गोबरउरा के जनम छोड़ावल जाव

बोल बतियाय के मंच माइक सजाय के माला पहिर, पहिराय के अपना के बीजी देखावल जाव गोबरउरा के जनम छोड़ावल जाव।   कतनों फइलाव देखाय के बानी पहरूवा, ई जनाय के कुछ भीड़-भाड़ जुटाय के तेवहार लेखा मनावल जाव गोबरउरा के जनम छोड़ावल जाव।   गिनती पहाड़ा पढ़ाय के कवनो अंक बताय के जरि मनी चिचिआय के आपन चेहरा चमकावल जाव गोबरउरा के जनम छोड़ावल जाव।   कुछ खाय नहाय के कुछ गाय-बजाय के कुछ नचनियों नचवाय के लोगिन के बहकावल जाव गोबरउरा के जनम छोड़ावल जाव।   जयशंकर प्रसाद…

Read More

कोख

कोख हमार मालिक तू ई का हऽ, आज ले ना बुझल अब का बुझब मरद नू हव। हमार कोख हमरा के माई बनावेला हमरा के पूर्णता प्रदान करेला बाकिर ओहू पर हमार अधिकार कहाँ बा तू इच्छा थोपेल जे हम ढ़ोईना , हमरा के बाजार के वस्तु बनवल चुप रहनी आज हमार कोख बाजार में आ गइल सौदा हो रहल बा कोख के पिता बने के इच्छा जे पूरा करे के बा तोहार समाज त तोहार ह हमार इच्छा के कवन मोल। कोख हमार बाकिर मरजी तोहार भूलियो के आपन…

Read More

धन धनिके के खात बा

केहू संगे कूट बोल केहू झूठ बोल केहू संगे बोल के अरूठ बच जात बा दीन हीन जन के भविष्य सुख प्रावधान छीन छीन छिनला पर बखरा बँटात बा धन पाछा केतना ना होत बाटे छलबल बड़े बड़े ओहदा से लोग उधियात बा केहू बाटे बाण्ड पर केहू बा रिमाण्ड पर धन के ना धनी धन धनिके के खात बा।।1।। पूत के न बाप पूछे बाप के न पूत पूछे खून में खुनुस खून खून अझुरात बा कौनो ओर मेहर भतार चले कौनो ओर घरवे में घर के कतल होइ…

Read More

गोबर के महादे’

बड़ी रे रकटना से गढ़ल महादे’ गोईं, बइठे देवल चढ़ि धइके गहिर ध्यान। पान-फूल अछतो प पलक न खोले बौरा, आरजू मिन्नत कइ जियरा बा हलकान। अपने गरज लागे छोड़ेले न पैंयाँ दैया, हमरी गरज पर नाधि देले चउगान। साँसति में लागे भोला, फँफरा में बड़बोला- “चल री बछेरी मोरी काँटे-कुशे धाने-धान।” दिनेश पाण्डेय, पटना।

Read More

साँवरी गधबेर

उखम थोरिक, हवा गुमसुम, साँवरी गधबेर। ओरमाइल घन बदरवा, गइल हऽ मुँहफेर। अबहिएँ कुछ देर। पलक पर पानी न छलकल, ना सिराइल ह अगन। देहि के तिसना अतिरपित, का कहीं कतिना तपन? चारि फूही के उमेदे, नयन तरई हेर। साध रहि गइलसि अपूरन, सघन भइल अन्हेर। नीनि रहलसि घेर। साँस में चम्पा कटेरी, गंध के गहिरी चुभन। मन-मिरिग तिरते रहल हऽ आँखि में अनगिन सपन। ओठ तरुआ हलक सूखल, जीभ अधरनि फेर। अकसगंगा धार पातर, निरभ राति उबेर- खेल रहलि अहेर। डाढ़ि में अँखुवा न फूटल, पात पर ना फुरफुरी।…

