समाज कल्याण फेडरेसन ऑफ इंडिया भोजपुरी साहित्यकार के सम्मानित कइलस

स्वतन्त्रता दिवस के पहिल संझा के समाज कल्याण फेडरेसन ऑफ इंडिया अपने एगो कार्यक्रम में गाजियाबाद के सुप्रसिद्ध भोजपुरी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के उनुका भोजपुरी के सतत सेवा खातिर सम्मानित कइलस। संस्था के अध्यक्ष जितेंद्र बच्चन जी कहलें कि जहाँ लोग शहर में जाते आपन मातृभाषा भुला जाला, उहें भोजपुरी क रेगिस्तान कहावे वाला जगहा पर द्विवेदी जी पछिला 5-6 बरिस से भोजपुरी के मासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य सरिता निकाल रहल बाड़न। संगही उहाँ के 4 गो किताब प्रकाशित हो चुकल बाड़ी आ 5 गो किताबन के संपादनों क…

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अपनइत के काव्य गोष्ठी सम्पन्न भइल

 स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर एक काव्यगोष्ठी “अपनइत ” (भोजपुरी संस्था) के तत्वावधान में हमरे आवास शास्त्री नगर गाजियाबाद में सम्पन्न भइल जेकर अध्यक्षता क भूमिका देस क जानल मानल प्रतिष्ठित कवि ,शायर, पत्रकार अ सम्पादक हम सबकर दुलरूआ अ चहेता भाई मनोज भावुक जी निभवलन। गोष्ठी के अध्यक्ष भाई मनोज भावुक जी मां सरस्वती के प्रतिमा पर माल्यार्पण कर के दीप प्रज्वलित कइलन , ओकरे उपरान्त श्री अजयवीर सिंह त्यागी जी सम्मानित अध्यक्ष अ रचना कारन क स्वागत माला पहिना के अ शाल ओढ़ाके कइलन। गोष्ठी क सफल…

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राकेश पाण्डेय जी के चार गो गीत

1   पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। भींजे मोरी कोरी रे चुनरिया नु हो,नाहीं बाड़ें रखवार।   पुरुवा के झोंकवा से सिहरे बदनियां। टप टप अंचरा से चूवे मोरा पनियां। आगि लगो कोठवा अंटरिया नु हो, नाहीं बाड़ें रखवार। पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार।   पिऊ पिऊ बोलेला मोर पिछवरवां। निनिया पराई गइलीं ननदी बहरवां। झलुआ क गीतिया बिरहिया नु हो, नाहीं बाड़ें रखवार। पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार।   संझवा बिहनवां ना लागे मोर मनवां। सासु सुत्तें…

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तोहरे बिगारल हवे

प्रेमी तोहरे सनेहिया के मारल हवे..2 नाहीं बिगड़ा ह तोहरे बिगारल हवे..2 आ॰1 तोहके अपनों से ज्यादा उ चाहत रहे…2 तोहरा से ओकरा जीनगी में राहत रहे..2 जननी ई सब त तोहार उतारल हवे….. नाहीं बिगड़ा ह तोहरे बिगारल हवे..2 प्रेमी तोहरे सनेहिया के मारल हवे..2 आ॰2 अब सनेहिया के नमवा से डर हो गईल..2 चर्चा गउएं का संउसे शहर हो गईल..2 तिरछी नैना कटारी के फारल हवे….. नाहीं बिगड़ा ह तोहरे बिगारल हवे..2 प्रेमी तोहरे सनेहिया के मारल हवे..2 आ॰3 पांडेय आनंद किस्मत में इहे लिखाईल..2 नीर नदिया में…

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सावन -प्रेम गीत

सावन के महिना घेरले बदरिया बरसेला पनिया बीच रे आँगन में केहसे संदेसा भेजी केहु नइखे दुआरा पियउ भींजत होंइहे बीच पाँतर मे। आदारा ना हवे इहो हवे इहो हथिया बड़े बड़े बुनी पड़े धरकेला छतिया चमके बिजुरिया दूर गगन में पियउ भींजत होंइहे बीच पाँतर में। लगे तनी रहतें त पूछ लेले रहतीं संझिया के हमहूँ निक-नोहर बनवतीं केहु नाही लउके दूर डगर में पियउ भींजत होंइहे बीच पाँतर में भींजतिया चिरई भींजतिया गइया दुअरा के छान पर बइठल गौरईया हमरा ना निक लागे अइसन महल में पियउ भींजत…

