” देखा , ले त चलत हईं सिवसंकर भइया के इंहा बाकिर कुछ एने -ओने हो जाई त हमके दोस मत दिहा।समझ गइला ना ! अपने कपार क अलाय-बलाय हमरे पर मत पटकीहा।” परताप एह अंदाज़ में बतिया कढ़वलन कि मनोज क पहिलहीं से संकित जीव में थरहरी दउड़ गइल।घबरा के पुछलन – ” काहें डेरवावत हउवा भाय।सिवसंकर सर क एतना बड़ाई सुनले हईं कि बिना मिलले रह ना जात ह।बनारस आके बिना उनकर चरन स्पर्श कइले लवट जाइब त हमार आत्मा के कल ना पड़ी।” मनोज क बेकली देखके…
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भितरघात
” आजकल सुमेधा मैम बहुत उदास रहती हैं,आपको पता है कि क्या मामला है ? आप तो खास हैं न उनकी,कुछ बताया उन्होंने आपसे ? ” रुचि मैम के आँखि में जिज्ञासा क चिनगी चटकत देख पहिले त आद्या के नीक ना लगल बाकिर बात टाले के गरज से अपने के काबू में करत ऊ धीरे से कहलीं – ” देखिए ,मैं उनकी खास जरूर हूँ लेकिन उनके पर्सनल स्पेस में दखल नहीं देती।आप से भी यही उम्मीद है।” आवाज़ के काबू में कइलहूँ के बाद भी तिताई ना गइल…
Read Moreबेकहला
” ए बचवा हई मोबईलवा पर का दिनवा भर टिपिर-टिपिर करत रहेला।कवनो काम -धंधा ना ह का तोहरे लग्गे आंय।” बेकहला बोलत-बड़बड़ात बचवा के गोड़तारी आके करिहांय धय के निहुर गइलीं। ” तू आपन काम करा न , काहें हमरे फेर में पड़ल रहे लू।अबही जा इँहा से हमार दिमाग जिन खा। ” आछा-आछा हमरे छन भर खड़ा रहले से तोहार दिमाग जर-बर जात ह।अइसन दिमाग के त हम बढ़नी बहारी ला।जा ए बचवा बूढ़ -पुरनिया से जे अइसे बोली ओके भगवान देखिहन।” “काहें, आज सबेरे से केहू भेटायला ना…
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