भोजपुरी के पानी

बजड़ा से बचपन उपजाईं, जौ से जोश जवानी। माँटी से माँटी के कविता, भोजपुरी के पानी। हम्मर नइखे कवनो सानी, रउरा मानीं भा ना मानीं। गेहूँ के गदराइल बाली गावे गीत गुमान के। सरसो के बुकवा लागल तन तूरे कठिन पखान के। धान धँउस ना सहलसि, दिहलसि कबहूँ कवनो भाँति के, रहर रहनिरखवार ठाढ़ करि ऊँचा पगड़ी शान से। मकई माथे टीका कइलसि छाती भइल उतानी। मटर टरे ना देत बचन के कबहूँ कवनो काल में। चन्नन माथे चमचम चमके चना बेंचि हर साल में। गावे गीत गरब से गोंएड़…

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भोजपुरिया

रउरा लिखनीं बेद हो गइल, हम जो लिखीं कहानी ह? साँच- साँच बस रउरा कहनीं, हम जो कहीं जुबानी ह? आ जाईं एकरोज अखाड़ा हम बस अतने जानीले, बतला देइबि कतना दम बा, का भोजपुरिया पानी ह? पीपर, बरगद, पाकड़, महुआ, जामुन, गुल्लर आम के। राउर मरजी कहि लीं कुछुवो, पूजीं सुबहो शाम के। तनगरमी से जाड़ लजाला, माथे राखीं घाम के। बादर आ के करे चिरउरी, जल ढारे बिन दाम के। सूरूज चंदा पहरा देलें, नाता ई खनदानी ह। मड़ुआ, टांगुन, साँवा, साईं, बजड़ा, जौ उपजाइ के मठ्ठा, रोटी,…

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माई जइसन होली माई

सारी, झुमका, टिकुली खातिर मेहरि करे लड़ाई। बाइक खातिर रूसल लरिका, हिस्सा खातिर भाई। स्वारथ साधत हीत-मीत सभ जे के आपन बुझनीं, बबुआ काहें मुँहवाँ सूखल पुछलसि खाली माई। माई जइसन होली माई। चढ़ल उधारी घरखरची के, करजा लेइ दवाई। कबहूँ सूखा, कबो बाढ़ि से खेती गइल बिलाई। सबहिन जाने हूक हिया के, पलटि हाल ना पूछे, उरिन काहि बिधि बबुआ होइहें ? गहिर सोच में माई। माई जइसन होली माई। धइ माथे पर हाथ असीसे आँखिन लोर बहाई। अँचरा से पोंछे लिलार के देव-पितर गोहराई। बबुआ हो दुबराइल बाड़S,…

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भोजपुरिया

रउरा लिखनीं बेद हो गइल, हम जो लिखीं कहानी ह? साँच- साँच बस रउरा कहनीं, हम जो कहीं जुबानी ह? आ जाईं एकरोज अखाड़ा हम बस अतने जानीले, बतला देइबि कतना दम बा, का भोजपुरिया पानी ह? पीपर, बरगद, पाकड़, महुआ, जामुन, गुल्लर आम के। राउर मरजी कहि लीं कुछुवो, पूजीं सुबहो शाम के। तनगरमी से जाड़ लजाला, माथे राखीं घाम के। बादर आ के करे चिरउरी, जल ढारे बिन दाम के। सूरूज चंदा पहरा देलें, नाता ई खनदानी ह। मड़ुआ, टांगुन, साँवा, साईं, बजड़ा, जौ उपजाइ के मठ्ठा, रोटी,…

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कजरी

बदरी आवऽ हमरी नगरी, नजरी डगरी ताकति बा। सूखल पनघट, पोखर, कुइयाँ असरा गिरल चिताने भुइयाँ छलके नाहीं जल से गगरी, नजरी डगरी ताकति बा। बूढ़ लगे सब बिरिछ पात बिन ठठरी सेवे दिनवाँ गिन-गिन अइतू फिनु बन्हि जाइत पगरी, नजरी डगरी ताकति बा। धरती के कोरा अँचरा में डालि खोंइछ बइठा पँजरा में भरितू मांग पिन्हइतू मुनरी, नजरी डगरी ताकति बा। छमछम छागल आजु बजावत पुरुआ के संग नाचत गावत आवऽ, तनि जा हरिअर चदरी, नजरी डगरी ताकति बा। संगीत सुभाष, मुसहरी, गोपालगंज।

