भोजपुरी के मान्यता: केकरा पर करीं सिंगार कि पिया मोर आन्हर ?

भाषा खाली बतकही के जरिया ना होला, बलुक ई कवनो समाज के आत्मा, संस्कृति, इतिहास आ सामूहिक चेतना के ढोअल करे वाली शक्ति ह। भारत जइसन बहुभाषी देश में हर भाषा आपन एगो अलग संसार समेटले बा। भोजपुरियो ओही में से एगो समृद्ध लोकभाषा ह, जवन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड से निकल के मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद जइसन देशन ले फैल गइल बा। लगभग 20–25 करोड़ लोग भोजपुरी समझेला या बोलेला। बावजूद एह सब के, आज ई भाषा आपन घरे में आपन आस्तित्व के संकट से जूझत बिया। सबसे बड़ सवाल ई बा कि जब खुद भोजपुरिया समाज हिंदी आ अंग्रेजी के मातृभाषा माने लागल बा, त भोजपुरी के उत्थान कइसे होई?

भोजपुरी के जड़ बहुत गहिर बा। ई भाषा अपभ्रंश आ लोकभाषा के परंपरा से निकसल बिया। भोजपुरी के जनम ‘मागधी अपभ्रंश’ के पच्छिमी रूप से भइल कहाला। विद्वान लोग मानेला कि संस्कृत से पालि, पालि से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश आ ओकरा बाद आजु के भोजपुरी विकसित भइल बिया । ई सीधा सातवीं-आठवीं सदी के ‘सिद्ध साहित्य’ के भाषा से मेल खाले। गुरु गोरखनाथ आपन उपदेश में सरल भाषा के इस्तेमाल कइले, जवन आम लोग खातिर आसान रहे।

मध्यकाल में कबीर जइसन संत लोग अपना वाणी में लोकभाषा के प्रयोग कइले, जवन सीधा जनमानस तक पहुँचल। कबीर दास के उलटबाँसियन आ पद में भोजपुरी के पुरान रूप (पूर्वी बोली) साफ झलकेला। ओहिजे आधुनिक समय में भिखारी ठाकुर भोजपुरी नाटक के माध्यम से समाज के बुराई के सामने ले अइले। एही तरे राहुल सांकृत्यायन भोजपुरी के वैश्विक पहचान देवे में महत्वपूर्ण योगदान दिहलन।

ई सब बतावेला कि भोजपुरी खाली बोलचाल के भाषा ना, बल्कि एगो समृद्ध साहित्यिक आ सांस्कृतिक परंपरा वाली भाषा ह। भोजपुरी खाली बोले के माध्यम ना ह, ई संस्कारन के भाषा ह। सोहर, कोहबर, समदाउन आ जँतसार नियर लोकगीत ई साबित करेला कि ई भाषा सदियन से आम जनमानस के सुख-दुख के साथी रहल बिया।

आज भोजपुरी के सबसे बड़ा संकट बा- एकर आपन पहचान के। एक ओर गहिर परंपरा बा त दोसरा ओर बाजार के दबाव। एक ओर संत-परंपरा के विरासत बा त दोसरा ओर फूहड़ गीतन के भरमार। एक ओर विद्वानन के चिंतन बा त दोसरा ओर सोशल मीडिया के सतही लोकप्रियता। एह द्वंद्व में भोजपुरी फँस गइल बा।

आज भोजपुरी के नाम पर कइगो मंच आ मचान खुलल बा।  भोजपुरी के मान्यता खातिर आंदोलन रही रही के जोर पकडेला आ फेर अपने नरमा जाला। भोजपुरी के मान्यता के सवाल संसदो में कई बेर पहुँच चुकल बा। अलग-अलग समय पर कई सांसद लोग संसद में भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के माँग उठवले बाड़े। ई मुद्दा भारतीय संसद में बार-बार गूँज चुकल बा, बाकिर अबले तक ठोस निर्णय नइखे भइल। हर बार आशा जगेला, फेर ठंडा पड़ जाला। एहसे आम जनता में निराशा बढ़त जात बा।

समय-समय पर अलग-अलग ठेहा के भोजपुरी के सेवा के नाम पर शक्ति प्रदर्शन वाला आयोजन होत रहेला। सबके आपन टोल बा सबके आपन गोल बा। केहू केहू के लंगड़ी ना बझावे।  बस अतने संतोख होला कि मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, नेपाल आ खाड़ी देशन तक भोजपुरी बोलनिहार लोग बसल बा, आ यह तरह के मंच आ सामेलन ओहू लोग के एक जगह अपर जोड़ेला। एह सब सम्मलेन के अलोता मठाधीश लोग देश-विदेश में भोजपुरी के पहचान बनावे से जादे आपन पहिचान बढ़ावे के प्रयास करेला।  एहसे भाषा के वैश्विक पहचान केतना मजबूत हो रहल बा जनता देख रहल बिया। सवाल सोझ आ साफ बा कि का ई सम्मेलन जमीन पर भाषा के असली समस्या-जइसे अश्लीलता, शिक्षा में अभाव, साहित्यिक कमजोरी- के हल कर पावत बा? अगर ना, त हेतना देखावा बेकारे के बा!

