भोजपुरी साहित्य में प्रेम अउर सद्भावना

लोक में रचल-बसल भोजपुरी भाषा आ ओह भोजपुरी भाषा के मधुरता आ मिठास, अपना जड़ से मजबूती से जुड़ल समाज आ ओह समाज में पसरल रीति-नीति के आपन अलग विशेषता बाटे। अपने एही विशेषता के संगे अलग- अलग सोपान गढ़त, ओके सजावत-सँवारत, ओकरे भीतरि के सुगंध के  अलग-अलग तरीका से अलग-अलग जगह बिखेरत भोजपुरी भाषा सदियन से गतिशील रहल बा आ अजुवो ले बा। अपना रसता में आवे वाला कवनो झंझावत से उपरियात, समय के मार के किनारे लगावत अपने भीतरि के ऊष्मा जस के तस अपने में समुआ के…

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ठकुरान के ठसक

विंध्य के पहाड़ियन के घाटी में बसल गाँव आ उहाँ के रहनिहारन के एगो अलगे सुघरई होले। पहुनई में त करेजा काढ़ि के रख देला लो, बाकि मोछ के बात आ गइल बेखौफ आर-पार करे खातिर उतर जाला लो। खेती- किसानी आ गोरू-बछरू से नेह छोह राखे वाला लो अपनइत नीमन से निबाहेला। अइसने एगो गाँव के बाति जवना गाँव में ढेर बाभन लोग रहे। ओह गाँव में अउरो जात धरम के लोग रहे बाकि एगो खास बात उ ई कि ओह गाँव में एगो राजपूत परिवारो बसल रहे। धन…

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देयाद

अलगाउज आँगना व्यथा औरी , मुंसुकी छाँटि व्यंग भर दौरी । मुँह बिजकल नियत बा खराब , घोर दुसुमन बनल देयाद बैरी । देयाद देयादी जरी भईल भौंरी , हर बात में हरदम जोरा-जोरी । दाजाहिसी देखजरूआ भईल , घोर दुसुमन बनल देयाद बैरी । ठेन बेसहेलन धूरी जेवर बरी , रेर हरदिन करे ढेरी बलजोरी । भोज- भवदी सभ छुट गईल , घोर दुसुमन बनल देयाद बैरी । चाल-ढाल बात -बतकही गैरी , बुझल धधकावेले खोरी-खोरी । अपनउज भाईचारा सभ गईल , घोर दुसुमन बनल देयाद बैरी । उमेश…

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धन पसु

बहेंंगवा-लफंदर बन घूमत रहन , ई त आहे प ढेला ढोवत रहन , अब त दिन – दूना रात – चौगना , बबुआ बड़हन नेता बनी बढ़न । पीठे पोछ फेंकी पिलकईलन , सभकर सलाह चुतरे दबईलन , सुमति टेरि कुमति के दाता भई , आग-पाछ विचारवा भुलईलन । नेत-धरम पीठिअउरा कईलन , सभके पछाड़ अगउरा भईलन , सभके एके लऊरी हंकलन , बनलो काम सभ बउरा कईलन । गोल बनाई गोलदार बनलन , सभके लूटि चौकीदार बनलन , सभकर त धन बाईसे पसेरी , कुबेर बन अवकातो थहलन। टटका…

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सोहर

घरवा में जनमेली बिटिया त , हिरीदा उमंग भरे हो। बबुनी तोहरा प सब कुछ नेछावर, सोहरियो सोहरि परे हो। बाबा खुशखबरी जे सुनले, धधाइ घरवा अइलन हो, बबुनी पगरी के पाग सोझ कइलन, मोछिया अइठी बोलेहो। गुरु जी के अबहीं बोलईबी, पतरा देखाइबि , ग्रह मिलवाइबि हो। बबुनी तुहीं मोरा कुल के सिंगार, सृजन मूलाधार हउ हो। सुनि सुनि अनध बधाव, जुटेले पुर गाँव, ले ले के उपहार नू हो। बबुनी तहके निहारे खातिर धरती, आकास लागे एक भइले हो। तहके पढ़ाईबि लिखाइबि , अकासे ले उठाइबि , दुनिया…

