Generated by All in One SEO v4.9.3, this is an llms.txt file, used by LLMs to index the site. # भोजपुरी साहित्य सरिता भोजपुरी ई पत्रिका : ISSN :2582-1342 ## Sitemaps - [XML Sitemap](http://www.bhojpurisahityasarita.com/sitemap.xml): Contains all public & indexable URLs for this website. ## Posts - [बड़का रंगदार के](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बड़का-रंगदार-के/) - का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर - [समय का संगे साँप-सीढ़ी के खेला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/समय-का-संगे-साँप-सीढ़ी-के-खे/) - समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि - [नकाबपोश](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नकाबपोश/) - "गोड़ लागतानी …… बाबा !" पंडी जी के दसई, फरके से गोड़ लगलें । "जय हो ……! का आइल बाड़े दसई, कवनो काम का बा रे हमरा से ?" " हं … बाबा ! तनी गृह प्रवेश के दिन पूछे के रहे रउवा से " सुन … दसई अब हम छोट जात में पूजा- पाठ, - [मारीसस देस के सुप्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मारीसस-देस-के-सुप्रसिद्ध/) - सन् उन्नीस सौ पचास,साठ आ सत्तर के दसक में पराधीन मारीसस देस में, गिरमिटिया आंदोलन के राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि कवि ब्रजेंद्र कुमार मधुकर भगत केवल एगो कवि साहित्यकार ना रहलन, बल्लुक ओह धरती पे बसल भारतीय मूल के सभे लोगन के आत्मा के आवाज़ रहलन । ओहिंजा पत्रकार,आंदोलनकारी, आजादी के सिपाही भी उ रहलन - [एगो मसखरापन के भाव-कुभाव सब जगह हावी बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एगो-मसखरापन-के-भाव-कुभाव-स/) - 1.एगो भोजपुरी निरगुन के मरम "सभकर ख़ूनवा एकही रे हऊवे, धरमवा अलगा - अलगा बा। केहू माई-बाप के चरनिया के धोवे, केहू के माई-बाप दिन -रात रोवे। माई के ममता एकही रे हऊवे, ललनवा अलगा - अलगा बा। हीरा जनम पवल- s सुंदर तन हो, तब काहे गंदा बाटे तोहार मन हो। सभकर नेहिया एकही - [जँतसार (पारम्परिक)](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जँतसार-पारम्परिक/) - नीची रे कुइयवाँ के ऊंची रे जगतिया ए राम ए रामा पनिया जे भरेली बराम्हनी ए राम घोड़वा चढ़ल अइलें जयसिंह रजवा ए राम ए रामा तनिए सा पनिया पियादा ए राम कइसे मैं पनिया पियाई जयसिंह रजवा ए राम ए रामा जतिया के बानी हम जोलाहीन ए राम जोलहीन जोलहीन मती करा बराम्हनी ए - [एगो रहलन कवि जी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एगो-रहलन-कवि-जी/) - एगो गाँव रहल जेकर नाम रहे -अमवा घाट। शांत-सुकून से भरल, खेत-खरिहान, नदी-नाला, आ चिरई-चुरगुन के बोल से रजगज।ओही गाँव में रहलन– लोग त “कवि जी” उनका के कहत रहे बाकिर उनकर असली नाम रामेश्वर प्रसाद मिश्र रहल। उनकर कवितई अइसन रहे कि लोग उनकर असली नाम बिसार दिहले। कवि जी कइसे कवि बनलन, ई - [फितूर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फितूर/) - " चोर चमार गांव में फितूर मचा के रखले रहन सं साला…! बरियात से लवटते बटोराहे भेंटा गइलें सं । लाठी डंडा लेले सभे टूट परल ओहनिन पर। अकेले बंदूक लेले हमहीं । तीन गो के गोली मरनी सरवन के। बाकी लोग लाठी डंडा से मारत मारत भहरा देंले । खदेर खदेर के मरले लोग। - [पूजा घर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पूजा-घर/) - मनोहर दूनों हाथ जोड़ के भगवान से कहलें " प्रभु हमरा के एगो बड़हन मकान दिहीं ताकि हम रउरा खातिर अलग से पूजा घर बना के राउर पूजा कर सकीं। '' " हम तहार ई काम नइखीं कर सकत '' भगवान कहलें । " काहे प्रभु '' मनोहर अचकचा के पूछलें । " अभी तूं - [इहवाँ हमनी के सरकार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/इहवाँ-हमनी-के-सरकार/) - लिखल, पढ़ल, सोचल, बोलल मानल जाई तकरार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥ हमरे से हौ नून तेल आ हमरे से कानून चाहे रहा तू केरल बबुआ चाहे देहरादून अगड़ा, पिछड़ा, दलित के खेला सब हमरे ब्योपार । इहवाँ हमनी के सरकार ॥ कबों खातिर एस सी एस टी,कबों के बा यू - [चइता के साध मरि गइलें हो रामा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चइता-के-साध-मरि-गइलें-हो-रा/) - हिन्दू कलेंडर का हिसाब से एह महिना के चैत महिना कहल जाला आ ई हिन्दू नव वर्ष के पहिल महीना ह। अपना भोजपुरिया संस्कृति में होली का बाद आवे वाला एह महीना में चैती/चइता गावे के चलन रहल बा। ‘चैत महीना के मधुमास कहल जाला । त मधुमास में होखे वाला सगरे श्रिंगार, वियोग, विरह, - [तेल के खेल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तेल-के-खेल/) - समय के बदलाव पृथ्वी के गोल होखला के प्रमाणित करे में कवनो कोर कसर ना छोड़े। एक बेर फेर से लइकइयाँ के बोलल, सुनल नारा ईयाद आ रहल बा । बात सत्तर के दसक के बा। जब गाँव-गाँव में छोट-छोट लइका ईस्कूल से छुटला का बाद भर रसता एगो नारा लगावत देखात रहलें । उ - [भोजपुरी के मान्यता: केकरा पर करीं सिंगार कि पिया मोर आन्हर ?](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-के-मान्यता-केकरा/) - भाषा खाली बतकही के जरिया ना होला, बलुक ई कवनो समाज के आत्मा, संस्कृति, इतिहास आ सामूहिक चेतना के ढोअल करे वाली शक्ति ह। भारत जइसन बहुभाषी देश में हर भाषा आपन एगो अलग संसार समेटले बा। भोजपुरियो ओही में से एगो समृद्ध लोकभाषा ह, जवन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड से निकल के मॉरीशस, सूरीनाम, - [भोजपुरी: संवेदना, संघर्ष अउर समता के भासा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-संवेदना-संघर्ष-अ/) - भोजपुरी के नाम आवते आजु ढेर लोगन के मन में पहिल छवि "लोकप्रिय गीतन" के उभरेला ऊ मंच, मेला, सिनेमा अउर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाजत चटर पटर गीत के, बाकिर ई हमरा समझ से अधूरा सच्चाई ह। भोजपुरी के असली माने, ओकर आत्मा, ओकर सांस्कृतिक गहिराई अउर मानवीय संवेदना के विस्तार एह सतही छवि से - [भोजपुरी गीतन में होली वर्णन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-गीतन-में-होली-वर्-2/) - भोजपुरिया धरती उत्सवधर्मी धरती ह। भोजपुरिया लोकजीवन मुख्य रूप से खेती-किसानी पर आधारित बाटे ना, त मेहनत मजदूरी पर। भोजपुरिया लोकजीवन के हर एक परब त्योहार कृषि से जुड़ल बाटे। एह त्योहारन में होली-फगुआ के त कहहीं के का बा?घर के कोठिला में घान-चाउर भरल रहेला, बघार में गेहूँ गदरात रहेला,आम-महुआ मोजरात रहेला आ - [भुलरू बाबा के रहस्य](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भुलरू-बाबा-के-रहस्य/) - गाँव में एकहि गो नाव सभकरा बतकही पर चढ़ल रहे, उ रहे भुलरू बाबा के नेकी आ दान धरम । लोग बाग कहत रहले कि ऊ साधारण मनई ना, देवता के रूप हउवन। पाँच गो भाई में तिसरका, आ चालीस बरिस के हो गइले बाकिर बिआहो ना कइले आ ऊपर से विद्वान आ दानी। गांव - [फगुआ के लोक-दर्शन : राग से विराग तक](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फगुआ-के-लोक-दर्शन-राग-से-वि/) - फगुआ के आगमन होतहीं प्रकृति आ मनुष्य दुनो एक साथ बउरा उठेले। खेत में पीयर सरसों के मुसकान, आम के मंजर, हवा में घुलल सुगंध, चिरई के चहचह —ई सभ जीवन के भीतर छुपल ऊर्जा के नया रूप में जगा देला। मैथिली के महाकवि विद्यापति लिखलेन— “आइल ऋतुपति राज वसंत, धावल अलि कुल माधवी पंत।” - [जब से बहल बयारि फगुन के।](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जब-से-बहल-बयारि-फगुन-के।/) - अमराई में कहईं कोइलि बोल गइल ह। मोजर गंध हिया के बान्हन खोल गइल ह। उसठा होंठ कसाँइन लागे आँखिन चढ़ल खुमार सगुन के। कवन निगोरा टेसू बन में आग लगावल? कोना आँतर में मुरझाइल राग जगावल। पनख रहल मनगुपुते डारी अँखुवन से गँउजार तरुन के। कुइँ दल खिलल भँवर मदमातल, घूप थिराइल। - [अपनापा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अपनापा/) - फगुनहट के सुगंध गाँव में उतर चुकल रहे। महुआ टपकत रहे आ हवा में भींजल मिठास घुलल रहे। रामदास के घर के आँगन में चूल्हा दहकत रहे। कड़ाही में पुआ फूल-फूल के उठत रहे जवना के रामदास के कनिया आँचल सम्हारत उलट-पुलट करत रहली। रामदास के पत्नी सीता खूब गोर,हँसमुख आ मेहनती रहली जेकरा कारण - [आयल जगावे फगुनवा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आयल-जगावे-फगुनवा/) - जागा जवान अरे जागा किसान आयल जगावे फगुनवा, रंग बिरंगा है नेहिया के बान आयल जगावे फगुनवा। सुगना जगावे कोयलिया जगावे गेहुंआ के बाली पे नाच दिखावे, भौरा जगावे ला गावे हो गान आयल जगावे फगुनवा। वीरों का मौसम है, वीरों का चोला, देखि वसन्ती जिया मोरा डोला। जय बोला जवान, जय बोला किसान, - [उचरत हरिनन्दी के पीर के बहाने से](http://www.bhojpurisahityasarita.com/उचरत-हरिनन्दी-के-पीर-के-बह/) - हरिनन्दी भा हरनंदी अब ई नाम बिलम गइल बा। विरले लोग होई जेकरा के ई नाम के महातम मालुम होई। अंग्रेजन के दिहल अपभ्रंश नाम हिंडन से सबके परिचय बा। ई उहे हरिनन्दी नदी हई जे सहारनपुर के पास से निकल के आ चार सौ किलोमीटर चल के गौतमबुद्ध नगर माने नोएडा के पास यमुना - [जेकर खइलन रोटी ओकरे धइलन बेटी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जेकर-खइलन-रोटी-ओकरे-धइलन-ब/) - समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लोग होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि - [जेकर खेती ओकर मति](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जेकर-खेती-ओकर-मति/) - शीतलहर के प्रकोप में अलग अलग तरह से गरमी के पैदा करे क उताजोग हो रहल बा आ लोग ओकरा के महसूसतो बा। ओह पर चरचा के बजारो गरम हो चुकल बा। कबों कवनो बैठक त कबों कवनो खिलाड़ी गरमी के श्रोत बन रहल बाड़ें। समइयो एक्के आँख से देखउवल के चल रहल बा। चाल - [ओरचन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ओरचन/) - दुआरी पर किनारे देवाल से सटा के खड़ा कइल बा एगो खटिया, ओकर हालत बड़ा डाँवाडोल बा ओकरा बिचवा में बड़ा झोल बा केहू के तरे सुतत होई बुझाते नइखे बाकिर ओरचन कसाइल बा ओरचन में दस गो गाँठ बा आ दोसरा ओर अइसन बिछवना बा जइसे राजा के ठाट बा। सबके माई-बाप इहे चाहेला - [आजकल बिआह में…](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आजकल-बिआह-में/) - शादी बिआह में देखऽ आजकल बस होखऽता शोबाजी । आशीष देबे माई बाबू ,चाहें होखे न राज़ी । दुल्हा दुल्हिन गुण ना दिल मिलऽल पतरा के देखाई ? दूर आँख से पानी लाज बस देबे के बा बधाई । पूछा पाछी आ निमन्त्रण सभे वाटसैप से जाता। बिआह के नेग चार ,रसम सगरो - [हे चच्चा चुपचाप रहा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हे-चच्चा-चुपचाप-रहा/) - हे चच्चा चुपचाप रहा बहुत किहा मनमानी में, अबकी बेरिया तोहार भतीजा, खड़ा होई परधानी में। चौराहे पे कम जाल करा, दोहरा गुटखा कम खाल करा, भरि -भरि गाल फुलैले बाट्या पहिले ऐके साफ करा। हम्मै हरदम हुरपेटै ला चाची से कहब दलानी में, हे चच्चा चुपचाप रहा बहुत किहा मनमानी में। गांव - [भोजपुरी लेखन आ प्रकाशन-2025](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-लेखन-आ-प्रकाशन-2025/) - भोजपुरी साहित्य आ संस्कृति के विकास के दिसाँई भोजपुरी समाज निरंतर प्रयासरत बा।भोजपुरी- विकास खातिर दर्जनन भोजपुरी संस्था लगातार कार्यक्रम आयोजित करत रहल बाड़ी सँ।साहित्यकार -कलाकार-राजनेता सभे अपना ओर से भोजपुरी के विकास खातिर हर संभव प्रयास कर रहल बा।भोजपुरी साहित्य के विकास के दिसाँई सबहर रचनात्मक प्रयास चल रहल बा।हर तरे के बिधन में - [उहे अदिमिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/उहे-अदिमिया/) - " का भइया ! तोहार चाल हमके तनिको ना समझ में आवेला।अइसन धउरवला ह कि हाँफत-हाँफत करेजा दुखाय लागल। अइसन ऊँहवा का रहल ह भाय कि हेतना डेराय गइला ह ....आंय।" आपन गोल -गोल आँख नचावत, बहुत मुश्किल से मनोज अपने हंफरी के कंट्रोल करे क कोशिश में लगल रहलन।परताप मुस्कियात चाह पियत कनखी से - [जतिए पहिचान बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जतिए-पहिचान-बा/) - जात में जात इहां जतिए प्रधान बा इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा। जात में जात जइसे केला के पतिया छिलका पियाज के जस मोथा के घसिया जात के मान इहां जतिए अभिमान बा इ ह भारत इहां जतिए पहिचान बा। पानी के जात इहां मटका के जतिया भात के जात इहां - [बिहारी मजदूर : एगो कविता: एगो व्याख्या](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बिहारी-मजदूर-एगो-कविता-एग/) - जब एगो कविता अपना छोटहन कलेवर में एगो मार्मिक परिवेश आ मनुजता के एगो बड़हन पीर-क्लेश के चित्र उगाहे आ बिना ठकठेन नधले साँच के तहे-तहे खोल के बतावे तब ऊ कविता साहित्य के बड़हन विभूति हो जाई, एमे कवनो शक नइखे। डॉ ब्रजभूषण मिश्र के रचल 'बिहारी मजदूर' अइसने काव्य-विभूति ह, जे साँझ के - ['चौधरी कन्हैया प्रसाद स्मृति सृजन सम्मान से दुगो भोजपुरी साहित्यकार सम्मानित भइलें](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चौधरी-कन्हैया-प्रसाद-स्म/) - विश्व पुस्तक मेला के अंतिम दिने सर्व भाषा ट्रस्ट के स्टाल पर चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह स्मृति न्यास आरा आ सर्व भाषा ट्रस्ट का ओर से भोजपुरी साहित्य के संरक्षण-संवर्धन आ सृजन खातिर वर्ष 2025 का डॉ संतोष पटेल आ वर्ष 2026 का श्री जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के 'चौधरी कन्हैया प्रसाद स्मृति सृजन सम्मान' से राष्ट्रीय - [नैनन चलावेली बान](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नैनन-चलावेली-बान/) - ले भौंहन क तीर कमान नैनन ! नैनन चलावेली बान। रति सी अंग अंग हौ ढारल सोझा आइल बा, सभ हारल भरमावै सभके धियान। नैनन--- साज समाज बीच जब आवे अवते इहाँ मधुर मुसुकावे सुघरई क छोड़े निसान। नैनन --- जब जब सुर में गीत सुनावे मन के तार तार झनकावे सांसत - [भोजपुरी साहित्य,कला आ संस्कृति के प्रमुख विभूतियन से अवगत करावत अनुपम ग्रंथ- ' भोजपुरी प्रतिभाएँ '](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्यकला-आ-संस/) - भोजपुरी क्षेत्र के इतिहास के व्यापक आ गहिराह अध्ययन के खातिर इहवाँ के सामाजिक, सांस्कृतिक आ साहित्यिक प्रतिभा के धनी व्यक्तित्वन के कृतित्व से अवगत होखल बहुते जरूरी बा।एह सारस्वत अभियान में बिहार आ उत्तर प्रदेश से इतर मध्यप्रदेश राज्य से अगर कवनों सांस्थानिक प्रयत्न होता त ई स्वागत योग्य त बड़ले बा, प्रेरणास्पदो बा। - [गंवईं माटी से गमकत कविता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गंवईं-माटी-से-गमकत-कविता/) - समीक्षित पुस्तक: पीपर के पतई( भोजपुरी कविता संग्रह) कवि के नाम - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी प्रकाशक - नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली प्रकाशन वर्ष: 2017 पृष्ठों की संख्या -104 समीक्षक- डॉ राजेश कुमार 'माँझी' ई बात सबका मालूम बावे कि कविता मूल रूप से पाठक के भावना के उद्दात बनावेले, ओकरा सौंदर्य-बोध में सुधार ले - [कुंडी क रहस्य](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कुंडी-क-रहस्य/) - " देखा , ले त चलत हईं सिवसंकर भइया के इंहा बाकिर कुछ एने -ओने हो जाई त हमके दोस मत दिहा।समझ गइला ना ! अपने कपार क अलाय-बलाय हमरे पर मत पटकीहा।" परताप एह अंदाज़ में बतिया कढ़वलन कि मनोज क पहिलहीं से संकित जीव में थरहरी दउड़ गइल।घबरा के पुछलन - " काहें - [बिहार चुनाव में वोट के कोरनीस](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बिहार-चुनाव-में-वोट-के-कोर/) - वोट के हाला महिनवन से चालू बा । राजधानी से ले के हाटे - बाजारे , चउके - चउराहे , गाँवे गिराँवे , घरे - घरे वोटे के बात होत बा । जवन काम पाँच बरिस असरे टंगाइल रहल , अब चल - चलंती के बेरा ओकर नींव दिआए लागल , उद्घाटन होखे लागल । - [बुझीं जनि ठिठोली](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बुझीं-जनि-ठिठोली/) - कउवो से करकस कोइलिया के बोली बुझीं जनि ठिठोली,इहे हियरा टटोली। बकुला भगत संगे हुंडरो बा आइल देखीं भला आजे बिलरो धधाइल बघवो त मनवाँ के राज आज खोली। बुझीं जनि ठिठोली,इहे हियरा--- रात दिन होत बात बाS अझुरउवा उपरा त अउर भीतर बाउर भउवा भरलको पुरलको फइलउले बा झोली । बुझीं जनि - [टूटल क्रम के जोड़े के कवायद : स्मृति कवि सम्मेलन सम्पन्न भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/smriti-kavi-sammelan/) - विश्व भोजपुरी सम्मेलन गाजियाबाद इकाई के द्वारा आयोजित ' स्मृति कवि सम्मेलन आ सम्मान समारोह' अध्यक्ष मनोज तिवारी आ संयोजक महासचिव जे पी द्विवेदी क परयास सफलता का संगे धरती पर उतरल। कार्यक्रम कई गणमान्य लोगन के सम्मानित काइल गइल। स्मृति कवि सम्मेलन में कुल 11 गो कवि लोग शिरकत कइलें। कार्यक्रम के अध्यक्ष विश्व - [भोजपुरी के लाल – लाल बिहारी लाल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-के-लाल-लाल-बिहार/) - सोनू गुप्ता। नई दिल्ली। भोजपुरी के माटी बिहार के सारण(छपरा)जिला के गांव आ पोस्ट भाथा सोनहो में 10 अक्टूबर,1974 के एगो साधारण शिक्षक परिवार में लाल बिहारी गुप्ता “लाल” के जन्म भइल। श्री लाल की सुरुआती शिक्षा-दीक्षा गांव के लगही प्राथमिक आ माध्यमिक विद्यालय में भइल। शिक्षा के बाद श्री लाल नौकरी के तलाश में दिल्ली अइले आ 1995 में भारत सरकार के पर्यावरण - [गीतकार डाॅ.