फेर त सवाल वाजिब उठी कि – का मान्यता मिल जाए से सब कुछ ठीक हो जाई? मान्यता जरूरी बा, बाकिर ऊ अंतिम समाधान ना ह। ऊ खाली रास्ता खोले के काम करी। असली काम त समाज के भीतर होखे के चाहीं। अगर हमनी के खुद भोजपुरी बोले में शर्म महसूस करब, अगर हमनी के अपने लइका-लइकी से हिंदी या अंग्रेजीए में बात करब, अगर हमनी के अश्लीलता के बढ़ावा देत रही, त मान्यता मिललो के बाद भाषा के हालत ना सुधरी। माने मान्यता मिललो के बाद हाल उहे- केकरा पर करीं शृंगार कि पिया मोर आन्हर!

 

अगर हम इतिहास देखीं, त साफ बुझाला कि भाषा के असली ताकत ओकर समाज में बसल बा। गुरु गोरखनाथ, कबीर, राहुल सांकृत्यायन- ई लोग बिना कवनो सरकारी मान्यता के भाषा के ऊँचाई पर ले गइल। आज जब हमनी के मान्यता खातिर संघर्ष करत बानी, त हमनी के उनकर देखावल रहियो इयाद रखे के चाहीं जवना लोक से जुड़ाव रहे, सादगी आ सच्चाई रहे। अब समय आ गइल बा कि हमनी के आत्ममंथन करीं जा। सबसे पहिले हमनी के अपना घर से शुरुआत करे के पड़ी। लइका-लइकी के भोजपुरी सिखाईं, अच्छा गीत-संगीत सुनाईं, लोक-संस्कृति से जोड़ल जाव। सोशल मीडिया पर गलत चीज के विरोध करीं आ सही चीज के बढ़ावा दीं। जब समाज खुद जागी, तब बदलाव अपने-आप आई।

दूसर जरूरी बात बा-एकजुटता के। भोजपुरी के नाम पर काम करे वाला सब लोग के एक मंच पर आवे के चाहीं। व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़ के सामूहिक उद्देश्य के प्राथमिकता देवे के पड़ी। जब आवाज एक होई, तबे असरदार होई।

तीसर बात-संस्कृति के पुनर्जागरण करल जरुरी बा। लोकगीत, लोकनाट्य, कविता, कहानी-एह सब के फेर से जिंदा करे के जरूरत बा। गाँव-शहर में कार्यक्रम होखे, साहित्यिक गोष्ठी होखे, डिजिटल प्लेटफॉर्म के सही उपयोग होखे—एहसे भोजपुरी के असली रूप सामने आई। आज के साहित्य एगो अइसन चौराहा पर खड़ा बा जहाँ शब्दन के भीड़ त बहुत बा, बाकिर ओकर सही-सही प्रयोग के तरिका के अकाल साफ-साफ देखाई देता। जेकरा के कबो ‘साहित्यिक सृजन’ कहल जात रहल, उ अब ‘कंटेंट क्रिएशन’ में बदल गइल बा। अभिव्यक्ति के साधन जतना बढ़ल बा, ओतने साहित्य के आत्मा सिमटत नजर आवत बा। ई समय निस्संदेह साहित्य खातिर एगो गम्भीर “संक्रमण काल” बा, जहाँ गुणवत्ता से जादे संख्या आ लोकप्रियता के दबाव बढ़त जा रहल बा।

ई बात साँच बा कि आज के समय, खासकर भोजपुरी साहित्य खातिर, एगो चुनौतीपूर्ण दौर बा। गद्य के उपेक्षा, सतही अभिव्यक्ति आ लोकप्रियता के अन्हाराइल  दउड़  से साहित्य के गुणवत्ता प्रभावित हो रहल बा। बाकिर हर संक्रमण काल में नया जीवन के संभावना छुपल रहेला। इतिहास गवाह बा कि ऊहे साहित्य टिकेला, जेकरा में युग के सच्चाई, समाज के पीड़ा आ मानवीय संवेदना के गहराई होखे। एहसे जरूरी बा कि भोजपुरी लेखक फेरु गंभीर अध्ययन आ चिंतन की ओर लवटें, गद्य लेखन के मजबूत बनावें, आ साहित्य के दिखावा ना, बल्कि बदलाव के माध्यम बनावें। साथे साथ, पाठको लोग के चाहीं कि ऊ सतही मनोरंजन से आगे बढ़ के गहन साहित्य के महत्व देवे। काहे से कि, साहित्य खाली शब्द ना, समाज के निर्माण ह—आ अगर ई चेतना जिंदा रहल, त भोजपुरी साहित्य हर दौर में आगे बढ़त रही।

चउथी बात- मातृभाषा खातिर सम्मान के भावना जागे। जब तक हमनी के खुद अपनी भाषा के सम्मान ना करब, तब तक दुनिया से सम्मान के उम्मीद बेमानी बा। भाषा के मान्यता दिल में पैदा होखे के चाहीं, तबे कागज पर लिखल मान्यता के कीमत होई।

आज हमनी के सामने चुनौती के साथे अवसरों बा। अगर हमनी के सही दिशा में कदम उठाईं, त भोजपुरी फिर से अपना गौरव के ऊँचाई पर पहुँच सकेला। बाकिर अगर हमनी के अबहियों ना जागनी, त धीरे-धीरे भाषा के असली पहचान खो जाई। अंत में फेर उहे बात-“केकरा पर करीं शृंगार कि पिया मोर आन्हर।” अब समय आ गइल बा कि ‘पिया’ के आँख खोले के। मतलब-समाज के जागरूक बने के। जब समाज जागी, तबे शृंगार के असली अर्थ समझ में आई। तब भोजपुरी के मान्यतो सार्थक होई।

  • शशि रंजन मिश्र ‘सत्यकाम’, द्वारका, नई दिल्ली

Related posts

Leave a Comment