सतुआ

पहिले सतुए रहे ग़रीबवन के आहार केहू जब जात रहे लमहर जात्रा प त झट बान्हि लेत रहे गमछा में सतुआ,नून, हरियर मरीचा आ पियाजु के एकाध गो फाँक केवनो चापाकल भा ईनार से पानी भरि के लोटा भर सुरूक जात रहे केहुओ बेखटके ऊ बिस्लरी बोतल के ज़माना ना रहे सतुआ सानि के गमछिए प खा लिहल जात रहे ओह घरी गरमी में केवनो पीपर,बर आम भा महुआ के छाँह में पहिले लोग क लेत रहे गुज़र-बसर सतुओ खाके ओह घरी बजार में बेंचात ना रहे केवनो फास्टफूड अब…

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तमासा घुस के देखै

लख लतखोर कहाय, तमासा घुस के देखै॥ सौ सौ जुत्ते खाय, तमासा घुस के देखै॥   इनका उनुका बहकावे में नाटो क खिचड़ी पकावे में जेलस्की इतराय, तमासा घुस के देखै॥   गावत फिरत देस के गीत संहत  छोड़ि परइलें मीत बइडेनवा मुसकाय, तमासा घुस के देखै॥   बरसे लगल रसियन मिसाइल खड़हर सहर मनई बा घाहिल खूनम खून नहाय, तमासा घुस के देखै॥   मानवता के नारा कइसन नैतिकता क पहाड़ा जइसन कबौं बदल ऊ जाय, तमासा घुस के देखै॥   के बा नीक, नेवर के बा फयदा केकरा…

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फागुन में नाचल

हंसि हंसि क बहार उतान भईल, अगराई के फाग जब फागुन में नाचल ।   फगुआ के जब आगुआन भईल, अबीर-गुलाल आपना सुघर भाग पे नाचल।   बबुआ-बुचिया के जब रंग रंगीन भईल , फिचकारी के संग उछल- कुद के नाचल ।   बुढा-जवान के भेद सभ भुल गईल , फागुन फगुआ के जब मधुर तान पर नाचल।   आपन-आन के सब ध्यान गईल , जब बैर तेज के सब केहु गले मीली नाचल।                उमेश कुमार राय ग्रा0+पो0- जमुआँव , जिला- भोजपुर (बिहार )

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मम्मी रे हमहूं इसकूल जाइब

मम्मी रे पापा से कह के ड्रेस एगो बनवा दे। हमहूं रोज इसकूल जाइब भइया के बतला दे। जूता मोजा कलम पेनसिल कापी किताब टाई। जेंटल मएन बनके जाइब जइसे जाला भाई। हरमेस हाथ पकड़ि के चलबि पीठ प लादि के बसता। इयाद पारि के रोजे रखिहे मम्मी ओ में नासता। मम्मी कान पकड़त बानी छोड़ देब सैतानी । सभ केहु के मान राखबि हम बोलबि गुर जस बानी। ना खाइब अब चिप्स कुरकुरा चाट अउरी समोसा। ए ममता के मूरत मम्मी अब त क ले भरोसा। सभ लइकन से…

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पान थूक के

पढ़े लिखे में जी ना लागे बनि के घुमत हवा नमुन्ना पिता जी पूछलन पूत से अपने रगड़त खैनी संगे चुन्ना।   तब बबुली झार अदा से अगबै पान थूक के बोलस मुन्ना सुना हे बाऊ नेता बनबै कइ देब दऊलत पल में दुन्ना।   का घबड़ाला झूठमूठ क अँगुरी पर बस दिनवा गीन्ना लड़ब बिधइकी जल्दी हनहुँ फिर बुझबा हम हई नगिन्ना।   जिला जवारी जानी हमके निक निक लोगवा छोड़ि पसिन्ना तोहरो नाम ऊँचाई छुई नाची सब डेहरी पर धिन्ना।   खड़ा सफारी दुअरे होई मनी महोत्सव साथ…

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नून-तेल-लकड़ी मे फंसि गइल जनता

