हे नारी तोहार केतना रूप

दुआर ओसार कुल साफ हो जायेके चाही , बाबू संझवे से सबके बिगड़त हउए । तनिको कही कसर ना रहे के चाही , बतायै देत हई । अबही हम स्कूले जात हई, देखी त मनेजर साहब काहे के बोलवले हउए । जब अपने घरे काम रहेला त बहरवौ अकाज पड़ल रहेला। अच्छा सुनत हउ कि ना हे भागवान , तोही से कहत हई । तनि बेटी के समझाय दिहा। माई बेचारी त गाय नियर ह। जवन बाबु कहि दें,  होखे के चाही । आज दिदिया के देखै बदे लइका वाले…

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