रोज-रोज काका टहल ओरियइहें!

भीरि पड़ी केतनो, न कबों सिहरइहें.. रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! भोरहीं से संझा ले, हाड़ गली बहरी जरसी छेदहिया लड़ेले सितलहरी लागे जमराजो से, तनिक ना डेरइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! गोरखुल गोड़वा क,रोज-रोज टभकी दुख से दुखाइ सुख, एने-ओने भटकी निनियों में अकर-बकर, रात भर बरइहें! रोज-रोज काका, टहल ओरियइहे! फूल-फर देख के, उतान होई छतिया छिन भर चमकी सुफल मेहनतिया फेरु सुख-सपना शहर चलि जइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! छोटकी लउकिया, बथान चढ़ि बिहँसे बिटिया सयान, मन माई के निहँसे गउरा शिव कहिया ले भीरि निबुकइहें! रोज-रोज काका,…

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भोजपुरी गीत के भाव-भंगिमा

कविता के बारे में साहित्य शास्त्र के आचार्य लोगन के कहनाम बा कि कविता शब्द-अर्थ के आपुसी तनाव, संगति आ सुघराई से भरल अभिव्यक्ति हऽ। कवि अपना संवेदना आ अनुभव के अपना कल्पना-शक्ति से भाषा का जरिये कविता के रूप देला। कवनो भाषा आ ओकरा काव्य-रूपन के एगो परंपरा होला। भोजपुरी लोक में ‘गीत’ सर्वाधिक प्रचलित आ पुरान काव्य-रूप हऽ। जेंतरे हर काव्य-रूप (फार्म) के आपन-आपन रचना-विधान, सीमा आ अनुशासन होला, ‘गीतो’ के बा। दरअसल गीत एगो भाव भरल सांकेतिक काव्य-रूप हऽ, जवना में लय, गेयता आ संगीतात्मकता कलात्मक रूप…

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