माफ करब माई !

गवें गवें जाम के लमहर रोगी बनत बनारस के एह घरी आउर बाउर हाल बा। चौमोहानियन के घेर के दुरगा माई के पंडाल बनावे के काम चल रहल बा। रोशनी के झालर लगावे खातिर ढेर लोग ऊंच ऊंच बांस , बल्ली आउर रसरी के सहारे लटकत देखात बाड़ें। ओह लोगन के देखि के रोंआ सिहर उठता ….. कि भहरा के गिर न जाँय सन? एकर जबाबों मन अपनही लप्प से हेर लेता,’ बाँड बाँडो जइहें आ नौ हाथ के पगहो ले जइहें’। मर मरा गइलें त ठीक ना त भर…

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ई कवनो मुवे के उमिर रहे

एह घरी तहार आँखि शमसान लेखा हो गइल बा भकसावन,सून आ चिता के भसम नीयर मटमइल उज्जर तहार मुसुकी पहिले लेखा नइखे रिझावत रोवला का पहिले लोर भरल आँखि तोपला के कला के माहिर भर बा सुनाs!! जेकरा के तोपि के राखल चाहतानी नु ओह घाव के जामल लोहू के रंग के तहार माई  जानतानी जानला के परयास में अउंजा के का करबू मरजाद के चउकठ पर बलि देत बेरा तहरा बाबूजी के हांथ काहें ना कांपेला। मूवे के कहतारू, त मू जा तहरा नाँव पर रोवे खाति अइहें मरजाद…

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माटी के सोन्हगर महक में सउनाइल ‘हूक-हुंकारी’

जब चारो-ओरी से उठत अवाजियन का उत्तर में कवनों किताब उपरियानी सन,त सहजे में सभे के अपना ओरी खींच लेनी सन। आजु भोजपुरी के युवा लेखक लोग अपना लेखनी से हर बातिन के बरियार जवाव दे रहल बा लो। एही से भोजपुरियो में निबन्ध, शोध आलेख आउर कहानियन के किताब छप रहल सन। महिना दू-महिना का भीतरि डॉ सुमन सिंह के 4-5 गो आइल किताबियन का हम एही रूप में देख रहल बानी। कई बरीस के कइल कामन के सहरियाय के ओकरा किताब का रूप दीहल, साँचो भोजपुरी माई के…

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कासी कबहूँ न छोड़िये

” कइसन लगल हमार बनारस ए बचवा ? कवन-कवन घाट घुमला ह।कासी कोतवाल बाबा क दरसन कइला ह ? बाबा बिसनाथ जी क दर्शन त ठीक से मिल गयल ह न ? ढेर धक्कम-धुक्की त ना न रहल ह ?” गदगद् कंठ अउर भर-भर नयन पूछत रहलन बुढ़ऊ बाकिर बचवा खुनुसन कुछ बोलत ना रहलन बाकिर कुछ कहे के फेर में उनकर होठ तनी – तनी देर में फड़क जात रहल। ” काहें दिक्कत -परेशानी में  देखात हउवा बचवा।कुछ भयल ह का ?” अपने बनारस क बखान सुने खातिर कान…

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हमरे दुअरा पर चाँन अगराइल रे, बसंत रितु आइल रे !

जाड़ा-पाला से सिहरत-ठिठुरत चिरई-चुरुंग,धूर -धक्कड़ से सनल-पटल पेड़- रूख, उकठल -सुनसान खेत- सीवान अउर थकल -उदासल धरती क हरस-सरस के सिंगार करे आवेले बसन्त रितु। एह समय धरती -आकास सगरो उछाहे -उछाह देखाला।किसिम -किसिम क फूलन के सुगंध से फुलवारी मह-मह महक उठेले, बाग़-बगइचा बउरा उठेला। सरसों क पीयर सोनहुल रंग से खेत दमक उठेला। माने रितुवन में सबसे चटख, सबसे सुघर ,सबसे सुगन्धित ,सबसे मनभावन रंग ह रितुराज बसंत ।एह रितु में सगरो मनलुभावन, मोहन आनन्द देखे के मिल जाला। सांच पूछीं त इ आनन्द नवसृजन क ह,पतझड़ के…

