बिहारी मजदूर : एगो कविता: एगो व्याख्या

जब एगो कविता अपना छोटहन कलेवर में एगो मार्मिक परिवेश आ मनुजता के एगो बड़हन पीर-क्लेश के चित्र उगाहे आ बिना ठकठेन नधले साँच के तहे-तहे खोल के बतावे तब ऊ कविता साहित्य के बड़हन विभूति हो जाई, एमे कवनो शक नइखे। डॉ ब्रजभूषण मिश्र के रचल ‘बिहारी मजदूर’ अइसने काव्य-विभूति ह, जे साँझ के उदासी से उगत बा आ जिनगी के साँझ के झाँक देखा के बिसइ जात बा। कविता के शुरुआत अइसे होत बा-
रोजे-रोज जुटेलन स
स्टेशन पर
बिहारी मजदूर
झुंड के झुंड,
जवना के हाँकेला
एगो चरवाहा
जइसे कि माल-गोरू होखन स!
आ कविता ए तरी बिसवतिया-
गाँव के स्टेशन पर
रूकेला एक्सप्रेस
जहँवा उतार दियाला
लस्त-पस्त हालत में
बिहारी मजदूर,
ना त
ओकर सड़ाँध मारत
बजबजात लाश।
रोजी-रोटी खातिर आपन जमीन, घर-दुआर आ जमीर- सबके छोड़ के परदेश जाए के त्रासदी बिहारी लोग सुराज मिले के पहिले से देखत आ भोगत आ रहल बा, बाकिर सुतंत्रो होखला के बाद स्थिति उहे रह जाई, बलुक पहिलहूँ से बिगर जाई अइसन आशा त’ ना रहे। ई स्थिति बिहार के जटिल होत जा रहल पारिवारिक आ सामाजिक जीवन के साथे-साथ घाघ आ दाग-दाग हो रहल राजनीतिक व्यवस्था के भी परिचय दे रहल बा, जे स्वारथ में सउनाइल अपना खातिर त’ सुवरन महल बनावत जा रहल बा आ जे ओके पगरी दिहलस, ऊँच आसन पर बइठवलस, ओके मरे-बिलाए आ देसा-देसी छिछिआए खातिर बगेदत जा रहल बा। एह बगेदइला के दृश्य कवि के शब्दन में देखल जाउ-
डिब्बा में कोंचाइल,
बोरा अस लदा के
छल्ली लागल
भा छत पर पटाइल,
‘शहीद’, ‘जनसेवा’, ‘साबरमती’
धकधकात रेल
हो जाला ‘पवन’।
अपनन से दूर,
फाँकत सपनन के धूर
पहुँच जाला-
पंजाब, दिल्ली, गुजरात, मुंबई।
जाँगर ठेठावत,
रात-दिन एक करत,
जीयत-मरत
अंगुरी पर गिनेलन स
दिन-हप्ता-महीना-साल।
ई जरूर अखियान करे लायक बा कि बिहारी मजूरन के पलायन पहिले कलकत्ता आदि पूरबी बनिजिया कहाए वाला जगहन पर होत रहे। भिखारी ठाकुर के बिदेसी यद्यपि कलकत्ता कवनो दुख-तकलीफ से नइखन जात, मउज-मस्ती करे जात बाड़े, तबो उनकर प्रवास ई त बतावते बा कि ओघरी कलकत्ते गमनकेन्द्र रहे। ‘बिदेसिया’ के एगो दृश्य देखे लायक बा-
(एक ओर से पहिले बिदेसी आ दोसरा ओर से प्यारी सुंदरी के प्रवेश)
बिदेसी : हो प्रानप्यारी, सुनतारू?
प्यारी सुंदरी : का कहतानी, ए स्वामी जी?
बिदेसी : एगो सलाह बा।
सुंदरी : भला कवन सलाह बाटे?
बिदेसी : सलाह बा कि हमार मन करता जे
तनी कलकत्ता से जाके हो अइतीं।
सुंदरी : ए रवों, रउआ कलकत्ता जाए के कहत
बानीं, रउआ कवना बात के तकलीफ
बाटे?
