भोजपुर में गाँधी के अइला के सै बरिस

मोहनदास करमचंद गाँधी के महात्मा के उपाधि तबे मिलल जब उ बिहार के धरती पर आपन गोड़ धरले। राजकुमार शुकुल से जिद से गाँधी जी चम्पारण अइले। गाँधी जी 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भाग लेवे आइल रहीं। एही अधिवेशन में शुकुल जी से पहिला मुलाकात भइल। शुकुल जी के बार बार आग्रह रहे कि हमार प्रदेश में आके ओहिजा के किसानन के उद्धार करीं। गाँधी जी टालमटोल करत रहलें आ शुकुल जी जिद। आखिर में गाँधी जी मान गइले आ कल्कता अधिवेशन के बाद आवे के सकरले। …

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भोजपुरिया समाज में ‘भिखारी ठाकुर’ होखला के माने-मतलब

एगो अइसन समाज जहवाँ लइका जनम का संगही पलायन अपना भाग के लिखनी में लिखवा के आवत होखे,जहवाँ आँख खोलते बाढ़, सुखाड़,गरीबी,भुखमरी आ अशिक्षा में सउनाइल समाज लउकत होखे,जात-पाँत, ऊंच-नीच, छुवाछूत, शोषण का संगे लइका बकइयाँ चलल सीखत होखे, जहां दू-जून के रोटी कुछे लोगन के समय से भेंटात होखे, जहवाँ लइकइयाँ से सोझे बुढ़ापा से भेंट होत होखे आ जहवाँ अमीरी गरीबी का बीचे बहुते गहिराह खाईं होखे, अइसन समाज अजुवो आपन लोक,संस्कार आ संस्कृति जोगावत चलल आवत बा, त कुछ न कुछ त खासे होखी।उ समाज अपना भीतरि…

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भाषा-साहित्य-संस्कृति के मोती: मोती बीए

नब्बे-पार मोती बीए लमहर बेमारी से जूझत आखिरकार 18 जनवरी, 2009 के सदेह एह लोक से मुकुती पा लेले रहनीं। किशोरे उमिर (1934) से संग-साथ देबे वाली जीवन संगिनी लछिमी सरूपा लक्ष्मी देवी पहिलहीं 1987 में साथ छोड़ि देले रहली। बांचि गइल रहे उन्हुका इयाद में बनावल ‘लक्ष्मी निवास’, जहंवां हिन्दी, भोजपुरी, अंगरेजी, उर्दू के एह समरथी आ कबो सभसे अधिका शोहरत पावेवाला कवि के पहिले आंखि  आउर कान जवाब दे दिहलन स,फेरु अकेलहीं तिल-तिल टूटत,बिलखत-कलपत शरीर से आतमा निकलि गइल,संसा टंगा गइल। 1 अगस्त, 1919 का दिने उत्तर प्रदेश…

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भोजपुरी में संस्मरण लेखन

जब कवनो लेखक अपना निजी अनुभव के ईयाद क के कवनो मनई, घटना, वस्तु चाहें क्रियाकलाप के बहाने लिखेला त उ सब पाठक के मन से जुड़ जाला। पाठक अपना देखल-सुनल-भोगल समय-काल में ओह चीजन के, बातन के, जोहे-बीने लागेला। संस्मरण एगो अइसनके विधा ह, जवना के पढ़ के पाठक लेखक के लेखनी से एकात्म हो के जुड़ जाला। उत्पत्ति के आधार पर देखल जाव त संस्मरण शब्द ‘स्मृ’ धातु में सम् उपसर्ग आ ल्युट् प्रत्यय के मिलला से बनल बा। एह तरे से एकर शाब्दिक अर्थ सम्यक् स्मरण होला।…

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भोजपुरी साहित्य में प्रेम अउर सद्भावना

लोक में रचल-बसल भोजपुरी भाषा आ ओह भोजपुरी भाषा के मधुरता आ मिठास, अपना जड़ से मजबूती से जुड़ल समाज आ ओह समाज में पसरल रीति-नीति के आपन अलग विशेषता बाटे। अपने एही विशेषता के संगे अलग- अलग सोपान गढ़त, ओके सजावत-सँवारत, ओकरे भीतरि के सुगंध के  अलग-अलग तरीका से अलग-अलग जगह बिखेरत भोजपुरी भाषा सदियन से गतिशील रहल बा आ अजुवो ले बा। अपना रसता में आवे वाला कवनो झंझावत से उपरियात, समय के मार के किनारे लगावत अपने भीतरि के ऊष्मा जस के तस अपने में समुआ के…

