बंगड़ गुरु के मिललीं नानी

” का बंगड़ भइया,काहें सोकतायिल हउवा।एतरे त एतना चहकेला कि चिरई-चुरुंग फेल।आज काहें उदासल हउवा भाय ?” मिंकू बंगड़ गुरु के आगे -पीछे चलत परिकरमा करत रहलन बाकिर बंगड़ चुप। ” आजकल लगन क दिन ह भइया।एतना सादी-बियाह होत ह कि पापा नेवता-हँकारी करत हलकान- परेसान हो जात हउवन..त ऊ का ह कि जयिसहीं हम दस-बीस गो रुपैया मांगत हईं कि अगियाबैताल नियन सोंटा लेके मारे धउरा लेत हउवन।उधारी एतना चढ़ गईल ह कपारे प कि सोचते घुमटा आवे लगत ह।तनी चाह-पान क मन रहल ह…..।का बतायीं भइया नसा छूटत…

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एक ठे बनारस इहो ह गुरु

‘का गुरु आज ई कुल चमचम ,दमदम काँहे खातिर हो ,केहू आवत ह का ‘? प्रश्न पूछने वाला दतुअन करता लगभग चार फुट ऊँची चारदीवारी पर बैठा आने -जाने वालों से पूछ रहा था।”काहें मोदी आवत हउअन ,तोहके पता ना ह ?” पता ना ह ‘ ऐसे गुर्राते हुए बोला गया कि यदि पूछने वाला पहुँच में होता तो दो तीन लप्पड़ कही गए नहीं थे। पर पूछने वाला भी अजब ढीठ ,तुनक कर बोला -“जा जा ढेर गरमा मत….. .” कहता हुआ वह ‘ कोई नृप होहुँ हमहि का…

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