बिदेसी : हमरा कवनो बात के दुख-तकलीफ
नइखे, बाकी हमार दोस्त अइलन हा
कलकत्ता से। कलकाता के समाचार
सुनि के हमरो तबीयत कइले बा कि
हमहूँ जाइब। हम पन्द्रह दिन में लवटि
के चल आइब।
(ll)
पाण्डेय कपिल के उपन्यास ‘फुलसुँघी’ में भी कलाविद महेन्दर मिसिर के कलकत्ता प्रवास के जिकिर बा आ एहिजो कारन आर्थिक नइखे। ई अलग बात बा कि जे जहाँ जाई ओहिजा कुछ काम करे के परी तबे पेट पोसाई। हँ, चेट के बरियार लोग जेकरा पर लक्ष्मी कृपालु बाड़ी, कुछ दिन, कुछ महीना-बरिस सुतलो रह के कचरमकूट मचा सकत बा।
महेन्दर मिसिर बनारस में, केसरबाई के कोठा पर अपमानित होखला के बाद, कलकत्ता के राह धइले रहले। रसिक हृदय मिसिरजी के ई ना बुझाइल कि उनके चेलहाइ में पूरबी के सिरमौर बने खातिर अभ्यासरत केसरबाई, गवनई में विद्याधरी बाई के हरावे के सपना देखत भले उनका(मिसिरजी के) प्रति समर्पित लउकत बाड़ी, बाड़ी ना। बनारस के राजा के सामने मिसिरजी के विद्या, ज्ञान आ प्रेम के कीमत कतना बा ई बात जब खुद मिसिरजी के लखार हो गइल त$ उनका पासे बनारस छोड़े के अलावे कवनो अउरी विकल्प बाँचते कहाँ रहे! एगो कलाकार खातिर अपमान मरन के समान होला। मरन माने मुअले ना, मुँह करिखियो लगावल होला। बाकिर देखे जोग बा कि जवन केसरबाई महेन्दर मिसिर के अपमानित करे में इचिको ना हदसली, ओही केसरबाई के दु:ख से पघिल के ऊ उनका खातिर नीमन-बाउर हर अधातम कइले।
महेन्दर मिसिर के कलकत्ता प्रवास उनकरा चारित्र के पोढ़ आधार दिहलस। उनका जिनगी में, एक बेर फेर, केसरबाई के आगम भइल, बाकिर दोसरा रूप में– एगो लकवा के मारल रोगिणी, जे काली माई के मंदिर के आगा हाथ पसरले भीख माँगत रहे। पहिले त’ ऊ मिसिरजी के देख के पराए के कोशिश कइलस बाकिर देह अबस होखे के वजह से परा ना सकल। मिसिरजी केसरबाई के टाँग के अपना डेरा पर ले अइले। उनकरा फसाना के फलाफल उपन्यासकार के शब्दन में–
“बनारस से राजा साहेब का साथे कलकत्ता आइल रहली केसरबाई। आलीशान कोठी। दरवान, नोकर, दाई, बाबर्ची से भरल रहे कोठी। केसरबाई के बुझाइल जइसे स्वर्ग बा त इहें बा! बड़ा शान-शौकत से आनंद में जिनगी बीतत रहे कि ओह सुख में जहर घोरा गइल। लकवा मार दिहलस केसरबाई के। आ फेर कुछ दवो दारू भइल। बाकिर तब-तक राजा साहेब का कवनो अउर बाई जी भा गइली आ काली जी का आश्रय में केसरबाई भीख माँगे खातिर स्वतन्त्र हो गइली। सुन के महेन्दर मिसिर के मन करुणा से भर गइल। फेर से दवाई के सिलसिला शुरू भइल।” (फुलसुँघी/तिसरका संस्करण, 2001/भोजपुरी संस्थान, इन्द्रपुरी, पटना/ पृ. 72)
भिखारी ठाकुर के बिदेसी कलकत्ता पेट के जरने ना गइल रहले बाकिर घर में गवनहुती मेहरि के छोड़ के गइला के मतलब ई बा कि ऊ तनी बेसिए रंग-रसिया टाइप के आदमी रहे। कलकत्ता में जाके ऊ एगो बाउर मेहरारू(ठाकुरजी जेकरा के रंडी कहत बाड़े) के फेर में पर के ओकरे संगे रहे लागत बाड़े। ओकरा से बालो-बच्चा हो जात बाड़े स।
पाण्डहूँ कपिल के महेन्दर मिसिर पतुरिया के फेर में परल बाड़े आ भिखारियो ठाकुर के बिदेसी पतुरिया के फेर में परल बाड़े, बाकिर महेन्दर मिसिर करुणा से भरल बाड़े जबकि बिदेसी वासना में डूबल बाड़े। दूनों आदमी के जमा-पूँजी स्वाहा हो गइल बाकिर महेन्दर मिसिर जहाँ आत्मतोष आ अहोभाव से भर उठले, ओहिजे बिदेसी आत्म-ग्लानि से। बिदेसी के हाल अइसन होत बा-
बिदेसी : (रो-रो के गावतारे)
का बहाना करब घर जा के?