गोरख प्रसाद मस्ताना आ उनकर गीत-कविता संग्रह-'आस- अँजोर'](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीतकार-डाॅ-गोरख-प्रसाद-मस/) - पटना दूरदर्शन में एही साल 26 जनवरी के बिहान भइला एगो भोजपुरी कवि-गोष्ठी के रिकार्डिंग रहे। हम तनिका लेट पहुँचल रहनीं ।पहिले से पता ना रहे कि आउर संगी कवि सभे में के-के बा बाकिर मिजाजे हरिअरा गइल जब देखनीं कि स्टेज पर चढ़े के बेरा दू गो नामी भोजपुरी गीतकार अग्रज -डाॅ.गोरख प्रसाद मस्ताना आ - ['हो ना हो ' के कविता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हो-ना-हो-के-कविता/) - जहाँ जीवन में चारू ओर अझुरहट आ तनावे होखे,मनई-मन में अकुलहट आ उबियाहटे भरल होखे ,उतावलापन, उबाल आ बेचैनिये समाइल होखे तब अइसनका समय में कविता में संघर्ष आ प्रतिरोध के स्वर स्वाभाविक बा।कविता मानव-मन के भावन के उच्छ्वास आ ओकरा माथा में उमड़त-घुमड़त सोच आ विचारने के कलात्मक अभिव्यक्ति होले।इहे कारन बा कि आज - [राजधानी दिल्ली में "रंग रसिया महोत्सव 2025" के आयोजन भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/rang-rasiya-2025/) - देश के राजधानी दिल्ली में स्वर कोकिला पद्मविभूषण शारदा सिन्हा जी के श्रद्धांजलि स्वरूप एक मनमोहक कार्यक्रम "रंग रसिया महोत्सव 2025" के आयोजन भइल। एह कार्यक्रम के संचालन माँ सरस्वती नृत्य भारती कलापीठ क संचालिका आ लोक गायिका विजय लक्ष्मी उपाध्याय कइनी। कार्यक्रम के भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष आ मैथिली भोजपुरी अकादमी के पूर्व - [भोजपुरी जन जागरण अभियान के 25वां धरना सम्पन्न भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-जन-जागरण-अभियान-क/) - 3 अगस्त | भोजपुरी भाषा के संविधान के आठवीं अनुसूची में सामिल करावे ला ,पछिला 10 बरिस भोजपुरी जन जागरण अभियान अपना एह मांग के लेके जंतर मंतर पर धरना देत आ रहल बा। असवों 3 अगस्त के भोजपुरी जन जागरण अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ संतोष पटेल के नेतृत्व में धरना आहूत रहल । - [स्त्री संवेदना के धारदार कृति:निमिया रे करुआइनि](http://www.bhojpurisahityasarita.com/nimiya-re-karuaini/) - पुस्तक- निमिया रे करुआइनि विधा-उपन्यास / उपन्यासकार – मीनाधर पाठक प्रकाशन वर्ष-2024 /प्रकाशन संस्थान – सर्वभाषा प्रकाशन , नई दिल्ली -59 ‘निमिया रे करुआइनि’ स्त्री संवेदना के उनुका मन के मोताबिक आ उनुका स्थिति का हिसाब से गढ़ाइल बा। कथाकार अपना कथा-विन्यास के स्मृतियन से जोड़त रोचक बनावे में कवनों कोर कसर नइखे छोड़ले। - [भोजपुरी कविता में रचल - बसल रस के मिठास से सराबोर एगो मजिगर पोथी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/bhojpurikavita/) - भोजपुरी कविता के इतिहास बहुत पुरान बा। बाबा गोरखनाथ आ संत कबीर के कवित के थाती त भोजपुरी कविता में बड़ले बा साथे ओह काल से लेके आजु तक भोजपुरी कविता समय के साथ कदम ताल करत कविता के हर विधा में आपन जोड़दार उपस्थिति दर्ज कइले बा। महेंद्र मिश्र, भिखारी ठाकुर, रघुवीर नारायण सिंह, - [विश्व भोजपुरी सम्मेलन गाजियाबाद इकाई का ओर से पुष्पांजलि अर्पित !](http://www.bhojpurisahityasarita.com/vbs/) - विश्व भोजपुरी सम्मेलन गाजियाबाद इकाई का ओर से आज 20जुलाई के संस्था के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ अरुणेश नीरन जी के पुष्पांजलि अर्पित कईल गइल ।बतावत चलीं कि डॉ नीरन जी 15 जुलाई के शिव लोक गमन क गइलन ।उनके व्यक्तित्व आ कृतित्व पर इकाई के महासचिव जे पी द्विवेदी विस्तार से प्रकाश डललेंं। इकाई अध्यक्ष - [प्रकृति किहाँ बा मेला भारी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/prakriti-kiha-ba-mela-bhari/) - प्रकृति कहाँ बा मेला भारी, सभे करे मिलि-जुलि तइयारी। बादर-बदरी खुश हो अइलें, ढोल बजावत गीत सुनइलें, मस्ती में बूनी बरिसइलें, बिजुरी के सँग नाच देखइलें, धरती के हिरदया जुड़ाइल, घर-आँगन होखल फुलवारी। प्रकृति किहाँ बा मेला भारी।। सगरो लउके हरियर-हरियर, रसगर भइलें आहर-पोखर, नदी-नहर नाला उमंग में, गागर-गागर लागे सागर, बीज बोआइल हँसी-खुशी के, - [रिमझिम बरसेला सवनवां](http://www.bhojpurisahityasarita.com/rimjhim-barasela-sawanava/) - रिमझिम बरसेला सवनवां में संवरिया बदरा। रस के गगरी चुआवेले बदरिया बदरा डर लागे अन्हियरिया में चमके चहुँ ओर बिजुरिया ओरियानी के पानी छींटा मारे सोझ दुवरिया । खटिया मचिया भीजे तकिया मुडवरिया बदरा करिया घटा नचावे बन में मोरवा संग मोरिनिया । दादुर मेघा मेघा टेरे चातक मांगे पनियां । बैरिन बंसिया बजावे बंसवरिया - [के हो लिलरा पर छिरकल गुलाल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ke-ho-lilara-par/) - के हो लिलरा पर छिरकल गुलाल बदरा उठल मनवां में केतनी सवाल बदरा। गइलें सुरूज़ देखS पछिम के देसवा बबुआ के दादी सुनावेली खिसवा लवटे लगलें मदरसा से लाल बदरा । के हो लिलरा पर छिरकल गुलाल बदरा। दफ़तरवा से लवटे लगलें नोकरिहा होखे लगल पनघट पनिहारिन से खलिहा नापे चरवहवा गइयन के - [पार्टी विथ डिफरेंस](http://www.bhojpurisahityasarita.com/party/) - पार्टी विथ डिफरेंस हईं हम होखे जय-जयकार। हो बाबू !हाउस टैक्स उपहार। तहरे माला हमै बनवलस पार्षद, मेयर आ विधायक । हमही लायक सांसद बानी टैक्स के चलाइब सायक। चैन से रहि ना पइबा घरे नगर निगम के मार। हो बाबू !हाउस टैक्स उपहार। पानी बिजुरी कूड़ा पूरा घर-घर हेरवाइब सर्वे कर - [मुखिया के पटीदार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/mukhiya/) - तेल पिला के राखीं लाठी सभ देखी तेल के धार । हम मुखिया के पटीदार। जीत क पगरी हमरा माथे रक्षक बनि डोलीं हम साथे हूँ-टू होखे कतौ कबों जे सुधरि के उपरे हमरा पाथे। हम बड़का हईं जुझार। हम मुखिया के पटीदार। बरिस पाँच जे गुन गन गावै बदले मोट मलाई पावै - [भोजपुरी साहित्यकार सम्मानित](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्यकार-सम्मा/) - 22 जून, 2025, गाजियाबाद, विश्व भोजपुरी सम्मेलन, गाजियाबाद इकाई द्वारा विचार संगोष्ठी आ सम्मान समारोह के आयोजन गणपति फार्म हाउस, अवंतिका II, गाजियाबाद में सम्पन्न भइल। भोजपुरी के तीन दशक से गद्य लेखन में एगो स्थापित नाम अंकुश्री जी इहाँ मुख्य अतिथि रही आ वशिष्ठ अतिथि डॉ.मधुलिका बेन पटेल रहीं। एह कार्यक्रम के दौरान अंकुश्री - [सवाल आ सपना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सवाल-आ-सपना/) - सवाल अपना जगे खड़ा रहेला खड़ा रही जे भागेला सवाल से सवाल ओकर पीछा परछाईं जस करेला काहे कि सवाल आपने उपराजन होला सामने बस ठाढ़ करेला कबो केहू त कबो केहू। [2] सवाल से भागे वाला के ना बुझाला कि ऊ जिनिगी से भाग रहल बा आ ढो रहल बा लाश बस अपने जिनिगी - [भोजपुरी भाषा के मानकीकरण’, ‘ओकर शब्दन के एकरूपता’](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-भाषा-के-मानकीकरण/) - ‘भोजपुरी भाषा के प्रमाणिक रूप’, ‘भोजपुरी भाषा के एकरंगी रूप’, भोजपुरी भाषा के मानकीकरण के आवश्यकता’ जइसन विषय पर समय समय पर विद्वावनन के विचार आइल। भोजपुरी के मानक रूप के तैयार करे के प्रयास लगातार चल रहल बा। कहे के ना होई कि भोजपुरी साहित्य के सृजन सिद्व आ नाथ पंथ, कबीर पंथी, भगताही - [का हो मुखिया !](http://www.bhojpurisahityasarita.com/का-हो-मुखिया/) - घूमत रहलें गल्ली-गल्ली देखत कहवाँ ऊंच-खाल बा। पूछलें रामचरितर उनुसे का हो मुखिया ! का हाल बा। कवन नवकी घोषना भइल कतना फंड बा आइल रउरा घरे मुखियाइन त रहनी खूबै धधाइल। हमनी के ना कुछौ मयस्सर रउरा धइले खूब ताल बा। का हो मुखिया ! का हाल बा। पर शौचालय बन्हल कमीसन - [नवके मनराखन के मनकही](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नवके-मनराखन-के-मनकही/) - का जमाना आ गयो भाया, लागत बा कि जयचंदन के फिरो दिन बहुरे लागल। अपना के फलाना भाषा के साहित्यकार कहवा के लुगरी आ लकड़ी बिटोरे में सरम ना लागे बाक़िर ओह भाषा पर अंगुरी उठावत बेरा अपना के बड़का भाषाविद बुझे लागल बा लोग। साँच के नकारे के फेरा में लोग कुछो लिखे- बोले - [‘कउने नरेसवा क देसवा उजरि गइले…’](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कउने-नरेसवा-क-देसवा-उजरि/) - आजु रामजियावन दास ‘बावला’ जी के जयंती हऽ। ‘बावला’ जी, लोकमन के कवि रहलें। कुछ विद्वान लोग उहाँ के ‘भोजपुरी के तुलसीदास’ कहले बा। बाकिर हम उहाँ के तुलना कवनो दोसर कवि से ना करऽब। ‘बावला’ जी के कवनो प्रतिमान नइखे हो सकऽत। कवनो पैमाना भा कसउटी पऽ उहाँ के नइखे तउलऽल जा सकऽत। काहें - [तोल मोल के बोल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तोल-मोल-के-बोल/) - लेवरल पोतल ह उप्पर से भितरी बड़का झोल, फकीरा, तोल मोल के बोल, फकीरा।2। लगल घून हौ धरम करम में नेह चटलेस दियका। लूह लागल हीत-नाता के सरम बिलाइल, डहका । इंटरनेट पर पीटत बबुआ परंपरा के ढोल, फकीरा , तोल मोल के बोल, फकीरा।2। तूरत फ़ारत झंखत झारत आगि लगवलें घर घर - [नातिदीर्घ हास-परिहास -भड़ाँस मूलक निबंध](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नातिदीर्घ-हास-परिहास-भड़/) - [पढ़े के पहिले निहोरा-भोजपुरी लोकचेतना के बानी हियऽ।सामूहिक चेतना के ।इहाँ कवनों प्रवृत्ति के उभरत- पसरत देर ना लागे।इहाँ जवन होला भा लउकेला ऊ सामूहिक चेतने से निकसिये के कहीं पइसारो पावेला।एह से एह आलेख के ओही नजरिया से पढ़ल जाये के चाहीं।तबे आनंद मिली।कवनों बात के अपने पर लोकल ओतने बेजाँय हऽ जेतना अपना - [फगुनहटे में](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फगुनहटे-में/) - पिहिके कोइलिया तनिक अहटे में धसोर गइल पुरुवा फगुनहटे में॥ भउजी के कजरारी अँखियन क थिरकन ससरे लहर बनि सिहरे लागल तन मन विलमते रंगवो डलल सहते में । धसोर गइल--- सुध-बुध हेराइल मोजराइल अमवा एह घरी नीक लगे बदराइल घमवा ई देखS बुढ़वो रंगल रसते में। धसोर गइल--- हुलसे पवनवा गोटाइ - [एगो मनसायन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एगो-मनसायन/) - [नमन भर से काम ना चली।पढ़ीं -जानीं -सोचीं सभे अपने पुरखन के बारे में] भोजपुरी कवि विचित्र जी ,मुँहदुब्बर जी आ मुखिया जी के इयाद करत ~~~~~~~~□□~~~~~~~~~~~~~ भोजपुरी के स्वनामधन्य कवि स्व.कुबेर मिश्र 'विचित्र ' जी आ राघवशरण मिश्र 'मुँहदुब्बर' जी ओह बेरा भोजपुरी कवि- मंचन के जान-परान रहनीं।मुँहदुब्बर जी आ विचित्र जी ई दूनू - [संगीत रागी जी के काव्य संग्रह 'मुझे तुमसे कोई गिला नहीं' के लोकार्पण सम्पन्न भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/संगीत-रागी-जी-के-काव्य-संग/) - विश्व पुस्तक मेला - 2025 में 8 फरवरी के संगीत रागी जी के काव्य संग्रह 'मुझे तुमसे कोई गिला नहीं' के लोकार्पण सम्पन्न भइल । एह समारोह में संगीत रागी, अखिलेन्द्र मिश्रा, ओम निश्चल, चंद्र प्रकाश द्विवेदी ,केशव मोहन पाण्डेय , लक्ष्मी शंकर वाजपेई आ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी सिरकत कइलें। - [जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के पहिल हिन्दी काव्य संकलन 'सूत्रधार कौन' के विमोचन भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जयशंकर-प्रसाद-द्विवेदी-क/) - विश्व पुस्तक मेला -2025 के 6 वे दिन भोजपुरी के प्रतिष्ठित कवि आ भोजपुरी साहित्य सरिता के संपादक जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के पहिल हिन्दी काव्य संकलन 'सूत्रधार कौन' के विमोचन 'सर्वभाषा ट्रस्ट के स्टाल पर सम्पन्न भइल। लोकरपन समारोह में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के प्रधान संपादक डॉ अमिता दुबे, प्रखर आलोचक ओम निश्चल , - [भोजपुरी कविता के राह में युवा कवि गुलरेज के 'धाह'](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-कविता-के-राह-में-य/) - भोजपुरी के युवा पीढ़ी के कविता में ताजगी त बड़ले बा बाकिर ओमें जवन उबाल आ आक्रोश के अभिव्यक्ति बा ओकरो में तल्खी ले जादे तथ्य आ समझदारी के प्रधानता बा।ई पीढ़ीअपना असंतोष,खीस आ नाराजगी के अपना संघर्ष,प्रतिरोध आ तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति के जरिए मुखर करे के जानेले।गुलरेज शहजाद एह पीढ़ी के एगो महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बाड़न। - [भोजपुरी समीक्षा के संकट](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-समीक्षा-के-संकट/) - भोजपुरी के साहित्यिक इतिहास मोटामोटी डेढ़ सौ साल के पूरा होखे जा रहल बा. एह में सब विधा के रचना भइल, बाकिर समीक्षा के लेके कुछ विचार हमरा सामने उठ रहल बा. किताबन के समीक्षा के नांव पर ओकर परिचय लिखे आ छापे के काम भोजपुरी आ हिंदी के अखबारन के संगे-संगे पत्रिकन में भी - [नैना के तीरे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नैना-के-तीरे/) - डूबि गइलें सजना सखी रे, कजरारे नैना के तीरे। नैना के तीरे हो, नैना के तीरे। डूबि गइलें सजना सखी रे, कजरारे नैना के तीरे। अँकुरल मन में प्रीत क बिरवा, बेर बेर हियरा के चीरे। कजरारे नैना के तीरे। तलफत जियरा पिय के खातिर , पीर बढ़ावत धीरे-धीरे। कजरारे नैना के तीरे। - [गाँव आ गोधन पूजा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गाँव-आ-गोधन-पूजा/) - असों सुजोग से देवारी पर हम गाँवे बानी। त ढेर कुछ भुलल–बिसरल मन परल।ओही में से एगो गोवर्धन पूजो बा। देवारी के एक दिन बाद भोजपुरिया समाज में गोवर्धन पूजा जवना के गोधना कहल जाला, बड़ सरधा का संगे मनावल जाला। आजु के गाँवन से सामुहिकता त बिला रहल बा, बाक़िर अबो ढेर कुछ बाचल - [अइसे कइसे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अइसे-कइसे/) - महटिया के सूतल जागी, अइसे कइसे। सभे बनत फिरे बितरागी, अइसे कइसे। सोझे आके मीठ बोलवा सोरी में अब डाले मंठा। ओकरे फेरा घर बिलाई फिरो बजावत रहिहा घंटा। सूपा पीट दलिदर भागी, अइसे कइसे । सभे बनत---- बेगर बुझले बिना ताल के ओही रागे अपनों गउला। सब कुछ तहरा राख़ हो गइल - [अब त नींन से जागा राजा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अब-त-नींन-से-जागा-राजा/) - हर कुर्सी बेईमान भेटालन अपने मन क बज ता बाजा हे सेवक परधान देश क अब त नींन से जागा राजा। तहसील कचहरी थाना चउकी मागैं रुपिया भर भर भऊकी ना देहले पर काम ना होला बेतन थोरिका अउर बढ़ा दा। अब त नींन से जागा राजा। पन सउआ क बात करैंन देहला - [जरावऽ दियना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जरावऽ-दियना/) - होई सगरो अंजोर हंसी घरे- घरे भोर कि जरावऽ दियना, भारत माता के मंदिरवा जरावऽ दियना । एगो दिया धर ऽअंगना में एगो दिया दलानी एक दिया घर के पिछवारे भुइंया परल पलानी नाहीं गोसयां गोहार ,नाहीं सूझे उजियार कि जरावऽ दियना, जहां जिनगी अन्हरवां जरावऽ दियना । एगो दीया गंग- जमुन के जेकर निर्मल - [जय हो गाजियाबाद](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जय-हो-गाजियाबाद/) - एगो सांसद चार बिधायक मेयर संगे सै गो पार्षद सबके सब आबाद । जय हो गाजियाबाद। नगर निगम के हाल न पूछा जी डी ए से ताल न पूछा पूरे पूरा सहर के बबुआ जनता बा बेहाल न पूछा। कोसिस करत करत मरि जइबा होखी ना संवाद । जय हो गाजियाबाद। कतो सड़क - [ए भवानी माई!](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ए-भवानी-माई/) - ए माई! साचो आइल बाड़ू का हो! देखनी हँ लोग बाग के घर दुआर धोवत रहल ए माई! तोहरा लगे त साँचो सक्ति बा दस गो हथवा लेहले सिंघवा पर सवार बाड़ू दसो में बरियारे औजार लेले बाड़ू सिंघवा अलगे चीरता फाड़ता ए माई! हम का करीं हो? तोहार हथियार दस गो आ - [झंखे साँच](http://www.bhojpurisahityasarita.com/झंखे-साँच/) - झंखे साँच झूठ क जयकारा हौ बाबू हई देखा आइल हरकारा हौ बाबू । मंच क पंच तक कारोबार फनले बा कीमत असूले ला रउबार ठनले बा । गीत चोरन क चढ़ गइल पारा हौ बाबू । झंखे साँच--- पीढ़ा पर बइठ के सबका के कोसल टुटली कमरिया संगे धरि धरि पोसल कबों - [भितरघात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भितरघात/) - " आजकल सुमेधा मैम बहुत उदास रहती हैं,आपको पता है कि क्या मामला है ? आप तो खास हैं न उनकी,कुछ बताया उन्होंने आपसे ? " रुचि मैम के आँखि में जिज्ञासा क चिनगी चटकत देख पहिले त आद्या के नीक ना लगल बाकिर बात टाले के गरज से अपने के काबू में करत ऊ - [भोजपुरी कविता के अतीत आ वर्तमान](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-कविता-के-अतीत-आ-वर/) - भोजपुरी कविताई के सुरूआती दौर भोजपुरी कविता के प्रारम्भिक दौर के पड़ताल करत खा हमरा सोझा ओकर तीन गो रूप आवत बा - एगो बा सिद्ध, नाथ आ सन्त कबियन क रचल, दूसर लोकजिह्वा आ कंठ से जनमल, हजारन मील ले पहुँचल, मरम छुवे आ बिभोर करे वाला लोकगीतन के थाती आ तिसरका भोजपुरी के - ["पढ़त -लिखत ": भोजपुरी आलोचना के कशमकश](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पढ़त-लिखत-भोजपुरी-आलोचना/) - भोजपुरी आलोचना में डॉ ब्रजभूषण मिश्र,डॉ विष्णुदेव तिवारी,डॉ सदानंद शाही आ डॉ बलभद्र के बाद डॉ सुनील कुमार पाठक एह सदी के तीसरा दशक में उभरत एगो आश्वस्तिदायक हस्ताक्षर बाड़न, हालांकि बहुत कम उमिर में ऊहां के भोजपुरी में एगो उभरत निबंधकार के रूप में आपन पहचान दे देले रहीं जब सन् 1985में"पाण्डेय योगेन्द्र नारायण - [ग़ज़ल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ग़ज़ल-4/) - भोर ले लोर अँखिया के खरचा भइल। रात भर मन ही मन उनके चरचा भइल। जेके रखनीं ए हियरा में आठों पहर, जाने कइसेदो मन ओकर मरिचा भइल। मन परीक्षा में हल खोजते रहि गइल, आँख उनकर सवालन के परचा भइल। कवनो पूरुब - पच्छिम के कमाई बा का, जे रहे हाथ पर खरचा - - [युद्ध के भट्ठी पर सिरजना के लेप](http://www.bhojpurisahityasarita.com/युद्ध-के-भट्ठी-पर-सिरजना-क/) - विध्वंस आ सिरजन एह सृष्टि रूपी सिक्का के दू गो पहलू लेखा बा। एक के दोसरा अलगा राख़ के देखल मोसकिल ह। मने अलगा-अलगा राखल भा देखल संभव नइखे। अब जवन कुछ संभवे नइखे,ओह पर कवनो बतकही बेमानी बा। बाक़िर एह घरी त पत्थर पर दूब्बा उगावे के पुरजोर परयास हो रहल बा। परयास देखउकी - [कजली मंजू मल्हार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कजली-मंजू-मल्हार/) - भोजपुरी लोक में तरह-तरह के गीतन के विधा बा। एहि लोक के कंठ में रचल-बसल एगो विधा के नांव बा कजली अथवा कजरी। भोजपुरी लोक जीवन खेती बारी प आधारित बेवस्था ह, आ खेतीबारी के चक्र आधारित बा मौसम बा रितुअन प। सुरूज़ जब उत्तरायन होखला के बाद आपन ताप से एह क्षेत्र के दहकावत - [सावन मास पावन आ मनभावन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सावन-मास-पावन-आ-मनभावन/) - सावन शिव के मास ह।