गीत

अबकी नवरतिया मइया करतु एगो जुगतिया हो मइया मोरी करतु एगो जुगतिया कि छोड़ि हो देतु ना, अपने बब्बर सेरवा के मइया, छोड़ि हो देतु ना।   छोड़तु त भले करतु आपन बब्बर सेरवा हो मइया मोरी आपन बब्बर सेरवा बाक़िर छोड़तु ओकरा ना, जयचंदवन के पिछवा मइया छोड़तु ओकरा ना। गद्दरवन के पिछवा मइया छोड़तु ओकरा ना।   छोड़तु त भले करतु आपन बब्बर सेरवा हो मइया मोरी आपन बब्बर सेरवा बाक़िर छोड़तु ओकरा ना, मंहगइया के पिछवा मइया छोड़तु ओकरा ना। बेरोजगरिया के पिछवा मइया छोड़तु ओकरा ना।…

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सुघर भूमि भारत

जहवाँ माई अँगने सुगना दुलारत सुघर भूमि भारत।   तीन ओरियाँ सिंधु, एक ओर ह हिमालय कन-कन में राम, गाँव-गाँव में शिवालय उहवें के ऊंच भाल दुनियाँ निहारत सुघर भूमि भारत।   मसजिद अजान, गुरुद्वारे गुरु बानी चर्च में बा प्रार्थना, बनता कहानी दुसुमन के दीठी पठावेला गारत सुघर भूमि भारत।   भोरहीं से पवना के जहवाँ मलय राग उहवें भेंटाला कामिनी के बिरह आग सुघरई के कामदेव उहें उघारत सुघर भूमि भारत।   गंगा जमुना नर्मदा अपने रवानी उर्वर भूमि खातिर खूब देलीं पानी अन्न उपजाई धरा सभे के…

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अगिन बरिसे

सावनों में दंवके सिवनवाँ अँगनवाँ मोरे, अगिन बरिसे। नीलहा अकसवा के बदरा रिगावे दिनवाँ में देहियाँ के लवरि जरावे सुसकेला खेतवा किसनवाँ अँगनवां ——– बिंयड़ा में धनवा क बियओ झुराइल पहिले जे रोपल,रोपलो मरुआइल बिरथा बा असवों रोपनवाँ अँगनवां————- कइसे कहीं अब हुंड़रा के धवरल रसते में गोजर बिच्छी के पँवरल फुँफकारे किरवा क फनवाँ अँगनवां ——–   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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गीत

झऊँसत बा देंहि सगरो झऊँसत बा मनवाँ करीं त का करीं। जरे धरती असमनवाँ सजनवा का करीं ।। गुम सुम भइल नाहीं बहेला पवनवाँ। छितरी प छितरी छूटे उग बुग मनवाँ।। बेनिया डोलावत चुनुकल हाथे के कङनवाँ सजनवा का करीं ।। दिनवाँ कटेला कइसो कटे नाहीं रतिया। अन्हारे धुन्हारे होला बहुते ससतिया।। छतवा तवेला अउसे घरवा अङनवाँ सजनवा का करीं।। धान के बेहन सूखल, खेत ना जोताइल। होला धूरिबावग लोग बाटे अगुताइल।। परल छितराह बहुते मिलें नाहीं जनवाँ सजनवा का करीं।। माया शर्मा, पंचदेवरी, गोपालगंज (बिहार)

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कजरी

अबके बाँव न जाई सावन साँवरिया बदरिया भले कतिनो बरिसे।   चाहे झिर झिर परिहें बूनी भीजे डहुंगी तर के चूनी सजना जाई उहवें देखि भरि नजरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे।   चाहे कउंचे साँवर गोरी इचिको तके न हमरे ओरी अइबै ओढ़ावे बदै धानी चुनरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे।   भउजी टुप टुप ताना मरिहें भलहीं कोसिस निफल करिहें अबके मिली उनुके सुनइबै कजरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे।   भले कंठ रही अनबोलले रयनि बैरिन पट के खोलले अबके साजन गोरी भेटी अंकवरिया । बदरिया भले कतिनो बरिसे।  …