पातुर के धन चातुर देके आप रोवत
पछताके।
बहुत कथा इतिहास सिखावल ना कइलीं
बुढ़वा के।
हालत काइ भइल पिया तोरी पुछिहन जब
जोरू धा के,
कवन जबाब देहब प्यारी से, मन में रहब
सरमा के।
कहत भिखारी भिखार होइ गइलीं दौलत
बहुत कमा के।
भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ के चर्चा के दौरान विद्वान लोग हरमेसा बिदेसी के कलकत्ता गमन के भूख आ बिपत से जोड़ेला। कुछ विशिष्ट जन के त’ एकरा में ‘गिरमिटिया प्रथा’ के प्रतीकांकन तक लउक जाला। साहित्य के ई बहुत बड़ खूबसूरती ह आ आलोचना के अप्रतिम दृष्टि कि रचना में जवन होइबे ना करे, ऊ खोज के सबका सामने धर दे। भोजपुरी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक महेश्वर प्रसाद, जे बाद में महेश्वराचार्य नाँव से विख्यात भइले अपना महत्वपूर्ण आलोचना पुस्तक ‘जनकवि भिखारी ठाकुर’ के शीर्षक ‘विरह-वेदना’ में अइसने खोज करत लउकत बाड़े-
“प्रसंग विदेश यात्रा का है जो किसी भी सदय पुरुष के लिए हृदय-द्रावक है। ‘गवने’ की आई हुई नवागता बहू और युवा पति में एक बहस हो रही है।पति रुपया कमाने के लिए परदेश जाना चाहता है और पत्नी अपनी रक्षा के लिए उसे रखना चाहती है। बहुधा ऐसा होता है कि जहाँ किसी गरीब का विवाह होता है कि उसे घर में रहना दुश्वार हो जाता है। विवाह के खर्च की पूर्ति के लिए, पत्नी की माँग की पूर्ति के लिए और अपने लिबास के साधन जुटाने के लिए बाध्य हो कर पुरुष को प्रवास करना ही पड़ता है। इधर नारी पर जैसे बज्रपात हो जाता है। उसके सारे अरमान चूर-चूर हो जाते हैं। कहाँ विवाह के बाद सुख और कहाँ यह आकस्मिक जुदाई, असमय का बिलगाव। ग्रामीण समाज के लगभग सभी लोग इस आफत के शिकार हो रहे हैं।”(प्रकाशक: भोजपुरी परिवार पटना/प्रथम संस्करण 1964/पृ. 84)
महेश्वर प्रसाद के कहल ओतना साँच नइखे, काहेंकि तत्कालीन ग्रामीण समाज के सब के ना, गरीब लोगन के स्थिति प्राय: अइसने रहे जइसन ऊ कहत बाड़े, बाकिर बिदेसी के स्थिति अइसन ना रहे। बिदेसी आ उनकरा मेहरारू के बीचे जवन बतकही होत बा, ऊ महेश्वराचार्य के बात के तस्दीक नइखे करत।
डॉ ब्रजभूषण मिश्र के कविता में कुछुओ ‘घूँघट के पट’ में नइखे जेकरा के खोलला से बिहारी मजूरन के फेफरिआइल ओठ आ लोराइल आँख लउकी। एहिजा जवन बा तवन हाथ के नरियर अस ठोस आ साफ-साफ लउकत बा। ‘बिहारी मजदूर’ माने बिहारी मजदूर, जे कवनो दलाल के भरोसा पर स्टेशन आइल बाड़े स। एहिजा से ऊ ओहिजा जइहें स, जहाँ रोटी के इंतजाम हो सकी भले एकरा खातिर अलेख जलालत सहे परी, अभोग भोग भोगे परी।
(III)
पेट के जरने आ एगो निश्चिंता जिनगी जीए के हसरत पूरा करे खातिर ई पलायन लगातार चलत रहल। गणतंत्र के जननी बिहार में यदि दुर्दशा भइल त’ जने के। तंत्र के काईंपना त’ हर जगहा मिल जाई, एकर कसाईपना बाकिर, एहिजा अस कमे जगह मिली। बात-बात पर दार्शनिक हो जाए वाला बिहारी समाजो एह मानवीय त्रासदी पर कबो फलप्रद बात ना कइलस। साहित्य के दुनिया में बात भइल, बाकिर अपना-अपना एजेन्डा के धार देबे खातिर। काव्य-संवेदना आ विवेक-चेतना के ऊँच धरातल पर अइसन कमे कविता रचइली स, जेमे मजदूरन के दरद-पीर रहे। जवन कमे रचइली स, ओमे डॉ मिश्रो के ई रचना शामिल बा- एकदम सपाट, स्पष्ट- जेकर अनेक अर्थ संभव नइखे। जीवन सत्य अनेकार्थी होइबो ना करे। खाँटी अभिधेयतो में श्रेष्ठ सर्जक अपना अनुशासित लेखनी से कुछ अइसन रच देला जे एगो नज़ीर बन जाला।
यदि डॉ मिश्र के एह कविता के साथे निराला के कविता ‘भिक्षुक’ के पढ़ल जाउ त’ पता चली कि दुनिया बदलला के साथे आज रचनाकारो के बहुत कुछ अइसन बदल चुकल बा भा बदलवा दिहल जा चुकल बा, जे सर्जना खातिर नीक ना कहा सके। ई बदलाव जीवन के स्वाभाविक बदलाव ना ह। निराला ‘भिक्षुक’ में कहत बाड़े-