पूरा लोक शिवमय हो जाला सावन में। चहुंओर बोल-बम, हर-हर महादेव के गूंज वातावरण में गूंजत रहेला। प्रकृति पार्थिव शिव पर जलाभिषेक करे खातिर बारिश के रूप में बरिसत रहेला।सावन चढ़ते हवा आपन रूख बदल देला। धूप आपन ताप प्रभाव कम कर देला। वातावरण में धूल उड़ल बंद हो जाला।सूखल जलाशय - [उरुआ के लभ मैरेज](http://www.bhojpurisahityasarita.com/उरुआ-के-लभ-मैरेज/) - एक बेरी के बात ह कि कैलाश मानसरोवर के एगो हंस के बियाह भइल त ऊ अपना मेहरारू हंसिनी से कहलस कि चले के बिहार घूमे. हंसिनी पुछलस कि ओहिजा देखे जुगुत का बा? तब हंस कहलन कि जवने बा तवने देखल जाई! फेर कहलस कि ओहिजा हिमालय नियन पहाड़ त नइखे, बाकिर कैमूर पहाड़ी - [भोजपुरी साहित्कारन के कुछ कटगरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्कारन-के-कु/) - हम ई पहिलहीं स्वीकार कर लेत बानीं कि हमरा कुछ ना बुझाला, एह से हम जवन कहबि ओकर कवनो माने-मतलब मत निकालब स। ई त बस आजु एकदमे कुछ बुझात ना रहुए त कुछ बुझाए खातिर कुछ बूझ कह देत बानीं, बाकिर हमरा निअर आदमी से ई आशा मत करब कि हमरा कबो कुछ बुझाई। - [अउवल दरजे वाली बकलोली](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अउवल-दरजे-वाली-बकलोली/) - का जमाना आ गयो भाया,इहवाँ त बेगार नीति आ बाउर नियत वाला लो सबहरे ‘अँधेर नगरी’ का ओर धकियावे खातिर बेकल बुझात बा। का घरे का दुअरे , का गाँवे का बहरे सभे कुछ ‘टका सेर’ बेंचे आ कीने क हाँक लगावे में प्रान-पन से जुट गइल बा। अइसन लोगन का पाछे गवें-गवें ढेर लोग - [ग़ज़ल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ग़ज़ल-3/) - चान अब त जहर तकले,निगलि जाता मानि लीं। रोज सूरुज एक रत्ती,पिघलि जाता मानि लीं।। हमरा जिनिगी में केहू के प्यार, शायद ना रहे। हरेक पल सभके मुखौटा,बदलि जाता मानि लीं।। एह शहर के आदिमिन्हि के,चाल क‌इसन हो ग‌इल? बहिनि-बेटिन्हि के करेजा,दहलि जाता मानि लीं।। जहां हर रिश्ता के एगो,मोल- मरजादा रहे। नेह-नाता ऊ पुरनका,ढहल - [मंगरुआ के मौसी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मंगरुआ-के-मौसी/) - मंगरुआ के मौसी मुँहझौसी ! कतों मुँह खोल गइल। ढेरे कुछ नु बोल गइल। नाड़ा के बाति भाड़ा के बाति उजरकी कोठी आ कलफ लागल कुरता दूनों के तोल गइल। ढेरे कुछ नु बोल गइल। कहाँ, के खोलल टटोलल ! कहाँ कतना मोल भइल। ढेरे कुछ नु बोल गइल। आजु मेजबान फेरु - [अब ना जगबा, त ओरा जइबा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अब-ना-जगबा-त-ओरा-जइबा/) - सिकुरत सिकुरत बचला मुट्ठी भर अब ना जगबा, त ओरा जइबा। पुरबुजन के नाँव हँसा जइबा॥ जे जे कांपत रहल नाँव से ओहन से अब कांपत हउवा। बीपत जब सोझा घहराइल भागत भागत हांफत हउवा॥ कतों बिलइला आ भाग परइला साँच बाति के कब पतिअइबा॥ अब ... कवन डर पइसल बा भीतरी जवना - [भोजपुरी भाषा के मान्यता खातिर बड़हर धरना प्रदर्शन के आयोजन भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-भाषा-के-मान्यता-ख/) - नई दिल्ली,भोजपुरी भाषा के संविधान का आठवीं अनुसूची में शामिल करावे खातिर ' भोजपुरी जन जागरण अभियान ' के बैनर तले जंतर-मंतर, दिल्ली पर 4 अगस्त,2024 के एगो बड़हर धरना प्रदर्शन के आयोजन भइल । जवना के अध्यक्षता प्रो.पृथ्वी राज सिंह कइलें। राष्ट्रीय अध्यक्ष डा.संतोष पटेल जोरदार ढंग से अवाज उठावतकहलें कि,' भोजपुरी के संगे - [‘बस्तर डाइरी’ के कुछ पन्ना ....’लाल गलियारा’ से लवट के](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बस्तर-डाइरी-के-कुछ-पन्न/) - बस्तर आपन प्राकृतिक खबसूरती के अलावे कला-संस्कृति के दुनिया में एगो खास जगह राखेला। हाल-हाल तक ई इलाका ‘नक्सली’ हिंसा के चपेट में रहे आ ‘लाल गलियारा’ के धुरी बनल रहे। हम रायपुर से रात के बस धर के भोरे बस्तर के मुख्यालय चहुंपनी। फजीरे फजीरे केनियों भटके के मन ना करत रहे तऽ बस - [परिवार के देल पगड़ी: खानदान के इज्जत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/परिवार-के-देल-पगड़ी-खानदा/) - बाप - दादा के नांव के आगे सिंह लागल रहे। सिंह के आपन एगो अलगे पहचान होला आपन एरिया में। आगे अउर बनल बाबू कुंवर सिंह नवाज देलन एगो अउर टाइटिल,नाम के आगे चौधरी लगाके काहे कि एक जंगल में दूगो सिंह ना रहे। अउर बनल चौधराहट के जोमे मातल खानदान धन के किनारे करि - [टुनटुन उर्फ पाब्लो पिकासो](http://www.bhojpurisahityasarita.com/टुनटुन-उर्फ-पाब्लो-पिकास/) - " ए टुनटुन भइया तनी हमरो गइया बना दा न ।" एगो साँवला, नाटा लइका के घेरले कुल लइकी-लइका चिरौरी -बिनती करत रहलन अउर एहर अपने कला के कॉपी में गाय के पोंछ के रंगे में लवलीन सिर झुकवले टुनटुन केहुए ओरी धियान ना देत रहलन।उनकर माथा तब्बे ऊपर भइल जब उजरकी गाय रंगाय -बन्हाय - [मैना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मैना/) - कबले रहबू परल अलोंता बेर भइल अब छोड़ऽ खोंता सोझां तोहरा आसमान बा देखऽ आंखि उघारऽ मैना अब त पांखि पसारऽ मैना ! कबों सांझि कबहूं दुपहरिया कबों राति डेरवावे अचके खरकि जाय पतई त सुतबित सांस न आवे बहुत ‌दिना अन्हियारा जियलू ना जाने केतना दुख सहलू सूरुज ठाढ़ दुवारे तोहरा बढ़िके नजर उतारऽ - [जीरो माइल बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जीरो-माइल-बा/) - गाँव घरे क बात करीं जनि, रिस्ता-रिस्ता घाहिल बा। सब कुछ जीरो माइल बा॥ पुस्तैनी पेसा ना भावत कहाँ गवैया नीमन गावत गीतकार क बात करीं जनि, इहाँ जमाते जाहिल बा। सब कुछ जीरो माइल बा॥ छोड़ि के आपन घर-गिरहस्ती बहरे हेरत फिरत हौ मस्ती मेहनत के बात करीं जनि, असकत सिरे समाइल बा। सब - [सुधि के मोटरी से कुछ-कुछ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सुधि-के-मोटरी-से-कुछ-कुछ/) - रउवा सभे के मालूम होखबे करी कि जिनगी के जतरा लइकई से गवें गवें आगु, बढ़त, जवानी के जीयत, अधेड़पन के संवारत बुढ़ापा के काटत एक दिन अंतिम जतरा पर निकल जाला। मनई के जिनगी में ढेर पल –छिन अइसन जरूर आवेला जवना के उ जोगा के राखलों चाहेला। भा ई कहल जाव के कुछ - [अति का भला न बोलना -----](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अति-का-भला-न-बोलना/) - का जमाना आ गयो भाया,सभे बेगर आगा–पाछा सोच के भोंपू पर नरियाये में जरिको कोर-कसर नइखे उठा राखत। मने कतों, कबों, कुछो जबरिये फेंक रहल बा। एह ममिला में सावन से भादों दुब्बरो नइखे। सुननिहारन के कत्तई अहमके बूझ रहल बा लोग । एहनी के केहू बतावहूँ वाला नइखे कि- ‘ उ जमाना लद गइल - [बगौरा तs बगौरे हs !!](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बगौरा-तs-बगौरे-हs/) - ए हे बगौरा ! तहार गजबे बा कहानी केहू कहेला- बड़हन -बड़हन बाग रहे एजवा एही से नाम पड़ल- बाग बड़ा -' बगौरा' बीच गाँव में बड़का एगो गढ़ गाँव के बहरी उत्तर से घूसे में बबुआ जी के कोठी दक्खिन आ पूरब के कोन बन्हले राम नारायन दास महंथ जी के मठिया पच्छिम आ - [अबाटी बंटी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अबाटी-बंटी/) - बंटी ... ना ना अबाटी बंटी ओह मोहल्ला में अइला के मात्र साते आठ दिन बाद बंटी अपना करतूत से ऐही नांवें जानें जाये लगलन। केहू के जगला के सीसा चेका बीग के फोर देस, त केहू के दुआर पर पानी से भरल बल्टी में माटी घोर देस, इ आएदिन के बंटी के काम रहे। - [डाला के साइत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/डाला-के-साइत/) - ‘‘का बबुआ, बारात के तइयारी भइल कि ना ? ’’ ‘‘हां भइया तइयारी त चल रहल बा. वैसे कलेवा के सामान सहेज के रखवा देले बानी. अब बिहौती सामान कीने के रह गइल बा.’’ ‘‘कवन-कवन सामान खरीदे के बा, जरा हमहूं त जानी बबुआ!’’ सवेरे सवेरे अपना मुंह में दतुवन के हुड़ा करत शिव रतन - [आइल चइत उतपतिया हो रामा!](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आइल-चइत-उतपतिया-हो-रामा/) - चइत के उतपाती महीना मस्ती के आलम लेले आ धमकल बा। कली-फूल के खिलावे के बहाना से बसंत अपना जोबन के गमक फइलावत चलल जा रहल बा। आम के मोजर में टिकोढ़ा लागि गइल बा आ सउंसे अमराई में टप-टप मधुरस टपकि रहल बा। कोइलरि के कुहू-कुहू के कूक माहौल में एगो अनूठा मोहक रस - [बिरहिनि के बेजोड़ भावाभिव्यक्ति हवे चैता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बिरहिनि-के-बेजोड़-भावाभिव/) - चइत महीना चढ़ते चारु ओर तनी चटक रंग लउके लागेला। एह तरे कहल जाव त चइता परेम के पराकाष्ठा के प्रस्तुति हऽ। परेम में मिलन, बिछुड़न, टीस, खीस के प्रस्तुति ह। जिनगी के अनोखा पल के अनोखा भावन के अभिव्यक्ति के प्रस्तुति ह। बिहार आ उत्तर-प्रदेश में चइत महीना में गावे वाला गीतन के चइता, चइती चाहे चइतावर कहल जाला। चइता में मुख्य रूप से चइत माह के वर्णन त रहबे करेला, ई शृंगार रस में वियोग के अधिकता वाला लोकगीत हवे। - [जिनिगी के छंद में आनंद भरि आइल रामा,चइत महीनवा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जिनिगी-के-छंद-में-आनंद-भरि/) - अइसे साल के बारहो महीना के आपन महत्व होला बाकिर साल के अंतिम महीना फागुन आ पहिला महीना चइत के रंग - राग आ महातम अनोखा बा।इहे देखि कहल जाला कि साल में से ई दूगो महीना फागुन आ चइत के निकाल देल जाय त साल में कुछ बचबे ना करी। फागुन आ चइत ना - [मसान- राग](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मसान-राग/) - आगे बाबूजी लगनीं पीछे हम छोटका भाई सबसे आगे जोर-जोर से घड़ीघंट बजावत चिल्लात चलत रहुए- "राम नाम सत है ।" राधामोहन के हाथ में छोटकी टाँगी रहुए कहत रहुअन- "चाचाजी जी एक सव एकवाँ नम्मर पर बानीं सएकड़ा त फागुये राय पर लाग गइल रहे हमार ।" बड़ गजब मनई हउवन राधामोहन ठाकुरो! गाँव - [चैता आ चुनाव](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चैता-आ-चुनाव/) - गज़ब हाल बा भाई! एक त चइत चहचहाइल बाटे आ मन,मनई,मेहरारू संजोग वियोग के चकरी में चकरघिन्नी भइल बाड़ें, ओही में ई चुनाव के घोषणा, मने धधकत आगि में घीव डला गइल। दूनों ओर जी हजूरी के तड़का, अब उ नीमन लागे भा बाउर। जिये के दूनों के पड़ी, मन से भा बेमन से। जब - [चइता गीतन पर एगो दीठी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चइता-गीतन-पर-एगो-दीठी/) - चइता, चैता भा चैती पुरवी उत्तर प्रदेश, बिहार आ झारखंड में चइत महीना में गावल जाये वाली एगो लोकगीत भा लोक शैली हवे। चइत महीना के हिन्दू पंचांग (कैलेंडर) से हिंदू लोग पहिल महीना मानल गइल ह अउर फागुन के अंतिम महीना। भगवान राम के जनम चइत महीना में भइल रहे। कहल त इहाँ ले - [बिलारी के भागे क सिकहर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बिलारी-के-भागे-क-सिकहर/) - का जमाना आ गयो भाया,अजबे खुसुर-फुसुर ससर ससर के कान के भीरी आ रहल बा आ कान बा कि अपना के बचावत फिरत बा। एह घरी के खुसुर-फुसुर सुनला पर ओठ चुपे ना रह पावेलन स। ढेर थोर उकेरही लागेलन स। एह घरी के ई उकेरलका कब गर के फांस बन जाई, एह पर एह - [तीन गो कविता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तीन-गो-कविता/) - १ कारगर हथियार कोर्ट - कचहरी कानून थाना - पंचायत कर्मकांड के आडम्बर धर्म आजुओ बनल बा आमजन के तबाही के कारगर हथियार सबसे बिगड़ल रूप में साम्प्रदायिकता साम्प्रदायिक तानाशाह के दरवाजे बइठ आपन चमकत रूप निरख रहल बिया कारगर हथियारन के बल बढ़ल आपन सौंदर्य के। २ छलवा विकास जमीनी स्तर पर कम कागज - [सजि गइल सगरो दोकान](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सजि-गइल-सगरो-दोकान/) - सजि गइल सगरो दोकान, चुनाव नगिचाइल बा। लउकsता निमने समान, चुनाव नगिचाइल बा। केहू बेचे सस्ता आ केहू देता घालू, केहू कहे दोसरा के सिरमिट में बालू, केहू के बिकाता खनदान, चुनाव नगिचाइल बा। केहू बेचे लसगर, केहू बेचे मयगर, केहू बेचे तरिगर, केहू बेचे जदुगर, केहू बेचे धरम-इमान, चुनाव नगिचाइल बा। - [करिखा पोतइलें](http://www.bhojpurisahityasarita.com/करिखा-पोतइलें/) - कुरसी के महूरत न भेंटइलें हो रामा, करिखा पोतइलें। तब नाही बुझनी माई मोर बतिया कुरसी पठवनी दोसरा के सेतिहा बनलो भाग आगी जरी गइलें हो रामा, करिखा पोतइलें। बोलिला दूसर बोला जाला दूसर सभही कहेला अब घूमी ना मूसर भदरा मोरे भागे घहरइलें हो रामा, करिखा पोतइलें। सभका हुलासे दुअरो अगराइल - [कौड़ी के तीन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कौड़ी-के-तीन/) - इहवाँ कइसन साज सजल हौ कइसन बनल जमीन। हाथ घवाहिल पंचर सैकिल हथियो बजावे बीन॥ आपौ के त छूटल पसीना जेल क अजबै सीन। दक्खिन वाले पीटें छाती सगरे फेल मसीन।। लालटेन क तेल ओराइल उधो सुधो गमगीन। भर दुनिया करे हथजोरिया का रसिया का चीन॥ अब्बो झाल बजावे पपुआ हव कौड़ी के तीन । - [फागुन फाग मचावै](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फागुन-फाग-मचावै/) - ओढ़ि बसंती चुनरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। गम गम गमके नगरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। ओढ़ि ----- फिकिर कहाँ फागुनी रंग के बनल बनावल अंग अंग के देखत झूमत डगरिया गुजरिया फागुन फाग मचावै। ओढ़ि ----- चढ़ल खुमार इहाँ अनंग के दरस परस आ साथ संग के मातल बहलीं बयरिया गुजरिया फागुन फाग - [धक् से लागल बात बावरी': लोकजीवन में गहिराहे धंसल कविताई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/धक्-से-लागल-बात-बावरी-लोकज/) - 'धक् से लागल बात बावरी' भोजपुरी के चर्चित कवि-गीतकार आ 'भोजपुरी साहित्य सरिता' मासिक पत्रिका के संपादक जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के कुल जमा पैंसठ गो कविता अवरू गीत के संकलन ह जेकर प्रकाशन सन् २०२२ में सर्व भाषा ट्रस्ट, नयी दिल्ली से भइल रहे । एह संकलन में छंदबद्ध आ मुक्तछंद दूनों के हुनर देखल - [फागुन के गोइयाँ, बसंत अगुवानी में](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फागुन-के-गोइयाँ-बसंत-अगुव/) - पुरनकी पतई झरे लगनी सन मने नवकी फुनुगी के अवनई के डुगडुगी बज गइल। अब डुगडुगी के अवाज सुनाइल कि ना, ई बिचारे जोग बात बाटे।बातिन के बिचारे खातिर समय होखे के चाही, सुने–देखे में त इहे आवता कि केहुओ के भीरी समय नइखे। सभे कतों ना कतों अझुराइल बा। अझुरहट सकारात्मक बाटे कि ना, - [हमार भउजी !](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हमार-भउजी/) - हमार भउजी शहर से आइल रही, गांव के रीत-रिवाज ना जानत रही. सब कुछ उनका खातिर नया रहे. एक से एक सवाल करटी रही. गांव के लइकी उनका के पटनहिया भउजी कहत रही सन. भउजी खाये-पीये के बड़ी सवखीन रही. भोजपुरी में अइसन अदिमी के खबूचड कहल जाला. भउजी ना जानत रही कि अनाज कइसे उपजे ला. फागुन के महीना रहे, होरहा-कचरी के - [गाछि ना बिरिछ आ सुझेला हरियरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गाछि-ना-बिरिछ-आ-सुझेला-हरि/) - पहिले चलीं जा गाँव घूम आईंजा।खेत - बधार के छोड़ीं महाराज घरे - दुआरे, आरे - पगारे, नदी - नाला के किनारे, मंदिर के अंगनइया, ताल - तलैया - नहर के पीड़ प,सड़कि के दूनों ओरि, कहे के माने जेने नजर दउराईं गाछि - बिरिछ, बाग - बगइचा लउकत रहे गँउवा में, धान- गेहूं- बूंट- - [जनावर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जनावर/) - अंडा बेचे वाली मनोरमा पहिले अंडा ना बेचत रही. उ एगो घरेलू महिला रही, जे अपना मरद भूलन आ बेटी आरती के साथे खूब बढ़िया से आत्मसम्मान के जिनिगी जीअत रही. बाकिर उनका शांत जीवन मे कोल माफिया कल्लुआ कवनों शैतान के माफिक घुस गइल आ उनुकरा हरा-भरा घर संसार के तहस नहस करके रख दिहलस. कोयलांचल में - [आपन भाषा, आपन सम्मान](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-भाषा-आपन-सम्मान/) - "अरे सुनतानी देर होता, जाइना स्टेशन, ना त गाड़ी आ जाई," कमला देवी कहली। "काहे हल्ला कइले बारू, जात त बानी, बुझाता की तहार बबुआ घर देखलही नईखन, गाड़ी से उतर जइहन त भूला जइहन," रामेश्वर जी तंज कसलन। "हम उ सब नइखी जानत, रउआ जाई जल्दी," खिसिया के कमला देवी कहली। "तहार बबुआ इंजीनियरिंग - [मतदान त अधिकार हउवे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मतदान-त-अधिकार-हउवे/) - भइया जगला के हवे दरकार मतदान त अधिकार हउवै॥