तहार सुधिया

आज कँगना खनका गइल,तहार सुधिया। मन के तार झनका गइल,तहार सुधिया॥   बहि रहल लोर संग नेह क खजाना बदरी बनल बा अंजोरिया के बहाना कान करकत झुमका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–   एने-ओने हेरत मोहनी सुरतिया मनवाँ बसल बाटे रउरी मुरतिया अबकी बेर तिनका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–   सपने में आइल रहल काँच निनियाँ अलसाइल लागल प्रेम के किरिनियाँ गरे लिपटी मनका भइल,तहार सुधिया॥ मन के तार झनका—–     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी  

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