ठहरो! अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा
अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारे दु:ख मैं अपने हृदय में
खींच लूँगा।
मजदूरन खातिर अइसन बात डॉ मिश्र चाहियो के नइखन कह सकत। नव क्लासिक युग के प्रसिद्ध कवि एलेक्जेन्डर पोप कहले रहले- ‘जहाँ अज्ञानता आनंद देत होखे ओहिजा ज्ञानी होखल मूर्खता बा।’ डॉ मिश्र, एही से, अपना एह कविता में अपना ओर से कुछुओ नइखन कहत। मजदूर लोगन के जवन हाल बा, बस ओतने सलीका से कह देत बाड़न। एह से बेसी कुछ कहिहें त’ अपना अज्ञानता के आनंद में मग्न लोग मए अस्त्र-शस्त्र लेके खाड़ हो जाई आ तब बात मजूरन से हट के जाति पर आ जाई।
जाति आ पंथ के नाँव पर आपन, अपना परिवार आ अपना हसबखाहन के हित साधेवाली पॉलिटिक्स भी बिहारी मजदूरन के अभाग पर यथोचित बात ना कहे, कुछ करे के बात त’ फइलावाँ बा। राजनीतिक पार्टी इनका में खाली आपन जिताऊ वोट चीन्हेले आ जाति आ धरम के नशा सुंघा के, इनकर वोट लेके, इनके फेर ओही गड़हा में पटक देले, जेकरा पाँकी में, अपना बापे-दादा के बेर से सउनात ई लोग आदमी नियर जीए-मुए के तमाम जतन करत आइल।
भारत के प्राय: मये राज्य में, हर औद्योगिक जगहा पर, बिहारी मजूरा लोग भागल जाले। ओहिजा जवन मिलल ओकरे में से बचा के माई, बहिन, बाप– पूरा परिवार खातिर जवन जूरल-आँटल कीनेले। डॉ मिश्र लिखत बाड़े-
पाई-पाई जोड़त
अपना भाग के कोड़त,
किनेलन स
माई खातिर चादर,
मेहरी खातिर लूगा,
बहिन खातिर फराक,
आ बाबू खातिर छाता।
बड़ा जतन से
जोगा के राखेलन स
चोरपाकिट में
रेहन धइल
खेत छोड़ावे खातिर
रोपया।
डिब्बा से छत ले
बहरी-भितरी
लदाइल-कोंचाइल
बिहारी मजदूरन से पाटल
एक्सप्रेस
सीटी मारत
धर लेवेले रफ्तार।
अइसनो नइखे कि मजूरा लोग रेलिए में लदाइल-कोंचाइल बा। जहाँ ई लोग रहेला, ओह जगहो के हाल रेल के डिब्बे अस बा। ओहिजो एगो छोट कोठरी में, कई-कई लोग पटरा परल देखल जा सकत बा। खाए-पीए, नहाए-धोए– सबके दिकदारी, सब खातिर मारा-मारी। का ई सोंचे के बात नइखे कि बिहार में कवनो उद्योग धंधा काहें नइखे?
हमनी के शास्त्रीय ग्रंथन में कवि के प्रजापति कहल गइल बा, एह से कि ओकर सृजन मर्यादा के भीतर एगो अइसना लोक के दर्शन करावेला जे यथार्थ त’ होइबे करेला, आदर्शो होला। तुलसीदास, एही से, कविता के सुरसरि के समान सबका खातिर हितकर कहले। आज नूँ तुलसी बाड़े नूँ उनकरा बेर के घर-समाज। आज तुलसी के सर्वहित के अवधारणो के कवनो माने-मतलब नइखे। हित आज अइसन पाग हो गइल बा, जे अपने अनाज के तिलवा बान्हत बा। दोसरा के अनाज पागे के बेरा अदबद के भरक जात बा। आसमान के सुरुज आजुओ पूरबे से उगत बाड़े, बाकिर हमनी के हर उगेन पच्छिमे से होत बा। ग्लोबल विलेज के बात करे वाला लोग घर के माने मियाँ, बीबी आ आपन बाल-बुतरू से लगावत बा। मार्क्स संसार के मजदूर लोग के एक होखे के विचार देले रहले। बड़ा नीक आ क्रांतिकारी विचार रहे, बाकिर देश-दुनिया के देखा-देखी आ कुछ अपनो स्वारथ-मजबूरी, मजदूरो लोग एकल परिवार के होके रह गइल जहाँ बीवी देवी हो गइली आ माई-बाप उफर पर गइले। अइसना में डॉ मिश्र के ई कहल कि-
किनेलन स
माई खातिर चादर,
मेहरी खातिर लूगा,
बहिन खातिर फराक,
आ बाबू खातिर छाता।
सामान्य नइखे। यदि मानवता के तमाम पतन के बाद अइसन अपवाद कुछुओ रह गइल होखे, तबो कवि के इजहार मंगलप्रद बा, एमे शक के गुंजाइश नइखे। आधुनिकता के बाद उत्तर आधुनिकता जेकरा खातिर मुबारक होखे, होखे। कवि खातिर ओकर भारतीयता मुबारक बा।