2॥ अफवाहन के दूर हटा के आपन बुद्दि विवेक जगा के तहरा वोटS बनाई सरकार , मतदान त अधिकार हउवै॥ 2॥ भइया... छोड़ के सगरे काम चलS के लोकतंत्र के धाम चलS के जइते होखी परब गुलजार, मतदान त अधिकार हउवै॥ 2॥ भइया... हित-मीत - [मातृभाषा दिवस (२१ .२. २०२४)के अवसर पर एगो सारस्वत समारोह के आयोजन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मातृभाषा-दिवस-२१-२-२०२४के/) - विश्व भोजपुरी सम्मेलन, प्रांतीय इकाई (उ.प्र.) के तत्वावधान में मातृभाषा दिवस (२१ .२. २०२४)के अवसर पर एगो सारस्वत समारोह क आयोजन जीवनदीप एकेडमी, बड़ा लालपुर ,वाराणसी में साहित्य अकादमी के भाषा सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार आ पाती पत्रिका के संपादक डॉ अशोक द्विवेदी क अध्यक्षता में भइल। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में - [सरस्वती पूजा के आयोजन भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सरस्वती-पूजा-के-आयोजन-भइल/) - बलिया। बांसडीह रोड थाना क्षेत्र के तिखमपुर गांव स्थित एक कालोनी में अपरिमिता- साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान द्वारा वसंत पंचमी के अवसर पर एगो सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन कइल गइल।एह मौका पर माई सरस्वती के चित्र के समीप विधिवत पूजा अर्चना क के कार्यक्रम के शुभारम्भ कइल गइल। उहाँ गायिका सुनीता पाठक सरस्वती वन्दना - [अइसन गारी के गारी जनि जानी के बहाने लोक के बतकही](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अइसन-गारी-के-गारी-जनि-जानी/) - भोजपुरी भाषा के मधुरता आ मिठास से सभे सुपरिचित बाटे। भोजपुरिया लोक के विशिष्ट पहिचानो बाटे। कहल जाला कि विविधता जहां के पहिचान आ परिभाषा होखे,अइसन लोक के बाति बरबस मन के मोह लेवेले। लोक जवन अपने संगे अपने संस्कृति के संवारत आ संइहारत आगु बढ़ेला। ओकर बढ़न्ति ओकरे जीवंतता के पहिचान होले।ओह पहिचान के - [आदत से लचार आ मानसिक बेमार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आदत-से-लचार-आ-मानसिक-बेमार/) - का जमाना आ गयो भाया,साँच के साँच कहे भा माने में नटई से ना त बोलS फूटता, आ ना त बुद्धिये संग-साथ देत देखात बा। ऐरा-गैरा,नथ्थू-खैरा सभे गियान बघारे में लाग गइल बा।गियान के सोता चहुंओर से फूट-फूट के बहि रहल बा।अजब-गज़ब गियान, न ओर ना छोर बस बहि रहल फ़फा-फ़फा के। मने कतों आ - [सामाजिक संबन्धन के सघनता से जनमल साहित्य के सिरिजना करेवाला साधक द्विवेदी जी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सामाजिक-संबन्धन-के-सघनता/) - लोक संस्कृति किताब में लिखल बात ना होखे, जिनिगी के ऊंच - खाल राह में अविरल बहत रहेला। अपना परिवेश खातिर बोलल - लिखल - दरद के अनुभव कइल लोक के बात कइल ह। सामाजिक संबन्धन के सघनता के गर्भ से लोकवार्ता के जन्म होला जे अपना में - [स्मृति में बसल गाँव के कहानी के बहाने लोक-संस्कृति आ जिनिगी के बयान](http://www.bhojpurisahityasarita.com/स्मृति-में-बसल-गाँव-के-कहा/) - दो पल अतीत के ( मेरा भी एक गाँव है) हरेराम त्रिपाठी ' चेतन ' के हिन्दी में सद्य प्रकाशित पुस्तक जब हाथे आइल त ई जान के खुशी भइल कि एह संस्मरणात्मक कथेतर गद्य के माध्यम से एगो विद्वान भोजपुरिया आ उनुकर गाँव के नजदीक से समझे बूझे के मिली।दू दिन में किताब एक - [दू बून लोर बा आ हम बानी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/दू-बून-लोर-बा-आ-हम-बानी/) - 'सजग शब्द के रंग' हरेराम त्रिपाठी 'चेतन' के 94 गो कविता आ गीत-ग़ज़ल के संग्रह हs । एह संग्रह के पढ़त-गावत-गुनगुनावत हमनी के देख सकीला जा कि एकरा में जीवन, समाज, प्रकृति-संस्कृति के विविधवर्णी छवि के उरेहल गइल बा । चेतन जी के कविताई के अगर असली हुनर आ कमाल देखे के होखे तs एह - ['आपन आरा' के बहाने एगो खास दौर के शैक्षिक आ साहित्यिक पड़ताल:](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-आरा-के-बहाने-एगो-खास-दौ/) - घर परिवार से दूर, शहर के जिनगी में अपना के समायोजित करत कुछ बने के जद्दो-जेहाद आ ओह दौर में संपर्क में आइल साहित्यिक बिभूतियन के परिचय का संगे उनुका से ढेर कुछ सीखे-जाने के अरमान मन में जोगवले एगो युवा मन के दस्तावेज़ ह 'आपन आरा'।'आपन आरा' में लेखक अपने जीवन के एगो महत्वपूर्ण - [भोजपुरी के हिरामन गोलोक वासी भइलें](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-के-हिरामन-गोलोक-व/) - ख्यातिप्राप्त वयोवृद्ध कवि आ साहित्यकार पंडित हरिराम द्विवेदी जी अब हमनी का बीच नइखी । सोमार के उहां के अपना महमूरगंज मोती झील स्थित आवास पर अन्तिम सांस लिहनी। पंडित हरिराम द्विवेदी पिछिला आठ महिना ले गंभीर रूप से अस्वस्थ चलत रही। मूल रूप से मिर्जापुर के शेरवा गांव निवासी पंडित हरिराम द्विवेदी जी के - [राम मेरे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/राम-मेरे/) - अब गूँज रहल तेरो नाम, राम मेरे गलियन में। राम मेरे गलियन में, हो राम मेरे गलियन में।। अब गूँज रहल तेरो नाम, राम मेरे गलियन में।। बरीस पाँच सौ बीतल बहरा उहवाँ रहल दुसमन के पहरा अब नइखे कुछो गुमनाम, राम मेरे गलियन में। अब गूँज रहल तेरो नाम, राम मेरे गलियन में।। - [डॉ. बलभद्र: साहित्य के प्रवीन अध्येता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/डॉ-बलभद्र-साहित्य-के-प्रव/) - डॉ. बलभद्र के, अबतक भोजपुरी में लिखल कुछ महत्वपूर्ण आलोचनात्मक आलेखन के संकलन, उनकरा 'भोजपुरी साहित्य: हाल-फिलहाल' नाँव के क़िताब में कइल गइल बा। एह क़िताब के महत्व एकरा में आलोचित कृति आ कृतिकार के, मौलिक नज़र से निरखला-परखला के वज़ह से त बड़ले बा, ई एहू से महत्वपूर्ण बा कि एह में कुछ विधा - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-20/) - सजि रहे तोरण द्वार, राम मोरे आई रहे आई रहे , मुसकाई रहे, कि सजि रहे तोरण द्वार, राम मोरे आई रहे। कटल तम के अन्हियारी रतिया सभके हिय उनही के बतिया। दुअरे लागल कतार, राम मोरे आई रहे। कि सजि रहे तोरण द्वार, राम मोरे आई रहे। ई बनवास कई सदियन के - [आँखिन देखी ---](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आँखिन-देखी/) - गंवे गंवे भोजपुरी साहित्य के पठनीयता के मिथक टूट रहल बा,अइसन हम ना बजार कहि रहल बा। एकरा पाछे मुख्य कारण उपलब्धता आ विश्वसनीयता के मानल जा सकेला। डिजिटल युग एहमें अहम भूमिका निभा रहल बा। भोजपुरी के पुस्तक पहिलहूँ प्रकाशित होत रहनी स आ अजुवो प्रकाशित हो रहल बानी स। एह दिसाई साहित्यांगन आ - [हमार बड़का बाबूजी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हमार-बड़का-बाबूजी/) - दूबर पातर सरीर, लमाई छव फुट से कम न रहल होई,समय के पाबंद, साइकिल के सवारी क के कबों-कबों ईस्कूल मने किसान उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सैदूपुर तक के जतरा, अक्सरहाँ त पैदले चलत रहने । सोभाव के तनि कड़क, पढ़ाई के लेके हरदम जागल रहे वाला मनई रहलें हमार बड़का बाबूजी मने श्री रामदास द्विवेदी - [पाती रचना मंच आ विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अधिवेशन सम्पन्न](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पाती-रचना-मंच-आ-विश्व-भोजप/) - काल्ह दिनांक-16दिसम्बर2023के पाती रचना मंच आ विश्व भोजपुरी सम्मेलन के तत्वावधान में अधिवेशन सम्पन्न भइल जवना में " पाती अक्षर सम्मान", "भोजपुरी के बढत डेग" विषय पर विचार गोष्ठी आ काव्य गोष्ठी शामिल रहे। सर्व श्री दिनेश पाण्डेय ,शशि प्रेमदेव आ शिवाजी पाण्डेय 'रसराज' जी के "पाती अक्षर सम्मान" से सम्मानित कइल गइल। एकरा बाद - [भोजपुरी साहित्य सरिता के संपादक जे पी द्विवेदी के भोजपुरी पत्रकारिता खातिर सम्मान मिलल।](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्य-सरिता-के/) - 16 दिसंबर | जमसेदपुर (झारखंड) में चल रहल अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 27 वें अधिवेसन में 'भोजपुरी साहित्य सरिता' पत्रिका के संपादन का चलते 'पाण्डेय नर्वदेशवर सहाय' सम्मान पत्रिका के संपादक जे पी द्विवेदी के मिलल।ई सम्मान मंच से भोजपुरी साहित्य सरिता के सहायक संपादक डॉ रजनी रंजन जी के अभाभोसास के राष्ट्रीय - [धत्त मरदवा हाँले](http://www.bhojpurisahityasarita.com/धत्त-मरदवा-हाँले/) - इसक समंदर डूबि नहइला, धत्त मरदवा हाँले। का रहला आ का बनि गइला, धत्त मरदवा हाँले।। ओझा सोखा पीर मौलवी, तहरे से माँगे पानी खबर नबीसन के खातिर तू, बनला अधिका ज्ञानी। नुक्कड़ नुक्कड़ तोही जपइला, धत्त मरदवा हाँले। का रहला आ-------- डगर नगर में सभै सुनावे, तहरे रामकहानी आगे आगे महा गुरुजी,पीछे - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-19/) - अबकी नवरतिया मइया करतु एगो जुगतिया हो मइया मोरी करतु एगो जुगतिया कि छोड़ि हो देतु ना, अपने बब्बर सेरवा के मइया, छोड़ि हो देतु ना। छोड़तु त भले करतु आपन बब्बर सेरवा हो मइया मोरी आपन बब्बर सेरवा बाक़िर छोड़तु ओकरा ना, जयचंदवन के पिछवा मइया छोड़तु ओकरा ना। गद्दरवन के पिछवा मइया - [प्यार के भूखल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/प्यार-के-भूखल/) - दुनियाँ के चहलो-पहल में लोग प्यार के भूखल रहेला प्रेम के ईयाद करावेला गर्मी में पेड़न के छाँव, जाड़ा में कम्बल, बरखा के झींसी-बूनी अउर समय बीतलो पर नदी के बहाव के नियन घेरत प्यार के सुखद ईयाद। ओही प्रेम के इयाद करावेला माई के गोदी में सूतला के भूख अचके भेंटल बाबूजी के डांट - [पितर पख आ सराध](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पितर-पख-आ-सराध/) - पितर पख में पुरबुज लो के अतमा के शांति खातिर पूरे विधि-विधान से अनुष्ठान कइल जाला। पितर पख में तर्पण आ पिंडदान कइला से पुरबुज लो के असीस मिलेला। घर में सुख-शांति बनल रहेले। वैदिक परम्परा का हिसाब से हिन्दू धरम में ढेर रीति-रेवाज़, बरत, तेवहार मनावल जाला। हिन्दू धरम में जनम से लेके मिरतुक - [डॉ. ब्रजभूषण मिश्र होखिहें अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के सत्ताइसवाँ राष्ट्रीय अध्यक्ष](http://www.bhojpurisahityasarita.com/डॉ-ब्रजभूषण-मिश्र-होखिहे/) - जमशेदपुर। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, बिहार के राष्ट्रीय प्रवर समिति आ कार्य समिति के 24 सितम्बर, 2023 के ‘ तुलसी भवन ‘ जमशेदपुर ( झारखंड ) में भइल अत्यंत महत्वपूर्ण संयुक्त बैठक में निर्णय लिहल गइल कि भोजपुरी-हिन्दी के जानल-मानल साहित्यकार आ समीक्षक डॉ. ब्रजभूषण मिश्र सम्मेलन के सत्ताईसवां राष्ट्रीय अध्यक्ष होइहें। सम्मेलन के - [सतुआन के नवकी परिभाषा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सतुआन-के-नवकी-परिभाषा/) - का जमाना आ गयो भाया, ओह दिनवा जे भोपू पर नरेटी फार-फार के नरियात रहल, आजु काहें घिघ्घी बन्हा गइल बा। दुका-दुका दोहाई दिया रहल बा।समय के चकरी त चलते रहेले आ चलियो रहल बा। ओह चकरी के चकर-चकर में कई लो चौनिहा गइल बाड़ें।काहें भाय, अब का भइल ?अपना पर परल ह, त दरद - [केशव मोहन पाण्डेय "भारतीय भाषा सम्मान 2023" से नवाजल गइलें](http://www.bhojpurisahityasarita.com/केशव-मोहन-पाण्डेय-भारतीय/) - मन गद गद बा। देश के राजधानी दिल्ली में अध्यापन का संगे सर्वभाषा ट्रस्ट संयोजक, सर्वभाषा प्रकाशन के कर्ता-धर्ता, सर्वभाषा पत्रिका के संपादक आ भोजपुरी साहित्य सरिता के साहित्य संपादक केशव मोहन पाण्डेय के हिन्दी दिवस का दिने (मने 14 सितंबर) के काशी में हिन्दुस्थान समाचार भोजपुरी भाषा के क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान खातिर "भारतीय - [भुकभुकवा के राग भैरवी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भुकभुकवा-के-राग-भैरवी/) - का जमाना आ गयो भाया, लोग-बाग बेगर सोचले-समझले कुछो नाँव राख़ लेत बा आ फेर अपढ़-कुपढ़ लेखा गल थेथरई करे में लाग जात बा।फेर त अइसन-अइसन विद्वान लोग जाम जात बाड़ें कि पुछीं मति। अरथ के अनरथ आ अनरथ के अरथ के घालमेल में असली बतिये बिला जात बिया। अबरी त साँचों में असली मकसदे - [सुघर भूमि भारत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सुघर-भूमि-भारत/) - जहवाँ माई अँगने सुगना दुलारत सुघर भूमि भारत। तीन ओरियाँ सिंधु, एक ओर ह हिमालय कन-कन में राम, गाँव-गाँव में शिवालय उहवें के ऊंच भाल दुनियाँ निहारत सुघर भूमि भारत। मसजिद अजान, गुरुद्वारे गुरु बानी चर्च में बा प्रार्थना, बनता कहानी दुसुमन के दीठी पठावेला गारत सुघर भूमि भारत। भोरहीं से पवना - [अगिन बरिसे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अगिन-बरिसे/) - सावनों में दंवके सिवनवाँ अँगनवाँ मोरे, अगिन बरिसे। नीलहा अकसवा के बदरा रिगावे दिनवाँ में देहियाँ के लवरि जरावे सुसकेला खेतवा किसनवाँ अँगनवां -------- बिंयड़ा में धनवा क बियओ झुराइल पहिले जे रोपल,रोपलो मरुआइल बिरथा बा असवों रोपनवाँ अँगनवां------------- कइसे कहीं अब हुंड़रा के धवरल रसते में गोजर बिच्छी के पँवरल फुँफकारे किरवा क फनवाँ - [डा अमिता दुबे सर्वभाषा साहित्य सृजन सम्मान --2023 से सम्मानित](http://www.bhojpurisahityasarita.com/डा-अमिता-दुबे-सर्वभाषा-सा/) - प्रो रामदरश मिश्र उनके कृतित्व के भूरि - भूरि सराहना कइलें। • नई दिल्ली, 11 सितंबर, 2023. हिंदी के सुपरिचित कवयित्री कथाकार आलोचक डा अमिता दुबे के सर्वभाषा ट्रस्ट का ओर से सर्वभाषा साहित्य सृजन सम्मान से सम्मानित कइल गइल। ई सम्मान ट्रस्ट का ओर से प्रोफेसर रामदरश मिश्र अपना आवास पर भइल एगो सादा - [लोकउकितन में खेती के बात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लोकउकितन-में-खेती-के-बात/) - भारतीय सभ्यता में जीव के उत्पत्ति, बढ़वार आ विलयके सिलसिला में अन्न के अहमियत के पहचान असलियत के अनुभव के आधार प बा । तैत्तिरीयोपनिषद्(आनन्दवल्ली, दूसरा अनुवाक्) के कथन ह कि पृथिवी के आसरे जतिना जीव बाड़न ऊ अन्ने से पैदा होले, जीएले आ अंत में ओही में बिला जाले- “अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः - [जिनिगी गांव के : रोज जीए-मूवे वाला सुभाव के](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जिनिगी-गांव-के-रोज-जीए-मूव/) - --भगवती प्रसाद द्विवेदी बाबू! रउआं परदेसी हईं नू? जरूर देश भा सूबा के राजधानी में राउर दउलतखाना होई। बइठीं हमरा एह टुटही खटिया पर भा ओह मचान पर। कहीं, हम अपने के का सेवा करीं?--हम भला राउर का खातिरदारी कऽ सकेलीं साहेब! पहिले हाथ-मुंह धोईं आ लीहीं हई गुर के भेली,साथ में एक लोटा - [खेती-बारी : बेद से लबेद तक](http://www.bhojpurisahityasarita.com/खेती-बारी-बेद-से-लबेद-तक/) - डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल भारत एगो खेती-बारी करेवाला देश हटे। भारत का आबादी के एगो बड़हन हिस्सा आपन गुजारा खेती से करेला। एही से भारत में खेती-बारी के भोजन का देवता के दरजा दिहल जाला। साँच त ई बा कि भारत में रामायण आ महाभारत का पहिलहीं से खेती के काम हो रहल बा। लोग - [भोजपुरी के किसानी कविता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-के-किसानी-कविता/) - भोजपुरी के किसानी कविता पर लिखे के शुरुआत कहाँ से होखी-ई तय कइल बहुत कठिन नइखे।भोजपुरी के आदिकवि जब कबीर के मान लिहल गइल बा त उनकर सबसे प्रचलित पाँति के धेयान राखलो जरूरी बा ।ऊ लिखले बाड़ें-"मसि कागद छूयो नहीं कलम गह्यो नहिं हाथ।" मतलब भोजपुरी के आदिकवि कलमजीवी ना रहलें।ऊ कुदालजीवी रहलें।हसुआ-हथौड़ाजीवी रहलें।झीनी-झीनी - [खेतिहर अजुवो जस के तस बा ----](http://www.bhojpurisahityasarita.com/खेतिहर-अजुवो-जस-के-तस-बा/) - 'खेती बाढ़S अपने करमे', 'आगे खेती आगे-आगे, पाछे खेती भागे जोगे' जइसन कतने कहाउतन से भोजपुरिया लोक गह गह बाटे। बाक़िर कतों न कतों ई कुल्हि कहाउत कई गो बातिन के खुलासा करे क समरथ रखले बाड़ी स। पहिल बात ई कि भोजपुरिया समाज के अर्थव्यवस्था के रीढ़ खेती-किसानी आ पशुपालने रहल बा। कवनो दौर - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-18/) - झऊँसत बा देंहि सगरो झऊँसत बा मनवाँ करीं त का करीं। जरे धरती असमनवाँ सजनवा का करीं ।। गुम सुम भइल नाहीं बहेला पवनवाँ। छितरी प छितरी छूटे उग बुग मनवाँ।। बेनिया डोलावत चुनुकल हाथे के कङनवाँ सजनवा का करीं ।। दिनवाँ कटेला कइसो कटे नाहीं रतिया। अन्हारे धुन्हारे होला बहुते ससतिया।। छतवा तवेला अउसे - [कजरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कजरी-4/) - अबके बाँव न जाई सावन साँवरिया बदरिया भले कतिनो बरिसे। चाहे झिर झिर परिहें बूनी भीजे डहुंगी तर के चूनी सजना जाई उहवें देखि भरि नजरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे। चाहे कउंचे साँवर गोरी इचिको तके न हमरे ओरी अइबै ओढ़ावे बदै धानी चुनरिया। बदरिया भले कतिनो बरिसे। भउजी टुप टुप ताना - [बदल रहल सामाजिक मूल्यन के बीच बेकतीगत महत्वाकांक्षा खातिर संघर्ष के आईना:"जुगेसर"](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बदल-रहल-सामाजिक-मूल्यन-के/) - 'जुगेसर' जइसन कि उपन्यास के नाम बा,युग+ईश्वर =योगेश्वर के आम बोलचाल में भोजपुरी के सब्द के अर्थ स्पष्ट कर रहल बा यानी युगेश्वर 'जुगेसर' के रूप में भोजपुरी में स्वीकृत आ प्रयुक्त सब्द बा। ई कहे में हमरा इचको ना संकोच हो रहल बाटे कि उपन्यासकार श्री हरेंद्र कुमार 'जुगेसर 'सब्द के चुनाव कर के - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-17/) - रूठल रूठल बदरवा मनाई कइसे। गाई रगिया मल्हरवा सुनाई कइसे ।। उत्तर में बदरा हाथ जोड़ी लिहले, पछुवा बेयरिया गजब कई दिहले, भारी गरमी से जियरा जियाई कइसे ।।