चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

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तहार सुधिया

आज कँगना खनका गइल,तहार सुधिया। मन के तार झनका गइल,तहार सुधिया॥   बहि रहल लोर संग नेह क खजाना बदरी बनल बा अंजोरिया के बहाना कान करकत झुमका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–   एने-ओने हेरत मोहनी सुरतिया मनवाँ बसल बाटे रउरी मुरतिया अबकी बेर तिनका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–   सपने में आइल रहल काँच निनियाँ अलसाइल लागल प्रेम के किरिनियाँ गरे लिपटी मनका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  

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शक्ति स्वरूपा

घर के मान मर्यादा के, ख्याल राखेली नारी। शक्ति स्वरूपा हई जेके, जग अबला कहे नारी।   उनुका चलते हम सभ बानी, उ हमनीन से नइखी। जइसन समझत बानी जा, शायद उ ओइसन नइखी।   माँ के फरज निभावस, ममता लुटावस नारी। कदर करs तू ओकर, ओके कबो ना दिहs गारी।   दुर्गा चंडी काली के, एगो रूप हई हो नारी। बिगड़ जइहें त प्रलय होई, असहाय ना हई नारी।   बहिन बनके बाँहेलि राखि, स्त्री बन के करेली सेवा। निःस्वार्थ भाव से करेली सभ कुछ, कबो माँगेली ना खेवा।…

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जोर-शोर से उठल भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के मांग

नई दिल्‍ली: भोजपुरी के संविधान के  आठवीं अनुसूची में शामिल करे  के  मांग एक बेर फेर  बहुत जोर-शोर से उठावाल  गइल। अवसर रहल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में विश्व भोजपुरी सम्मेलन आ भोजपुरी समाज दिल्‍ली के संयुक्त तत्वावधान में अंतरराष्‍ट्रीय मातृ भाषा दिवस के अवसर पर आयोजित ‘भोजपुरी हमार माँ – मनन, मंथन और मंतव्‍य’ विषयक विचार गोष्‍ठी के । मुख्य अतिथि श्री हरिवंश, उपसभापति राज्यसभा रहने । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आ  राज्यसभा के उप सभापति श्री हरिवंश ने कहने  कि भोजपुरियन  में बहुत ऊर्जा बाटे। ओह ऊर्जा के सदुपयोग…

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खुल के अब रणभेरी बजाईं

झूठिया के जनि दुखड़ा गाईं खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ ढेर भइल मान-मनउवल बेबात के गला मिलउवल बेहया के औकात बताईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ विषधरवन के घर में सेवता बात न मानी लात क देवता काट के सिर सौगात पठाईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ आहुति मे चढ़ गइल जवानी दबा के मारीं पिया के पानी अब जरिको मति समय गवाईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ बाउर बोले, ओके ठोकीं सेना के जनि रसता रोकीं दुसमन के बस चिता सजाईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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केहू आइल बा

अपना गाँव में कतहीं आवाज फेरु आइल बा, लागे तिरंगा में लपेटाइल खास केहू आइल बा। हलफा उठल बा राहि में सभे धावल काहे ओने, कहल अचके में ई केहू देख ना वीर आइल बा। केहू के राखी केहू के आस काहे रोज अइसे आवता, केहू के मांगि के सेनुर लागता फेरु पोंछाइल बा। लड़त देश के खातीर लगवले जान के बाजी, भरि ताबुत सेना साथ में केहू के लाल आइल बा। लगवले दाव प जीनिगी चल चलिके त देंखीं, सिसकत अंखियां के लोर से राय बिदाई दिआइल बा।  देवेंद्र…

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बसंती बयार

उड़ावेला निन्हिया बसंती बयार हो। काँहा बाड़, सईंया हमार हो। उठेला दरदिया अपार हो। छछनत जिअरा कोईली पुकार हो। जलदी से आजा सुना घर संसार हो। टूटेला अंगे अंग बसंती बयार हो। मन करे तेज दी आपन परान हो। आजा सईंया रजऊ गणपति यार हो। बाड़ा तड़पावे बसंती बयार हो। गणपति सिंह छपरा Jp Dwivedi LikeShow more reactions

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बसंत कबो ना आइल

जीनीगी में बसंत कबो ना आइल। चुअत मड़ई में बुधिया जामल ना केहु ओके आदिमी मानल मानव जनम त भइले नु रहे जमते फाटल आंचर भेंटाइल जीनीगी में बसंत कबो ना आइल। मांगि चाहिके जीनिगी कटल देखते देखत जवानी चढ़ल सपना सहेजले डोली चढ़ली लागे सुख के दिन नियराइल जीनीगी में बसंत कबो ना आइल। कहीं का कइसन मिलल भतार नाशा में हरदम उ रहसु लाचार दइबो के दाया तनिको ना आइल जीनीगी में बसंत कबो ना आइल। कांट बीचे अइसन फूल फुलाइल रहे अजबे बा सुघराई जे देखे से…

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फागुन आवत

फागुन नाचत, गावत आवत। अगुवानी में आगे-पाछे सकल चराचर धावत।   विविध रंग के फूल धरा पर,अँजुरिन छिटत, बिछावत। गोद भरत नवकी फसिलिन के, तनमन सब हरखावत। बाँटत, देत, लुटावत आवत।   पछुआ पर असवार घुमत नित, सभकर तन सिहरावत। सजनाके गमछा, सजनी के अँचरा के लहरावत। उछलत, कूदत- फाँनत आवत।   गाल लाल टेसू, गुलाब के परसि-परसि दुलरावत। मुकुट धरत सिर ठूँठ बिरिछ के उमगि-उमगि उमगावत। मटकत, मोद मनावत आवत।   मधुर राग होरी के टेरत, झाँझ- मृदंग बजावत। धरनि अबीरा, कुमकुम, केशर, रंग, गुलाल गिरावत। रस बरसावत, धावत…

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काँहे ना केहू के सुनेल

काँहे ना केहू के सुनेल खाली अपने बतियाँ धुनेल, निमनो केहूँ कुछ कहे त आपन कान तू मुनेल मनमानी कहिया ले चली तू बुझत नइख बाति के, कहना एको सुनेल नाही बाड़ देवता तू लाती के खुरचाली करेल निशदिन रहेल ना चैन से, हरवाई में बैल प गिरे लागे ओसही सुधरब पएन से धीर धर तनि धीर धर रह कायदा कानून में, बुझतानी जवान तू बाड़ तोहरा गरमी बाटे खून में तनिको तोहरा शरम ना बाटे लज्जियाँ घोर के पियल हो, आज ले जवन ना भइल रहे ऊ सगरो उठा…

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