साधो, अब न रहब यहि गाँव

हियाँ उमर भरि रोध हजारन, पग-पग कूकरहाँव। गोबर गउआँ बात न बूझसि चमगीदर मग धावसि, उरझि-पुरझि मरि जासि बावरा अंतभेद नहिं पावसि। निपट फरेबी सियरन के सुर छेद रहल गहिराँव। सिधवा के तिल-तिल मउअति बा, टेढ़िया फरे फुलाय, थोपल जाय तबेला माथे, बानर केरि बलाय, न्याव टकौरी दोल्हा खेले, उल्टे-सीधे दाँव। जटहा बरगद पात चोरावल, तरकुल मन अगराइल, बन-बबूर करइल गाछी के, रूखर तन गदराइल। अमराई में कउआ कुल के मचल गदर गुहराँव। कोइलि का गइहें मनसाइन? करुई बोलि बढन्ती, कहवाँ फूल कटेरी चम्पा, फफसत जाय बिजन्ती। धुन-सुबास-दृग-तिसना मूअल, मरघट…

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ए… बालम!

फूल झरै तोहरे बोलियाँ ए…बालम । तब तौ कहेय हम कुंईयाँ न खोदबैय अब काँहे पनिया भरायेव… ए…बालम । तब तौ कहेय हम खेती न करबैय अब काँहे कटनी कटवायेव… ए…बालम । तब तौ कहेव हम सेजिया न सोईबैय अब काँहे कुण्डी लगायेव… ए…बालम । – श्लेष अलंकार

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माई जइसन होली माई

सारी, झुमका, टिकुली खातिर मेहरि करे लड़ाई। बाइक खातिर रूसल लरिका, हिस्सा खातिर भाई। स्वारथ साधत हीत-मीत सभ जे के आपन बुझनीं, बबुआ काहें मुँहवाँ सूखल पुछलसि खाली माई। माई जइसन होली माई। चढ़ल उधारी घरखरची के, करजा लेइ दवाई। कबहूँ सूखा, कबो बाढ़ि से खेती गइल बिलाई। सबहिन जाने हूक हिया के, पलटि हाल ना पूछे, उरिन काहि बिधि बबुआ होइहें ? गहिर सोच में माई। माई जइसन होली माई। धइ माथे पर हाथ असीसे आँखिन लोर बहाई। अँचरा से पोंछे लिलार के देव-पितर गोहराई। बबुआ हो दुबराइल बाड़S,…

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गोबर के महादे’

बड़ी रे रकटना से गढ़ल महादे’ गोईं, बइठे देवल चढ़ि धइके गहिर ध्यान। पान-फूल अछतो प पलक न खोले बौरा, आरजू मिन्नत कइ जियरा बा हलकान। अपने गरज लागे छोड़ेले न पैंयाँ दैया, हमरी गरज पर नाधि देले चउगान। साँसति में लागे भोला, फँफरा में बड़बोला- “चल री बछेरी मोरी काँटे-कुशे धाने-धान।” दिनेश पाण्डेय, पटना।

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घोघो रानी , कतना पानी ?

  घोघो रानी , कतना पानी ?बबुआ अब तs डूबत बानी । डूब गइल बाटे धनखेती ।पानी दिहलस गरदन रेती ।गाछ – बिरिछिया डूब गइल बा , चारु ओरिया पानी-पानी । बबुआ अब ….. डूबल अगुवारा – पिछुवारा ।धुसले बा पानी के धारा ।पानी-पानी कर देले बा , छप्पर के छुअले बा पानी । बबुआ अब …. लागत बा जिनिगी ना बॉची ।पानी पर कबले ई नाची ।भुखे-पिआसे कबले जीहीं ,कबले जोहीं दाना-पानी । बबुआ अब …. आसमान उड़त चिल्हगाड़ी ।झॉकत बाड़ें पारा-पारी ।खलिहा मदद मिलल भरोसा ,झॉक-झुँक लवटे रजधानी । बबुआ…

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ग़ज़ल

चलीं जी आजु में एक बे फेर से जिअल जाव। मिलल बा जवने जिनिगी मज़ा खुब लिहल जाव। मिली का दोसरा से आपन दुख दरद बता के, दरद के जाम बना के आईं घट घट पिअल जाव। बेयार ओरिये बहि के लय में लय मिला लीं जा, उल्टा चलि के सभका से मत दुशमनी लिहल जाव। दोसरा के फाटला फुटला से हमनीं के का मतबल जुगाड़ क के आपन फाटल कसहुँ सिअल जाव। मुड़ी ममोरि के चाहे शरम के खोरि के धरीं, दान पुन क के हँसी खुशी लोग से…

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भोजपुरी लोकगीत के अनन्य साधक: श्री जगन्नाथ मिश्र

“गांगा मिलती त खुब नहइती अम्मा मिलती त खुब बतिअइती”   आदरणीय नामवर सिंह जी के भोजपुरी भाषा के बारे व्यक्त कइल गइल ऊपरोक्त उदगार के अक्षरस: चरितार्थ करेवाला, श्री जगन्नाथ मिश्र जी (घर पिंजरोई ,थाना संदेश,जिला आरा पेशा-विज्ञान शिक्षक ,टउन स्कूल आरा) के, हमनी के भोजपुरी लोकगीतन के जनक, प्रतिष्ठापक,  प्रष्कोटा,  संकल्पक,  अन्वेषक, या पुनर-सर्जक, ए में से कवनों विभूषण से विभूषित करी, ई  सब इन कर हिमालय जइसन व्यक्तित्व के सामने बौना हो जाई। बौना होखें लाइक बतिये बा, कहे कि, जवना लोक गीतन के, हमार आज के…

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चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

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तहार सुधिया

आज कँगना खनका गइल,तहार सुधिया। मन के तार झनका गइल,तहार सुधिया॥   बहि रहल लोर संग नेह क खजाना बदरी बनल बा अंजोरिया के बहाना कान करकत झुमका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–   एने-ओने हेरत मोहनी सुरतिया मनवाँ बसल बाटे रउरी मुरतिया अबकी बेर तिनका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–   सपने में आइल रहल काँच निनियाँ अलसाइल लागल प्रेम के किरिनियाँ गरे लिपटी मनका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  

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शक्ति स्वरूपा

घर के मान मर्यादा के, ख्याल राखेली नारी। शक्ति स्वरूपा हई जेके, जग अबला कहे नारी।   उनुका चलते हम सभ बानी, उ हमनीन से नइखी। जइसन समझत बानी जा, शायद उ ओइसन नइखी।   माँ के फरज निभावस, ममता लुटावस नारी। कदर करs तू ओकर, ओके कबो ना दिहs गारी।   दुर्गा चंडी काली के, एगो रूप हई हो नारी। बिगड़ जइहें त प्रलय होई, असहाय ना हई नारी।   बहिन बनके बाँहेलि राखि, स्त्री बन के करेली सेवा। निःस्वार्थ भाव से करेली सभ कुछ, कबो माँगेली ना खेवा।…

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