सोझ, सपाट आ सरल भाषा के कहानी संग्रह- अकथ प्रेम

अपने माई भाषा भोजपुरी में आजु कहानी के सिरजना करे वाली महिला लेखिका लो अंगुरी पर गिने भर बाड़ी। त अइसना में डॉ रजनी रंजन के बारे में ई  कहल कि उ भोजपुरी साहित्य जगत में पहिचान के मोहताज नइखी, अतिशयोक्ति ना कहाई। डॉ रजनी रंजन भोजपुरी कि साहित्यिक मासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य सरिता के खोज बाड़ी आ उनुका लेखन के बीरवा एही पत्रिका संगही फरत फुलात आगु बढ़ल। एह कहानी संग्रह के सगरी पहिले से लोक में बाड़ी सन, काहें से कि कुल्हि पतरिकन में प्रकाशित हो चुकल बाड़ी सन। ई संग्रह अपना भितरी 18 गो कहानियन के समेटले बा।

‘बटेसर चाचा’  कहानी संग्रह ‘अकथ प्रेम’ के पहिल कहानी बिया। बटेसर एगो बहरा नोकरी करे वाला नवहा रहलें, जे करिया लइकी से बियाह भइला का वजह से सोहागरात का दिने बेगर बतवाले ट्रेन से भाग के हिमाचल पहुँच जात बाड़न । जब लइका सभे नोकरी में लाग जात बाड़न त पचीस बरीस बाद उहाँ के अपने गाँवे लउटत बाड़न, आ कुछ बातिन का चलते उहे रुक जात बाड़न। मने पचीस बरीस पुरान परेम अँखुआ कुलबुलाये लागल आ इहे जरूरतो रहल।

‘जाड़ा के घाम’ सास-पतोह  के नोक-झोक आ आपसी प्रेम के कहानी ह, उहें ‘बरगद गाँछ’ गाँव में आपूसी सौहार्द खातिर कइल त्याग के बाति कर रहल बिया। बतिया खाली बाते भर नइखे बलुक ओहमें सफल भइल बा। ननद-भउजाई के आपुसी परेम-ब्योहार के कहानी ह ‘भउजी’। पलिवार के जोगा के राखे में भउजी का रूप में एगो कड़ी देखात बा। उहवें ‘हरिहरी चाची’ का रूप में एगो अइसन पुरनिया के रेखाचित्र उकेरल गइल बा, जवन दूगो पलिवार में बियाह भइला का बाद जामल बाउर स्थितियन के अपना सूझ-बूझ से सझुरावत परेम के गंगा बहवा देत बाड़ी। ओहूमें अपना पोती कनिका के जिनगी सँवार देत बानी आ कनिका के सास के ई कहे के मजबूर क देतानी कि ‘घर-परिवार में बूढ़-पुरनियन के होखल बहुत जरूरी बा।’  अपना बात के ठीक से परोसे आ समुझावे में कहानीकार डॉ रजनी रंजन सफल देखात बाड़ी। ‘भुलनी बुआ के रनिया’ एगो अलगे कलेवर के कहानी बा। भर गाँव के भरमा के अपनही लइकी के बियाह के नाटक रचा के  बेंच देतिया। ई कहानी भिखारी ठाकुर के ‘बेटी बेंचवा’ कहानी के ईयाद ताजा करा जात बिया। कहानी अंत में भुलनी बुआ के मरद के कमजोर पक्ष के मजगुती दे जात बा।’नयका साल पर पुरनका विचार के छौंका’ के पढ़ला का बाद कुछ लो ई कह सकेला कि जबरी पूजा-फरा के बात ढुकावल गइल बा। जबकि लइकी के मन बदलाव ओकरे उपयोगिता के साबित कर रहल बा। परिवार आ नवहा पीढ़ी के जोगावल आजु के समय के सभेले लमहर जरूरत बा।

दहेज के दानव अभिओ बिलाइल नइखे, ‘रामरती के राम’ कहानी में एही बात के सोझा राखल गइल बा। लडिका के समझदारी से घर उजड़े से आ मितई टूटे से बच जात बा। नवाही पीढ़ी के अगुआ बना के कहानीकार डॉ रजनी रंजन इहे सनेसा देवे के कोसिस कइले बानी। ‘नन्हकी के माई’ कहानी समाज में पसरल एगो अइसन सोच पर चोट कर रहल बा,जवन सगरों पावल जाला। सभे गोरे लइकी-पतोह चाहेला। मद्धिम रंग भा साँवरपर लो नाक-भौं सिकोरे लागेला। ई कहानी अइसन सोच वाला लो के आईना देखा रहल बा।