‘पाई-पाई जोड़त/अपना भाग के कोड़त’ में अभिधा से उगे वाली व्यंजना अइसहीं सुंदर लागत बा, जइसे स्वच्छ जल में उगल असित कँवल। ‘जोड़त’ आ ‘कोड़त’ के अनुप्रास करुणो में लालित्य के सर्जना कर रहल बा, जे घाव के सहाउर बनावे में मदतिहा हो रहल बा।
(IV)
औद्योगिक क्रांति से बहुत कुछ बदल गइल। एके जगह के ना, हर जगह के रीति-नीति, अधातम आ सोच बदल गइल। जेकरा पाले अकिल रहे, कुछ करे के कूबत रहे, लूटे के प्रवृत्ति आ अपना के सबसे सेसर साबित करे के टिसुना रहे, ऊ मैदान में कूद गइल आ मैदान मारे लागल। मार्क्स आ उनकर चेला लोग एह पर अनंत थीसिस गँजिआ दिहले, बाकिर उहन लोग के कहलका से तनिओ-मनी केनियो कुछ उजियाइल ना। सर्वहारा के अधिनायकत्व के जगहा एगो व्यक्ति(भा व्यक्ति समूह) आ एगो विचारधारा के अधिनायकी स्थापित भइल, जे जन के हित के नाँव पर खाली आपन हित कइल, जेकर चाल आ चरित्र हरमेस संदेहपूर्ण रहल। होलरी त’ खूब भँजाइल, बाकिर मजदूर ओहिजे रहल रह गइले जहाँ ऊ क्रांतिपूर्व रहले। (एकर कुछ अपवादो जरूर रहल, बाकिर अपवाद उदाहरण ना होखे।) समृद्धि के छाँह ओकरे मिलल जे चालू रहे। सिधवा आ सोझिया लोग साम्यवाद के झंडा ढोवत रह गइले आ नयकी दुनिया के सपना देखावत धूर्त लोग अमरपद पा गइल। यूरोपीय तर्ज पर, भारतो में, कुछ भरल पेट वाला लोग- मनुवाद, ब्राह्मणवाद आ सामंतवाद- जइसन पद गर्हले आ दोष व्यवस्था में ना, आस्था में बतलावत, ऊ हर कोशिश कइले जेसे उनकर, भ्रष्टता आ दुष्टता के विपरीत, शोभनउक छवि बेदाग रहे। अपना कुंठा के धार पजावत ई नवप्रभु वर्ग, जन के अस भरमवले कि ऊ(जन) अपना विवेक के तिलांजलि दे, इनकरा विचारधारा के बन्हुआ हो गइल।
ई उदम बदस्तूर जारी बा। अब त’ कहल जात बा, कुछ जाति-वर्ग के अपमानित करे बदे देश- विदेश से फाँड़ भर पइसो मिलत बा। भोजपुरी कवि शशि प्रेमदेव, एह साँच के रेखांकित करत कहत बाड़े-
साँच के कइसे छिपावल जा रहल बा, देखि ल’
लाश पानी के चढ़ावल जा रहल बा, देखि ल’।
नीम, पीपर, ब’र के जबरन बताके बुर्जुआ
रेंड़ के माला पेन्हावल जा रहल बा, देखि ल’।
बिहारी मजदूर अपना तथाकथित नेतन के पायक बन के रह गइले। उनकरा मुँह से ई बकार कबो ना फूटल कि स्वतंत्रता के सत्तर बरिस से ऊपर बितला के बादो काहें उनकर हालत जस के तस रह गइल? काहें बिहार में कवनो कल-कारखाना ना खुलल आ जवन पहिले रहल, ओकर सत्यानाश हो गइल? काहें जब-जब पेट आ भूख के बात उठल तब-तब प्रभु वर्ग ओके जाति, धर्म आ धर्मग्रंथ का ओर मोड़ दिहल? काहें सत्ता आ संपत में भागीदारी कुछे खानदान, कुछे चुहान आ कुछे पेहान तक सिमट के रह गइल? काहें हजारन बरिसन से एही भूँइ से उत्पन्न होत, मातृभूमि खातिर जीअत-मरत, उच्च करतब करत आवेवाला आ सरकार के अधिकतम टैक्स चुकावे वाला वर्ग आ जाति समूह विदेशी कहाए लागल आ जे विदेशी रहे, भारत के रोआ-रोआ मरले रहे ओकरा संगे बइठ के चाह सुरुकाए लागल? काहें बिहारी लोग अपने देश में प्रवासी कहाए खातिर अभिषप्त भइले?
मजदूर अपना निजी दु:ख के उत्पत्ति स्रोत के बारे में कबो ना सोचले। मतिमार लोग उनकरा के एह लायक छोड़बे ना कइल कि ऊ ई सब सोचस-विचारस आ जाति आ वर्ग ना, सत्य के नाँव पर कुछ सुंदर करे खातिर एक जगे जवरासु। एही से ऊ घरे आ बाहर दूनों जगह जिबह होत रहले।
साँच इहे ह कि कवनो वर्ग के नेता ओह वर्ग के मजूरन के अपना वोटर से अधिका कुछ ना माने। आकंठ भ्रष्टाचरण में डूबल रहलो पर ऊ जन- उद्धारक आ मसीहा के अपना खोल में सुरक्षित आ निहचिन्त रहेला। ओकर यात्रा विशिष्ट गगनयान भा रेलवे के फस्ट क्लास एसी में होला एह से रेल के जेनरल डिब्बा में भेंड़-बकरी अस लदाइल, अपना करम पर रोअत साधारण जन के दुर्दशा से ओकरा का मतलब?
