शेष भगवान जाने ——-!!

का जमाना आ गयो भाया, टँगरी खींचे के फेरा में ढेर लोग अझुराइल बाड़ें। उहो काहें बदे, एकर पता नइखे, बस खींचे के बा, सरेखल बा लोग आ आँख मून के खींच रहल बा। आगु चलिके एकर का फायदा भा नोकसान होखी, एकरा ला सोच नइखे पावत। आला कमान के कहनाम बा, सेकुलर दादा कहले बाड़ें, एही सब के चलते हो रहल बा। अब भलही टँगरी खींचे के फेरा मे खुदे गड़हा गिर के कनई मे लसराए के परत होखे। ओहमे कवन सुख मिल रहल बा भा आगु मिली,पता नइखे।…

Read More

सावन मे फुहार परे बलमू

बरसेला मेघ जलधार हो कि सावन में फुहार परे बलमू॥2॥ फुहार परे बलमू,फुहार परे बलमू 2 सावन मे फुहार परे बलमू॥   तोहरे ही  नेहिया में उठेला हिलोरवा 2 आवे जब  सुधिया तोहार हो कि सावन मे फुहार परे बलमू॥   राति भर सेजिया पे निदियों न आवेला 2 अइबा तबे होई गुलजार हो कि सावन मे फुहार परे बलमू॥   पोरे पोर बिरहा में मातल देहिया 2 बूझा तनि बतिया हमार हो कि सावन मे फुहार परे बलमू॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  

Read More

बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना

का जमाना आ गयो भाया , “बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना” कूल्ही ओर फफाये लागल बाड़न सs। पतरी पर छोड़ल खइका खइला के बाद जइसे कुकुर अइठत चलेलन सs, ओइसही इहवों ढेर लोग चल रहल बाड़ें । का कहीं महाराज , दोकान – दउरी बन्न होए के अपसगुन देखाए लागल बा । फेर त “उपास भला कि पतोहू के जूठ” , जियल जरूरी बा त पतोहिया क जूठवों के साफ आ मीठ बुझही के परी नु । खइला के बाद पतोहिया के गोड़वों पुजही के परी नु । पुजाइयो रहल…

Read More

बउझकवन के चउपाल

का जमाना आ गयो भाया, छाती के जगहा मुड़ी पर लोग मूंग दरे लागल । कुछ लोग पेंड़ा छील के खाये के फिराक मे जुटल बाड़ें त कुछ लोग बतरस आ बतकुचन के पगहा बरत बाड़ें । ओह पगहवा के का करिहें , एकर उनकरो के पता नइखे । मालिक के हुकुम बजावे खाति बस दिन रात जुटल बाड़ें । कनई के मइल लुगरी से पोछत बेरा ओकरे से आपन मुँहवों पोछ लेत बाड़ें । सगरों गज़ब के हाल चलत बा , सभे मगन होके लगल बा । बउझकवा के…

Read More

जरिके मे काहे बदलि जाले बोली

का जमाना आ गयो भाया ,जेहर देखा जेसे सुना सभ बिखिआइए के बोल रहल बा । बोलत बेर इहो भुला जाता कि समाज मे ओकर एगो अलग पहचान बा । घर पलिवार से लेके संघतिया लोग तक बिखबोली मे लागल बा । संगही संगे सभे के बेवहार बदले लागल बा । लगता सभे के आँखि के सोझा  कवनो परदा लाग गइल बा भा दिन अछते दिनौधी हो गइल बा ।  रतौंधी वाला लोग ढेर मिल जाला बाकि दिनौंधी वाला लोग पहिले हेरे के पड़त रहने । अब त ओहनियों के…

Read More

बाकि राउर मरजी —-?

का जमाना आ गयो भाया , जेने देखा ओनही ठेकेदारी आ ठेकेदारन बयार बह रहल बा । उहो लूआर अस , ओहमे फँसते केहुवो  झोकराइए जाई । कबों पुरूबी लूआर त कबों पछिमी । ओही मे कबों कबों उतरहिया आ दखिनहियों झुरके लगतिया । बाचल मुसकिल बा । एक त अबही दिल्ली के खराब हावा आफत मचवाले रहल हे , ओही मे जाड़े मे लुआर बहे लागल । बुझाता प्रकृतियो बउराय गइल बा , कबों कुछों त कबों कुछों । अजब हाल बा भाई । प्रवक्ता त बरसाती बेंग लेखा…

Read More

अन्हरिया मे हलचल भइल

भोरहीं उग्गल किरिनियाँ के भाग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   तारीख पचीस आ पूस महिनवाँ माई भारती क रहे शुभ दिनवाँ लीहलें अजुवे मदन अटल राग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   छनकल केहरो केहू के मनवाँ भइलें हुलास उमगल अंगनवाँ चंहकल गोइड़ा के हरियर बाग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   मदन जरवने काशी ज्ञान दियरी पोखरण विस्फोट, पहिनी पियरी दहकल दुनिया मे भारत के आग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   भोरहीं उग्गल किरिनियाँ के भाग अन्हरिया मे हलचल भइल ।   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Read More

बिला रहल थाती के संवारत एगो यथार्थ परक कविता संग्रह “खरकत जमीन बजरत आसमान “

मनईन के समाज आउर समय के चाल के संगे- संगे  कवि मन के भाव , पीड़ा , अवसाद आउर क्रोध के जब शब्दन मे बान्हेला , त उहे कविता बन जाला । आजु के समय मे जहवाँ दूनों बेरा के खइका जोगाड़ल पहाड़ भइल बा , उहवें साहित्य के रचल , उहो भोजपुरी साहित्य के ,बुझीं  लोहा के रहिला के दांते से तूरे के लमहर कोशिस बा । जवने भोजपुरी भाषा के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग सुनल भा बोलल ना चाहेला , उहवें  भोजपुरी  के कवि / लेखक के देखल ,…

Read More

आपन बात

साहित्य के चउखट पर ठाढ़ ऊँट कवने करवट बइठ जाई , आज के जमाना मे बूझल तनि टेंढ ह । कब के टोनहिन नीयर भुनभुनाए लागी आ कब के टोटका मार के पराय जाई ,पते ना चले । आजु के जिनगी मे कवनों बात के ठीहा ठेकाना दमगर देखाई देही , भरोष से कहलों ना जा सके । एगो समय रहे जब मनई समूह मे रहत रहे , अलग समूह – अलग भाषा –बोली , रीत – नित सभे कुछ कबीला के हिसाब से रहे । ओह कबीलन मे अपने…

Read More