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बरसेला बदरा

राखी बान्हेले बदरिया लरकेला बदरा गइली धरती जुड़ाय बरसेला बदरा पुरुवा बयरिया से पठवे सनेसा बितलें बरिस दिन जियरा अनेसा पउते पउते खबरिया हरसेला बदरा गइली धरती जुड़ाय बरसेला बदला मेंड़ ना देखात कहीं भरली कियारी छोटी छोटी गड़ही भेंटेली अकवारी सभके मिलाय के गरजेला बदरा गइली धरती जुड़ाय बरसेला बदरा बन्द होई गइली कोइलिया के बोली झिंगुरा मेघुचवा मचावेलें ठिठोली कजरा के रंग जइसे ढरकेला बदरा गइली धरती जुड़ाय बरसेला बदरा भइया बहिनियाँ के नेह फरिआइल सुखली धरतिया के देंह हरिआइल नतई निभाय कतहीं सरकेला बदरा गइली धरती जुड़ाय…

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बरसि गइलैं बदरा

बरसि गइलैं बदरा,आजु मोरी गुंइयां। मनवा जुड़ा गइलै,महकल ई भुइयां।। आजु मोरी गुंइयां,बरसि गइलैं बदरा।। आजु मोरी गुंइयां,बरसि…… खेतवा सिवनवा में भरि गइलैं पानी, पोखरी सुनावे ले हंसि के कहानी, तलवा के जइसे,छुवल चाहे कुंइयाँ। आजु मोरी गुंइयां,बरसि…… पेड़वन के फुंनुगी पे नाचल बा बुनियाँ, पात पात झूमल बा चहँकल टहनियाँ, मछरी तलइया में,मारें कलइया। आजु मोरी गुंइयां,बरसि…… गउवांं किसनवां के हियरा जुड़ायल, खेतीबारी रोपनी कै,मैसम बा आयल, उतरल सवनवाँ,करी पार नइया। लालबहादुर चौरसिया ‘लाल’ आजमगढ़

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बतावा बुढ़ऊ

काहें काशी पर मोहइला बतावा बुढ़ऊ। काहें आदि देव कहइला बतावा बुढ़ऊ।   जाने के त सभ जानेला हउवा बड़का दानी भगतन खातिर कई जाला, बढ़-चढ़ के मनमानी काहें असुरन पर लोभइला बतावा बुढ़ऊ।   जेकर अरजी तहरे लग्गे दुख ओकर भागेला दाही-दुसमन भूत-प्रेत, पानी सबही माँगेला काहें दसानन से लुटइला बतावा बुढ़ऊ।   हम निरधन तहरा सोझा,हमके राह देखावा मझधार में बूड़त नइया, ओके पार लगावा काहें हम पर ना छोहइला बतावा बुढ़ऊ।   कैलास के बासी हउवा, मृग छाला पहिरेला जंगल झाड़ का बतलाईं, पहड़ो में रहि लेला।…

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सावनी गीत

पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। भींजे मोरी कोरी रे चुनरिया नु हो,नाहीं बाड़ें रखवार। पुरुवा के झोंकवा से सिहरे बदनियां। टप टप अंचरा से चूवे मोरा पनियां। आगि लगो कोठवा अंटरिया नु हो, नाहीं बाड़ें रखवार। पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। पिऊ पिऊ बोलेला मोर पिछवरवां। निनिया पराई गइलीं ननदी बहरवां। झलुआ क गीतिया बिरहिया नु हो, नाहीं बाड़ें रखवार। पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। संझवा बिहनवां ना लागे मोर मनवां। सासु सुत्तें अंगना ससुर जी दलनवां। सेजिया…

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सावनी गीत

दिनवां धराइदा मोर सजनवां, सवनवां उदास लागे गोइयां। जहर बोले सगरो जमनवां, सवनवां उदास लागे गोइयां। संघे के सहेली सब करेलीं ठिठोली। कहिया तोहार होई बोलेलीं किबोली। नइहर में लागे नाहीं मनवां। सवनवां उदास लागे गोइयां। छतिया में हूक उठे घेरे जब बदरिया। केहू कहां छोड़ेला आपन गुजरिया। कधले देखइबा बस सपनवां। सवनवां उदास लागे गोइयां। अंगराइल देंहिया ना सम्हरे अंचरवा। देखि देखि बरसे ला बैरी बदरवा। कहिया लेजइबा मोर गवनवां। सवनवां उदास लागे गोइयां। राकेश कुमार पांडेय गांव-हुरमुजपुर सादात,गाजीपुर

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