कहानी संग्रह ‘अकथ प्रेम’ के माथेला कहानी पुरनका समय के परेम के पड़ताल करत देखात बा। कहानीकार डॉ रजनी रंजन समसामयिक विसंगति पर लेखनी चलावे में पिछुआइल नइखी। पुरनियन के कुछ अइसने स्थिति ‘हहरत हियरा लहरत खेत’ में लउकत बा।  धनेसरी चाची एगो मिसाल सोझा रखली आ कहानीकार इहे सनेसो दे रहल बानी।

‘नयका हवा में बहकल मन’ में कहानीकार के दीठी आजु के बाउर फैसन से समाज में बेटियन के सुरक्षा ला घातक मान के रचल गइल बा।  ‘तेतर बेटी राज रजावे’ लोक कहाउत के लेके गूंथल-गाँठल कहानी ह। जवन ओकरा जनमला से लेके ओकर परवरिस आ नोकरी में अइला के बाति निकहे ढंग से बता रहल बा।  ‘बबुआ’ कहानी से कहानीकार किन्नरन के सवीकारता के पक्ष राख़ रहल बानी, बाक़िर समाज ओहनी के सवीकार नइखे करल चाहत। आजु ना त काल्हु समाज के सवीकार करही के पड़ी, इहे सनेसा एह कहानी के बा।

‘निरमल गाँव’ आजु के सफाई अभियान के गाँव-सहर सभे क जरूरत मान के रचल गइल बा। ई कहानी सामुहिकता एह अभियान के जरूरत  हवे, इहे मान के गढ़ाइल बा। ‘रामधन’ कोरोना काल में बहरा छेंकाइल मजूरन के परिस्थिति बस पेट जियावे खातिर समसान में काम करे के बेबस एगो  बेकती के कहानी ह। ई कहानी ना बलुक एगो जमीनी हकीकत का ओर इसारा करत देखात बा।

एह कहानी संग्रह के अंतिम कहानी ‘धाह से पाकल उमिर’ बा जवन संसारिकता के करुवा साँच से परिचय करा रहल बा। मनई आ मेहरारू जात के मन में पइसल लालच आ एक-दोसरा के देह के जरूरत पूरा करे खातिर अपना दायित्व बोध से किनारा करत चरित्रन के उकेर रहल बा।

सोझ आ सपाट भाषा में लिखाइल ई कहानी संग्रह कहानीकार के वैशिष्टता दे रहल बा। भाषा में कतो जबरी पांडित्य के देखावा नइखन। पढ़निहार लोग के जोड़ के राखे के तागतो बा आ सरल भाषा में बात राखे के सलीका जवन पहिल कहानी में लउकल उ अंतिम तक ले ओइसहीं बा। समसामयिक समस्यन पर कहानीकार के दिठी त बड़ले बा, ओकरा लेके आदर्शो स्थापित करे आ समाज के नीमन सनेस देवे क परयासो बा। आगु आवे वाला समय में कहानीकार डॉ रजनी रंजन के लेखनी अउर चोंख होखी, एहुके उमेद जगा रहल बाड़ी।  भाषा से नेह-छोह आ ई सरलता डॉ रजनी रंजन के असली तागत बनी, ई उमेद त बड़ले बा। सर्वभाषा प्रकाशन आपन विशेषता बना के राखे में इहवों पिछुवाइल नइखे। कतों कतों एकाध प्रूफ के गलती त देखाइल जरूर बाक़िर उहो अइसन नइखे कि ओकरा के पकड़ के बइठल जाव। पहिल कहानी संग्रह ला ढेर सारा बधाई आ अगिला के उमेद का संगे शुभकामना।

 

पुस्तक – अकथ प्रेम

विधा- कहानी संग्रह

कहानीकार-डॉ रजनी रंजन

मूल्य- रु 220/- मात्र

प्रकाशन- सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली    

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

संपादक

भोजपुरी साहित्य सरिता

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