गोबर के महादे’

बड़ी रे रकटना से गढ़ल महादे’ गोईं, बइठे देवल चढ़ि धइके गहिर ध्यान। पान-फूल अछतो प पलक न खोले बौरा, आरजू मिन्नत कइ जियरा बा हलकान। अपने गरज लागे छोड़ेले न पैंयाँ दैया, हमरी गरज पर नाधि देले चउगान। साँसति में लागे भोला, फँफरा में बड़बोला- “चल री बछेरी मोरी काँटे-कुशे धाने-धान।” दिनेश पाण्डेय, पटना।

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साँवरी गधबेर

उखम थोरिक, हवा गुमसुम, साँवरी गधबेर। ओरमाइल घन बदरवा, गइल हऽ मुँहफेर। अबहिएँ कुछ देर। पलक पर पानी न छलकल, ना सिराइल ह अगन। देहि के तिसना अतिरपित, का कहीं कतिना तपन? चारि फूही के उमेदे, नयन तरई हेर। साध रहि गइलसि अपूरन, सघन भइल अन्हेर। नीनि रहलसि घेर। साँस में चम्पा कटेरी, गंध के गहिरी चुभन। मन-मिरिग तिरते रहल हऽ आँखि में अनगिन सपन। ओठ तरुआ हलक सूखल, जीभ अधरनि फेर। अकसगंगा धार पातर, निरभ राति उबेर- खेल रहलि अहेर। डाढ़ि में अँखुवा न फूटल, पात पर ना फुरफुरी।…

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बिछावे जाल मछेरा रे

बिछावे जाल मछेरा रे सभके छीने बसेरा रे कहे हम भाग्य विधाता ह ईं सभ के जीवन दाता ह ईं सरग में सभका के पहुँचाइब हमहीं भारत माता ह ईं बढ़ावे रोज अंधेरा रे चकमक चकमक सगरो करे जोति नयन के चुपके हरे देखावे सपना रोज नया ई पेट सँघतियन के ई भरे भगावे दूर सबेरा रे कैद में सुरुज अउरी चान करे के बा ओकर अभियान बजावे ढोल ढमाका खूब नाप देलस धरती असमान उगावे खूब लमेरा रे करीं का कांटक सोचे रोज करेलन हथियारन के खोज बाँची मीन…

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कल्लू क रिजल्ट

इम्तिहान हो गईल ख़तम त कल्लू बँधलेन आस हे भगवान चढ़इबे लड्डू बस करवा द पास रहल परीक्षा इंटर वाला टेंशन बहुत दिहेस गुलछर्रा के संगे कल्लुआ मेहनत बहुत किहेस नक़ल करावे खातिर चच्चा पूरा जोर लगइलेन पर कल्लू क बुद्धि अइसेन नक़ल मारि ना पइलेन चच्चा अउर मास्टर दूनो कइलेन बहुत प्रयास | पढ़ै-लिखै के नाही कुच्छो दिन भर खेले गोली खाली कापी भरअ लिखावत बाटै ओकर टोली सब पेपर बा राम भरोसे रामअ पार लगइहन जल्दी पता चली की केतना नंबर लेके अइहन नंबर के बारे में सोचतअ…

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मोबाइल

अब केसे हव अनजान मोबाइल, सब कर हउए ई जान मोबाइल। सुत्तत, उठत, बइठत जागत , छेड़े हरदम तान मोबाइल। सुनी ला की कुल कहन , ज्ञान विज्ञान क खान मोबाइल। एकौ छन न फुरसत देला, कई देला परेशान मोबाइल। मासूका क फ़ोटो जैसे तकिया के नीचे रक्खें लोग, आज उहाँ क देखा भइया हउए ससुरा शान मोबाइल। तकते मोबाइल में सूत्तें, अ उठते खोजे, जैसे हव भगवान मोबाइल। रिश्ता नाता दूर भइल सब, अ छीन लेलस ईमान मोबाइल। रंग बिरंगे वीडियो देखैं बुढ़वा, नौजवान अउर बच्चा। कठपुतली बनउले हव…

