गजल

मौसमी प्रीत में अबके भरम आइल बा।
राज रूप के जंगलन में भुलाइल बा।।

संगे-संग पतझड़ का अगुआन बनके ।
बगियन में फूलन के बहार आइल बा।।

जाने कइसे एक-दोसर के धरम बाँची।
गवें से गांव में फेरू फाग आइल बा।।

ऊ ना आपन मन के बात कहस कबहूँ।
हमार जबान त जज्बात से सिआइल बा।।

आँख से उनका आइल सनेस नेह के।
होठ बाकिर इनकार में फड़फड़ाइल बा।।

जिनगी इनकर-उनकर राह का ताकी।
नजर में फरेब का दुनिया समाइल बा।।

उनका हर पिआस के हल बा ‘कौशलʼ।
दरद जिनका जिगर में मुसकाइल बा।।
@कौशल मुहब्बतपुरी

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