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कइसे बसी बसंत बनारस में

‘ गुरु ! बसन्त पंचमियो बीत गयल बाकिर एना पारी कवनो बसंत क राग-रंग नइखे जनात।फेड़ -फुनगी, फूल पत्ता धूर से अटल बाटे।कोइलियो ना बोलले अब त।का हो साह जी तोहार त सठवां बसंत लग गयल होई। कि ना? ‘ साह जी खदकत -फफात चाय क भगोना उतारे खातिर सँडसी खोजत रहलन बाकिर कहीं देखात ना रहे।ए कुल में ऊ एतना अफनायल रहलन कि उनके नन्हकू क बात मरिचा जस तीत लगत रहे। तीताई नन्हकू भांप गयल रहलन अउरी अब केहू दोसरे से बतकुच्चन करे खातिर छटपटाये लगलन। ‘का ए…

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पिनकू जोग धरिहन राज करीहन

बंगड़ गुरू अपने बंगड़ई खातिर मय टोला-मोहल्ला में बदनाम हउवन। किताब-ओताब क पढ़ाई से ओनकर साँप-छुछुनर वाला बैर ह। नान्हें से पढ़े में कम , बस्ता फेंक के कपार फोड़े में उनकर ढ़ेर मन लगे। बवाल बतियावे में केहू उनकर दांज ना मिला पावे। घर-परिवार अड़ोसी-पड़ोसी सब उनके समझा-बुझा, गरीयाय के थक गयल बाकिर ऊ बैल-बुद्दि क शुद्धि करे क कवनों उपाय ना कइलन। केहु तरे खींचतान के दसवीं ले पढ़लन बाकिर टोला- मुहल्ला के लइकन के अइसन ग्यान बाँटें कि लइका कुल ग्यान के ,दिमाग के चोरबक्सा में लुकवाय…

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बाबा बउरहवा क बनारस बचल रही

‘ ए गुरु देखला ह न कलकत्ता में कइसे ओभरब्रिजवा अरराय के गिर पड़ल।टिविया में देखते दिमाग सुन्न पड़ गयल रहे हमार त।बतावा भाय अइसे भला काल आवेल।कहत हईं कि घोर कलजुग नाचत ह।जहंवे देखा उंहवे नासे नास।का होई ए भोलेनाथ अब केहुवे ना बची का।’ नन्हकू चहकत-बमकत अड़ी के बतरस में आन्ही-पानी नियन कूद पड़लन। ‘ ए नन्हकू भइया ! तू साँचो में कलकत्ता वालन क दुःख में दुखी हउवा कि अपने चिंता में दुबरात हउआ ई बतावा.. आंय।बनरसो में त ओभरब्रिज बनते न ह।डेरा जिन कवनो दिन ओहितरे…

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पिनकू जोग धरिहन राज करीहन

बंगड़ गुरू अपने बंगड़ई खातिर मय टोला-मोहल्ला में बदनाम हउवन। किताब-ओताब क पढ़ाई से ओनकर साँप-छुछुनर वाला बैर ह। नान्हें से पढ़े में कम , बस्ता फेंक के कपार फोड़े में उनकर ढ़ेर मन लगे। बवाल बतियावे में केहू उनकर दांज ना मिला पावे। घर-परिवार अड़ोसी-पड़ोसी सब उनके समझा-बुझा, गरीयाय के थक गयल बाकिर ऊ बैल-बुद्दि क शुद्धि करे क कवनों उपाय ना कइलन। केहु तरे खींचतान के दसवीं ले पढ़लन बाकिर टोला- मुहल्ला के लइकन के अइसन ग्यान बाँटें कि लइका कुल ग्यान के ,दिमाग के चोरबक्सा में लुकवाय…

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