चम्पा-चमेली फूल फूलि-फूलि महके गइल सखी सावन एहू साल नहके। गांव आ नगर घूमे मोरा पांखे बदरी कइसे उड़ाईं ना – उड़ेले मोर चुनरी एक ओर भींजे जाले एक ओर भरके।गइल0 गमकेले धूर जइसे घीव-गूर मीस के इमिर-झिमिर देव ओरिन बरीस के बूंद-बूंद तन प’ हवन अस लहके।गइल0 आंख मोर सिकरी दुअरिया प’ लटके कनवां में गीतिया जनाय बासी टटके मन मोर मटिही देवाल अस भसके।गइल0 कवना लय चूरिया कवन लय कंगना कवना लय गावेला सावन मोर सपना कवना लय देंहिया कदम्ब अस लचके।गइल0 आनन्द…
Read MoreCategory: भोजपुरी गीत
हँसि हँसि अँजुरी भरे !
रतिया झरेले जलबुनियाँ, फजीरे बनि झालर, झरे फेरू उतरेले भुइयाँ किरिनियाँ सरेहिया मे मोती चरे ! सिहरेला तन , मन बिहरे बेयरिया से पात हिले रात सितिया नहाइल कलियन क , रहि रहि ओठ खुले पंखुरिन अँटकल पनिया चुवत खानी दिप-दिप बरे ! चह-चह चहकत/ चिरइयन से सगरों जवार जगे- सुनि, अँगना से दुवरा ले तानल मन के सितार बजे छउंकत बोले बछरुआ मुंडेरवा पर कागा ररे ! सुति-उठि धवरेले नन्हकी उघारे गोड़े दादी धरे बुला एही रे नेहे हरसिंगरवा दुवरवा पर रोजे झरे बुची, चुनि-चुनि बीनेले…
Read Moreमड़इया मोर झाँझर लागे
गरमी के तिखर किरिनिया मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ दँवकेले पातर छन्हिया, मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ खाँखर पतलो क खर ले , खरकि गइले सरल रसरिया क बान्हन सरकि गइले हरका से हिलि जाले थुन्हिया मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ सावन – भदउवाँ क रतिया ओनइ परे सरवत छन्हिया के संगही नयन झरे बरे जब नाही चुल्हनिया मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ जेठवा मे जइसे कि अगिया लवरि बरे लुहवा लहकि मोरा भितरा सुनुगि जरे अदहन बनि जाला पनिया मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ रोपनी से…
Read Moreसुखेला नयनवाँ
कईसे के जिहं माई तोर ई ललनवाँ सूखि जाले धरती सगरौ सुखेला नयनवाँ कईसे के जिहं माई…….। सुबहा के घाम लागे जेठ के दुपहरी कउनो नखतवा देखालै नाहीं बदरी तपते त बीत गईल ई अषाढ़, सवनवाँ कईसे के जिहं माई……..। झुरा अकाल साल सालै परि जाला चईति अगहनी के बीज जरि जाला छोड़ि गाँव चिरई,चुनमुन उड़ि गइलन बनवाँ कईसे के जिहं माई…….। कईसे के होई आगे पूतन के पढ़ाई कईसे करब माई बेटी के विदाई कईदा तूँ माई मोर पूरा ई सपनवाँ कईसे के जिहं माई……..। बुधिया बीमार बनलि कपरा…
Read Moreगीत
हमरा पर बाबू जी रहम रउरा करीं गइया बछरुआ नीयर दान जन करीं काहे करतानी बाबा सभे लोग के नकल मत करीं हमके नइहरवा से बेदखल अँखिया में बेटिया के लोर जन भरी गइया बछरुआ……………………… धक धक करेला हमरो करेजवा का जाने कइसन मिली ससुरवा सोंचत अँखियाँ से लोर मोरे झरी गइया बछरुआ………………….. हम हूँ बनब राउर बुढ़उती के लाठी आपना करेजवा के जन करीं काठी बतिया पर हमरा विश्वास तनी करीं गइया बछरुआ……………………….. पढ़ लिखी के हमहूँ नाव राउर करब फेर हम करब जवन रउरा…