रूठल..... आजु रथ जतरा में रथवा खिंचाइल, कुछ कुछ बदरिया अकासे रहल छाइल, इचिको बरसल ना बदरा नहाई कइसे ।।रूठल..... रउवा त ठीक भइली - [बदरिया बरसे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बदरिया-बरसे/) - आइल बा बरसात संवरिया बदरिया बरसे गाँवे गाँव। धानन के खेतन में बाजे रुन झुन पाँवें पाँव। बदरिया बरसे... झूमत झुरकल बा पुरवइया कउवो कांवे कांव। बदरिया बरसे... बंसवरिया में बंसुरी के धुन चर मर छाँवे छाँव। बदरिया बरसे... पीपर पात मगन मन डोले बदरो धूप आ छाँव। बदरिया बरसे... - [बात बनउवल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बात-बनउवल/) - दुनियाँ में हम सबसे अउवल कविता हउवे बात बनउवल। गढ़ीं भले कवनों परिभाषा मंच ओर तिकवत भरि आशा गोल गिरोह भइया दद्दा साँझ खानि के पूरे अध्धा। कबों कबों त मूड़ फोरउवल। कविता हउवे..... कवि के कविता, कविता के कवि उनुके खाति कबों उपमा रवि अब त ज़ोर जोगाड़ू बाटै पग पूजी के - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-16/) - बिख उगे घमवा अषाढ़ महीनवां में, बरखा के आस नाहीं सुरुज धिकाइल बा। पोखरी तलइया में नीर नाहीं नदी सूखि, त्राहिमाम सगरो धरतिया सुखाइल बा। झन-झन झिंगुरा झनकि दुपहरिया में, पेड़वा क पतवा मुरुझि लरुआइल बा। दुबुकल चिरइया खतोंगवा में छांह खोजि, बचवन के सँगवा पियासल पटाइल बा। धनि-धनि बदरा ना लउके सपनवों में, पपीहा - [एगो पौराणिक उपन्यास 'तारक'](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एगो-पौराणिक-उपन्यास-तारक/) - सद्य प्रकाशित आदरणीय अग्रज 'मार्कन्डेय शारदेय' जी के पौराणिक उपन्यास सर्वभाषा प्रकाशन से भोजपुरी साहित्य जगत के सोझा आइल ह। ई कृति शारदेय जी के जीवंत लेखनी से प्रत्याभूत त बड़ले बा, संगही उहाँ के एह कृति के भोजपुरी के पुरोधा पाण्डेय कपिल जी के समर्पित कइले बानी। जब कवनों पौराणिक कथा कहानी के - [भोजपुरी भाषा आ साहित्य : एक नजर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-भाषा-आ-साहित्य-एक/) - जवना माध्यम से अपना विचार के लेन-देन होला, उहे भाषा ह। भारत में पैशाची,संस्कृत , पाली, प्राकृत आ अपभ्रंश के संगे-संगे चलत भोजपुरी हजारन बरिस पुरान भासा हS। प्राकृत आ अपभ्रंश से 12 वीं सदी आवत-आवत असमिया,बंगला,उड़िया, मैथिली,मगही,आ भोजपुरी के अलगा-अलगा रूप निखरल। - उनइसवीं सदी का अंतिम चरन में भाषा के भोजपुरी नाँव मिलल। - [एक सुझाव गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एक-सुझाव-गीत/) - धरती के सिंगार बिरना आवा सजावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के बचावा हो।। हरे हरे पेड़ होइहैं फैली हरियाली, हरषी सिवान देखि पूरब के लाली, उसर के नाम अब जग से मिटावा हो। पेड़वा लगाके यही भुइँया के...... सुंदर समाज बनी शुद्ध होई पानी, ताजी हवा से मिली मन के रवानी, एसी में सोवल - [पूरबी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पूरबी/) - पियवा के सुधिया सतावे भरि रतिया साँवर गोरिया रे। तलफत सेजरिया पर जाय। सेही सेजरिया सपनवाँ ना भावे साँवर गोरिया रे। सोचि सोचि बतिया लोराय। कवने कारन पिया छोड़लें बेगनवाँ साँवर गोरिया रे। क़िसमत के कोसी पछताय। जेपी के कहना बा ठाना ठनगनवाँ साँवर गोरिया रे। आपन पियवा लेहु न बोलाय। - [गुलबिया हो](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गुलबिया-हो/) - ना हमरा से नेह छोह ना रउरा से प्यार बा। फेरु गुलबिया हो, केकरा लग्गे सरकार बा। बुद्धू बकसवा में बइठ टर्राने केकरा खातिर पूछेलें फलाने केकरा साथ संगत के उनुका दरकार बा। गुलबिया हो...... केकरे ओठवा के नमी झुराइल बाति के सुनगुन से के बउराइल केहो छान-पगहा लिहले करत गोहार बा । - [ईयाद आवे गउवाँ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ईयाद-आवे-गउवाँ/) - शहर सपना अस, ईयाद आवे गउवाँ खेत, खरिहान अउर पीपर के छउवाँ ईयाद आवे गउवाँ॥ संगही ईयाद आवे, ईया के बतिया लइकन संगे खेललकी होला पतिया अचके मचल जाला जाये के पउवाँ। ईयाद आवे गउवाँ॥ शहर सपना अस, ईयाद आवे गउवाँ॥ संगही ईयाद आवे होरहा भुजलका खेतन के डांड़े भागत बेर गिरलका संझा - [बकरिया रे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बकरिया-रे/) - बकरिया रे तोर महिमा बा भारी गुन गावे खूबे संविधान सरकारी ! दुधवा जे पियेला उ बनेला महातमा दुनिया कहेला महामानव देवातमा आजु होला पठरुन के बलि बरियारी ! तोरे से आ तोरे खातिर तोरे लोकतंतर ज्ञानी जन दिने राति जपे इहे मंतर बाकिर तोरा घरवा के देवेलन उजारी ! तहरे के बेचि कीनि चले - [माई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/माई/) - पेट जारि के जिअवलू आपन बखरा खिअवलू , करनी अइसन कइलू कभों बिसराई ना केहू माई तोर करजा भरि पाई ना केहू । बहुते बेमार परीं हमहूँ नन्हईयाँ जोहलू न केहुके उठवलू कन्हईयाँ कोसनऽ ले जाई जा के लेहलू दवाई गुन गवला से कतनो अघाई ना केहू माई तोर करजा-- जड़वे त कोरवे में साटि - [ग़ज़ल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ग़ज़ल-2/) - प्यार नइखे गर जिया में, जिंदगानी डाँड़ बा । रौब झाड़े चढ़ उतानी, तब जवानी डाँड़ बा ।। लाज अउरी शान बाटे, आदमी में आब ही, बे-हायाई में मिलावल, यार पानी डाँड़ बा ।। दाग इज्ज़त में बिया, जिनके तनिक उनके बदे, लाल पीला या गुलाबी, रंग धानी डाँड़ बा ।। बाप आ भाई क - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-15/) - बेसुरा कुछ लोग,लय क चासनी लेके खड़ा बा शब्द के फींचे सुखावे अरगनी लेके खड़ा बा/ रेलगाड़ी के सफर में दूर से सीवान देखे आंखि पर ऐना चढ़ा के झिरखिरी से चान देखे दिनकेउजियारे दिया भर चांदनी लेके खड़ा बा/ ककहरा भर पाठ पढ़िके रोज भासा ज्ञान बांटे राह जे चीन्हें न जाने राह क - [हम नगर निगम बोलतानी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हम-नगर-निगम-बोलतानी/) - रात क मुरगा दिनही दारू लड़ी चुनाव अब मेहरारू काम धाम करिहें ना कल्लू मुँह का देखत हउवा मल्लू। जनता खातिर गंदा पानी हम नगर निगम बोलतानी। साफ सफाई हवा हवाई चिक्कन होखब चाप मलाई के के खाई, का का खाई इहो बतिया हम बतलाईं। जनता के भरमाई घानी हम नगर निगम बोलतानी। - [आपन बात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-बात-5/) - ईश्वर की सृष्टि के साथ मिले, त तनाव दूर होखे के सथहीं रचना में इहे आदमी के मूड के बेहतर करे के रसायन भी बन जाला। ई हमनी के शरीर के कोशिका सभन के भी पोषित करेला। । मानसिक स्वास्थ्य खातिर भी ई एगो टॉनिक होखेला। एहसे ऊर्जा, ताजगी, चैतन्यता के साथे जीवनशक्ति बढ़ जाला। - [सामाजिक आ राजनीतिक विद्रूपता के खिलाफ के स्वर: गोरख के गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सामाजिक-आ-राजनीतिक-विद्र/) - गोरख यानी गोरख पाण्डेय।हँ, उहे गोरख पाण्डेय जेकर गीत ' समाजवाद बबुआ, धीरे - धीरे आई ' आ ' नक्सलबाड़ी के तुफनवा जमनवा बदली ' गाँव के गली से दिल्ली के गलियारा तक अस्सी के दसक में गूंजत रहे। उहे गोरख पाण्डेय के गीतन पर हम इहाँ बात कइल चाहतानी। गोरख पाण्डेय के जीवन काल - [कलही मेहरिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कलही-मेहरिया/) - दूभर कइलस चलल डहरिया हो रामा कलही मेहरिया ॥ गाँव के रसता अचके भुलाइल जिनगी में उ जहिया से आइल भूल गइल अपनों सहरिया हो रामा कलही मेहरिया ॥ केहुके न छोड़लस एकहु बाकी कोना अंतरा गउंखा झाँकी ननदो पर ढारत कहरिया हो रामा कलही मेहरिया ॥ भाई भतीजन के देखते खीझे - [चइता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चइता/) - चईत महीनवा के सुभ सुदिनवा मंगल बाजेला बधईया हो रामा.. चईत महीनवा.. फुलवा खिलखिल झरले अँचरवा में , सूरुज हँसेले ठठाइके हो रामा.. चईत महीनवा.. कमल खिलाके हँसेले पोखरवा में पुरईन सजेली मोती मालवा होरामा .. चईत महीनवा..! अमवा के डलिया में छोट-छिन टिकोरवा , कोईली बोलेली टहकारवा हो रामा.. चईत महीनवा.. कटहर हुलसेला देखिके - [धरती पर उतरल बिहान](http://www.bhojpurisahityasarita.com/धरती-पर-उतरल-बिहान/) - बोलल चिरइया मड़इया का उपराँ सुनि सुनि उठलें किसान देखीं धीरे धीरे- धरती पर उतरल बिहान। पुरुवा पवनवाँ पोर पोर भीने बछरू बन्हल डिंड़िआय चमकत चनवाँ कहवाँ लुकइलें गइलीं तरइयो हेराय। मठ मन्दिर से भजनियाँ सुनाले रेडियो में जोर से अजान देखीं धीरे धीरे - धरती पर उतरल बिहान। बसिया परल रातरानी के महकिया पनघट - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-11/) - जिनिगी के जख्म, पीर, जमाना के घात बा हमरा गजल में आज के दुनिया के बात बा कउअन के काँव-काँव बगइचा में भर गइल कोइल के कूक ना कबो कतहीं सुनात बा अर्थी के साथ बाज रहल धुन बिआह के अब एह अनेति पर केहू कहँवाँ सिहात बा भूखे टटात आदमी का - [राजनीति कै इहै पहाड़ा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/राजनीति-कै-इहै-पहाड़ा/) - बता के पड़िया बांटा पाड़ा राजनीति कै इहै पहाड़ा जनता खातिर थूकल बीया अपने सोगहग भखा छोहाड़ा। बिना कमीशन बने न कुच्छौ शौचालय गऊशाला एकौ तन गयल आपन तल्ला तल्ला कोई बितावै नंगे जाड़ा। पईसा कहाँ गयल सरकारी के घुमत हव बईठ सफारी राजतन्त्र भी लज्जित बाटै बाजत दुअरे देख नगाड़ा। ब्लाक बीडीओ अउर सेकेटरी - [मन के बात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मन-के-बात/) - बाति कहीं कि ना कहीं बाति मन क कहीं मन से कहीं क़हत रहीं सुनवइया भेंटाई का? उमेद राखीं भेंटाइयो सकेला कुछ लोगन के भेंटाइलो बा कुछ लोग अबो ले जोहते बा, त बा सुनवइया मन से बा मन के बा जोगाड़ल बा बिचार करे के होखे त करीं के रोकले बा रोकल - [महेंदर मिसिर उपन्यास के बहाने उहाँ के व्यक्तिव पर एगो विमर्श](http://www.bhojpurisahityasarita.com/महेंदर-मिसिर-उपन्यास-के-ब/) - आगु बढ़े से पहिले कुछ महेंदर मिसिर के बारे में जान लीहल जरूरी बुझाता - महेंद्र मिसिर के जनम 16 मार्च 1888, काहीं-मिश्रवालिया, सारण, बिहार आ उहाँ के निधन 26 अक्टूबर 1946 । उहाँ विद्यालयी शिक्षा ना हासिल होखला का बादो संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी, भोजपुरी , बांग्ला,अवधी, आ ब्रजभाषा के विशद गियान रहे। - [मसाने में](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मसाने-में/) - शिव भोले हो नाथ, शिव भोले हो नाथ चलि अवता दिल्ली मसाने में। अवता त देखता दिल्ली के हालत दिल्ली के हालत हो दिल्ली के हालत सभे जूटल दारू पचाने में । शिव भोले हो....... अवता त देखता नेतन के हालत नेतन के हालत हो नेतन के हालत सभे जूटल ई डी से - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-14/) - महुआ मन महँकावे, पपीहा गीत सुनावे, भौंरा रोजो आवे लागल अंगनवा में। कवन टोना कइलू अपना नयनवा से।। पुरुवा गावे लाचारी, चिहुके अमवा के बारी, बेरा बढ़-बढ़ के बोले, मन एने-ओने डोले, सिहरे सगरो सिवनवा शरमवा से।। अचके बढ़ जाला चाल, सपना सजेला बेहाल, सभे करे अब ठिठोली, कोइलर बोले ले कुबोली, हियरा हरषे ला - [कईसन होला गाँव ?](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कईसन-होला-गाँव/) - हम त भूलाइये गइनी कईसन होला केहूँ गाँव जब से पसरल शहर में गड्ढा में गईलन सगरे गाँव न दिखेला पाकुड़ के पेड़ न चबूतरा, न खेत के मेड़ न बाहर लागल ईया के खाट न रौनक बचल मंगलवारी हाट न अब लईकन के कोई खेल बचपन ले गइल मोबाइल के रेल न - [अब कहाँ ऊ फगुआ-बसंत!](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अब-कहाँ-ऊ-फगुआ-बसंत/) - जनम कानपुर में भइल बाकिर लइकायी के दिन गाँवें में बीतल। लमहर परिवार रहे। दूगो तीन गो फुआ लोग के ससुरा जाए खातिर दिन धरा त दू तीन जनी के बोलावे खातिर। त हम लइका लोग के ठीक ठाक फ़ौज रहे। घर में जेतना लोग बहरा नोकरी करत रहे ओकर परिवार ढेर घरहीं रहत रहे। - [कुँवर सिंह के आखिरी रात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कुँवर-सिंह-के-आखिरी-रात/) - 26 अप्रैल 1858 के रात कुँवर सिंह के आखिरी रात रहे. तीन दिन पहिले 23 अप्रैल के 80 बरिस के एह घायल शेर के कटल हाथ पर कपड़ा बन्हाइल, ओकरा ऊपर से चमड़ा के पट्टा से ढ़ाल के बान्हल गइल, तिलक लगावल गइल. फेर त ई राजपूती तलवार अंगरेजन के गाजर-मूली के तरह काटल शुरू - [नेपाली आजी के दुख !](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नेपाली-आजी-के-दुख/) - चइत क घाम में साईकिल चलावत शिखा स्कूल से घरे चहुँपल त, पियास क मारे मुँह झुरा गइल रहे। तेज हवा रहे त बाकिर लूह लेखा गरम ना रहे, लेकिन हवा के बिपरीत साईकिल खिंचल एतना आसान न होखे। साईकिल दुआरी पर ठाड़ा करके जल्दी से घर मे घुसल त दुगो नया परानी के देख - [माटसाहेब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/माटसाहेब/) - माट साहेब के आवे से पहिले लइका सब इस्कूल गेट पर भीड़ लगा देत रहलन। माट साहेब आवते हाथ में बाल्टी उठा लेस।उनका पीछे सब बच्चा सब सफाई में लाग जात रहले। तनिके देर में इस्कूल के काया कलप हो जात रहे। फेर सब लइकन के सथहीं बइठा के ककहरा, पहाड़ा, कविता आ खेल सब - [आपन बात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-बात-4/) - अनघा भाव मन के उद्बबेगत बहुत कुछ कह जाला। उहे सब जब लेखनी में समा के कागज पर उतरेला तब सबकुछ नया नया लागेला। बीतल समय से बहुत सुन्दर चित्र मिलेला जवना में वर्तमान परिप्रेक्ष्य खुद हीं अपना के फिट पावेला आ ई मेल मन के खूबे भावेला।सुख, दुख,दया, अहम ,क्रोध आदि भाव साक्षात आपन - [अंगार पड़ गइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अंगार-पड़-गइल/) - का जमाना आ गयो भाया,आजु कल त सभे के सेस में बिसेस बने के लहोक उठ रहल बा। भलही औकात धेलो भर के ना होखे। सुने में आवता कि एगो नई-नई कवयित्री उपरियाइल बानी आ कुछ लोग का हिसाब से उ ढेर नामचीन हो गइल बानी । मुँह पर लेवरन पोत के मुसुकी मारल उहाँ - [बूड़ल बंस कबीर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बूड़ल-बंस-कबीर/) - 1 तीन तिरिखा- देह, मन के, तत्त्व के। रूप-रस-धुनि-गंध-परसन तीर रहलन सत्त्व सारा देह के, आदिम समय से। भटक जाला बेबसी में अनवरत मन, भाव के फैलाव-घन में। चिर तरासा अस बयापल तत्त्व के बुनियाद में, कन परस्पर डूब रहलन तिश्नगी में। के कही कि के पियासल- नदी-जल कि माछरी? बेअरथ जनि हँस कबीरा। 2 - [भोजपुरी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के 'काव्य कौस्तुभ' के मानद उपाधि मिलल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्यकार-जयशंक/) - हिंदुस्तानी अकादमी के भिखारी ठाकुर सम्मान से सम्मानित भोजपुरी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के 'काव्य कौस्तुभ' के मानद उपाधि से नवाजल गइल। साहित्य मंडल नाथद्वारा राजस्थान में आयोजित भगवती प्रसाद देवपुरा स्मृति एवं राष्ट्रीय बाल साहित्य समारोह ( 6 - 7 जनवरी 2023) के उहाँ के एह उपाधि से सम्मानित कइल गइल । - [बाढ़ का कहर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बाढ़-का-कहर/) - थमें ना लहरिया कइसे निकली बहरिया। लेवे ना किसनवन के केहू अब खबरिया।। आ○1 चुनउआ से पहिले वादा रहे बच बचाव के..2 अब जानी गइनी इ सब होता खाली नाव के..2 तकला पर आवे सगरो पनीये नजरिया...2 लेवे ना किसनवन के केहू अब खबरिया।। आ○2 मिले आश्वासन खाली होत नाही कुछ बा..2 नेता लोग के - [घर घर में रावण बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/घर-घर-में-रावण-बा/) - बनल आदमी आदमी के हीं मुश्किल। घर-घर में रावण बा मिले ना केहू संगदिल।। बनल आदमी.............................. आ○1 माई-बाप-भाई केहू लउकत ना खास बा..2 केहू के केहू पर ना तनिको विश्वास बा..2 गईल बा रुपइया देख सबका से हिल-मिल.. बनल आदमी.............................. आ○2 अखियां तरस गइल पावे ला सनेहिया..2 माटिए में मिल जाइ एक दिन इ देहिया..2 - [कवन ठगवा नगरिया लूटलस हो...](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कवन-ठगवा-नगरिया-लूटलस-हो/) - नगर निगम चुनाव प कुछ हमार निजी अनुभव, जरूरी नइखे कि रवुआ हमार बात से सहमत होखीं।आरा शहर प पिछिला कुछ दिन से नगर निगम चुनाव के खुमार चढ़ल बा. आज सांझी के 5 बजे जा के भोजपुरी-हिंदी के पैरोडी कानफाडू गीत आ डी जे के हल्ला बंद भईल. कबो शाहाबाद के मुख्यालय इ शहर - [भोजपुर में गाँधी के अइला के सै बरिस](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुर-में-गाँधी-के-अइला-क/) - मोहनदास करमचंद गाँधी के महात्मा के उपाधि तबे मिलल जब उ बिहार के धरती पर आपन गोड़ धरले। राजकुमार शुकुल से जिद से गाँधी जी चम्पारण अइले। गाँधी जी 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भाग लेवे आइल रहीं। एही अधिवेशन में शुकुल जी से पहिला मुलाकात भइल। शुकुल जी के बार बार आग्रह - [लगै कि फागुन आय गयल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लगै-कि-फागुन-आय-गयल/) - गायब पूष भयल बा भयवा, जइसे माघ....