भोजपुरी नाव के महाभारत काल से जुड़ाव !

तेग अली तेग, भोजपुरी के पहिला गजलकार हवे आ 1895 के करीब इनिकर पहिला गजल संग्रह ” बदमाश दर्पण ” प्रकाशित भइल रहे जवन इनिकर 23 गो भोजपुरी गजलन के संग्रह ह । एह किताब के दोबारा प्रकाशन ज्ञानमण्डल (वाराणसी) से पं. शिवप्रसाद मिश्र ” रुद्र कशिकेय’ जी एह किताब के ” तेग अली और कशिका’ नाव से प्रकाशित कइनी । बाद में पं. पुरुषोत्तमलाल दवे ‘ऋषि’ जी एह किताब के ‘ बदमाश दर्पण’ नाव से प्रकाशित कइनी आ फेरु 2002 में विश्वविद्यालय प्रकाशन से इ किताब ‘ बदमाश-दर्पण ‘…

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भोजपुरी लोक संस्कृति : खान-पान आ परिधान

भोजपुरी लोक संस्कृति बिहार,उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल आ झारखंड के कई हिस्सन में पसरल एगो समरिध आ पुरान जीवन शैली ह। भोजपुरी लोक संस्कृति एगो लमहर पइसार वाली संस्कृति ह, जवन ओह क्षेत्र के रहनिहार लोगन के जिनगी के हर कोना-अँतरा में ससरि के बइठल बा। ई संस्कृति मनई के जिनगी जिये के कला का संगे सुघर आ अनुसासित बनावेले। एह क्षेत्र में अलग-अलग परंपरा आ रीति-रेवाजन के विधि-विधान जिनगी के जिये खातिर जरूरी साधन बनि चुकल बा। मनई के जिनगी खातिर घर, महल, किला, गाँवन के बनावट-बुनावट, भोजन, शिक्षा,…

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भोजपुरी लोकगीतन में भारतीय संस्कार आ परम्परा

भारतीय सभ्यता संस्कृति ओकर पौराणिक जन-जीवन , रहन –सहन , खान-पान , दुख-विलाप , हर्ष- उल्लास का साठे जीवन का हरेक पहलू जनम से लेके मरन तक के बखान हमनी का लोकगीत भा  लोकगाथा में गतिबद्ध बा,  जवन एक पीढ़ी से दूसरा पीढ़ी तक आसानी से पीढ़ी दर पीढ़ी भेंटत बा। कवनो भी क्षेत्र के पौराणिक वस्तु स्थिति के जाने के खातिर उहाँ क भाषा में रचल बसल साहित्य के अवलोकन होला । हरेक क्षेत्र के आपन एगो अलग लोक संस्कृति , रीति-रिवाज , खान-पान, पर्व-त्योहार , रहन-सहन के साथ …

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भोजपुरी नाटक के विविध रूप

नाटक एगो अइसन विधा ह, जवना के ब्रह्म आँख से देख के कान से सुन के होला। ई विधा बहुत पुरान ह। एकरा सम्बन्ध में कई प्रकार के मत पावल जाला। नाटक के उत्पत्ति का विषय में एगो कथा बा कि सब देवता लोग ब्रह्मा जी के पास में गइल लोग आ काहल लोग कि एह शृष्टि में मनोरंजन के कवनों व्यवस्था कइल जाव। ब्रह्मा जी शृग वेद से कथानक,सामवेद से संगीत अथर्व वेद से रस आ अजुर्वेद से अभिनय लेके पांचवा वेद नाट्य वेद के अवतारना कइनी। ओकरा बाद…

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चंदेश्वर के कविता संग्रह ‘गोहार ‘पढ़ला-गुनला के बाद —

भोजपुरी में गद्य से शुरुआत करिके पद्य के दुनियाँ में उतरे वाला हिन्दी-भोजपुरी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार चंद्रेश्वर जी के पहिला भोजपुरी कविता -संग्रह ‘गोहार ‘ के पढ़े से पहिले हम ‘कवि का ओर से दूर गो बात ‘ के पढ़े लगनीं।अपना एह आत्मकथ्य में कवि कविता के लेके कुछ साफ-साफ बतकही कइले बाड़न।उनकर कहनाम बा – 1-” कविता सच्चाइयन से जोड़ के मनुष्य-जीवन के एगो गति प्रदान करेले।××××× सभ्यता -संस्कृति के रचे-गढ़े में मय संसार में ओकर योगदान विशेष रहल बा।ऊ प्रेम आ प्रतिरोध साथ लेके आपन जय-जतरा प निकलेले।”…