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गीत

रूठल रूठल बदरवा मनाई कइसे। गाई रगिया मल्हरवा सुनाई कइसे ।।   उत्तर में बदरा हाथ जोड़ी लिहले, पछुवा बेयरिया गजब कई दिहले, भारी गरमी से जियरा जियाई कइसे ।।रूठल…..   आजु रथ जतरा में रथवा खिंचाइल, कुछ कुछ बदरिया अकासे रहल छाइल, इचिको बरसल ना बदरा नहाई कइसे ।।रूठल…..   रउवा त ठीक भइली पीही कढवा, लुहिया सहत पूरा बीतल अषढ़वा, अब जिनगी के रथवा खिंचाई कइसे ।।रूठल……   बाबा जगन्नाथ भेजी पूरब से पनियां, ‘लाल’ रोवे घरवा रोवत बानी धनियां, राउर भगतन के दुखड़ा बताई कइसे ।।रूठल……  …

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गीत

बिख उगे घमवा अषाढ़ महीनवां में, बरखा के आस नाहीं सुरुज धिकाइल बा। पोखरी तलइया में नीर नाहीं नदी सूखि, त्राहिमाम सगरो धरतिया सुखाइल बा। झन-झन झिंगुरा झनकि दुपहरिया में, पेड़वा क पतवा मुरुझि लरुआइल बा। दुबुकल चिरइया खतोंगवा में छांह खोजि, बचवन के सँगवा पियासल पटाइल बा। धनि-धनि बदरा ना लउके सपनवों में, पपीहा वियोग जरें गर रून्हिआइल बा। केकरा अंजोरवा तूं अइबा बदरवा हो, जुगुनू के बत्तिया पसेनवा बुताइल बा। हेरें असमनवां में चान के अंजोरिया हो, खेतिया किसनिया के बेला इहे आइल बा। मेझुका मिलन बाट जोहेलीं…

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एक सुझाव गीत

धरती के सिंगार बिरना आवा सजावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के बचावा हो।। हरे हरे पेड़ होइहैं फैली हरियाली, हरषी सिवान देखि पूरब के लाली, उसर के नाम अब जग से मिटावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के…… सुंदर समाज बनी शुद्ध होई पानी, ताजी हवा से मिली मन के रवानी, एसी में सोवल जे बा उनके जगावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के …… ओजोन चादर में छेद भइलैं भारी, कहियो ज फाटी चादर फैली बीमारी, “लाल” के बिचार भइया टोगें गठियावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के…….…

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पूरबी

पियवा के सुधिया सतावे भरि रतिया साँवर गोरिया रे। तलफत सेजरिया पर जाय।   सेही सेजरिया सपनवाँ ना भावे साँवर गोरिया रे। सोचि सोचि बतिया लोराय।   कवने कारन पिया छोड़लें बेगनवाँ साँवर गोरिया रे। क़िसमत के कोसी पछताय।   जेपी के कहना बा ठाना ठनगनवाँ साँवर गोरिया रे। आपन पियवा लेहु न बोलाय।   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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गुलबिया हो

ना हमरा से नेह छोह ना रउरा से प्यार बा। फेरु गुलबिया हो, केकरा लग्गे सरकार बा।   बुद्धू बकसवा में बइठ टर्राने केकरा खातिर पूछेलें फलाने केकरा साथ संगत के उनुका दरकार बा। गुलबिया हो……   केकरे ओठवा के नमी झुराइल बाति के सुनगुन से के बउराइल केहो छान-पगहा लिहले करत गोहार बा । गुलबिया हो……   अचके में आजु मार पड़ल अइसे करके भितरघउवा सुसुकीं कइसे अइसन दरद जवन कहलो बेकार बा। गुलबिया हो……   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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