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गीत

कर जोरि बिनवे दुलारी बेटी, बाबू जनि काटीं हरिअर गाछि पलंगिया का कारन जी। आम, महुआ, पाकर, गुलर, बर जी, बाबा निमिया, निबुइया, जमुनिया धरतिया के छाजन जी। मथवा क अँचरा सरकत खने जी, डलिहें सुरुजमल कुदीठि त माई सकुचाई जइहें जी। सजना अँगनवाँ दुरूह काज हो, धिया, दिनभर खटि-मरि थकबू त रयनि का नींनि लेबू हो? कहवाँ सुतइबू गोदिलवा नू हो, धिया, कहवाँ सुतइबू सजन केरि चरन दबइबू नू हो। कीनि दीं बाबू हँसुअवा नू जी, बाबू, घने-बने खरई कटाइबि, तरई बनाइबि जी। लीपि-पोति घरवा अँगनवाँ क जी, बाबू,…

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फागुन आवत

फागुन नाचत, गावत आवत। अगुवानी में आगे-पाछे सकल चराचर धावत।   विविध रंग के फूल धरा पर,अँजुरिन छिटत, बिछावत। गोद भरत नवकी फसिलिन के, तनमन सब हरखावत। बाँटत, देत, लुटावत आवत।   पछुआ पर असवार घुमत नित, सभकर तन सिहरावत। सजनाके गमछा, सजनी के अँचरा के लहरावत। उछलत, कूदत- फाँनत आवत।   गाल लाल टेसू, गुलाब के परसि-परसि दुलरावत। मुकुट धरत सिर ठूँठ बिरिछ के उमगि-उमगि उमगावत। मटकत, मोद मनावत आवत।   मधुर राग होरी के टेरत, झाँझ- मृदंग बजावत। धरनि अबीरा, कुमकुम, केशर, रंग, गुलाल गिरावत। रस बरसावत, धावत…

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गीत

चहुँओरिया छवलसि हरियरी, बसंती आगम जनाता। गोरी बेसाहेली चुनरी, बसंती आगम जनाता। मोंजरि का अँचरे लुकाइल टिकोरा तितली कुलाँचेले भँवरा का जोरा मांगेली नगवाली मुनरी, बसंती आगम जनाता। तीसी बतीसी के रहिला रिगावे गेहूँ गुँड़ेरि आँखि ताके, धिरावे माथे सरसो बान्हे पियरी, बसंती आगम जनाता। कूदे बछरुआ तुरावेला पगहा मादक पवन, गंध पसरल सब जगहा पागल मन लागे ना सुधरी, बसंती आगम जनाता। सजनी बोलवली ह साजन के अँगना जाईं, लिआईं अबे गोड़रंगना डालि आँखिन में आँखि कजरी, बसंती आगम जनाता। संगीत सुभाष गोपालगंज

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कुजाति

ई ओ बेरा के कहानी ह, जवना बेरा सामाजिक नियम तूरला पर तूरेवाला के जाति से निकाल दिहल जात रहे आ कुजाति कहल जात रहे। ओकरा साथे खाइल-पिअल, उठल-बइठल आ बातचीत तक ले समाज के लोग बन क देत रहे। कुजाति छँटइला के पीरा आ मानसिक कष्ट के अन्दाजा दोसर केहू ना लगा पावे, छँटाएवाला के छोड़ के। झींगुर अइसहीं कुजाति छँटा गइलें आ अइसन खातिर छँटइलें जवना में रत्तियो भर उनुके दोष ना रहे। झींगुर के चार बेटा पर एगो बेटी गुलबिया रहे। झींगुर दस बिगहा के जोतनिया रहलें।…

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कुक्रांद

चौंकि गइनी़ नू ई नाम सुनिके? देश में बनेवाला हजारन दलन में ई एगो दल के नाम ह, जवन अबे नये बनल ह। ओइसे त ई दल बने  आ बनावे के विचार कई साल से चलत रहल ह, लेकिन कई अड़चनन का बावजूद ई रजिस्टर्ड पाटी होइए गइल बा। भइल ई कि कुछदिन पहिले फुलेसर आ भुवर के कुक्कूर आपस में लड़ि गइले सन। समय बीतल, ओ कुक्कूरन में इयारी हो गइल, लेकिन फुलेसर आ भुवर में लाठी- लउर निकलि गइल आ आजु ले बोलोचाल बन बा। उहे कुक्कूरा रोज…

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