होरी गीत

कइसे खेलब हम होरी sss आहे लाल कइसे खेलब हम होरी sss बेचत राज सकल धरती के कइसे खेलब हम होरी sss हो ssssssssss आहे बेचत राज………। पूत किसान लड़त सरहद पर खेतिहर सड़क अगोरी sss आहे खेतवा बचावत जंग लड़त है देसवा बचावे दूई ओरी sss हो sssssssss आहे खेत बचावत ………।. लड़लन वीर कुँवर गोर वन से वीर भगत चहुओरी sss आहे गान्ही बाबा गइलें देसवा के खातिर धूम मचल खोरी खोरी ssss हो ssssssss आहे गान्ही बाबा …………। देस के किसनवा लड़त रजधनिया जियत मरत पथ अगोरी…

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तितिलिया रे

तितिलिया रे तू मोरे मन भावे उड़ि उड़ि बइठे फूलन के बीचे पल पल उड़े गिरे ना नीचे रंग रस अनगिन पावे ! तितिलिया रे …………. बहत बयार बसंती चहुदिशि तुरत धेयान देव, नर, अरु ऋषि अहथिर मन भरमावे ! तितिलिया रे………… कण कण में मधुमास विराजे मंजर मंजर साज सिराजे लेइ लेइ रस उड़ि जावे ! तितिलिया रे ………….. अजब गजब आकाश हुलासे अधर अधर टपकत रस प्यासे हाथ नहीं कुछ आवे ! तितिलिया रे ……….. चहकत चपलत चंचल हिरनी पुहुप पुहुप पहुँचत शतकिरनी सात सरग दिखलावे ! तितिलिया…

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रामजी के चिरैया

रामजी के चिरैया, बेदाना कुतुर, खोदि खाले ज’ले जी, न ताना-खुचुर। नील रंगी भुँईं, नील आकास में, चाह जौनी दिसा नापि जा, ना उजुर। आगु की ओरि इंदल रजा राजले, नाहिं बजवा सँ डर नाहिं ठिगना शुतुर। दाहिने दिस धरमराज राखा हवें, बंदना में न मन असकताना पुतुर। पाछ की ओरि ले ले बसेरा बरुन, थोर सुझबुझ सँ गूँजी तराना मधुर। बाँव में बा किनरराज के आसरे, तेज से भोग कइले सेयाना चतुर। ए धरा के अजीबे नसीबा हवे, भीतरी घात से डूबि जाना फितुर। ललगढ़ी भूतही भा हवेली भयद,…

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कवित्त

शिव के मनावे वाली जुकति के सोचि-सोचि बड़ बड़ लोगवा के बुधिये अटक जाला मनवा के भावे उनुका भांग-धतूरा बस पूड़ी पकवान सब देखते खटक जाला मिरिगा क छाल चाहे ओढ़े के बिछवे के शाल-दुशाला कवनों पेंड प लटक जाला। बाबा क  सवारी खाति बसहा बयल चाहे हाथी आ घोड़ा देखि मतिए भटक जाला टुटही मड़इया में सुख बदै भोला बाबा महल-अटारी केहु सट से सटक जाला ॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी    

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बुझाता जे फेरु फगुआ लौटि आई

कई साल बाद असो हम फगुआ के गाँवे गइल रहनी | पहिले हम भरसक हर साल गाँवे जात रहीं, फगुआ के बेरि | कवनवे कवनो साल बीतत होई कि फगुआ में हम गाँव पर ना पहुँचल होखीं| साँच पूछीं त शहर के फगुआ हमरा कबहुँ ना भावल | बाकि घर-गृहस्थी के जंजाल, नौकरी के बोझ आ कुछ आपन बाझ, जेकरा चलते फगुआ में कई साल हम गाँवे ना जा सकनी | अबकी पता ना काहें, गाँव बडा़ उदास लागल | सऊँसे वातावरण नीरस, सुखल लागल | बहरवाँसु लोग में भी…

