चढ़ल उतर गइल

हमार बाउजी जब अपना लइकाईं के बात बतइहें त मन बहुत परसन्न हो जात रहे I लागे फुलझड़ी छूटे हँसी के I  हँसत-हँसत पेट बथे लागे I ओहि बतियन में से आज एगो बाति इयाद आ रहल बिया I चइत बइसाख के महीना रहे I पुकारी बाबा के खरिहानी में गहूँ दवाँत रहे I मोटकी आरी प जगजीतन चा माथ प तेलहन के एगो छोट बोझा लेले आवत रहन I जब  भीरी अइले त माथ के बोझा उतार के बाबूजी से कहले “का हो माह्टर का हाल चाल बा ? सब ठीक ठाक ?  बोलत काहे नइखs, मुँहवाँ…

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“छापक पेड़ छिउलिया त पतवन गहबर….”

लोक साहित्य मे भारतीय सां स्कृति क छवि देखकै मिलै ले। समाज के सब रूपन से परिचित करवालै।आज के समय में जहाँ सम्बन्धन क कउनो मान ना रहि गयल बस रस्म अदायगी तक उहाँ जरूरी हो जाला हमने अपने परम्पराअउर लोक व्यवहार पर चिन्तन कयल जाय।काहे से कि आजकल एकर लोप होत जात बा।लोक जीवन में सामाजिक धार्मिक आथिर्क पझ क छटा देखेके मिलेला। आज भी गाँवन में सयुंक्त परिवार क बोलबाला बा सब लोग एकसाथ एक घर मे रहैनै,हमरे इहाँ लोकगीत मे आदर्श सम्बन्ध क रूप देखैके मिलेला। पति…

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