गीत

जानके केहू आहत कईल जान के तान के तनके तनके नयन बान के   केस छितरावत घेरत गगन में घटा फूल अस कोमल अंगन के अजबे छटा फूल उपमण्डल चेहरा  लगे चान के   नाम ओठन पर आंखिन में सूरत बसल आस तूरत ना  पूरत जरूरत असल ओही मूरत के देवी जपी मान के   घाव उसुका के  मुसुका के मारत रहे प्रान ओही के पल पल पुकारत रहे चैन जारत उजारत जे  असमान के   लोक रीति के कवन बात संजोग के खुस बा सोमेश लेके कठिन रोग के…

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बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले

विधना का लिखना पर जरि जरि बुताले। बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले..   बिचरत चरिवातन पर दूर दूर रोले आवत छावत अन्हार अकड़ि अकड़ि बोले लखि के कुलबोरन के लोरन नहाले बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले..   असमय अरियात रहनि समझ में न आवे उमरत बेढंग बान घेरी के चलावे घाव घोर मनवा के तनवा के शाले बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले..   करकत दरकत करेज आसमान फाटे छूटत चिनगी जिनगी रहि रहि दिन काटे चमके दमके सोमेश लमके नहाले। बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले..  …

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पहुना भइल जिनगी

कब दरक गइल जियरा उधियाइल भिनुसहरा अब टोवत बेवाई सभे अहमक़ कहाई । साटल पेवना भइल जिनगी ॥   घाव बाटे जियतार टकटोरत बार बार उहाँ उजार खोरिया देखीं जवने ओरिया काँच खेलवना भइल जिनगी ॥   बड़की बिटिया सयान सभे उझिलत गियान दाना ला मोहताज कइसे चली राज काज ओद लगवना भइल जिनगी ॥   माँग बहोरि आंखि नम पायल बाजल छमाछम केहरो मन के खटास टूटि बिखरल बा आस बिसरल चूवना भइल जिनगी ॥   घरे खलिहा सिकउती इचिको नइखे बपउती कहवाँ बाटे चउपाल भर गउवाँ बा बेहाल…

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बिला रहल थाती के संवारत एगो यथार्थ परक कविता संग्रह “खरकत जमीन बजरत आसमान “

मनईन के समाज आउर समय के चाल के संगे- संगे  कवि मन के भाव , पीड़ा , अवसाद आउर क्रोध के जब शब्दन मे बान्हेला , त उहे कविता बन जाला । आजु के समय मे जहवाँ दूनों बेरा के खइका जोगाड़ल पहाड़ भइल बा , उहवें साहित्य के रचल , उहो भोजपुरी साहित्य के ,बुझीं  लोहा के रहिला के दांते से तूरे के लमहर कोशिस बा । जवने भोजपुरी भाषा के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग सुनल भा बोलल ना चाहेला , उहवें  भोजपुरी  के कवि / लेखक के देखल ,…

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माथे कS सिङार बाबूजी

बाटें भरि भरि के आपन दुलार बाबूजी । तोहीं हमनी के माथे कS सिङार बाबूजी ॥   सभके नियमित जगावें नेह बचवन पर लुटावें करें नेहिया के बारिस हर बार बाबूजी ॥ तोहीं हमनी के…..   दरदिया सिरहीं उठावें हँसि बिहँसि के दुलरावें कइने दिन रात आपन निसार बाबूजी ॥ तोहीं हमनी के…..   बीपत कइसनो लहरे उनके समने न ठहरे सहलें समय क मार , हर बार बाबूजी ॥ तोहीं हमनी के…..     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  

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कबले होइहं गवनवा हमार

कबले होइहं गवनवा हमार भउजी। बाटे मौसम मे आइल खुमार भउजी।   बसंती हवा चले देहीयां दुखाता। कोइलर के बोलियो माहुर बुझाता। नीक लागे ना पायल झंकार भउजी। कबले होइहं गवनवा हमार भउजी।   सरसो के खेतवा मता के पिअराइल। आमन के बगिया बा खूबे मउराइल। सून्न लाग$ता सगरो जवार भउजी। कबले होइहं गवनवा हमार भउजी।   अपने बहिन से  बियाह रचवइलू। ओकरे बाद आजू ले ना बोलवलू। भइल फागुन मे हमके बुखार भउजी। कबले होइहें गवनवा हमार भउजी।   अब गवना करा द तोहार गुन गाइब। लइकन के तोहरे…

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ऑक्सीजन से भरपूर ‘पीपर के पतई’

कहल जाला कि प्रकृति सबके कुछ-ना-कुछ गुण देले आ जब ऊहे गुण धरम बन जाला त लोग खातिर आदर्श गढ़े लागेला। बात साहित्य के कइल जाव त ई धरम के बात अउरी साफ हो जाला। ‘स्वांतः सुखाय’ के अंतर में जबले साहित्यकार के साहित्य में लोक-कल्याण के भाव ना भरल रही, तबले ऊ साहित्य खाली कागज के गँठरी होला। बात ई बा कि अबहीने भोजपुरी कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के पहिलकी कविता के किताब ‘पीपर के पतई’ आइल ह। ई किताब कवि के पहिलकी प्रकाशित कृति बा बाकिर ऊहाँ…

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जेब कट गइल थाने में

एक दिन गइली रपट लिखावे , घबड़ाइल कुछ माने में । का बतलाईं ये भइया मोर जेब कट गइल थाने में । मुंशी अउर दीवान भी रहलन , थाना के परधान भी रहलन । दु एक लोग महान भी रहलन,कुछ मुजलिम मेहमान भी रहलन आँख मुदाइल भागल अइलीं , गइलीं चाय दुकाने में । का बतलाईं ये भइया मोर जेब कट गइल थाने में । रह गइलीं बुड़त उतिरात , कहीं त कहले बिगड़े बात । देखते देखत अस उत्पात , ओरी क पानी बड़ेरी प जात । चाय पियइलीं…

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बबुआ बोलता ना

कहवाँ से आवैला कवन ठाँउ जइबा,बबुआ बोलता ना, के हो दिहलें तोहके बनवास, बबुआ बोलता ना!   कवने करनवाँ बतावा अइला बनवाँ? कोने कोने घूमला भंवरवा जइसे मनवाँ कउनी हो नगरिया में अंजोरिया नाही भावै, बबुआ बोलता ना, कहवाँ रात भावै बरहो मास, बबुआ बोलता ना!   रूठि गइलीं रिधि-सिधि चललीं रिसियाइ के कउनी हो नगरिया मे अगिया लगाइ के कहवाँ के लोगवा के भोगवा नाही भावे, बबुआ बोलता ना, दिहलै तोहके घरवा से निकास, बबुआ बोलता ना!   बिधना जरठ मति अटपट कइलै रे किया कवनों भूल तीनों मूरति…

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पगलो आजी

ओह दिने गाँव के प्राथमिक इस्कूल में कवनों बरात रुकल रहल।खूब चहल-पहल रहल।हमहन के घर के समनवे वाला खेत में तम्बू गड़ल रहल अउर बराती लोगन क खूब स्वागत -सत्कार होत रहल।लाउडस्पीकर पर ‘हाँथे में मेहँदी , माँगे सेनुर , बरबाद कजरवा हो गइल हो…।’ बजत रहल।ओहर समियाना में जेतने किसिम क गाना बजे एहर घर में आजी ओतने किसिम क गारी तजबीज के बाबा के आवभगत में लगल रहलीं।हम ओह समय कक्षा तीन में पढ़त रहलीं। न त गाना क महातम समझ में आवे न त गारी क।बस एतना…

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