बाकिर एगो सहृदय कवि करुणा से ओतप्रोत रहेला। ओकर मन दु:खी जन के दु:ख से छपिटा उठेला आ ओकर लेखनी करुण जथारथ के अरथ देबे खातिर लरज उठेले। डॉ मिश्र के कवि मजदूरन के लवटानी के बेर के हाल कहत लिखत बा-
(बिहारी मजदूरन से पाटल
एक्सप्रेस
सीटी मारत
धर लेवेले रफ्तार।)
जवना में
तरह-तरह के
बेमारी के जिवाणु
अपना देह में भरले,
चादर-लूगा-फराक-छाता
करेज से सटले
बड़ा कठोर साँसत में
जागत-उहाँत-सपनात
ठेलात-धकियावल जात
लतवँसल जात
सोनहुला बिहान के ललसे
लवटेलन स
बिहारी मजदूर।
अतना जलालत सहला के बादो मजदूर आशा के डँग नइखन छोड़त लोग। ई उनकरा जिजीविषा के परतोख बा, बाकिर ई आशा के सोनहुला विहान खाली आकाश कुसुम ह।
(V)
आशा आ विश्वास मानवता के अमूल्य रत्न ह। ई ऊ भावबोध ह जे हर ओर से लुटाइल, हतास मानव के मन में उमंग, चाल में गति आ हृदय में अमरत्व भरत रहेला नाहीं त’ प्रवास में पेट काट के, क्लेष सह के जिनगी जीयत मजदूर लोग लवटानी के बेरा चहकत ना रहिते! अपना लोगन से मिले, सुख-दुख बाँटे आ नया अनुभव सुने-सुनावे के ललक अभावो-बिपति में हिम्मत बन्हवले रहेला, थउसे ना देला। बिहार के सबसे गरीब लोगन में से कुछ लोगन के ई लवटानी यात्रा ह, जेमे सोनहुला बिहान के ललसे भर बा, ओकरा प्राप्ति के गारंटी नदारद। घर से बहरा, बहरा से घर, फेरु बहरे– इहे हाल-रोजगार बा बिहारी मजूरन के। अउरियो ढेर लोग बहरी जाला। आवे-जाए के सिलसिला कबो रूकल ना, बाकिर दोसरा केहू के जाए-आवे के बात आ मजूर लोग के जाए-आवे के बात में बहुते फरक बा। अउरी केहू जाला त’ बिहान लेके आवेला भा ओनिए बिहान उगा लेला, मजदूर लोग आवेला त’ अन्हारे लेके आवेला भले उनका पाकिट में अपमान सह के कुछ पइसा हो जात होखे।
हालाँकि जाति, धर्म आ संप्रदाय के पुरोवाक क’ के, अपना गरे मजदूरने के हसबखाह के पट्टा बान्हेवाला (नव) नेता हमेशा से बिहाने उगावे के वादा करत आइल बा। ई सोचनीय नइखे कि नेता लोग अइसन काहें करेला, सोचनीय ई बा कि मजदूर लोग ई काहें ना सोचे कि हम मजूर से मजूरे रह गइलीं आ उनके में से कुछ तिकड़मबाज लोग मजूर से हुजूर बन गइल, त’ काहें? एमे दोष केकर बा आ केकरा के दंड मिले के चाहीं? का जरल अँगुरी के अउर जारे खातिर मत देबे के चाहीं कि जे जरले होखे ओकरा के जारे खातिर सनमत होके सत्य के संगे लागे के हिम्मत बेसाहे के चाहीं?
हिन्दी काव्य-संग्रह ‘साक्षी हैं समुद्र’ के कवि धर्मेन्द्र त्रिपाठी अपना एही किताब के एगो कविता ‘सारे वायदे एक तरफ’ में वादा करे वाला एगो (नव) नेता के चरित्र के व्यंग्यात्मक उरेह करत कहले रहले (कविता ‘मैं शैली’ में बिया)–
सारे वायदे एक तरफ
चाहता हूँ-
सारी उपलब्धियाँ हासिल हो जाएँ
एकाएक-
चली आए भविष्य की सारी पूँजी
मेरी तरफ
और मैं जैसा चाहूँ
उपयोग करता रहूँ।
हँसता रहूँ सिर्फ मैं
सभी मेरे पीछे रहकर
मेरा यशगान करें
और मैं
कभी पूरा न होने वाला
‘वायदा’ करता रहूँ
बिना किसी प्रयास के
बनता जाऊँ
बढ़ाता जाऊँ
कई पीढ़ियों तक
सियासत की पूँजी
और लोग-
जयगान करते रहें
सदियों तक।
(साक्षी हैं समुद्र/नमन प्रकाशन, नई दिल्ली/पहिला संस्करण:2019/पृ. 49)
का मजदूर लोग के ई ना बुझाला?
