घास क रोटी कोइ बतावै फिर कउनो राजा खइलस का हम कुरबानी काहे देहीं जे देहलस उ पइलस का। महल बनउलस शिला तोड़ जे अपन नाम लिखइलस का कउनो कोने खोज बतावा उ अपनो कुटी बनइलस का। सार गला संसार रचयिता जाना इहा कमइलस का मजदूर बोल जग हँसी उड़ावै कोइ हाँथ कपारे धइलस का। चीर धरा जे अन्न उगावस आपन पीर सुनइलस का भात महीनका जे चभकै उ पूछा स्वेद बहइलस का। चान छुए में बाउर जन बसुधा क साध पुरइलस का सूरज भेटै सबै…
Read MoreCategory: भोजपुरी कविता
कुकुरिया
भूँक कुकुरिया भूँक तोके राम भूँकावै भूँक नइहर खइली सासुर खइली खइली पास पड़ोस गिन-गिन देवता पित्तर खइली तवनों पर अफसोस आँख खोल के देख बउरही मचल हौ थूकम थूक। के के नाही कुंआ झंकउली के के ना तरियउली भलमनुसन क रस्ता छूटल अइसन दाँत गड़उली सोच सोच के कारस्तानी उठै करेजे हूक। जेकरे माथे बेइल फूलै ओकरे घर कुकरौंछी हाँडी बिछै हाड़ बरावै तुलसी तर मुँहझौंसी का देखीं मुँह बरै रोवाई जल्दी मुर्दा फूँक॥ कैलास गौतम
Read Moreनीति
तिन्हकर घर सुख चैन रहे जहँ धी सुधिया, तिअई सुमुखी। भृत्य भरोसी, इच्छित वित्त, धनी अपनी सबरंग सखी। अतिथि सेव, देव पूजन नित, मधुर अन्न-रस की जिवनारी, बितत नित्य साध के संगति जीवन धन्य उहे घरुआरी। जवनि हाथ दान नहिं जाने स्रवन सहे नहिं सुक्ति उदेसा। दरस साध आँखि अनजानल, पैर भ्रमे ना तीरिथ देसा। धन अकूत अरजे अनरीत, भरल पेट सिर तुंग गुमाना रे नर लोमड़ सहसा त्याग नीच देह अघ के पैमाना। करइल गाछ न लागे पात दोखी का मधुमास रामजी! दिन चढ़ते उरुआ चुँधियाय का सूरज उपहास…
Read Moreभोर के गद
मूठरी घाम गुलेट खोंस गइल ह जंगला के फाँक में अखबारी टेल्हा सूरुज कुछ अगिते। एगो चिड़ा ओरी त झूलत नसेनी प पसार रहल बा प्रेम। अनमुन्हे के फींचल गँड़तर हरकऽता। पाँख छितनार मूरुख चिड़ी खोज रहली ह गूलर के फूल। फिजूल। सकल कपट अघखानि सकल पँड़या सरबजनिक नल प बलटियन पानी छछरावत गावऽता बेहया अस- “रधिका औगुन चित न धरऽ।” “ढकरचाँय-ढकरचाँय, कील खिआ गइल साइद, तेल डाल, खोंट बा का काने? कवन एकटंगे ठाड़ बिया होने घूघ तान, बहरे से आके? उजबक अस। गड़ही का पानी सूख गइल का?…
Read Moreसात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा
सात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा बेंचा गइलें स बैल दुआर कुछ दिन रहल उदास बाकिर सन्तोषो ई कम ना रहल कि अतना जोतइला के बादो निकल गइल दाम गहँकी अइलें स तय भइल दाम धरा देल गइल पगहा पगहा धरावत दाम धरत माथ पर गमछा धइल ना परल भोर रिटायर होत समय चाचा सोचलें आ सोचल आपन सगरो गवलें कि रहब गाँवे खेत-बधार घूमब रिटायर भइला के साले-दू साल बाद बँटा गइल घर चूल्हा-चउका फरिया गइल गुमसुम रहे लगलें चाचा एह गुमसुमी के लागल कतने माने-मतलब कबो अन्हारें कबो…
