चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

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टोंटी आउर धोबियापाट के जतरा

का जमाना आ गयो भाया, सभे भाई लोग कुछ ना कुछ उखाड़े-पछाड़े मे लाग गइल बाटे। अखाड़े के रसूख खाति “धोबियापाट” कबों ना कबों लगवहीं के पड़ेला। जब सभे दाँव फेल हो जाले सन, त “धोबियापाट” के सहारा बचेला। फेर मौका आ दस्तूर देखि के “धोबियापाट” दे मारेलन पहलवान लोग। अखाड़ा मे लड़े से पहिले पहलवान लोगन के दिमाग मे एकर जोजना बनि जाले। आखिर अखाड़ा के इज्जत के सवाल उठि जाला। आ इजत खाति त इहवाँ मडर हो जाला। एह घरी सभे एक मुस्त एक्के जोजना पर काम क…

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खेत खइलस गदहा …. मार खाई …….?

का जमाना आ गयो भाया , जोलहवा के त सामते आ गइल । जेके देखS , जेहर देखS ओहर एकही गो अवजिए सुनाता ….. बेच्चारा बेबात पिसाइल जात बा । कइल धइल केकर बा ई करम  आ जान पर केकरे बन आइल ।  रमेसर काका पांडे बाबा के पान के दुकानी पर ठाढ़ होते बड़बड़ाए लगने । देखS न , बाबा एगो सोझबक मनई के ओही के संघतिया सभे अइसन फंसवले बाड़न कि बेचारा न घर के बाचल न घाट के । अपने कूल्हि मिल के सब हजम क गइलें…

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