सब जानत बा कि एह वादा के कवनो माने-मतलब नइखे। सब जानत बा कि केहू के पक्ष में पँचबरिसा मत देला से ओकरा घरे ना, मत पावेवाला के घरे सोना बरिसी, तबो– अफरात क्लेष सहियो के–ऊ अपने जाति-संप्रदाय वाला (नव) नेता के नाँवे बटन दबाई। काहें?
जन के ई बतावल जा रहल बा कि ओकर असली शत्रु शासन ना, समाज के कुछ जाति-वर्ग ह जे सदियन से ओकर शोषण करत आ रहल बा। ई बतावे खातिर तरह-तरह के सिद्धांत गर्हा रहल बा। तरह-तरह के विक्षिप्त दर्शन सामने आ रहल बा। कुछ जाति-वर्ग के गरियावे के कवनो मोका नइखे छोड़ल जात। तारीफ ई कि संविधान के नाँव पर, संविधान के विपरीत आचरण करे वाला एह जरोह के बस एके मकसद बा– सत्ता के मनभोग ओकरे घरे पाके जेके ओकर घर भर अँड़ीच के खाइ। बाकी लोग झंडा ढोवे, तंबू ताने, ओकरा नाँवे बटम दबावे आ जमके जयकारा करे, बस। ऊ अपना शीशमहल में सुरक्षित रहे। देश खातिर आपन सबकुछ समर्पित कर देबे वाला वर्ग जेकर पुरुष स्वातंत्र्य वेदी पर जान दिहले, वीरांगना आपन अस्तित्व अगिन-लौ में अर्पित कइली, फूहर-पातर सुनत रहो, जियते यम-यातना सहत रहो!
जनता के एह तरह के ब्रेनवाश के मनोवैज्ञानिक व्याख्या अंतोनियो ग्रामशी बहुत पहिले अपना थियरी cultural hegemony में कर चुकल बाड़े।
( VI)
बिहारी मजदूर लवट रहल बाड़े। जब ऊ यू.पी.- बिहार के सिवान पर पहुँचत बाड़े, प्रकृति के मये तत्व अगरा जात बाड़े स। डॉ ब्रजभूषण मिश्र एहिजा प्रकृति के मानवीकरण करत लिखत बाड़े-
जब आवेला
यू.पी. – बिहार के सिवान
सिहरा देवेला-
पुरवइया बेयार,
सोहर के बोलावे लागेला आकाश!
स्पर्श आ चाक्षुस बिंबन के रचना करत कवि जनमभूमि के द्वारा अपना संतानन के प्रति स्नेह के अभिव्यंजना करा रहल बा। दउरत रेलगाड़ी से पूरबी बयार के स्पर्श आ घूमत-झुकत आकाश के दरशन जे कइले होई ऊ कवि के बात के तस्दीक करी कि लागेला जइसे ऊ अपना संतानन के अपना अँकवारी में बान्ह लेबे खातिर बेचैन हो गइल होखे लोग।
प्रकृति त’ चराचर से प्रेम करेले। ई आदमी के खुद के विवेक आ संवेदना पर निर्भर करेला कि ऊ एह प्रेम के कतना समुझ पा रहल बा! अँग्रेजी साहित्यकार आस्कर वाइल्ड के कहानी ‘सेल्फिस जायंट’ प्रकृति के एही प्रेम के इजहार करे वाली एगो क्लासिक कहानी ह, जेमें बाग के तरुअन के, बच्चन के प्रति प्रेम के देख के, भयानक राक्षसो द्रवित हो जात बा। कहल जाला जे जगत के मनसपपई से दुखी जगन्माता जानकी के कारने धरतीमाता फाट गइल रही आ उनके अपना अंकवारी में लुकवा लेले रही ताकि ऊ एह कूर आ कुचाली संसार से बहुत दूर प्रेम, पवित्रता आ शांति के आश्रय में साँस ले सकसु।
जवना धरती के जननायक लोग के आपन पेट भरे से फुरसत ना होखे, ओह धरती के सामान्य आदमी से लगाइत सरकारी कर्मचारी तक के हाल का होई, कहे के जरूरत नइखे। गीता के उद्गाता भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहले रहले कि अर्जुन! ऊपर वाला लोग जइसन आचरण करेला, उनुका नीचे वाला लोग ओइसने अनुसरण करेला। बिहार के बारे में कहल जाला जे एहिजा बहारे-बहार बा काहें कि ई लोकतंत्र के जननी ह, जहाँ बरियारा मारेला आ रोवहू ना देइ। लवटत मजूरन पर प्रकृति प्रेम लुटावेले बाकिर मनु के कमासुत संतान लोग का करेला, ई यथार्थ डॉ ब्रजभूषण मिश्र के जवरे निरखल जा सकत बा। ऊ देखावत बाड़े-
जब कवनो स्टेशन पर
रुकेले एक्सप्रेस,
दउरेलन स कुक्कुर,
करिया-करिया कुक्कुर,
संगे लेले
खाकी रंग का
कुक्कुरन के जमात
जवन दाँते-नोहे
नोचे लागेले स
बिहारी मजदूरन के देह आ मोटरी
हबके लागेलन स करेज
दाँत से खींच लेबेलन स
माई के चादर,
बहिनी के फराक
मेहरी के लूगा
घींचे लागेलन स
बाबू के छाता,
करेज से काढ़ लेबेलन स
ओकरा खून के कमाई।
नोंचइला-चोंथइला के दुख में
रहेला डूबत-उतरात,
तले मिल जालन
ठग मामी कि ठग मउसा
हीत-नात के
ढोंग रचनिहार
जे प्रेम से खियावेलन बिसकुट,
पियावेलन जहर मिलावल चाह।
चोरपाकिट से कटा जाला
ओकरा जाँगर के कमाई,
जोड़ल पाई-पाई।
(VII)
सुराज मिलला के एगो उमिर बीत गइला के बादो यदि मजूर अपने देश में, अपने धरती आ अपने आसमान के बीचे, अपने घर-दुआर आ प्लेटफार्म पर अइसन दुख भोगी– कबो रोई आ कबो जान से हाथ धोई त’ ऊ सुराज भा स्वतंत्रता कवना काम के?