नून-तेल-लकड़ी मे फंसि गइल जनता नाहीं त तखता पलटि देत जनता!   ओके लगेला की होत बा सब अच्छा नइखे मालूम के बा झूठा के बाद सच्चा भेड़ियन के बीच में भइल नंगी जनता नाहीं त तखता पलटि देत जनता!   धरम-करम मेें उ बा गइल अझुराई जात-पात ऊंच-नीच के रोग लगाई भरम मे भागल जाले कांवर लेके जनता नाहीं त तखता पलटि देत जनता!   बरध जइसे रात-दिन बहावे पसीना पेट जिआवे फारि धरती के सीना किसमत पे रोवै बइठ करे कुछ ना जनता नाहीं त तखता पलटि देत…

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कहानी का सुनायीं

गांव के परिवेश के कहानी का सुनायीं सभे बा मतलबी केकरा के समझायीं घर के पड़ोसिया लगावे दरहीं कूड़ा कहले पे हमके दिखावे लमहर हुरा धमकी त देत बा कईसे समझायीं गांव के परिवेश के……।   संस्कार घर-घर के स्वाहा भईल जाला ईर्ष्या के आग में सबे जरते देखाला सुनि के अनसुनी करे माने नाहीं बतिया अंखिया में धूल झोके संझिये के रतिया अइसने मतलबियन के कईसे समझायीं गांव के परिवेश के……..।   ऐश आ फिजूल में करेला सभे खरचा मुहवा से कब्भो नाहीं धरम के चरचा मतलब परेला त…

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बरम बाबा

तू त देखतअ हउअ सब दिन-रात बरम बाबा नाहीं बा अब पहिले जइसन बात बरम बाबा   सुक्खू अपने अँगने में भी नल लगवा लेहलेन कुँआ पाट के रामधनि बइठका बना देहलेन बुधनी के दुआर पर खम्भा घर में लाइट बा बालकिशुन बिल देवे लगलेन जेबा टाइट बा   घरे-घरे पैखाना बा ,लोटा क जुग बिसरल केहू नाही अब जंगल में जात बरम बाबा ||   घर घर में टीवी बा ,डिश बा,इंटरनेट भी बा सबके पल्ले मोबाईल क बढ़िया सेट भी बा बर्गर,पिज़्ज़ा,चाउमीन सब मिलय लगल अब त केक, पेस्ट्री ,काफी,कुल्फी दिखय लगल अब त  …

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तीन चौथाई आन्हर

बाबू आन्हर माई आन्हर हमै छोड़ सब भाई आन्हर के-के, के-के दिया देखाई बिजुली अस भउजाई आन्हर॥   हमरे घर क हाल न पूछा भूत प्रेत बैताल न पूछा जब से नेंय दियाइल तब से निकल रहल कंकाल न पूँछा   ओझा सोखा मुल्ला पीर केकर-केकर देईं नजीर जंतर-मन्तर टोना-टोटका पूजा पाठ दवाई आन्हर॥   जे आवै ते लूटै खाय परचल घोड़ भुसवले जाय हँस-हँस बोलै ठोंकै पीठ सौ-सौ पाठ पढ़वले जाय   केहू ओन‍इस केहू बीस जोरै हाथ निपोरै खीस रोज-रोज मुर्गा तोरत हौ क‍इसे कहीं बिलाई आन्हर॥  …

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भाषा के खातिर तमासा

इ भाषा बदे ही तमाशा चलत हौ बिना बात के बेतहासा चलत हौ इहाँ गोलबंदी, उहाँ गोलबंदी बढ़न्ती कहाँ बा, इहाँ बाS मंदी ।   कटाता चिकोटी सहाता न बतिया बतावा भला बा इ उजियार रतिया कहाँ रीत बाचल हँसी आ ठिठोली इहो तीत बोली, उहो तीत बोली ।   मचल होड़ बाटे छुवे के किनारा बचल बा इहाँ ना अरारे  सहारा बहत बा दुलाई सरत बा रज़ाई न इनके रहाई न उनके सहाई।   भगेलू क इहवाँ बनल गोल बाटे सुमेरु क उहवाँ बनल गोल बाटे दुनों के दुनों…

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