Read More

बिछावे जाल मछेरा रे

बिछावे जाल मछेरा रे सभके छीने बसेरा रे कहे हम भाग्य विधाता ह ईं सभ के जीवन दाता ह ईं सरग में सभका के पहुँचाइब हमहीं भारत माता ह ईं बढ़ावे रोज अंधेरा रे चकमक चकमक सगरो करे जोति नयन के चुपके हरे देखावे सपना रोज नया ई पेट सँघतियन के ई भरे भगावे दूर सबेरा रे कैद में सुरुज अउरी चान करे के बा ओकर अभियान बजावे ढोल ढमाका खूब नाप देलस धरती असमान उगावे खूब लमेरा रे करीं का कांटक सोचे रोज करेलन हथियारन के खोज बाँची मीन…

Read More

कल्लू क रिजल्ट

इम्तिहान हो गईल ख़तम त कल्लू बँधलेन आस हे भगवान चढ़इबे लड्डू बस करवा द पास रहल परीक्षा इंटर वाला टेंशन बहुत दिहेस गुलछर्रा के संगे कल्लुआ मेहनत बहुत किहेस नक़ल करावे खातिर चच्चा पूरा जोर लगइलेन पर कल्लू क बुद्धि अइसेन नक़ल मारि ना पइलेन चच्चा अउर मास्टर दूनो कइलेन बहुत प्रयास | पढ़ै-लिखै के नाही कुच्छो दिन भर खेले गोली खाली कापी भरअ लिखावत बाटै ओकर टोली सब पेपर बा राम भरोसे रामअ पार लगइहन जल्दी पता चली की केतना नंबर लेके अइहन नंबर के बारे में सोचतअ…

Read More

मोबाइल

अब केसे हव अनजान मोबाइल, सब कर हउए ई जान मोबाइल। सुत्तत, उठत, बइठत जागत , छेड़े हरदम तान मोबाइल। सुनी ला की कुल कहन , ज्ञान विज्ञान क खान मोबाइल। एकौ छन न फुरसत देला, कई देला परेशान मोबाइल। मासूका क फ़ोटो जैसे तकिया के नीचे रक्खें लोग, आज उहाँ क देखा भइया हउए ससुरा शान मोबाइल। तकते मोबाइल में सूत्तें, अ उठते खोजे, जैसे हव भगवान मोबाइल। रिश्ता नाता दूर भइल सब, अ छीन लेलस ईमान मोबाइल। रंग बिरंगे वीडियो देखैं बुढ़वा, नौजवान अउर बच्चा। कठपुतली बनउले हव…

Read More

हारब त हूरब,जीतब त थूरब

जादू टोना, दख्खिन कोना बाति-बाति पर रोना-धोना जाइब पश्चिम आ बोलब पूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   करब बहाना मारब ताना ठेंगे ऊपर रखब जमाना बेगर बात के टंगरी तूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   उपरल सोर डेहुंगी सूखल भंडारी रहलें कुल्हि भूखल अनकहले सुरुजो के घूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   इहाँ उहाँ बस उगिलब आग अनियासे छेड़ब खट राग धरम जाति के पेंगला पूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Read More

चुनउवा

सोझवें ओकतिया बतावेला चुनउवा नीमन-बाउर खेल खेलवावेला चुनउवा॥ कटिया करवावे,खेते खेत घुमावेला लहनी सरिआई के बोझ बनवावेला गउवाँ में चकरी पिसवावेला चुनउवा॥   तारु आ तरवा, दूनों पिराये लागल मन के उछाह, घामे थिराये लागल सबही से छिपनी धोवावेला चुनउवा॥   मुंहवाँ सुखाइल बाटे, ओठवा झुराइल कई घरी बीतल, पनियों ना भेंटाइल दिनही में चनरमा देखावेला चुनउवा॥   हाथ ज़ोरवावेला गोड़ धरवावेला टुटही मड़इया आ दुवरा देखावेला तिनगी वाला नाच नचवावेला चुनउवा॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Read More