” देखा , ले त चलत हईं सिवसंकर भइया के इंहा बाकिर कुछ एने -ओने हो जाई त हमके दोस मत दिहा।समझ गइला ना ! अपने कपार क अलाय-बलाय हमरे पर मत पटकीहा।” परताप एह अंदाज़ में बतिया कढ़वलन कि मनोज क पहिलहीं से संकित जीव में थरहरी दउड़ गइल।घबरा के पुछलन – ” काहें डेरवावत हउवा भाय।सिवसंकर सर क एतना बड़ाई सुनले हईं कि बिना मिलले रह ना जात ह।बनारस आके बिना उनकर चरन स्पर्श कइले लवट जाइब त हमार आत्मा के कल ना पड़ी।” मनोज क बेकली देखके…
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