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निमिया के पात पर

निमिया के पात पर सुतेली मयरिया,ए गुंइया। क‌इसे करीं हम पुजनियां,ए गुंइया।। धुपवा जराइ हम ग‌इनीं जगावे,ए गुंइया। म‌इया का ना मन भावे, ए गुंइया।। गंगा जल छींटि छींटि,लगनी जगावे,ए गुंइया। म‌इया करो ना घुमावे,ए गुंइया।। अछत,चनन,छाक,ग‌इनी चढ़ावे,ए गुंइया। म‌इया का ना इहो भावे,ए गुंइया।। मालिनि बोला के कहनीं,मलवा ले आवे,ए गुंइया। म‌इया मूड़ी ना उठावे,ए गुंइया।। पूआ-पूरी ले के ग‌इनीं,भोगवा लगावे,ए गुंइया। म‌इया तबो ना लोभावे,ए गुंइया।। पुतवा बोला के कहनी,झुलुहा लगावे,ए गुंइया। म‌इया झट उठि आवे,ए गुंइया।। अनिल ओझा ‘नीरद’

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एगो चिरई गोहार लगावत रहत रहे

हमनी अइसन नगर में बसे खातिर रहली जा सरापित जेहवाँ सलीका के ना बाँचल रहे केवनो पड़ोस सिरमौर बनि के रहे जिनगी में तटस्थता बिना केवनो काम के प्रतिरोध एह घरी खलिसा एगो रूप मानल जात रहे मूर्खता के जेकरा किछुओ भेंटा जात रहे ऊहे मानल जात रहे रसूख़दार पद पैरवी पुरस्कारे से आँकल जात रहे केवनो आदमी के सरकारी संस्थानी ‘साहित्यभूषण’ के उपाधिए पहचान बनि गइल रहे बड़हन साहित्यकार के जे एक्को दिन क्लास में जाइ के ना पढ़ावत रहे ऊहे पावत रहे शिक्षक शिरोमणि के सम्मान चरने चाँपल…

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पंडित हरिराम द्विवेदी होखला के माने मतलब

पंडित हरिराम द्विवेदी से हमार रिस्ता 12 पीढ़ी पुरान ह। कांतिथ के परवा गाँव से आइल कश्यप गोत्रीय  3 भाइन के एगो परिवार में से एक भाई के खानदान से उहाँ के बानी आ दोसरा भाई के खानदान से हमनी बानी। उहाँ के 11 वीं पीढ़ी में बाड़ें आ हम 12वीं पीढ़ी में। माने ठसक के संगे दयादी बा आ उ अजुवो जियल जा रहल बा। लोकजीवन आउर लोक संस्कृति के कतौ जब बात होखे लागेला, त चाहे-अनचाहे लोककवि लोगन के भुलाइल संभव ना हो पवेला।भोजपुरिया जगत मे अनगिनत लोककवि…

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आपन बात

अझुरहट के सझुरावत ,रसता बनावत गवें-गवें आगु बढ़े के जवन तागत साहित्य से मिलेले उ कहीं अउर से भेंटाले कि ना, एह पर कुछ कहल एह घरी हमरा उचित नइखे बुझात। भोजपुरी साहित्य के धार के आपन बहाव ह,लहर ह,तरंग ह, हुहुकारल ह, फुफुकारल ह। ओही में आपन-आपन नइया लेके हिचकोला खात किनारा पहुँचे क ललक जिनगी के प्रान वायु लेखा बा। आजु भोजपुरी में जहाँ साहित्य के झोली भरा रहल बा, उहें एहमें ढेर विकारो आ रहल बा। जवने क हाल-समाचार समय-समय पर उतिरात रहेला। कई बेर साँच के…

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बाप के माल ह

इनकर उनकर सबकर दबा के हजम कइल रउरे चाल ह। बेसरमी से कहेलन बाप के माल ह।   कुछो जोड़-घटा द इहाँ उहाँ के कुछो सटा द कुछ गूगल से उधार करS बाचल-खुचल अनुवाद करS फेर कतनों अनवाद करS थेथरई त ढाल ह। बाप के माल ह।   एगो गिरोह बना ल कुकुर-बिलारो के मंच पर चढ़ा द जेकरा स के नइखे पता ओकरा शोध के काम पकड़ा द कबों अपनों विरोध करवा  द एह पर त सभे निहाल ह। बाप के माल ह।   कतों घुसुर के तर्क-बितर्क अपना…

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