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हारब त हूरब,जीतब त थूरब

जादू टोना, दख्खिन कोना बाति-बाति पर रोना-धोना जाइब पश्चिम आ बोलब पूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   करब बहाना मारब ताना ठेंगे ऊपर रखब जमाना बेगर बात के टंगरी तूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   उपरल सोर डेहुंगी सूखल भंडारी रहलें कुल्हि भूखल अनकहले सुरुजो के घूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   इहाँ उहाँ बस उगिलब आग अनियासे छेड़ब खट राग धरम जाति के पेंगला पूरब हारब त हूरब,जीतब त थूरब॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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चुनउवा

सोझवें ओकतिया बतावेला चुनउवा नीमन-बाउर खेल खेलवावेला चुनउवा॥ कटिया करवावे,खेते खेत घुमावेला लहनी सरिआई के बोझ बनवावेला गउवाँ में चकरी पिसवावेला चुनउवा॥   तारु आ तरवा, दूनों पिराये लागल मन के उछाह, घामे थिराये लागल सबही से छिपनी धोवावेला चुनउवा॥   मुंहवाँ सुखाइल बाटे, ओठवा झुराइल कई घरी बीतल, पनियों ना भेंटाइल दिनही में चनरमा देखावेला चुनउवा॥   हाथ ज़ोरवावेला गोड़ धरवावेला टुटही मड़इया आ दुवरा देखावेला तिनगी वाला नाच नचवावेला चुनउवा॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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शक्ति स्वरूपा

घर के मान मर्यादा के, ख्याल राखेली नारी। शक्ति स्वरूपा हई जेके, जग अबला कहे नारी।   उनुका चलते हम सभ बानी, उ हमनीन से नइखी। जइसन समझत बानी जा, शायद उ ओइसन नइखी।   माँ के फरज निभावस, ममता लुटावस नारी। कदर करs तू ओकर, ओके कबो ना दिहs गारी।   दुर्गा चंडी काली के, एगो रूप हई हो नारी। बिगड़ जइहें त प्रलय होई, असहाय ना हई नारी।   बहिन बनके बाँहेलि राखि, स्त्री बन के करेली सेवा। निःस्वार्थ भाव से करेली सभ कुछ, कबो माँगेली ना खेवा।…

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खुल के अब रणभेरी बजाईं

झूठिया के जनि दुखड़ा गाईं खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ ढेर भइल मान-मनउवल बेबात के गला मिलउवल बेहया के औकात बताईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ विषधरवन के घर में सेवता बात न मानी लात क देवता काट के सिर सौगात पठाईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ आहुति मे चढ़ गइल जवानी दबा के मारीं पिया के पानी अब जरिको मति समय गवाईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ बाउर बोले, ओके ठोकीं सेना के जनि रसता रोकीं दुसमन के बस चिता सजाईं। खुल के अब रणभेरी बजाईं॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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चलीं गणतन्त्र मनावे के

घेर घार के सभके भीतरी देश के भाव जगावे के। चलीं गणतन्त्र मनावे के॥   गारी-गुन्नर, मूड़ फोरउवल हर चुनाव में सभही अउवल अबकी बेरी पकड़ पकड़ के ककहरा पढ़ावे के। चलीं गणतन्त्र मनावे के॥   कहाँ आस भा कहाँ विकास बा जनता खातिर इहाँ कुहास बा बात करीं भोजपुरी खातिर दियरी एगो जरावे के। चलीं गणतन्त्र मनावे के॥   आशा रोवत भाषा रोवत देख देख परिभाषा रोवत चमक धमक से बरियारी से तिरंगा फहरावे के। चलीं गणतन्त्र मनावे के॥   कतौ अशिक्षा कतौ गरीबी मंदिर मसजिद कैंसर टीबी ठीकरा…

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