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गंगा के नवगीत भीतर भाव के उत्पात

भोजपुरी साहित्यांगन के एगो चमकत सितारा गंगा बाबू, हँ गंगा प्रसाद अरुण के भोजपुरी काव्य संसार में आपन विशेष पहचान बा। गंगा बाबू के कलम भोजपुरी के हर विधा के समृद्ध कइले बा बाकिर उहां के प्रिय विधा काव्य रहे। कविता में उहाँ के गीत, नवगीत, हाइकु, गजल आ दूसरों विधा में खूब कलम चलवनीं बाकिर उनुका भीतर गीत – नवगीत के अजस्त्र धारा बहत रहत रहे। उहाँ के भोजपुरी गीत – नवगीत संसार के एगो विशेष पहचान देनीं। मंच से लेके पुस्तक आ पत्रिकन तक में। उहाँ के ‘…

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भोजपुरी साहित्य के काल विभाजन

कवनो भाषा के परिचय के मतलब होला ओकरा उत्पत्ति से लेके वर्तमान तक के क्रम बद्ध गतिविधि के विस्तार पूर्वक जानल भा जानकारी प्राप्त कइल। भोजपुरी हिन्द आर्यन  भाषा परिवार के एगो सशक्त भाषा ह,जवना के उत्पत्ति मागधी,प्राकृत आ ओकरा अपभ्रंश से भइल मानल जाला। आजु भोजपुरी के सर्वमान्य लिपि देवनागरी लिपि बा। पहिले से शुरू कके आज ले गौरवशाली भोजपुरियन के चित्त, चिंतन ,चेतना में हो रहल परिवर्तन , परिमार्जन के साथे-साथे भोजपुरी साहित्य में समसामयिक बदलाव के दस्तावेजीकरण  के भोजपुरी साहित्य के इतिहास कहल जा सकेला । साहित्य…

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मारीसस देस के सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत

सन् उन्नीस सौ पचास,साठ आ सत्तर के दसक में पराधीन मारीसस देस में, गिरमिटिया आंदोलन के राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत केवल एगो कवि साहित्यकार ना रहलन, बल्लुक ओह धरती पे बसल भारतीय मूल के सभे लोगन के आत्मा के आवाज़ रहलन । ओहिंजा पत्रकार,आंदोलनकारी, आजादी के सिपाही भी उ रहलन ।। मारीसस में “गिरमिटिया” पीड़ा, संघर्ष आ अस्मिता के जवन इतिहास हौ, उ ओकरा के गीत, कविता आ भावनात्मक अभिव्यक्ति में ढाल के अमर कर देहलन ।। “गिरमिटिया आत्मा के आवाज़ रहलन ब्रजेंद्र मधुकर भगत”…

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भोजपुरी के मान्यता: केकरा पर करीं सिंगार कि पिया मोर आन्हर ?

भाषा खाली बतकही के जरिया ना होला, बलुक ई कवनो समाज के आत्मा, संस्कृति, इतिहास आ सामूहिक चेतना के ढोअल करे वाली शक्ति ह। भारत जइसन बहुभाषी देश में हर भाषा आपन एगो अलग संसार समेटले बा। भोजपुरियो ओही में से एगो समृद्ध लोकभाषा ह, जवन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड से निकल के मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद जइसन देशन ले फैल गइल बा। लगभग 20–25 करोड़ लोग भोजपुरी समझेला या बोलेला। बावजूद एह सब के, आज ई भाषा आपन घरे में आपन आस्तित्व के संकट से जूझत बिया। सबसे बड़…

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भोजपुरी: संवेदना, संघर्ष अउर समता के भासा

भोजपुरी के नाम आवते आजु ढेर लोगन के मन में पहिल छवि “लोकप्रिय गीतन” के उभरेला  ऊ मंच, मेला, सिनेमा अउर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाजत चटर पटर गीत के, बाकिर ई हमरा समझ से अधूरा सच्चाई ह। भोजपुरी के असली माने, ओकर आत्मा, ओकर सांस्कृतिक गहिराई अउर मानवीय संवेदना के विस्तार एह सतही छवि से कहीं जादे व्यापक बा। भोजपुरी ना त खाली “मौसमी” गीतन के भासा ह, न खाली मनोरंजन के साधन; ई संघर्ष, करुणा, त्याग, समर्पण, श्रम, वियोग अउर मुक्ति के जियत-जागत सांस्कृतिक दस्तावेज ह। त्याग अउर समर्पण…

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