कविवर पंत अपना एगो कविता ‘भारतमाता ग्रामवासिनी’ में भारतमाता के ‘वह अपने घर में प्रवासिनी’ कहले रहले। डॉ ब्रजभूषणो मिश्र बिहारी मजदूरन के संदर्भ से एह शब्दन के प्रयोग कइले बाड़े, जेमें एक ओर मजूरन के दुर्भाग्य, बेबसी, लाचारी आ अपना लोगन के साथ अपना जनमभूँइ खातिर छोह अउर तड़प व्यंजित होत बा, दोसरा ओर प्रच्छन्न रूप से व्यवस्था के प्रति हृदयद्रावक व्यंग्यो लक्षित होत बा–
आवे लागेला इयाद-
आपन देश,
जाने कइसे दो
देशे में
मिलल बा परदेस।
‘देशे में मिलल बा परदेस’ पद, भोजपुरी क्षेत्रन से कमाए-खाए खातिर बहरा जाए वाला लोगन के सम्बन्ध एह क्षेत्र में प्रचलित ओह लोककथा से सहजे जोड़ देत बा, जेमे एगो चिरईं कहत बिया-
खूँटा में मोर दाल बा
का खाऊँ, का पीऊँ
का लेके परदेस जाऊँ?
एह लोककथा के बारे में बलभद्र के कहनाम बा– “खूँटे में अँटकी हुई एक दाल का प्रश्न चिड़िया के लिए एक अहम प्रश्न है। यह उसके ‘का खाऊँ, का पीऊँ, का ले के परदेस जाऊँ’ से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यह प्रश्न आज भी है भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से के प्रश्न के रूप में। चिड़िया के लिए जो उसके ‘का खाऊँ, का पीऊँ, का ले के परदेस जाऊँ’ से जुड़ा मामला है, वह बढ़ई और राजा-रानी के लिए महज एक दाल है, अत्यंत मामूली चीज। मतलब यह कि उसके जीवन-मरण के बुनियादी प्रश्नों के प्रति पूरा का पूरा तंत्र उदासीन है। यह उदासीनता शासक वर्ग की नीतियों और कार्य-शैलियों की उपज है और देश का एक बहुत बड़ा एवं संभावनाशील हिस्सा इस उदासीनता की मार सहने को अभिशप्त है। जन-जीवन के प्रति कहीं कोई संवेदनशीलता नजर नहीं आती।”
(भोजपुरी साहित्य: देश के देस का/प्रथम
संस्करण/पृ. 19)
अपना घर-दुआर के छोड़ के, अपना आत्मीय लोगन के बिछोह सह के, केहू के मन कहीं आन जगह जाए के ना करे– चाहे ऊ आदमी होखे चाहे कवनो अउर प्राणी।
विस्थापन के बड़हन त्रासदी के संवेदना सनल, अभिधेय काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करत डॉ ब्रजभूषण मिश्र के ‘बिहारी मजदूर’ कविता बेशक एगो महत्वपूर्ण कविता बिया, जेकरा वर्णनात्मकता में अनेक सवाल लुकाइल बाड़े, बाकिर ऊ अबूझ नइखन।
खाली सवाले ना, उनकर समाधानो अबूझ नइखे। बस एगो सवाल के जवाब खूँख रह जात बा– एकर समाधान के करी?— तंत्र कि जनता? कि…?
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# ‘बिहारी मजदूर’ कविता डॉ ब्रजभूषण मिश्र के कविता-संग्रह “खरकत जमीन बजरत आसमान”(2015) में आइल रहे।
  • डॉ  विष्णु देव तिवारी

 

(साभार – फेसबुक )

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