फगुआ फगुआ नइखे रह गइल

फगुआ निअराते मन अगराये लागत रहे। भौजी सब से अझुराये के मोका मिल जाई -ई सोच के मन गुदगुदात देरी ना लागे। बड़की भौजी के फगुआ आवते बेमारी जोर मार देत रहे। बड़की माई उनकर पैरवीकार बन जास। ‘तू ना मनबऽ, दुलहिनियाँ के तीन दिन से बोखारे नइखे छोड़त, आ तू दिन में दू- बेर आके नहवा देत बाड़ऽ।’ मन खिनखिना जात रहे। हमरा रंग डलला से बोखार चढ़ जात बा आ साँझ होते झार के तइयार हो जात बाड़ी। भइया के बाजार निकले के बेरा फरमाइशे नइखे ओरात। डाबर…

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