हेराय गयल। बहै ला पछुआ आन्ही जइसन, लगै कि फागुन आय गयल।। कइसो कइसो गोहूं बोवलीं, किल्लत झेललीं डाई कै, करत दवाई थकि हम गइलीं, खोखी रुकल न माई कै, मालकिन जी कै नैका छागल, कल्हिऐ कहूं हेराय गयल। बहैला पछुआ आन्ही जइसन, लगै कि फागुन आय गयल।। झंड - ['आखर-आखर गीत' आ भोजपुरिहा तड़का](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आखर-आखर-गीत-आ-भोजपुरिहा-तड/) - हमरा संगे रऊओं सब के मन खुश होई कि हमनी सब मिलि-जुलि के भोजपुरी भाषा के कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के कविता संग्रह "आखर-आखर गीत" में डुबकी लगावे वाला बानीजा। साहित्य कवनों भाषा में होखे,ओह में रस होला। रस होई,त तनी-मनी त होई ना,साहित्य के रस के औकात कवनो नदी लेखा होला,आ सांच कहीं - [अँगनइया लोटे बबुआ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अँगनइया-लोटे-बबुआ/) - अँगनइया लोटे बबुआ, लेहिंजा बलाइया हो अँगनइया लोटे बबुआ, लेहिंजा बलाइया॥2॥ लेहिंजा बलाइया हो लेहिंजा बलाइया अँगनइया लोटे बबुआ, लेहिंजा बलाइया।। अँगना भर, धुरिये फइलावेला मुँहे भरिके, देही लगावेला धुरिये से पोत लेला दूनों कलइया। हो अँगनइया लोटे बबुआ, लेहिंजा बलाइया। अँगनइया लोटे बबुआ, लेहिंजा बलाइया॥ पवते मोका, भागेला दुअरे सोचत आवे ना, - [गजियाबादी नगर निगम हौ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजियाबादी-नगर-निगम-हौ/) - लूट खसोट मचवलें प्रतिनिधि जन सुविधन पर गिरल सितम हौ। गजियाबादी नगर निगम हौ॥ मेयर की तो बात न पूछो लूट रहल सौगात न पूछो ठिकेदारन के ज़ेबा भइया इनका खातिर अति सुगम हौ। गजियाबादी नगर निगम हौ॥ निगम के पिछे कचरा के ढेरी लूटे खातिर लगत हौ फेरी शिकायत कइला पर भइया जिनगी ससुरी - ['साहित्य आज तक' के महोत्सव सम्पन्न](http://www.bhojpurisahityasarita.com/साहित्य-आज-तक-के-महोत्सव-स/) - 'साहित्य आज तक' के तीन दिन के समारोह बीत गइल।'साहित्य आज तक', भा 'आज तक' भा इंडिया टूडे ग्रुप के ई बहुते सुखद आ सराहे जोग पहल रहल। शुरुवतिए से जवन टीका-टिप्पड़ी चले लगल रहल, तवन अभियो चल रहल बा। कुछ लोग रजनीगंधा के स्पानसरशिप के लेके कार्यक्रम के क्रिटिसाइज करत देखाइल आ कुछ लोग - [सचहूँ; ‘फेर ना भेंटाई ऊ पचरुखिया’](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सचहूँ-फेर-ना-भेंटाई-ऊ-पचर/) - संस्मरण हिन्दी साहित्य के एगो अइसन गद्य बिधा ह जवन अपनी स्मृति प आधारित ह। कई बेर ई अत्यंत व्यक्तिगत भी होला आ सामाजिक चाहे राष्ट्र से जुडल भी। बाकिर केतनो व्यक्तिगत संस्मरण होखे, ई गद्य साहित्य के बिधा कहाला। जदि देखल जा त हिन्दी के संस्मरण लेखक लोग के एतना नाँव बा जे लिखल - [डॉ राजेश माँझी के संपादित पुस्तक के लोकार्पण सम्पन्न भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/डॉ-राजेश-माँझी-के-संपादित/) - *फ़ीजी उच्चायोग में 'फ़ीजी में हिंदी : विविध प्रसंग’, डॉ राजेश माँझी के संपादित पुस्तक के लोकार्पण सम्पन्न भइल जवना के संचालन के भूमिका रिंकल शर्मा जी निभावनी। पुस्तक लोकार्पण समारोह में महामहिम फ़िजी उच्चायुक्त श्री कमलेश प्रकाश जी, पापुआ गिनी के उच्चायुक्त , गुयाना के उच्चायुक्त श्री चरनदास परसुआद , मुख्य अतिथि विदेश मंत्रालय - [लोकतन्त्र के लास जरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लोकतन्त्र-के-लास-जरी/) - जब मनई मनई के आस जरी बूझीं, लोकतन्त्र के लास जरी। गली गली भरमावल जाई उलटबासी पढ़ावल जाई आइल फिर चुनाव के मउसम फुटही ढ़ोल मढ़ावल जाई। कवनो बहेंगा, फिरो गरे परी । बूझीं, लोकतन्त्र के लास जरी। लागत हौ दिन बदलल बाटे एही से अब लउकल बाटे जनता के हौ जनलस नाही - [हलिए आ रहल बा-'धक् से लागल बात बावरी'](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हलिए-आ-रहल-बा-धक्-से-लागल-बा/) - भोजपुरी के चर्चित कवि आ भोजपुरी साहित्य सरिता के संपादक जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के नया काव्य संग्रह 'धक् से लागल बात बावरी' प्रेस में जा चुकल बा। उमेद बा कि नवंबर 2022 में प्रकाशित हो के लोक में आ जाई। ई द्विवेदी जी के 5 वीं किताब बाटे। - [घरे-घर खुशियां मनाव,दीया खुशी के जलाव](http://www.bhojpurisahityasarita.com/घरे-घर-खुशियां-मनावदीया-ख/) - घरे-घर खुशियां मनाव,दीया खुशी के जलाव घरे-घर खुशियां मनाव, बात अब ई फइलाव धरा बचावे खातिर बबुआ,अब त तू आगे आव अब ना छोड़ बम पटाखा, कीरिया आज उठाव दुखियन के गले लगाव... दीया खुशी के जलाव घरे-घर खुशियां मनाव.......... ना खाएब ,मेवा मिठाई, ना खाएब बाजार के आपन घरे बनाएब आज,रोकब भ्रष्टाचार के बिजली - [हमहूं आजु दरिद्दर खेदब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हमहूं-आजु-दरिद्दर-खेदब/) - हमहूँ आजु दलिद्दर खेदब, घुमि घुमि सूप बजाइब हो।, कहियै कै सोवलि किस्मत बा, ओके आजु जगाइब हो।। सूप बजावत पुरखा लोगवा, बदहाली में मरि गइलैं, घुसुरल जवन दरिद्दर बइठल, हमरे माथे थरि गइलैं, पकरि के टेटा ओहि कुकुरे कै, गड़ही ले दउराइब हो।, कहियै कै सोवलि किस्मत बा, ओके आजु जगाइब हो।। जेकर नाँव - [फेर ना भेंटाई ऊ पचरुखिया के बहाने से :](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फेर-ना-भेंटाई-ऊ-पचरुखिया-क/) - पछिला कुछ बरिस में भोजपुरी में लेखन फेर से अँगड़ाई ले रहल बा। भोजपुरी में लेखन पहिलहूँ खूब भइल बा। हर विधा में थोर-ढेर किताब लिखाइल बाड़ी सन। चूँकि पठनीयता के अभाव आ कवनो सरकारी सहजोग के बेगर भोजपुरी के किताबन के उपलबद्धता के लेके सभे के सब कुछ पता बा। कारन इहे बा कि - [भोजपुरिया समाज में 'भिखारी ठाकुर' होखला के माने-मतलब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरिया-समाज-में-भिखार/) - एगो अइसन समाज जहवाँ लइका जनम का संगही पलायन अपना भाग के लिखनी में लिखवा के आवत होखे,जहवाँ आँख खोलते बाढ़, सुखाड़,गरीबी,भुखमरी आ अशिक्षा में सउनाइल समाज लउकत होखे,जात-पाँत, ऊंच-नीच, छुवाछूत, शोषण का संगे लइका बकइयाँ चलल सीखत होखे, जहां दू-जून के रोटी कुछे लोगन के समय से भेंटात होखे, जहवाँ लइकइयाँ से सोझे बुढ़ापा - [“बनचरी”: भाव भरल प्रेम कथा के बहाने मानव मूल्य के कृति](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बनचरी-भाव-भरल-प्रेम-कथा/) - आपन भाषा, आपन बोली भोजपुरी के संगे-संगे, अपना माती के सोन्हपने से भरल-पूरल कवि डॉ अशोक द्विवेदी के लेखनी से सिरजित भइल 'बनचरी' एगो अइसन कथा विन्यास ह, जवन पढ़निहार के अपना कथारस अउर रंग में सउन के पात्रन के संगे लिया के ठाढ़ क देवेला। एह उपन्यास के लिखनिहार के दीठि एह कृति के - [गँवई जिनगी का शब्द चित्र - काठ के रिश्ता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गँवई-जिनगी-का-शब्द-चित्र-क/) - जब कवनों उठत अंगुरी के जबाव बनिके किताब सभका सोझा आवेलीं सन,त ओकरा से सहज में नेह-छोह जुड़िये जाला। मन-बेमन से कुछ लोग सोवागत करेला, ढेर लोग ओहसे दूरी बनावे के कोसिसो करत भेंटाला। भोजपुरी भाषा के किताबन के संगे घटे वाली अइसन घटना के सामान्य घटना मानल जाला। अंगुरी उठावे वाला लोग अफनाये लागेलन। - [लोकजीवन मे रचल-बसल अघोर पंथ के मरम- रमता जोगी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लोकजीवन-मे-रचल-बसल-अघोर-पं/) - लोकजीवन आउर लोक संस्कृति के कतौ जब बात होखे लागेला, त चाहे-अनचाहे लोककवि लोगन के भुलाइल संभव ना हो पवेला।भोजपुरिया जगत मे अनगिनत लोककवि भइल बाड़ें, जेकर कहल-सुनल गीत-कविता लोककंठ मे रचल-बसल बाटे। पीढ़ी दर पीढ़ी चलल आवत संस्कार गीत एही के उदाहरण बाड़ी सन। भोजपुरिया समाज मे एह घरी लोककवि के बात करल जाव - [सोझ, सपाट आ सरल भाषा के कहानी संग्रह- अकथ प्रेम](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सोझ-सपाट-आ-सरल-भाषा-के-कहान/) - अपने माई भाषा भोजपुरी में आजु कहानी के सिरजना करे वाली महिला लेखिका लो अंगुरी पर गिने भर बाड़ी। त अइसना में डॉ रजनी रंजन के बारे में ई कहल कि उ भोजपुरी साहित्य जगत में पहिचान के मोहताज नइखी, अतिशयोक्ति ना कहाई। डॉ रजनी रंजन भोजपुरी कि साहित्यिक मासिक पत्रिका भोजपुरी साहित्य सरिता के - [कहल-सुनल माफ़ करिहा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कहल-सुनल-माफ़-करिहा/) - बंगड़ परेसान हो-हो खटपटिया गुरु के मकान क चक्कर काटत रहलन। कब्बो गेट के लग्गे जाके भित्तर झाँके क कोसिस करें कब्बो खिड़की के बंद पल्ला पर कान रोपें बाकिर कवनों आवाज़-आहट ना। दू तल्ला क बड़-बरियार मकान अइसन सून-सपाट रहे कि लगे बरिसन क उजाड़ ओम्मे वास ले लिहले ह। मानुस त मानुस चिरई-चुरुंग - [भाषा-साहित्य-संस्कृति के मोती: मोती बीए](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भाषा-साहित्य-संस्कृति-के/) - नब्बे-पार मोती बीए लमहर बेमारी से जूझत आखिरकार 18 जनवरी, 2009 के सदेह एह लोक से मुकुती पा लेले रहनीं। किशोरे उमिर (1934) से संग-साथ देबे वाली जीवन संगिनी लछिमी सरूपा लक्ष्मी देवी पहिलहीं 1987 में साथ छोड़ि देले रहली। बांचि गइल रहे उन्हुका इयाद में बनावल ‘लक्ष्मी निवास’, जहंवां हिन्दी, भोजपुरी, अंगरेजी, उर्दू के - [भोजपुरी में संस्मरण लेखन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-में-संस्मरण-लेखन/) - जब कवनो लेखक अपना निजी अनुभव के ईयाद क के कवनो मनई, घटना, वस्तु चाहें क्रियाकलाप के बहाने लिखेला त उ सब पाठक के मन से जुड़ जाला। पाठक अपना देखल-सुनल-भोगल समय-काल में ओह चीजन के, बातन के, जोहे-बीने लागेला। संस्मरण एगो अइसनके विधा ह, जवना के पढ़ के पाठक लेखक के लेखनी से एकात्म - [भोजपुरी साहित्य में प्रेम अउर सद्भावना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्य-में-प्रे/) - लोक में रचल-बसल भोजपुरी भाषा आ ओह भोजपुरी भाषा के मधुरता आ मिठास, अपना जड़ से मजबूती से जुड़ल समाज आ ओह समाज में पसरल रीति-नीति के आपन अलग विशेषता बाटे। अपने एही विशेषता के संगे अलग- अलग सोपान गढ़त, ओके सजावत-सँवारत, ओकरे भीतरि के सुगंध के अलग-अलग तरीका से अलग-अलग जगह बिखेरत भोजपुरी भाषा - [ठकुरान के ठसक](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ठकुरान-के-ठसक/) - विंध्य के पहाड़ियन के घाटी में बसल गाँव आ उहाँ के रहनिहारन के एगो अलगे सुघरई होले। पहुनई में त करेजा काढ़ि के रख देला लो, बाकि मोछ के बात आ गइल बेखौफ आर-पार करे खातिर उतर जाला लो। खेती- किसानी आ गोरू-बछरू से नेह छोह राखे वाला लो अपनइत नीमन से निबाहेला। अइसने एगो - [देयाद](http://www.bhojpurisahityasarita.com/देयाद/) - अलगाउज आँगना व्यथा औरी , मुंसुकी छाँटि व्यंग भर दौरी । मुँह बिजकल नियत बा खराब , घोर दुसुमन बनल देयाद बैरी । देयाद देयादी जरी भईल भौंरी , हर बात में हरदम जोरा-जोरी । दाजाहिसी देखजरूआ भईल , घोर दुसुमन बनल देयाद बैरी । ठेन बेसहेलन धूरी जेवर बरी , रेर हरदिन करे ढेरी - [धन पसु](http://www.bhojpurisahityasarita.com/धन-पसु/) - बहेंंगवा-लफंदर बन घूमत रहन , ई त आहे प ढेला ढोवत रहन , अब त दिन - दूना रात - चौगना , बबुआ बड़हन नेता बनी बढ़न । पीठे पोछ फेंकी पिलकईलन , सभकर सलाह चुतरे दबईलन , सुमति टेरि कुमति के दाता भई , आग-पाछ विचारवा भुलईलन । नेत-धरम पीठिअउरा कईलन , सभके पछाड़ - [सोहर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सोहर/) - घरवा में जनमेली बिटिया त , हिरीदा उमंग भरे हो। बबुनी तोहरा प सब कुछ नेछावर, सोहरियो सोहरि परे हो। बाबा खुशखबरी जे सुनले, धधाइ घरवा अइलन हो, बबुनी पगरी के पाग सोझ कइलन, मोछिया अइठी बोलेहो। गुरु जी के अबहीं बोलईबी, पतरा देखाइबि , ग्रह मिलवाइबि हो। बबुनी तुहीं मोरा कुल के सिंगार, सृजन - [निमिया के पात पर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/निमिया-के-पात-पर/) - निमिया के पात पर सुतेली मयरिया,ए गुंइया। क‌इसे करीं हम पुजनियां,ए गुंइया।। धुपवा जराइ हम ग‌इनीं जगावे,ए गुंइया। म‌इया का ना मन भावे, ए गुंइया।। गंगा जल छींटि छींटि,लगनी जगावे,ए गुंइया। म‌इया करो ना घुमावे,ए गुंइया।। अछत,चनन,छाक,ग‌इनी चढ़ावे,ए गुंइया। म‌इया का ना इहो भावे,ए गुंइया।। मालिनि बोला के कहनीं,मलवा ले आवे,ए गुंइया। म‌इया मूड़ी ना - [एगो चिरई गोहार लगावत रहत रहे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एगो-चिरई-गोहार-लगावत-रहत-र/) - हमनी अइसन नगर में बसे खातिर रहली जा सरापित जेहवाँ सलीका के ना बाँचल रहे केवनो पड़ोस सिरमौर बनि के रहे जिनगी में तटस्थता बिना केवनो काम के प्रतिरोध एह घरी खलिसा एगो रूप मानल जात रहे मूर्खता के जेकरा किछुओ भेंटा जात रहे ऊहे मानल जात रहे रसूख़दार पद पैरवी पुरस्कारे से आँकल जात - [पंडित हरिराम द्विवेदी होखला के माने मतलब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पंडित-हरिराम-द्विवेदी-हो/) - पंडित हरिराम द्विवेदी से हमार रिस्ता 12 पीढ़ी पुरान ह। कांतिथ के परवा गाँव से आइल कश्यप गोत्रीय 3 भाइन के एगो परिवार में से एक भाई के खानदान से उहाँ के बानी आ दोसरा भाई के खानदान से हमनी बानी। उहाँ के 11 वीं पीढ़ी में बाड़ें आ हम 12वीं पीढ़ी में। माने ठसक - [आपन बात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-बात-3/) - अझुरहट के सझुरावत ,रसता बनावत गवें-गवें आगु बढ़े के जवन तागत साहित्य से मिलेले उ कहीं अउर से भेंटाले कि ना, एह पर कुछ कहल एह घरी हमरा उचित नइखे बुझात। भोजपुरी साहित्य के धार के आपन बहाव ह,लहर ह,तरंग ह, हुहुकारल ह, फुफुकारल ह। ओही में आपन-आपन नइया लेके हिचकोला खात किनारा पहुँचे क - [बाप के माल ह](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बाप-के-माल-ह/) - इनकर उनकर सबकर दबा के हजम कइल रउरे चाल ह। बेसरमी से कहेलन बाप के माल ह। कुछो जोड़-घटा द इहाँ उहाँ के कुछो सटा द कुछ गूगल से उधार करS बाचल-खुचल अनुवाद करS फेर कतनों अनवाद करS थेथरई त ढाल ह। बाप के माल ह। एगो गिरोह बना ल कुकुर-बिलारो के मंच - [दुनिया त गोले नु बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/दुनिया-त-गोले-नु-बा/) - का जमाना आ गयो भाया, मजबूरी के लोग अपनइत बता रहल बा आ हाल देखि-देखि के थपरी बाजा रहल बा। कवनो मउसम विज्ञानी के रिमोट दोसरा के हाथ में थम्हावत देखल कुछ लोगन के अचरज में डाल रहल बा। ढेर लोग त देखि के चिहा रहल बा। कवनो मुँहफुकवना भिडियो बना के सोसल मीडिया पर - [शरद बहार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/शरद-बहार/) - आइल शरद बहार रे,आइल शरद बहार। पहरा बीति ग‌इल पावस के,लोग भ‌इल खुशहाल। ताल ताल पर कलरव उतरल,धरती भ‌इलि निहाल।। झलकलि पूरब ओर,भोर के गोरिया, दमकल भाल। चमकलि पांव पखारल मोती,गमकल मलल गुलाल।। हंसा चलल विदेसे,अइली ढेंकी बान्हि कतार रे।