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पंडित हरिराम द्विवेदी होखला के माने मतलब

पंडित हरिराम द्विवेदी से हमार रिस्ता 12 पीढ़ी पुरान ह। कांतिथ के परवा गाँव से आइल कश्यप गोत्रीय  3 भाइन के एगो परिवार में से एक भाई के खानदान से उहाँ के बानी आ दोसरा भाई के खानदान से हमनी बानी। उहाँ के 11 वीं पीढ़ी में बाड़ें आ हम 12वीं पीढ़ी में। माने ठसक के संगे दयादी बा आ उ अजुवो जियल जा रहल बा। लोकजीवन आउर लोक संस्कृति के कतौ जब बात होखे लागेला, त चाहे-अनचाहे लोककवि लोगन के भुलाइल संभव ना हो पवेला।भोजपुरिया जगत मे अनगिनत लोककवि…

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धनवा-मुलुक जनि बिआह हो रामा

भोजपुरी कविता में महिला कवि लोग के उपस्थिति आ ओह लोग के कविता पर विचार, आज के तारीख में एगो गंभीर आ चुनौतीपूर्ण काम बा। एह पर अब टाल-मटोल वाला रवैया ठीक ना मानल जाई। भोजपुरी के लोकगीत वाला पक्ष हमरा नजर में जरूर बा। लोकगीत के अधिकांश महिला लोग के रचना ह, भले केहू के नांव ओह में होखे भा ना होखे। एहिजा लोकगीतन के चरचा हमार मकसद नइखे। भोजपुरी कविता के जवन उपलब्ध भा अनुपलब्ध बिखरल इतिहास बा, ओह के गहन-गंभीर अध्ययन के जरिए ही एह विषय प…

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गोरखनाथ: धीरे धरिबा पाँव

अठवीं से लेके बरहवीं शताब्दी ले चौरासी सिद्ध लोग  अपभ्रंश में कविता करत रहे ।सिद्ध लोगन के कविता में भोजपुरी शब्द आ क्रिया रूप मिलल शुरू हो गईल रहे। चौरासी सिद्धन में सबसे प्रसिद्ध रहलें सरहपा । उन कर एगो कविता देखल जां –नगर बाहर रे डोंबि तोहारि कुडिया/छोड़- छोड़ जाई सो बाभन नाड़िया /आलो डोंबि तो सम करबि मो संग /जाम मरण भाव कइसन होई/जीवन्ते भले नाहि विसेस ।‘  एमे  ‘छोड़ि छोड़ि जाई’ आ ‘कइसन होई’  भोजपुरी प्रयोग हवे ।सिद्ध लोगन के कविता में  एह तरे के बहुत उदाहरण…

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भउजी देह अंइठली अउरी फागुन आय गइल

फगुआ! आहा! चांद-तारा से सजल बिसुध रात छुई-मुई लेखां सिहरता. सोनहुला भोर मुसुकाता. प्रकृति चिरइन के बोली बोलऽतिया. कोयल कुहुक के विरहिनी के जिया में आग लगावऽतिया. खेत में लदरल जौ-गेहूं के बाल बनिहारिन के गाल चूमऽता. ठूंठो में कली फूटऽता. पेड़ पीयर पतई छोड़ हरियर चोली पहिर लेले बा. आम के मोजर भंवरन के पास बोलावऽता. कटहर टहनी प लटक गइल बा. मन महुआ के पेड़ आ तन पलाश के फूल बन गइल बा. हमरा साथे-साथ भउजी के छोटकी सिस्टर भी बउरा गइल बाड़ी. माधो काका भांग पीके अल्ल-बल्ल…

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धुआंला ना जेकर चुहानी ए बाबू

आसिफ रोहतासवी के नांव भोजपुरी गजल लिखे वाला ओह लोग में शामिल बा, जे गजल के व्याकरण के भी खूब जानकार बा। उनकर रचनाशीलता के पूरा निचोड़ गजल ह, खास क के भोजपुरी गजल। खाली भाषा से ही ना, पूरा मन मिजाज से ऊ भोजपुरी के गजलकार हवें। भोजपुरी के लोकधर्मी गजलकार कहे में हमरा कवनो उलझन नइखे। काहे कि उनकर गजल जवना चीज से बनल बा, जवना दरब से (ई शब्द हम अपना बाबा से सुनले रहीं। ऊ पइसा- कउड़ी के अर्थ में प्रयोग करत रहलें। इहां द्रव्य के…

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