गजल

बात जब बेबात के तब बात का? कटल जड़ तऽ भला बांची पात का?   ऊ मोटाइल बा रहस्ये ई अभी, का पता ऊ रहे छिपके खात का?   छली कपटी जब होई दुश्मन होई, मीत ऊ कइसे होई? हित-नात का?   कथ्थ आ करनी में जेकरा भेद बा, ठीक केवन वंश के भा जात का?   झूठ के महिमा रही दुइये घरी, एह से बेसी हो सकी औकात का?   अशोक कुमार तिवारी

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गजल

ई बीमारी बड़का भारी। सनमुख डंणवत, पीछे गारी।।   काटे भीतर घात लगाके, राम राम ई कइसन यारी?   कवन भरोसा केन्ने काटी? जेहके भइल सुभाव दुधारी।   ढेला भर औकात न जेकर, ऊहो मुँह से लादे लारी।   छेड़के ओके नीक न कइलऽ, बहुत पड़ी तोहरा के भारी।   कबहूँ जे सोझा आ गइलऽ, सात पुश्त ले ऊहो तारी।   निकलल बाटे फन त काढ़ी? राखल बाटे लाठी – कारी।   अशोक कुमार तिवारी

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गजल

पहिले रSहे सरल आ सहज आदमी आज नफरत से बाटे भराल आदमी ॥   गीत जिनगी के गावत – सुनावत रहे अब तs जिनगी के पीछे पर्ल आदमी ॥   आदमी जे रहित तs करित कुछ सही आदमी के जगह बा मरल आदमी  ॥   अपना वइभव के तिल भर खुसी ना भइल देख अनकर खुसी के जरल आदमी ॥   राण – बेवा भइल अब त इंसानियत माँग मे पाप कोइला दरल आदमी ॥   कब ले ढोइत वजन नीति के ज्ञान के फायदा जेने देखलस ढरल आदमी ॥…

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