Read Moreडिजिटल जमाना अउर रामधनी बब्बा
खुद से त अब नाही उनकर कइल बा लड़िकन के बुद्धि पे पत्थर धइल बा मोदी क अभियान का चल गइल बा रामधनी बब्बा क फजीहत भइल बा जब से खुलल हउए जनधन क खाता खाता में रुपिया न आवत न जाता कुछ गड़बड़ी बा रुकल बाटे पेंशन बब्बा से ज्यादा हौ आजी के टेंशन न पइसा मिली त चली काम कइसे बिना माल मुद्रा क आराम कइसे टूटल हउए खटिया फटल बा रजाई इ सुरति सुपारी कहाँ से अब आयी बब्बा लगवअत हयन खूब चक्कर घुमावअत बहुत हउए…
Read Moreकुछ दिन बचके रहअ गुरु
कुछ दिन बचके रहअ गुरु घर में घुस के रहअ गुरु केहू से मत तनिक सटअ सबसे कट के रहअ गुरु फइलल बाटै खूब कोरोना ख़ूब मचल हौ रोना-धोना कउनो दवा न असर करत बा नाहीं कउनो मंतर टोना चीन से फइलल दुनिया भर में गाँव-गाँव में,शहर-शहर में एक लोग से अउर लोग में एक घरे से, दुसरे घर में सर्दी से शुरुआत करअ ला खाँसी दिनों रात करअ ला फिर जम के बुखार देला ई किडनी पर फिर घात करअ ला पहिले चीन में ठोकलेस ताल फिर इटली…
Read Moreसावन भादो फेल भइल ह
जेठ में अइसन खेल भइल ह सावन भादो फेल भइल ह । नदी नहर फूफकरले बाटे ताल पोखर भी भरले बाटे धान क बिआ सांस ना लिहलस अइसन इहां झमेल भइल ह सावन भादो फेल भइल ह । केकर लगल ह उल्टा बानी लूह के बदले बरसे पानी ललका पानी भरल सिवनवां पूरा रेलम रेल भइल ह सावन भादो फेल भइल ह । तेलहंडा में गइल किसानी कइसे रइहें पशु परानी का खइबा का देहं लगइबा महंगा सरसो तेल भइल ह सावन भादो फेल भइल ह । सांचो में भठजुग…
Read Moreकेकरे ख़ातिर
दिनवा दिनवा भागत हउवअ केकरे खातिर रतिया रतिया जागत हउवअ केकरे खातिर बीवी-बच्चा ख़ातिर भी ना समय बचत बा ऑफिस में ही सारा-सारा समय कटत बा पइसा त आवत बा लेकिन जीवन बा फीका पइसा खर्च करअ क टाइम कहाँ मिळत बा बहरअ रहअ चाहत हउवअ केकरे खातिर झूठअ मन बहलावत हउवअ केकरे खातिर करअ नौकरी के रोकत बा खूब करअ खिंचअ रुपिया के टोकत बा खूब धरअ लेकिन अपने देहियों क तनी करअ फिकिर के कहले बा नया जमाना देख मरअ बेटाइम क चाभत हउवअ केकरे खातिर छुप के चूरन फांकत हउवअ केकरे खातिर दूसरे क बस देख -देख क होड़ मचल…
Read Moreबगल में छुरी
आन्हर बहिर गरहो से गहिर पोतले चन्नन उजरे पहिर। ओढ़ले कमरी लिहले गगरी बिष से भरल चललें डहरी। कुछहू बोलत सगरों डोलत सरम छोड़िके गठरी खोलत। कुछ के बटलें सभके कहलें मुँह पर ढकनी बन्हले रहलें। कउड़ा तपलें उलटा जपलें बाउर माहुर सोझहीं नपलें। करमें भगलें धउरे लगलें हाथ जोरिके मफ़ियो मगलें। राखीं दूरी मिलें त थूरीं जिनके मुँह राम बगल में छुरी॥ डॉ जे पी द्विवेदी संपादक भोजपुरी साहित्य सरिता
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