लिखल, पढ़ल, सोचल, बोलल मानल जाई तकरार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥ हमरे से हौ नून तेल आ हमरे से कानून चाहे रहा तू केरल बबुआ चाहे देहरादून अगड़ा, पिछड़ा, दलित के खेला सब हमरे ब्योपार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥ कबों खातिर एस सी एस टी,कबों के बा यू जी सी बचा-खुचा आरक्षण से, घलुआ बाटे खबर नबीसी बिना जांच-पड़ताल के बबुआ सुखले खइबा मार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥ झगड़ो केहू कतौ भले, खतरा तहनी के सिरे किल्लत के उठी…
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चइता के साध मरि गइलें हो रामा
हिन्दू कलेंडर का हिसाब से एह महिना के चैत महिना कहल जाला आ ई हिन्दू नव वर्ष के पहिल महीना ह। अपना भोजपुरिया संस्कृति में होली का बाद आवे वाला एह महीना में चैती/चइता गावे के चलन रहल बा। ‘चैत महीना के मधुमास कहल जाला । त मधुमास में होखे वाला सगरे श्रिंगार, वियोग, विरह, मधुरता आ कोमलता एह चइता गीतन के परान ह। लोकगीतन के अउर कवनो विधा में अतना विविधता कमें भेंटाले’। ई बाति अब किताब भा पत्रिका में छपे वाली बाति बन के रह गइल बा। हमरा…
Read Moreतेल के खेल
समय के बदलाव पृथ्वी के गोल होखला के प्रमाणित करे में कवनो कोर कसर ना छोड़े। एक बेर फेर से लइकइयाँ के बोलल, सुनल नारा ईयाद आ रहल बा । बात सत्तर के दसक के बा। जब गाँव-गाँव में छोट-छोट लइका ईस्कूल से छुटला का बाद भर रसता एगो नारा लगावत देखात रहलें । उ नारा रहे ‘खा गइल रासन पी गइल तेल’ जवना के सुनला का बाद ओह लइकन के उनुके बाप-मतरी भर हीक पाथतो रहलें। उ समयइयो अइसन रहल कि रोवला पर फेर पहिला से बेसी पथाई मिलत…
Read Moreउचरत हरिनन्दी के पीर के बहाने से
हरिनन्दी भा हरनंदी अब ई नाम बिलम गइल बा। विरले लोग होई जेकरा के ई नाम के महातम मालुम होई। अंग्रेजन के दिहल अपभ्रंश नाम हिंडन से सबके परिचय बा। ई उहे हरिनन्दी नदी हई जे सहारनपुर के पास से निकल के आ चार सौ किलोमीटर चल के गौतमबुद्ध नगर माने नोएडा के पास यमुना से भेंट करेली। बाकि एह नदी पर जइसे राहू के साया होखे, आपन जनम स्थान से निकलते कईगो शहर के मैला आ कल-कारखाना के गाद अपना माथे ढोवे लागेली। देह गल के जइसे ठठरी हो…
Read Moreजेकर खइलन रोटी ओकरे धइलन बेटी
समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लोग होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि पर मोटगर परदा टाँग देले, बोल आ चाल दूनों बदल देले। नाही त जेकरा लगे ठीक-ठाक मनई उनुका कुरसी रहते ना चहुंप पावेला, कुरसी जाते खीस निपोरले उहे दुअरे-दुअरे सभे से मिले ला डोलत देखा…
Read Moreजेकर खेती ओकर मति
शीतलहर के प्रकोप में अलग अलग तरह से गरमी के पैदा करे क उताजोग हो रहल बा आ लोग ओकरा के महसूसतो बा। ओह पर चरचा के बजारो गरम हो चुकल बा। कबों कवनो बैठक त कबों कवनो खिलाड़ी गरमी के श्रोत बन रहल बाड़ें। समइयो एक्के आँख से देखउवल के चल रहल बा। चाल चरित्र के बात करे वाला लोगवो एक्के आँख से देखे क आदती हो चुकल बा। उ लोग देखते भर नइखे बलुक फीरी में धमकियो दे रहल बा उहो भोंपू लगा के । मुख पोथी के…
Read More‘चौधरी कन्हैया प्रसाद स्मृति सृजन सम्मान से दुगो भोजपुरी साहित्यकार सम्मानित भइलें
विश्व पुस्तक मेला के अंतिम दिने सर्व भाषा ट्रस्ट के स्टाल पर चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह स्मृति न्यास आरा आ सर्व भाषा ट्रस्ट का ओर से भोजपुरी साहित्य के संरक्षण-संवर्धन आ सृजन खातिर वर्ष 2025 का डॉ संतोष पटेल आ वर्ष 2026 का श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के ‘चौधरी कन्हैया प्रसाद स्मृति सृजन सम्मान’ से राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संपादक श्री लालित्य ललित के हाथों सम्मानित कइल गइल।
Read Moreनैनन चलावेली बान
ले भौंहन क तीर कमान नैनन ! नैनन चलावेली बान। रति सी अंग अंग हौ ढारल सोझा आइल बा, सभ हारल भरमावै सभके धियान। नैनन— साज समाज बीच जब आवे अवते इहाँ मधुर मुसुकावे सुघरई क छोड़े निसान। नैनन — जब जब सुर में गीत सुनावे मन के तार तार झनकावे सांसत में डारस परान। नैनन— जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
Read Moreबुझीं जनि ठिठोली
कउवो से करकस कोइलिया के बोली बुझीं जनि ठिठोली,इहे हियरा टटोली। बकुला भगत संगे हुंडरो बा आइल देखीं भला आजे बिलरो धधाइल बघवो त मनवाँ के राज आज खोली। बुझीं जनि ठिठोली,इहे हियरा— रात दिन होत बात बाS अझुरउवा उपरा त अउर भीतर बाउर भउवा भरलको पुरलको फइलउले बा झोली । बुझीं जनि ठिठोली,इहे हियरा— बुझलें न अबले, जोड़त हाथ दुअरे लागत बा आइल चुनउवा ह नियरे भरमावे भर दिन चार चार गो टोली । बुझीं जनि ठिठोली,इहे हियरा— जयशंकर प्रसाद द्विवेदी 09-10-2025
Read Moreस्त्री संवेदना के धारदार कृति:निमिया रे करुआइनि
पुस्तक- निमिया रे करुआइनि विधा-उपन्यास / उपन्यासकार – मीनाधर पाठक प्रकाशन वर्ष-2024 /प्रकाशन संस्थान – सर्वभाषा प्रकाशन , नई दिल्ली -59 ‘निमिया रे करुआइनि’ स्त्री संवेदना के उनुका मन के मोताबिक आ उनुका स्थिति का हिसाब से गढ़ाइल बा। कथाकार अपना कथा-विन्यास के स्मृतियन से जोड़त रोचक बनावे में कवनों कोर कसर नइखे छोड़ले। एह उपन्यास के नायिका सुरसतिया (सुरसती) के करुणा आ दुःख भरल जिनगी के जतरा जवन मन,मेहनत आ देह के शोषण से होके गुजरल बा , ओकर नीमन से शब्द चित्र खिंचाइल बा। एही उपन्यास के…
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