Read Moreभिनसहरा
”फूटल , किरिनिया ,त, मन, मुसूकाइल बिहंसल, भोर- भिनसार , लक-दक फुलवा, के, भरल बगइचा से , धरती के सोरहो सिंगार i उचरत- कगवा ,लेअइलस , सनेसवा , बहुरल ,दिनवा ,हमार , पुरुबी -बयरिया ,उड़वलस अंचरवा … … चुनरी भरल, कचनार i मुंहवा के ,पनिया, सजनिया ,निहारे ख़ुशी -ख़ुशी ,ओसरा , दुवार उदित सुरुजवा के ,जगमग, ज्योतिया से, चहु दिशी ,सब उजिआर i घर के पूरनिया , जे ,दूअरा बइठी के , सुमिरेलें, डीह-डीहवार , मारे, किलकारी ,सब, लइका -लइकिया , बरसेला ममता अपार! गांव…
Read Moreगीत
सपना मे सुध–बुध के खेती अंगे-अंग कचनार । सखी रे, अइसन होला प्यार । लैला-मजनू हीर के देख प्रेम मे पसरल पीर के देख राधा के पायल के धुन पर मुरली के तस्वीर के देख श्रवण के कांधे के बहँगी जगत भइल उजियार । सखी रे, अइसन होला प्यार । लक्ष्मण,राम,भरत सम भाई दुर्दिन मे जे साथ निभाई भूखा रहके भाग्य जगावे अइसन जग मे चाही भाई । जब भाई के प्रेम कथा सुन छलके लोरन के धार । सखी रे, अइसन होला प्यार । यमुना तट…
Read Moreदेंह फागुन महीना हमार भइल बा
जहिए से नैना दु से चार भइल बा, इंतजार में मजा बेसुमार भइल बा I पह फाटल हिया में अंजोर हो गइल, पाँख में जोस के भरमार भइल बा I जाल बंधन के तहस नहस हो गइल, संउसे धरती आ अम्बर भइल बा I पूस के दिन बीतल बसंत आ गइल, देंह फागुन महीना हमार भइल बा I महुआ फुलाइल आम मोजरा गइल, हमरा दिल में नसा बरियार भइल बा I डॉ. हरेश्वर राय, सतना, मध्य प्रदेश
Read Moreकवन गीत हम गाईं बसन्ती
कठुआइल उछाह लोगन के, मेहराइल कन -कन कवन गीत हम गाईं बसन्ती पियरी रँगे न मन !! हर मजहब के रंग निराला राजनीति के गरम मसाला खण्ड खण्ड पाखण्ड बसन्ती चटकल मन – दरपन !! गठबन्धन के होय समागम तिहुआरी टोटरम के मौसम धुआँ -धूरि कोहराम मचावे धरती अउर गगन !! गलत कलेण्डर के तिथि लागे जे देखs ,बउराइल भागे कोइलरि गइल बिदेस भँवरवा गड़ही – तीर मगन !! हिम-तुसार-बदरी घिरि आइल जाय क बेरिया माघ ठठाइल चुभ-चुभ धँसे बरफ के टेकुआ सन् सन् चले पवन…
Read Moreभोर हो गइल
खोल द दुआर, भोर हो गइल। किरिन उतर आइल, आ खिड़की के फाँक से धीरे से झाँक गइल, जइसे कुछ आँक गइल, भीतर से बन्द बा केंवाड़ी त बाहर के साँकल के पुरवाई झुन से बजा गइल, आँगन के हरसिंगार, दुउरा के महुआ जस, चू-चू के माटी पर अलपना सजा गइल, ललमुनियाँ चहक उठल, बंसी के तान थोर हो गइल।। रोज के उठवना जस, ऊठ, अब जाग त किरिन-किरिन जूड़ा में खोंस ल, झुनुक-झुनुक साँकल से पुरवाई बोलल जे, पायल में पोस ल ; अँचरा से महुआ के गंध झरल हरसिंगार…
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