रोज-रोज काका टहल ओरियइहें

भीरि पड़ी केतनो, न कबों सिहरइहें.. रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! भोरहीं से संझा ले, हाड़ गली बहरी जरसी छेदहिया लड़ेले सितलहरी लागे जमराजो से, तनिक ना डेरइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! गोरखुल गोड़वा क,रोज-रोज टभकी दुख से दुखाइ सुख, एने-ओने भटकी निनियों में अकर-बकर, रात भर बरइहें! रोज-रोज काका, टहल ओरियइहे! फूल-फर देख के, उतान होई छतिया छिन भर चमकी सुफल मेहनतिया फेरु सुख-सपना शहर चलि जइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! छोटकी लउकिया, बथान चढ़ि बिहँसे बिटिया सयान, मन माई के निहँसे गउरा शिव कहिया ले भीरि निबुकइहें! रोज-रोज काका,…

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हम गाँव क हईं गँवार सखी

हम गाँव क हईं गँवार सखी! हम ना सहरी हुँसियार सखी! बस खटल करीला सातो दिन, आवे न  कबो  अतवार  सखी! हम गाँव क हईं गँवार सखी! लीची,अनार,अमरूद,आम, सांझो बिहान खेती क काम, घेंवडा़,लउकी,धनिया जानी, ना जानीं हरसिंगार सखी!हम गाँव क हईं गँवार सखी! इहवाँ जमीन बा बहुत ढेर, असहीं उपजे जामुन आ बेर, इ गमला में के फूल ना ह, जे खोजे सवख सीगांर सखी! हम गाँव क हईं गँवार सखी! गोबर-गोथार , चउका-बरतन, अंगना,दुअरा सब करीं जतन, दम लेवे भर के सांस न बा, बानीं तबहूं बेकार सखी!…

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पंछी उड़त गगन छिछिआए

पंछी उड़त गगन छिछिआये।   अइसन उठल बवण्डर-अंधर जाना कहाँ,कहाँ चलि जाय। पंछी उड़त गगन छिछिआये॥   तनिक हवा के दया न आइल टूट-टूट खोंता उधिआइल टूटल डाढ़ बसेरा उजड़ल ना निशान कुछ जगह चिन्हाए पंछी उड़त गगन छिछिआये॥   नीड़ गिरल कुछ नदी नीर में ताल-तलइया नहर-झील में भुंइ भूखे कुछ मरे डूब जल पर बिनु बचवन उड़ ना पाये। पंछी उड़त गगन छिछिआये॥   छींटल दाना जाल बिछल बा का उतरे चिड़िमार छिपल बा बिमल सोत लउके ना कतहूँ का पंछी ऊ प्यास मिटाये। पंछी उड़त गगन छिछिआये॥…

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वासकसज्जा

हुलस अंगना नूतन नेह, पसरल गेह खनक कंगना।   गदगद गात सुहावन सिहरन उमगल चाल अपार पुलक मन आपन आन, एक समान हरख नयना।   चान लुटावत जोती निरमल निरखत नखत गगन से अविकल मुखड़ा गोर, नित चितचोर रटत रटना।   दीप जरा चितवे अपलक पथ मिलन आस पिय के सुधि में रत आहट जानि, घूंघट तानि निरख सजना।   संगीत सुभाष, प्रधान सम्पादक- “सिरिजन”, भोजपुरी पत्रिका।

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नदिया भेदवा खोलत बिया

करिआ चितउरि बोलत बिया।   कर्फू लागल बहरा  बा सांसन ऊपर पहरा बा खाली खतरे खतरा बा   नइया डगमग डोलत बिया।   घरवो के भीतरा डर बा गांवन से बुरा खबर बा बांचल ना कौनो दर बा   नदिया भेदवा खोलत बिया।   – डाॅ. हरेश्वर, सतना

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गीत

आफत बनके आइल कोरोना, अजी हम सुकवार नइहर की।   आटा सानत मोरी मुरूके कलाई, मुरूके कलाई अजी जीउ जर जाई, ओह पे ताना मारे सास! कहें काम इ तिहारी, अजी हम सुकवार नइहर की।   आफत बनके आइल कोरोना …   बरतन माजत मोरी हाथ करिआई, हाथ करिआई सगरी देह मरूआई, ओह पे लेबे चुटकी देवरा ! कहें काम इ तिहारी, अजी हम सुकवार नइहर की…     आफत बनके आइल कोरोना ….   मचकल कमर तबो झाड़ू लगाई, झाड़ू लगाई अजी पोछा लगाई, ओह पे मटक मटक के…

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वारि जाऊँ ए सखी

वारि जाऊँ ए सखी,2 हो बबुअवा निरखि वारि जाऊँ ए सखी॥   सुघर-सुघर हाथ-गोड़, सुघर नयनवाँ सुनि लागै बोलिया, बोलत मयनवाँ अचके मुसुकी परखि, वारि जाऊँ ए सखी। हो बबुअवा निरखि, वारि जाऊँ ए सखी॥   बिहँसेला बाबू, झलके दंतुलिया बेर-बेर मुँहवा,  डारत अंगुलिया कबों धऊरे लपकि, वारि जाऊँ ए सखी। हो बबुअवा निरखि, वारि जाऊँ ए सखी॥   कबों चले घुसुकी आ कबहुँ बकइयाँ अँगुरी पकड़ि के चलत पइयाँ-पइयाँ कबों पउवाँ थिरकि, वारि जाऊँ ए सखी। हो बबुअवा निरखि, वारि जाऊँ ए सखी॥     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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