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सरस्वती वंदना

जिनगी बेहाल बाटे ढाल नाही हाँथ कोई सुर लय ताल आ के हमरो सँवार देतु। नाही बाटे ज्ञान कऊनो भगती बिधान नाही बीणवा बजाय तनी हियरा निखार देतु। असरा तोहार बस शेष हव मतारी मोहे अँगुरी हमार धरी पार तू लगाय देतु। “योगी” मजधार में फँसल आजु नाव मोरी अँचरा के छाँव राखि हमका ऊबार देतु। सुर लय ताल आ के हमरो सँवार देतु।। योगेंद्र शर्मा ‘योगी’

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कविता संकलन

कविता संकलन के साथे आजकल बड़की आफत बा एकनी के कोई जल्दी छापते नइखे केहू छापियो दे त बिकाई नाहीं खरीदियो ले केहू त पढ़ी नाहीं केहू पढ़ियो ले त कुछ कही नाहीं कुछ कहियो दे त केहू सुनी नाहीं केहू सुनियो ले त समझी नाहीं -अगर केहू एतनो बात समझ ले त फेरू का बात! ई सब सुनके ऊ मूंछने बीच से मुसुकिअइले जइसे कहत होखस- कवनों पुरस्कार दिलवा दीं तब कइसन रही? कवि जी सोचत बाड़ें- तब का,तब का….! -हरेप्रकाश उपाध्याय अनुवाद: डॉ  सुनील कुमार पाठक

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आइल बसंत

आइल बसंत धरती अगराईल। सरसों फूलाईल आम मोजराईल हरियर बधार खेत गेहूं से पटाईल ओढ़ पियरकी चुनरिया नवकी दुल्हनिया अस धरती ईतराईल। पुलकत अंग अंग चारो ओर रंग रंग भंग से भरल संग मन में अलग उमंग जीय तू बसंत संग । सजनी से साजन दूर ओह पे बसंती नूर पागल बनावे मन बस में ना रहे तन होली के असरा दे बसंत समझावेला। पापी पपीहरा भोरहिं जगावेला बिरह के आग के खोर भड़कावेला उठे करेजा पीर कइसे धरि धीर समझ ना आवेला। अब त निहोरा बा पिया के बोलाव…

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एगो भोजपुरी गीत

ए राजा भइया ! ए राजा भइया ! ए राजा भइया ! छीन मत किसान के कमइया ए राजा भइया ! एकरे से पालींलाजा पूरा परिवरवा बाल बाचा के बा इहे जीये जीए के अधरवा मति कर हते के उपइया ए राजा भइया ………! मति दुहराव हिटलर के कहानी कामे नाहीं अइहें अडानी अंबानी छीड़ी जब लमहर लड़इया ए राजा भइया ……….! धरती के हमनी का हईं जा सपूतवा तहरो के हमहीं बनवनी राजदूतवा आगे पीछे देख ना समइया ए राजा भइया………….! गम गम गमकेला फूल फुलवरिया लह लह लहरेला…

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अन्हरा बिना रहियो न जाय

” राउर मती मारल गइल बा ए अम्मा जी कि अइसन अछरंग बाबू जी प लगावत हईं।बतायीं इहो कवनो उमर-समय ह ई कुल करे क ?” अम्मा जी के चारो ओरी ले डाँट -फटकार पड़त रहे बाकिर ऊ मानत ना रहलीं एक्के बतिया फेंटे कि बुढ़वा कमकरिनिया से फँसल ह।पहिले-पहिल इ भेद ऊ अपने बिटिया से कहलीं अउर धिरवलीं कि केहू से कहिहा जन।बिटिया त केहू से ना कहलीं बाकिर बूढ़ा अपनहीं सबसे कह घललीं।गाँव भर में ई बात फइल गइल कि बाबू साहब कमकरिन से फँसल हउवन।जे सुने उहे…

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