उचरत हरिनन्दी के पीर के बहाने से

हरिनन्दी भा हरनंदी अब ई नाम बिलम गइल बा। विरले लोग होई जेकरा के ई नाम के महातम मालुम होई। अंग्रेजन के दिहल अपभ्रंश नाम हिंडन से सबके परिचय बा। ई उहे हरिनन्दी नदी हई जे सहारनपुर के पास से निकल के आ चार सौ किलोमीटर चल के गौतमबुद्ध नगर माने नोएडा के पास यमुना से भेंट करेली। बाकि एह नदी पर जइसे राहू के साया होखे, आपन जनम स्थान से निकलते कईगो शहर के मैला आ कल-कारखाना के गाद अपना माथे ढोवे लागेली। देह गल के जइसे ठठरी हो जाला ओइसहीं इहो नोएडा पहुँचत-पहुँचत नदी से नाला बन जाली।  अइसन नाला जवना में जलीय जीवन नील-बट्टा-सन्नाटा बा। कल-कल के गुलजार से ले के थथमल दलदल के बदबूदार जिनगी जियत हरनंदी आह से कराहे आ कुहुके ली।  बाकि ई आह आ कराह के सुनेवाला के बा ? आ केकरा से कहल जाव। हाल- ‘सुनी अठिलैहैं लोग सब, बाँट न लीहें कोई!’

त केकरा आगे रोअल जाव। अब त  दरद के आलम ई कि रोअत-रोअत हंसी आ जाता।  दरद आ दरद देवेवाला दूनों पर हँसी आवेला।  हरिनंदी अब कराहे ना, हँसेले। ओकर हँसी  व्यंग्य ह – हमनी सभ पर, हमनी के सरकार पर, हमनी के बेवहार आ चुप्पी पर।

हरिनन्दी के कहानी आ दरद अकेला के ना ह।  हरिनन्दी अपने आप में संउसे  समाज आ समाज के बात-बिचार के अईनक ह। जवना के नजर से  प्रश्न उठेला कि का आदमिए एह धरती पर सबसे बड़का बा कि उहो संसार के व्यवस्था के हिस्सा ह। कई तरह के सवाल जे आदमी के आदमी भइला पर शक-सुबहा कर सकेला।  हरिनन्दी के दरद अथाह बा आ आदमी से लेके ओकर झूठ के बनावल जाल में अझुराइल कई हजार सवालो  बा।  एही सवाल के जवाब जोहे में हरिनन्दी कबो हँसेले, कबो रोअले आ कबो कटाह बोलेले।

हरिनन्दी के एही पीर के गूँज एकरे तीर पर बसल गाज़ियाबाद के कवनों कोना में बइठल जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के अंतर्मन झंझोरलस। समाज के आईना देखावत हरिनन्दी  के पीर के आपन कलम से उचरले। भोजपुरी साहित्य में व्यंग्य लेखन के परंपरा बहुत मजबूत ना सही, बाकिर जे रचनाकार एह विधा में आपन अलग छाप छोड़ले बानी, ओह में जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के नाम आदर से लिहल जाला। “उचरत हरिनन्दी के पीर”  उनकर व्यंग्य-संग्रह के नाम मात्र नइखे, बलुक एक नदी के पीड़ा में समाइल समाज, राजनीति, संस्कृति आ पर्यावरण के करुण कथा ह।

रचना के भाषा ठेठ भोजपुरी ह, बाकिर ओकर प्रवाह साहित्यिकता से भरल बा। व्यंग्य के धार में भाषा के मिठास बा, आ साथे बा संवेदना के खोंचाह धार।  द्विवेदी जी के भाषा ना खाली लोक-संवेदना से भरल बा, बलुक ऊ समाज के चुभत साँचो के सहज रूप में कह देले बानी। व्यंग्य के “कटाह” लहजा ओहिजे दिखेला, जहवाँ लेखक अपनो के सवाल में झोंक देवे।

ई खाली  नदी के पीर नइखे बलुक एकरे बहाने द्विवेदी जी आपन संग्रह में समूचा समाज के जवना में इतिहास-भूगोल, राज आ राजनीती, अचार- बेवहार पर अइसन टोन  मरले  कि मय जिनिस बेअंग हो गइल बा। व्यंग्य सहजे नइखे, समाज के बदबूदार गाद के व्यंग्य के ईतर के अलोता चहेंटल  बा।  व्यंग्य के एह संग्रह में छियालीस गो रचना बा भा कह सकेनी कि हरनंदी के राह में छियालीस गो  मोड़ जेकरा से ई घवाहिल भइली। एकर धाह के आँच  अइसन कि कबो जेठ के तीत त कबो अगहन के कुनमुन घाम लाग सकेला। आ एकर छाप एह संग्रह के कई गो लेख में साफ बुझल जा सकेला।

पछ-विपछ से परे जहाँ गलत लउकल ओहिजे कलम के तलवार भोंकत, छल-कपट के बेवहार के गिरहबान चढ़ावत, त कब्बो जन-मन के मरम के बुझत ओकर पीर से नाता जोड़ ओकर बात कहल व्यंगकार के काम ह। आ एहमें द्विवेदी जी सोरहो आना न्याय कइले बाड़ें।

अथ मनराखन कथा से व्यंग्य बाण चलावत-चलावत द्विवेदी जी के अंत में सकारल – ‘हम भोजपुरिया साहित्यकार बानी… ‘ तक पहुँचे में अलग-अलग ताव आ भाव के व्यंग्य के मार सहे पड़ी।

“उचरत हरिनन्दी के पीर” खाली नदी के पीर पुराण नइखे, बलुक ई समाज के चरित्र-पत्र ह। ई संग्रह भोजपुरी व्यंग्य साहित्य के एगो महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानल जा सकेला, जे ना केवल भाषा के समृद्ध करेला, बलुक आदमी के संवेदनो के आईना देखावेला। अब ई पाठक लोग के कोरा बा कि उनकर मन हरिनन्दी के पीर से केतना भींजता।

व्यंग्य के मार के केतना सह पायी ई पढ़ला के बाद लोग बताई बाकि एह  संग्रह के पढ़ल जरुरी बा- हरिनन्दी खातिर। ओह पीर के जानल जरुरी बा जवना के जयशंकर प्रसाद द्विवेदी आपन एह संग्रह में उचरले बानी। भोजपुरी के थाती में अइसन रचना धरम के सहेजे खातिर लेखक के बहुत बहुत बधाई।

पुस्तक – उचरत हरिनंदी के पीर

लेखक -जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

प्रकाशन वर्ष-2021

प्रकाशन संस्थान – सर्वभाषा ट्रस्ट , नई दिल्ली

 

समीक्षक- शशि रंजन मिश्र ‘सत्यकाम’ 

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