बेटी के भाग

गोधन कुटा गईल रहे,लोग बियाह-शादी के रिश्ता खातिर आवे-जाय लागल रहे।रघुनाथ के भी आपन बेटी के हाथ पियर करे के रहे।एगो सेयान बेटी के बप के आँख में नींद कहाँ लागे।रगुनाथ के दिन-रात इहे चिंता सतावे, “आखिर उ रेशमा के बियाह कईसे करीहें? ” “कहाँ से ले अईहें दहेज के पईसा?” “बिना दहेज,के करी रेशमा से बियाह?” एगो जे बेटा रहले चार साल पहिले कालकात्ता सड़क दुर्घटना में चल बसले आ मेहरारू त पहिलहीं दुनिया त्याग दिहले रहली। बाकी जात-जात कह गईल रहली, “रेशमा के बियाह निमना घर मे करेम”…

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