आइल शरद----।। झिर-झिर बहल जोमाइल नारा,लवटल नदी बिसास। सिहरल सून अरार,निछाने फूलल गह गह कास।। गुलगुल - [समाज कल्याण फेडरेसन ऑफ इंडिया भोजपुरी साहित्यकार के सम्मानित कइलस](http://www.bhojpurisahityasarita.com/समाज-कल्याण-फेडरेसन-ऑफ-इं/) - स्वतन्त्रता दिवस के पहिल संझा के समाज कल्याण फेडरेसन ऑफ इंडिया अपने एगो कार्यक्रम में गाजियाबाद के सुप्रसिद्ध भोजपुरी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के उनुका भोजपुरी के सतत सेवा खातिर सम्मानित कइलस। संस्था के अध्यक्ष जितेंद्र बच्चन जी कहलें कि जहाँ लोग शहर में जाते आपन मातृभाषा भुला जाला, उहें भोजपुरी क रेगिस्तान कहावे वाला - [अपनइत के काव्य गोष्ठी सम्पन्न भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अपनइत-के-काव्य-गोष्ठी-सम्/) - स्वतंत्रता दिवस के पूर्व संध्या पर एक काव्यगोष्ठी "अपनइत " (भोजपुरी संस्था) के तत्वावधान में हमरे आवास शास्त्री नगर गाजियाबाद में सम्पन्न भइल जेकर अध्यक्षता क भूमिका देस क जानल मानल प्रतिष्ठित कवि ,शायर, पत्रकार अ सम्पादक हम सबकर दुलरूआ अ चहेता भाई मनोज भावुक जी निभवलन। गोष्ठी के अध्यक्ष भाई मनोज भावुक जी मां - [राकेश पाण्डेय जी के चार गो गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/राकेश-पाण्डेय-जी-के-चार-गो/) - 1 पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। भींजे मोरी कोरी रे चुनरिया नु हो,नाहीं बाड़ें रखवार। पुरुवा के झोंकवा से सिहरे बदनियां। टप टप अंचरा से चूवे मोरा पनियां। आगि लगो कोठवा अंटरिया नु हो, नाहीं बाड़ें रखवार। पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। पिऊ पिऊ - [तोहरे बिगारल हवे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तोहरे-बिगारल-हवे/) - प्रेमी तोहरे सनेहिया के मारल हवे..2 नाहीं बिगड़ा ह तोहरे बिगारल हवे..2 आ॰1 तोहके अपनों से ज्यादा उ चाहत रहे...2 तोहरा से ओकरा जीनगी में राहत रहे..2 जननी ई सब त तोहार उतारल हवे..... नाहीं बिगड़ा ह तोहरे बिगारल हवे..2 प्रेमी तोहरे सनेहिया के मारल हवे..2 आ॰2 अब सनेहिया के नमवा से डर हो गईल..2 - [सावन -प्रेम गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सावन-प्रेम-गीत/) - सावन के महिना घेरले बदरिया बरसेला पनिया बीच रे आँगन में केहसे संदेसा भेजी केहु नइखे दुआरा पियउ भींजत होंइहे बीच पाँतर मे। आदारा ना हवे इहो हवे इहो हथिया बड़े बड़े बुनी पड़े धरकेला छतिया चमके बिजुरिया दूर गगन में पियउ भींजत होंइहे बीच पाँतर में। लगे तनी रहतें त पूछ लेले रहतीं संझिया - [बरसेला बदरा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बरसेला-बदरा/) - राखी बान्हेले बदरिया लरकेला बदरा गइली धरती जुड़ाय बरसेला बदरा पुरुवा बयरिया से पठवे सनेसा बितलें बरिस दिन जियरा अनेसा पउते पउते खबरिया हरसेला बदरा गइली धरती जुड़ाय बरसेला बदला मेंड़ ना देखात कहीं भरली कियारी छोटी छोटी गड़ही भेंटेली अकवारी सभके मिलाय के गरजेला बदरा गइली धरती जुड़ाय बरसेला बदरा बन्द होई गइली कोइलिया - [बरसि गइलैं बदरा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बरसि-गइलैं-बदरा/) - बरसि गइलैं बदरा,आजु मोरी गुंइयां। मनवा जुड़ा गइलै,महकल ई भुइयां।। आजु मोरी गुंइयां,बरसि गइलैं बदरा।। आजु मोरी गुंइयां,बरसि...... खेतवा सिवनवा में भरि गइलैं पानी, पोखरी सुनावे ले हंसि के कहानी, तलवा के जइसे,छुवल चाहे कुंइयाँ। आजु मोरी गुंइयां,बरसि...... पेड़वन के फुंनुगी पे नाचल बा बुनियाँ, पात पात झूमल बा चहँकल टहनियाँ, मछरी तलइया में,मारें कलइया। - [बतावा बुढ़ऊ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बतावा-बुढ़ऊ/) - काहें काशी पर मोहइला बतावा बुढ़ऊ। काहें आदि देव कहइला बतावा बुढ़ऊ। जाने के त सभ जानेला हउवा बड़का दानी भगतन खातिर कई जाला, बढ़-चढ़ के मनमानी काहें असुरन पर लोभइला बतावा बुढ़ऊ। जेकर अरजी तहरे लग्गे दुख ओकर भागेला दाही-दुसमन भूत-प्रेत, पानी सबही माँगेला काहें दसानन से लुटइला बतावा बुढ़ऊ। हम - [सावनी गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सावनी-गीत-2/) - पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। भींजे मोरी कोरी रे चुनरिया नु हो,नाहीं बाड़ें रखवार। पुरुवा के झोंकवा से सिहरे बदनियां। टप टप अंचरा से चूवे मोरा पनियां। आगि लगो कोठवा अंटरिया नु हो, नाहीं बाड़ें रखवार। पूरुब से आवेले बदरिया नु हो,जहां पिया जी हमार। पिऊ पिऊ बोलेला मोर पिछवरवां। निनिया - [सावनी गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सावनी-गीत/) - दिनवां धराइदा मोर सजनवां, सवनवां उदास लागे गोइयां। जहर बोले सगरो जमनवां, सवनवां उदास लागे गोइयां। संघे के सहेली सब करेलीं ठिठोली। कहिया तोहार होई बोलेलीं किबोली। नइहर में लागे नाहीं मनवां। सवनवां उदास लागे गोइयां। छतिया में हूक उठे घेरे जब बदरिया। केहू कहां छोड़ेला आपन गुजरिया। कधले देखइबा बस सपनवां। सवनवां उदास लागे - [रोपनी गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/रोपनी-गीत/) - खुश भईले इनर देवता आईल मनसून घरे नेवता अब बरसल खूब पनिया, चलऽचलऽ करे रोपनिया ना-- ---- मेध बरसे झमर-झमर चमके बिजुरिया , झामुर-झुमुर बियवा उखाड़े बियड़रिया, पसिनवा सुखावे हो तिरछी बेयरिया -- चलऽचलऽ करे रोपनिया ना ----- पियर-पियर बेंगवा के टर्र-टर्र स्वर लहरिया, केंकड़ा के झुण्ड देखीं अरिया-कगरिया, बकुला खोजन लागे डेड़िया मछरिया --- - [कजरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कजरी-3/) - भर सावन मोहे तरसइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना। कवना सउतिन में अझुरइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना। खेतवा फाटे अस फटे बेवइया बेहन सूखत जइसे मुदइया काहें असवों नाहीं अइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना। कइसे जीहें चिरई-चुरमुन बबुआ चलिहें कइसे ढुनमुन ई बुझियो ना सरमइला हो बदरु कहवाँ भुलइला ना। - [भुला गइला का..!](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भुला-गइला-का/) - बम्बई नगरिया,मोहा गइला का। नाहीं अइला बदरवा,भुला गइला का।। तलवा तलइया कै फाट गइलैं सीना, खेतवा टिबुलिया के छूटल पसीना, गउवांं से लागे, अघा गइला का। नाहीं अइला बदरवा,भुला गइला का।। डहके गगनवां अ सिसके धरतिया, सुलगे सिवनवां न आवे ले बतिया, कउनो गलइचा, ओंघा गइला का। नाहीं अइला बदरवा,भुला गइला का।। धुरिया उड़ावे ला - [याद कइल गइले कवि गीतकार 'सत्तन' जी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/याद-कइल-गइले-कवि-गीतकार-सत/) - सुखवा क ताना आ दुखवा क बाना हेरि-हेरि हारीं हेराइल बहाना संझा बिहान ओरहन भींज जाला मड़इया में मोर मन भींज जाला...'सत्तन' गत 19/07/2022 के साँझ के चार बजे से भोजपुरी के कवि-गीतकार स्व. सत्यनारायण मिश्र 'सत्तन' जी के पूण्यस्मृति में सत्तन सम्मान समारोह बार एसोशिएशन सिविल कोर्ट सभागार ,गोरखपुर में आयोजित भइल। कार्यक्रम के - [कजरी बिना सावनी बहार के](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कजरी-बिना-सावनी-बहार-के/) - नीक लागे नाहीं सावन क महीनवां ना। दिनवां धूप बरियार रतिया गरम बयार, बिस्तर भींजे तर तर चुवेला पसीनवां ना।।नीक0--- नइखीं बदरा देखात लउके निर्मल आकाश, चंदा केलि करे पसरी गगनवां ना।।नीक0-- बहे झोरि पुरवाई, रहिया धूर उधिराई, पानी बिना सून खेत ख़रिहनवां ना।।नीक0-- आइल सावनी सोमार धूप बाटे बेशुमार, ब्रत मा सुखल जाला पानी - [कजरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कजरी-2/) - असों बरखा ना भईल बरसात में , दिन चाहे रात में ना ।। बितल सूखले आषाढ़, घाम होखता प्रगाढ़ अगिया लागि गइल बा कूल्हिए जजात में दिन चाहे रात में ना।। बरिसल तनिको नाहीं अदरा , भींजल एको दिन ना चदरा जिनिगी आके फँसल बिया झंझावात में ... दिन चाहे रात में ना ।। बिया - [भिखारी ठाकुर प विशेष संगोष्ठी के आयोजन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भिखारी-ठाकुर-प-विशेष-संगो/) - बीएचयू के भोजपुरी अध्ययन केंद्र में आज "भोजपुरी की लोक संस्कृति और उसके लोक नायक" श्रृंखला के तहत भिखारी ठाकुर प विशेष संगोष्ठी के आयोजन भइल. एह संगोष्ठी के अध्यक्षता समन्वयक श्रीप्रकाश शुक्ल जी कइनी. जहवां विशिष्ट वक्ता के रूप में बलिया से आइल डा. शुभनीत कौशिक लोक संस्कृति आ भोजपुरी नाटकन के परंपरा प - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-13/) - खेतवा जोतात बा फरहरी बरिसत केनियो ना बदरी लागsता सुखार परी अबरी करजा कँपावताटे हड़री ! गरजत तड़पत कबो कबो आवत चमकत दमकत भागताटे धावत घामावा उगत बाटे चमवा जरावत सुबहे में लागsता दुपहरी ! ट्रेक्टर रोटोबेटर खेतवन के जोते घास पात साफ करे मटिये में गोते पूख असरेषावा प असरा बा लागल लगिहें लेवाड़ - ['अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन' के दिल्ली इकाई के गठन भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अखिल-भारतीय-भोजपुरी-साहि/) - दिल्ली। 'अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन' भोजपुरी साहित्य के संवर्धन-संरक्षण के क्षेत्र में काम करे वाली सबसे पुरान संस्था ह। एह संस्था से अनेक वरिष्ठ साहित्यकार लोग जुड़ रहल बा। एह संस्था के 21 वां अधिवेशन पिछला 26-27 फरवरी के बिहार के मोतिहारी में भइल। अधिवेशन सम्मेलन के नया कार्यकारिणी के गठन भइल आ ओही - [सुनीं ना अरज मोरे भइया हो](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सुनीं-ना-अरज-मोरे-भइया-हो/) - भोजपुरी कविता प जब बात होई त भोजपुर के भोजपुरी कविता प जरूर बात होई भा होखे के चाहीं। भोजपुर के जमीन भोजपुरी कविता खातिर काफी उपज के जमीन ह। भोजपुर के भोजपुरी कविता के एगो महत्वपूर्ण पक्ष ह ओकर जनधर्मी मिजाज। सत्ता से असहमति आ जन आ जन आंदोलन से सीधा संवाद। रमाकांत द्विवेदी - [मय सिवान के चोली-चूनर धानी लेके](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मय-सिवान-के-चोली-चूनर-धानी/) - ए. बी.हॉस्टल, कमच्छा, वाराणसी में रहत समय अकसरहां सांझ के कवनो ना कवनो टॉपिक प चरचा छिड़िए जात रहे। सारंग भाई (स्व. सुरेंद्र कुमार सारंग) एह चरचा के सूत्रधार होत रहलें। एही तरे एक दिन चरचा होये लागल भोजपुरी के कवि जगदीश पंथी के एगो गीत प। ऊ गीत रहे- 'रुनुक झुनुक बाजे पायल तोहरे - [मंतोरना फुआ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मंतोरना-फुआ/) - बुचिया के छुट्टी ना मिलल एहि से मंतोरना फुआ के अकेले जाए के पड़ल।एसे पहिले जब कहीँ जायेके होखे त केहू न केहू उनके संगे रहे।एदा पारी फुआ एकदम अकेले रहलीं बाकी गांवें जाये क एतना खुसी रहे कि उनके तनिको चिंता न रहे। आराम से गोड़ फइलवले पूरा सीट छेंकले रहलीं। "दादी जरा साइड - [बेकहला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बेकहला/) - " ए बचवा हई मोबईलवा पर का दिनवा भर टिपिर-टिपिर करत रहेला।कवनो काम -धंधा ना ह का तोहरे लग्गे आंय।" बेकहला बोलत-बड़बड़ात बचवा के गोड़तारी आके करिहांय धय के निहुर गइलीं। " तू आपन काम करा न , काहें हमरे फेर में पड़ल रहे लू।अबही जा इँहा से हमार दिमाग जिन खा। " आछा-आछा हमरे - [गंगा महिमा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गंगा-महिमा/) - गंगा के महिमा दुनिया में, सबसे बड़ा अनमोल हगंगा में जे डूबकी लगावे,पाप ओकर सब गोल हगंगा के महिमा........ मोक्ष देवे के खातिर गंगा, लेले बारी अवतारपर परदूषण से दुखी बारी, देख तनी विचारअमरित जस गंगा जल में,कचरा के मिलत घोल हगंगा के महिमा........ धरती पर जब अइली मईया,मोक्ष के खुलल दुआरभागिरथ के सब पुरखन के, तब - [रोवतारी माई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/रोवतारी-माई/) - सखी सहेली खड़ा,बाड़ी कतार में, रोवतारी माई , धके अकवार में। नईहर छोड़ी जब, ससुरा में जाली, फेड़ से लागे जस ,टूट गइल डाली। बरसो के रिश्ता, तोड़ी एक बार में.. रोवतारी माई , धके अकवार में। सुसुकी-सुसुकी माई,लोर बहावेली, बेरी,बेरी बेटी जरी,घूमी के आवेली। भरे ना जियरा ,मिले से एक बार में.. रोवतारी माई - [ए बदरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ए-बदरी/) - सुखि गइलें पोखरा आ जर गइलें टपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । बनरा के पेट पीठ एक भइलें घानी । कहा काहें होत बाटे राम मनमानी । गोरुअन के बेटवा क पेटवा ह खपरी , ए बदरी । कउना बात पे - [समइये गुरु ह समइये ह चेला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/समइये-गुरु-ह-समइये-ह-चेला/) - समइये गुरु ह समइये ह चेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । लहर जाला झंडा केहु के अकासे केहु हाथ मल के रहेला उदासे समइये घुमावेला सुख दुख के मेला समझ नाहीं आवे समइया के खेला । बिना मंगले देबेला बड़का खजाना मंगला पर मिले न चाउर के दाना कहां केहु के कुछो वश - [धनवा-मुलुक जनि बिआह हो रामा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/धनवा-मुलुक-जनि-बिआह-हो-राम/) - भोजपुरी कविता में महिला कवि लोग के उपस्थिति आ ओह लोग के कविता पर विचार, आज के तारीख में एगो गंभीर आ चुनौतीपूर्ण काम बा। एह पर अब टाल-मटोल वाला रवैया ठीक ना मानल जाई। भोजपुरी के लोकगीत वाला पक्ष हमरा नजर में जरूर बा। लोकगीत के अधिकांश महिला लोग के रचना ह, भले केहू - [खेलगीत के तर्ज प](http://www.bhojpurisahityasarita.com/खेलगीत-के-तर्ज-प/) - 'तीन तलक्का' नवगीत ओम धीरज जी के भोजपुरी गीत-संग्रह 'रेता पड़ल हिया में' में संकलित बा। ओम जी हिंदी आ भोजपुरी में गीत लेखन में सक्रिय बाड़न। ऊ उत्तर प्रदेश शासन के वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी रहलें। सेवामुक्त होके बनारस में रह रहल बाड़न। बचपन के खेलगीत 'ओक्का बोक्का तीन तड़ोका' के तर्ज प रचल एह - [ग़ज़ल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ग़ज़ल/) - आ गइल बा प्रेम के दिन, दिल भइल कचनार अब, फेर जनि आपन नजरिया, नैन कर तू चार अब। खेत में सरसों फुलाइल, रंग हरदी के लगल, लाज से धरती लजाइल, हो गइल बा प्यार अब। प्रीत-चुनरी ओढ़ के जे, डूब गइली प्यार में, गीत मस्ती के पवनवा, देत बा उपहार अब। आम के मोजर - [बोल बचवा – कुछो बोल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बोल-बचवा-कुछो-बोल/) - कुछ दिन से दादा जी बहुत याद आवत बाड़न। जब भी पुरान बात अतीत के सोचीला, ओकरा में दादा जी जरूर शामिल होखेलन। छुट्टी में जब भी शहर से दादा जी के पास जात रहनी, खूब बतकूचन होखे। हमरा से भर पेट तरह-तरह के बात पूछस। एके बतिया के घुरपेट के आगे बढ़ावत रहीं जा। - [लोक-परलोक के संघतिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लोक-परलोक-के-संघतिया/) - दुलारी देवी के सज्जन सिंह से बिआह भइला 40 बरीस खुल के ना बोल पावत रहली आ ना उनुका से नजर मिला सकत रहली। उनकर खड़ाऊँ के खटर खटर सुनऽते उनकर घूघ नाक तक आ जात रहे। सज्जन सिंह से ऊ कुछुओ बोलऽतो बतिआवत रहली कि ना कहल मुसकिले रहे। सज्जन सिंह बड़ी दम-खम वाला - [चन्द्रेश्वर के 'हमार गाँव': हमरो गाँव](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चन्द्रेश्वर-के-हमार-गाँव/) - भोजपुरिया माटी उहो गंगा के किनार के पलल बढ़ल हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.चन्द्रेश्वर के भोजपुरी के कथेतर गद्य 'हमार गाँव' पढ़ के लागल कि रोजी- रोटी के तलाश में शौक भा मजबूरी में भले गाँव छूट जाला ,देह से भले दूर चल जाला बाकिर मन में गाँव मुए ना,मन से ऊ गाँवे के रहेला। - [गोरखनाथ: धीरे धरिबा पाँव](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गोरखनाथ-धीरे-धरिबा-पाँव/) - अठवीं से लेके बरहवीं शताब्दी ले चौरासी सिद्ध लोग अपभ्रंश में कविता करत रहे ।सिद्ध लोगन के कविता में भोजपुरी शब्द आ क्रिया रूप मिलल शुरू हो गईल रहे। चौरासी सिद्धन में सबसे प्रसिद्ध रहलें सरहपा । उन कर एगो कविता देखल जां –नगर बाहर रे डोंबि तोहारि कुडिया/छोड़- छोड़ जाई सो बाभन नाड़िया /आलो - [नदी के लाश बेहतर बा गुरूजी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नदी-के-लाश-बेहतर-बा-गुरूजी/) - बहत हर आदमी धारा में लेकिन किनारा पा सकल ना आज तक भी , सहारा अब कहां पाईं, भेटाई इशारा कर रहल इतिहास तक भी । खुदी के हाथ पर विसवास राखी ओही के आखिरी पतवार बुझी। नदी के लाश बेहतर बा गुरूजी। नदी के लाश,,,,,,,,, । नियम कानून कऊनो ना बनल ह कि - [सम्पादन टीम](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सम्पादन-टीम/) - संरक्षक रामप्रकाश मिश्रा, अकोला उपाध्यक्ष महाराष्ट्र प्रदेश, भाजपा (उत्तर भारतीय मोर्चा) अशोक श्रीवास्तव (गाजियाबाद) अनामिका वर्मा (भोपाल) प्रकाशक आ सम्पादक जे. पी. द्विवेदी (गाजियाबाद) कार्यकारी सम्पादक डाॅ. सुमन सिंह (वाराणसी) साहित्य सम्पादक केशव मोहन पाण्डेय (दिल्ली) सहायक सम्पादक डाॅ. ऋचा सिंह (वाराणसी), सुनील सिन्हा (गाजियाबाद), डाॅ. रजनी रंजन (झारखंड) सरोज त्यागी (गाजियाबाद) सलाहकार सम्पादक मोहन - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-12/) - हो घेरलस करिया बदरिया, रोपनी के सुतार आ गईल। बहे लागल पुरवा बयरिया, हमनी के बहार आ गईल। जइसे उड़े सड़िया अचरिया, गछियन के लहार आ गईल। रोपे चलस गोरिया संवरिया, पायलन के झंकार आ गईल। झमर झमर बरसे बुनरिया, छातवो में फुहार आ गईल। कड़कड़ाए चमके बिजुरिया, लुकाएके ओहार आ गईल। गावे के गीतवा - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-11/) - मन सून-सून मनसून बिना। अबले ताले कमल खिलल ना तन लागेला खून बिना। एक तऽ अदिमी अइसे जरना हिया भरल अंगार ऊपर से सूरुज दहकावे हो के माथ सवार भाव बिना सूनी कविताई खत सूना मजमून बिना। नदी मात के छाती सूखल भूखे शिशु छपटाय पेड़ लता के बाँचल ठठरी कब जाने भहराय जोजन भर - [रहे इहाँ जब छोटकी रेल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/रहे-इहाँ-जब-छोटकी-रेल/) - देखल जा खूब ठेलम ठेल रहे इहाँ जब छोटकी रेल चढ़े लोग जत्था के जत्था छूटे सगरी देहि के बत्था चेन पुलिग के रहे जमाना रुके ट्रेन तब कहाँ कहाँ ना डब्बा डब्बा लोगवा धावे टिकट कहाँ केहू कटवावे कटवावे उ होई महाने बाकी सब के रामे जाने जँगला से सइकिल लटका के बइठे लोग - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-10/) - जादू बा सरकार , रउरी ऑखिन में, डूबल बा संसार , रउरी ऑखिन में, निरमल ताले कमल फुलाइल लागता, लाल- लाल चटकार , रउरी ऑखिन में। अमिय, हलाहल, मदिरा के प्याली हउवे, जिअल, मुअल, मॅझधार , रउरी ऑखिन में। उषा के लाली कि बारल दुइ दियरा, जगमग जोति पथार , रउरी ऑखिन में। सूरज, चंदा - [चमकत चनरमा के जोती](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चमकत-चनरमा-के-जोती/) - आज हम बड़ा खूस बानी।पूछ काहे ???? हमरा ग‌ऊंआ में एगो बियाह बा।मलिकाइन कीहां...क दिन निमन से ख‌ईला भ‌ईल बा।अजुए राति ओही जा जाएम। पहिले से ना जाएम त ओहू जा बड़ा मारामारी बा।अधेसरा,नौलखिया,बटुलिया,सिकनरा..पहिलही से बोरा-झोरि ले के ब‌ईठल रहेले सन।सुने में आईल ह कि मछरी के भोज-भात बा।केतना मूड़ा पछिला बेर बिगाईल रहे।दू दिन - [बनउवा रूप तहरा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बनउवा-रूप-तहरा/) - दहके पलास फूल जिया डहकावे हो। बनउवा रूप तहरा हमरा ना भावे हो॥ सोरहो सिंगार ओढ़ि ललखर चुनरिया गाँव नगर होत आइल सइयाँ दुअरिया गोरिया के नखरा जिया ललचावे हो। बनउवा रूप----- घर अँगनइया में धप-धप अँजोरिया टटके सजल बाटे ललकी सेजरिया गजरा गुलाबी गोरी जिया बहकावे हो॥ बनउवा रूप----- रूसियो के - [बरम बाबा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बरम-बाबा-2/) - राउर महिमा रउरे जानी हम ना जानी मरम बाबा का का गाईं बरम बाबा॥ रउरे किरपा सोनरा के घर पसरल मजगर उजियारी पूजन अरचन करि करिके दीहलस कुलवा तारी। जियत जिनगी करम करत मानि आपन धरम बाबा। का का गाईं बरम बाबा॥ पहिले दिनवाँ कटत रहे जइसे तइसे,बाँची पतरा तहरे दीठि से - [अपनइत के गठन आ पहिल काव्य गोष्ठी सम्पन्न भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अपनइत-के-गठन-आ-पहिल-काव्य-ग/) - एक संकल्प,एक उद्देश्य, एक समर्पण अ एक सुखद प्रयास बा अपने माई भाषा भोजपुरी के मान मर्यादा, समृध्दि अ विकास बदे समर्पित संस्था बा । काल क दिन भोजपुरी अ भोजपुरियन बदे एक ऐतिहासिक दिन रहै काहे से कि काल्ह गाजियाबाद में भोजपुरी बदे समर्पित अ संकल्पित एक संस्था "अपनइत" क गठन गइल गयल जवने - [भउजी देह अंइठली अउरी फागुन आय गइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भउजी-देह-अंइठली-अउरी-फागु/) - फगुआ! आहा! चांद-तारा से सजल बिसुध रात छुई-मुई लेखां सिहरता. सोनहुला भोर मुसुकाता. प्रकृति चिरइन के बोली बोलऽतिया. कोयल कुहुक के विरहिनी के जिया में आग लगावऽतिया. खेत में लदरल जौ-गेहूं के बाल बनिहारिन के गाल चूमऽता. ठूंठो में कली फूटऽता. पेड़ पीयर पतई छोड़ हरियर चोली पहिर लेले बा. आम के मोजर भंवरन के - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-10/) - मुदित मगन मन देखे बलजोरी , खेलतारे राम राजा सिया संग होरी। नगर अयोध्या झूमे झूमे त्रिभुवन हो , झूमे कैलाश शिव शक्ति के गन हो । राधा मगन कान्हा गोकुला के गोरी , खेलतारे राम राजा सिया संग होरी । ब्रह्मा जी झुमे लेके नारद के संग हो , विणा बजावे माई - [चिरईं फेर से चहकी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चिरईं-फेर-से-चहकी/) - पुरवा फेर से बहकी। हर पत्ता पियराइल बा कतहूं गंध हेराइल बा टेढ़ परीक्षा आइल बा फूलवा फेर से महकी। अबहीं रात के डेरा बा सब समय के फेरा बा धीरज धरे के बेरा बा चिरईं फेर से चहकी। डॉ हरेश्वर राय सतना, मध्य प्रदेश - [महेंदर मिसिर : गीत- संगीत के ढाल का संगे राज धरम निबाहे वाला मनई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/महेंदर-मिसिर-गीत-संगीत-के/) - पूरबी के कालजयी गीतन के लिखनिहार मने पूरबी के जनक, भोजपुरी के पहिलका महाकाव्य 'अपूर्व रामायन', प्रेम , विरह आ निरगुन गीतन के सिरजना करे वाला एगो अइसन मनई जे समाज आ देस के खातिर आपन सागरी जिनगी दाँव पर लगा देलस। जेकरा के आज भोजपुरी अस्मिता के प्रतीक का रूप में जानल- मानल जाला। - [खेला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/खेला/) - नदी पर ढेर दिन ले पूल ना रहे केहु कहे कि नदी के पूल पसन ना ह केहु कहे कि पूल के इ नदी पसन नइखे बूढ़वा बिधायक दूनू जाना के बात गाँठ बान्ह लेले रहनी कहीं कि, जवन नदी के पसन जवन पूल के पसन, उ पब्लिक के पसन जवन पब्लिक के पसन उ - [टीस](http://www.bhojpurisahityasarita.com/टीस/) - “महतारी की कोखि से का जाने का भागि ले के जनमल रहनीं। नइहर में नाहीं ढेर त कुच्छु कम्मों त ना रहे। हमार बाबूजी कवनों चीज के कमी ना होखे देत रहलें। बड़ी देखि सुनि के भरल-पुरल घर में बिअहले रहलें कि हमार बबुनिया सुख से रही, बाकिर भागि के लेखा कि छौ भाइन में - [कुल्हि हमरे चाही](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कुल्हि-हमरे-चाही/) - हमही त बानी असली राही कुल्हि हमरे चाही। हमही से उद्गम हमरे में संगम धमकी से करब हम उगाही कुल्हि हमरे चाही। हमरे से भाषा हमरे से आशा छपि के देखाइब खरखाही कुल्हि हमरे चाही। हमही चउमासा बुझीं न तमासा खम खम गिरिहें गवाही कुल्हि हमरे चाही। जयशंकर प्रसाद द्विवेदी - [बाबूजी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बाबूजी/) - घरवा के मुखिया लइकन के मुस्कान बाबूजी के पाकिट में रहेला सब के जान। सब के ख़ुशहाली बजा के ताली सब दुख दूर होला चुटकी में खाली। बाबूजी जइसन छाता हमनी के विधाता। दुनिया जहान में नइखे आइसन सुंदर नाता। माई के सिंदूर चमके। खेत बधार गमके। बाबूजी के पसीना से अंगना अँजोर दमके। बहाके - [रामनाथ पांडेय शिखर सम्मान से डॉ. मयंक मुरारी अउर डॉ.जौहर शफियाबादी सम्मानित](http://www.bhojpurisahityasarita.com/रामनाथ-पांडेय-शिखर-सम्म/) - पटना। भोजपुरी के पहिला उपनन्यासकार रामनाथ पांडेय के पुण्यतिथि पर 16 जून के पटना में एगो कार्यक्रम के आयोजन भइल। एह अवसर पर डॉ.मयंक मुरारी और डॉ.जौहर शफियाबादी के पहिला रामनाथ पांडेय शिखर सम्मान देहल गइल। दूनों विद्वानों के स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र आ शॉल से सम्मानित कइल गइल। सारण भोजपुरिया समाज आ जागृत प्रकाशन के तत्वावधान में मैत्री शांति भवन, अशोक राजपथ पर भइल यह कार्यक्रम में रामनाथ पांडेय के कालजयी रचना "महेन्दर मिसिर" के लोकार्पण भी भईल। कार्यक्रम के अध्यक्षता चंद्रकेतु नारायण सिंह जी कइनी। डॉ.सुनील पाठक, पूनम आनंद, तैय्यब हुसैन पीड़ित, भगवती प्रसाद द्विवेदी जइसन विद्वान मंच के शोभा बढ़इनीं। लोकार्पण के बाद रामनाथ पांडेय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उपस्थित विद्वान लोग आपन विचार व्यक्त कइलख। व्याख्यान के बाद काव्य पाठ भी भइल। एह में डॉ. मीना पांडेय, दिवाकर उपाध्याय, मधुरानी लाल, सुजीत सिंह सौरभ, श्याम श्रवण, सुधांशु कुमार सिंह आपन रचना के पाठ कइलीं। एह अवसर पर भोजपुरी साहित्य जगत से जुड़ल कई गो हस्ती उपस्थित रहल। एहमें शुभ नारायण सिंह शुभ, राजेंद्र गुप्त, प्रेमलता, यशवंत मिश्रा, प्रणव पराग, रवि प्रकाश सूरज आदि प्रमुख रहनीं। धन्यवाद ज्ञापन रामनाथ पांडेय के बड़हन लइका बिमलेंदु भूषण पांडेय कइलन तथा मंच संचालन दिवाकर उपाध्याय जी संभलनीं। - [हमार रामभंजन बाबा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हमार-रामभंजन-बाबा/) - बात हमहन से छ पीढ़ी पहिले के ह। बरहुआं के कश्यप गोत्रीय दुबे लोगन के परिवार में दुर्गानन्द दुबे के तीन गो सुपुत्र भइल रहलें। जवना में सभेले बड़ रामभंजन बाबा रहलें। उहाँ से दूनों छोट भाई राम सहाय दुबे आ हंसराज दुबे रहल लोग। तीनों भाई एकदम सोझबग, मयगर आ साधु लेखा सोभाव के - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-9/) - सुखि गइलें पोखरा आ जर गइलें टपरी , ए बदरी । कउना बात पे कोहाइ गइलू ए बदरी । देखा पेड़वा झुराई गइलें ए बदरी । बनरा के पेट पीठ एक भइलें घानी । कहा काहें होत बाटे राम मनमानी । गोरुअन के बेटवा क पेटवा ह खपरी , ए बदरी । कउना बात पे - [मध दुपहरिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मध-दुपहरिया/) - सप सप चले ले लुअरिया हो सखि ! मध दुपहरिया। कइसे बचाईं जवरिया हो सखि ! मध दुपहरिया॥ एकहू बाग बगइचो ना बाचल नदी नार पोखर नइखे सवाचल बन्हओ क टुटल कमरिया हो। सखि ! मध दुपहरिया॥ हरियर बनवा सपन होई गइलें सहर आ गउवाँ प्रदूषित भइलें गरमी के बढ़ल कहरिया हो। सखि - ['बावला' के सौवीं जयंती पर 'गीत मंजरी' के विमोचन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बावला-के-सौवीं-जयंती-पर-गी/) - विश्व भोजपुरी सम्मेलन, गाजियाबाद इकाई आ सर्वभाषा ट्रस्ट के सम्हिलात संयोजन में गाजियाबाद में जनकवि राम जियावान दास 'बावला' जी के सौवीं जयंती मनावल गइल। दिल्ली-एन सी आर में 'बावला' जी केन्द्रित ई पहिल कार्यक्रम के परयास रहल ह। कार्यक्रम में बावला जी के नवीनतम काव्य संकलन 'गीत मंजरी' के विमोचन भइल। 'गीत मंजरी' के - [सतुआ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सतुआ/) - पहिले सतुए रहे ग़रीबवन के आहार केहू जब जात रहे लमहर जात्रा प त झट बान्हि लेत रहे गमछा में सतुआ,नून, हरियर मरीचा आ पियाजु के एकाध गो फाँक केवनो चापाकल भा ईनार से पानी भरि के लोटा भर सुरूक जात रहे केहुओ बेखटके ऊ बिस्लरी बोतल के ज़माना ना रहे सतुआ सानि के गमछिए - [धुआंला ना जेकर चुहानी ए बाबू](http://www.bhojpurisahityasarita.com/धुआंला-ना-जेकर-चुहानी-ए-बा/) - आसिफ रोहतासवी के नांव भोजपुरी गजल लिखे वाला ओह लोग में शामिल बा, जे गजल के व्याकरण के भी खूब जानकार बा। उनकर रचनाशीलता के पूरा निचोड़ गजल ह, खास क के भोजपुरी गजल। खाली भाषा से ही ना, पूरा मन मिजाज से ऊ भोजपुरी के गजलकार हवें। भोजपुरी के लोकधर्मी गजलकार कहे में हमरा - [रूस युक्रेन युद्ध](http://www.bhojpurisahityasarita.com/रूस-युक्रेन-युद्ध/) - धरती अकास सब जरे लगल शोला बरसावल बन्द करऽ रोकऽ बिनास कऽ महायुद्ध अब आगि लगावल बन्द करऽ। अंखियन से लोहू टपक रहल बिलखे मानवता जार-जार हरियर फुलवारी दहक रहल धधकत बा मौसम खुशगवार अबहूं से आल्हर तितलिन कऽ तूं पांख जरावल ‌ बन्द करऽ । बनला में जेके बरिस लगल हो गइल निमिष में - [मामा के सपना, उनकर सुख आ बिछोह](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मामा-के-सपना-उनकर-सुख-आ-बिछ/) - जितेंद्र कुमार हिंदी आ भोजपुरी दूनो भाषा में कविता, कहानी, समीक्षा आ संस्मरण लिखेलन। जितेंद्र कुमार के हिंदी आ भोजपुरी के कुछ किताबो छपल बा, जेकर चर्चा लोग करत रहेला। जितेंद्र जी के भोजपुरी कहानी के एगो किताब ह 'गुलाब के कांट'। ओह में एगो कहानी बा 'कलिकाल'। 'कलिकाल' के बारे में लोक में अनेक - [मोथा आ मूंज के जिद आ धार के गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मोथा-आ-मूंज-के-जिद-आ-धार-के-ग/) - भोजपुरी के कवि शशि प्रेमदेव के दूगो गजल भोजपुरी के पत्रिका 'पाती' के अलग अलग अंक में जब पढ़लीं त ई महसूस भइल कि एह कवि के ठीक से पढ़े के चाहीं। ई कवि आज के समय के कटु सत्य के अपना गीत- गजल के विषय बना रहल बा। ऊ समय के सांच के कहे - [टिकुरी से बहावल अंखिए बर रहल बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/टिकुरी-से-बहावल-अंखिए-बर-र/) - रामजियावन दास बावला के एगो गीत राह चलते इयाद आवेला आ मन ओह गीत के गुनगुनाए लागेला। ऊ गीत ह -" हरियर बनवा कटाला हो कुछ कहलो ना जाला।" आगे के लाइन ह -" दिनवा अजब चनराला हो, कुछ कहलो ना जाला। " हरियर बन के कटाइल एगो मामिला बा जवन रोज देखे में आवत - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-8/) - माई-बाबू से ना बढ़ि के देवता पितर हवें हो इहे हवें सोना चानी ऊ त पीतर हवें हो ! माई के अँचरा सरगवा के सुखवा बबुआ खातिर ऊ सहेली सभ दुखवा सभ तिरिथन से बढ़ि के पवित्तर हवें हो ! बाबूजी त सपनो में राखेलें आकाश में सुखवा जुटावे सभ भुखियो पियास में इहे देलें - [उतार गइल मुँहवा क पानी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/उतार-गइल-मुँहवा-क-पानी/) - करिया करम बीखि बानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥ कतनों नचवला आपन पुतरिया लाजो न बाचल अपने दुअरिया नसला इजत खानदानी । उतार गइल मुँहवा क पानी॥ झुठिया भौकाल कतनों बनवला बदले में लाते मुक्का पवला मेटी न टाँका निसानी उतार गइल मुँहवा क पानी॥ साँच के बचवा साँचे जाना नीक आ - [गाँव आ गँवई नारी के हालत क पोढ़ लेखा-जोखा- “के हवन लछुमन मास्टर”](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गाँव-आ-गँवई-नारी-के-हालत-क-प/) - यथार्थ के खुरदुरा जमीन पर आम आदमी के जूझत जिनगी के जियतार बखान लीहले भोजपुरी के सुप्रसिद्ध कथाकार श्री कृष्ण कुमार जी के भोजपुरी क पहिलका उपन्यास आजु के समाज के आधी आबादी जेकर चरचा हर ओरी बा, बेटी पढ़ावों, बेटी बचाओ, के नारा लग रहल बा, “के हवन लछुमन मास्टर” के रूप मे हमनी - [बाउर बातिन का बिरोध से बेसी जरूरत बा नीमन बाति के लमहर परम्परा बनावे के !](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बाउर-बातिन-का-बिरोध-से-बेस/) - हम विषय पर आपन बात राखे का पहिले रउवा सभे के सोझा 3-4 बरिस पहिले के कुछ बात राखल चाहत बानी। 20-22 करोड़ कथित भोजपुरी भाषा भाषियन का बीच 3-4 गो पत्रिका उहो त्रमासिक भा छमाही निकलत रहनी स। ओह समय भोजपुरी के नेही-छोही रचनाकार लोगन का सोझा भा भोजपुरी के नवहा रचनाकार लोगन के - [बलम परधानी लड़ाके](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बलम-परधानी-लड़ाके/) - खा गइल बचल - खुचल पानी बलम परधानी लड़ाके। एक भइल संझिया बिहानी बलम परधानी लड़ाके।। नइहर से अइनी त दुल्हिन कहइनी भुइयां ना डेग हम दुउरे में धइनी । आज सँउसे गँउवे के रानी बलम परधानी लड़ाके.... कहेला लोग दिन तिरिया के आइल मरद - मेहरारु बराबर कहाइल। अब तु ही अगोरिहs चुल्हानी बलम - [तमासा घुस के देखै](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तमासा-घुस-के-देखै/) - लख लतखोर कहाय, तमासा घुस के देखै॥ सौ सौ जुत्ते खाय, तमासा घुस के देखै॥ इनका उनुका बहकावे में नाटो क खिचड़ी पकावे में जेलस्की इतराय, तमासा घुस के देखै॥ गावत फिरत देस के गीत संहत छोड़ि परइलें मीत बइडेनवा मुसकाय, तमासा घुस के देखै॥ बरसे लगल रसियन मिसाइल खड़हर सहर मनई - [गाईं कइसन लोरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गाईं-कइसन-लोरी/) - आगि लागल बा मन में बोताईं कहां, सुतल हियरा के फेरु से जगाईं कहां। कुछ कहला प छन दे छनकि जाले उ, सांच बतिया के लोरी गवाईं कहां। उ पवले का पद भूलि जा तारे हद, अइसन दरद प मल्हम लगाईं कहां। देवे के उपदेश उन्हुका आदत परल, हिम्मत रउवे बताईं कि - [नीतू सुदीप्ति 'नित्या' के भोजपुरी उपन्यास 'विजय पर्व' के मिलल अभय आंनद पुरस्कार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नीतू-सुदीप्ति-नित्या-के-भ/) - मोतिहारी : राधा कृष्ण सीकरिया बीएड कालेज में आयोजित अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के 26 वां अधिवेशन दू दिवसीय 26-27 फरवरी के सम्पन्न भइल। सम्मेलन के उद्घाटन माननीय श्री मंगल पाण्डेय स्वास्थ्य मंत्री बिहार सरकार कइनी। मुख्य अतिथि गन्ना उद्धोग मंत्री माननीय श्री प्रमोद कुमार, विशिष्ट अतिथि माननीय संजय मयूख बिहार विधान परिषद सदस्य, - [फागुन में नाचल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फागुन-में-नाचल/) - हंसि हंसि क बहार उतान भईल, अगराई के फाग जब फागुन में नाचल । फगुआ के जब आगुआन भईल, अबीर-गुलाल आपना सुघर भाग पे नाचल। बबुआ-बुचिया के जब रंग रंगीन भईल , फिचकारी के संग उछल- कुद के नाचल । बुढा-जवान के भेद सभ भुल गईल , फागुन फगुआ के जब मधुर - [भोजपुरी त पहेली बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-त-पहेली-बा/) - साँचो में रउआ सुन के भक फाट जाई। भोजपुरी एगो पहेली बन गइल बा ।नइहरे में बेआबरू भइल बेटी जइसन हाल एह घरी भोजपुरी साहित्य आ साहित्यकार लोगन के बा ।साहित्यकार कइगो मोटकी-मोटकी किताबन में माथा खापावेलन आ रात-दिन एक करके कलम-कागज के साथ मगजमारी (माथापची )करेलन तब जाके एगो रचना तइयार होला ।रचना एकजुट - [विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डॉ अरुणेश नीरन सम्मानित भइलें](http://www.bhojpurisahityasarita.com/विश्व-भोजपुरी-सम्मेलन-के/) - विश्व भोजपुरी सम्मेलन संस्था खाति हुलास आ गौरव के बाति बाटे कि अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2022 के अवसर पर भोजपुरी प्रतिष्ठान,बीरगंज,नेपाल के तत्वावधान में आयोजित सम्मान समारोह में विश्व भोजपुरी सम्मेलन संस्था के अंतरराष्ट्रीय महासचिव आदरणीय डॉक्टर अरुणेश नीरन जी के भोजपुरी के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान का चलते अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रदान कइल गइल । - [बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बबुनवाँ-बड़-नीक-लागे-हो/) - ठुनुक़त घरवाँ अंगनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। अरे हो बिहँसत माई के परनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। मुँहवा लपेटले मखनवाँ बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। अरे हो उचकि उतारत अयनवाँ, बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। हुलसत गरवा लगावेली अरे हो भरले लोरवा नयनवाँ , बबुनवाँ बड़ नीक लागे हो। रोआँ - [वसंत अइले नियरा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/वसंत-अइले-नियरा/) - हरसेला हहरत हियरा हो रामा, वसंत अइले नियरा।। मन में मदन, तन ले ला अंगड़ाई, अलसी के फूल देख आलस पराई, पीपर-पात लागल तेज सरसे, अमवा मोजरीया से मकरंद बरसे, पिहू-पिहू गावेला पपीहरा हो रामा, वसंत अइले नियरा।। मटरा के छिमिया के बढ़ल रखवारी, गेहूँआ के पाँव भइल बलीया से भारी, नखरा नजर आवे नजरी - [सारधवा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सारधवा/) - मरछिया अपने त सात गो लइका के मार कै भइल रहै .. जनमते महतारी घुरा पर फेकवा दिहली ..कौदो दे कै किनली ..बड़ा टोटरम पर .मरछिया जिएल ..मरछिया धीरे-धीरे सेयान होखे लागल ..जवानी उफान मारत रहे .."इजवानी केकरा कस में बा ..मरछिया एकदम गोर भभुका रहे रहे ..आओठ लाल-लाल ..नकिया सुग्गा के ठोर अइसन चोख - [मम्मी रे हमहूं इसकूल जाइब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मम्मी-रे-हमहूं-इसकूल-जाइब/) - मम्मी रे पापा से कह के ड्रेस एगो बनवा दे। हमहूं रोज इसकूल जाइब भइया के बतला दे। जूता मोजा कलम पेनसिल कापी किताब टाई। जेंटल मएन बनके जाइब जइसे जाला भाई। हरमेस हाथ पकड़ि के चलबि पीठ प लादि के बसता। इयाद पारि के रोजे रखिहे मम्मी ओ में नासता। मम्मी कान पकड़त बानी - [भोर हो गइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोर-हो-गइल-2/) - खोल द दुआर, भोर हो गइल। किरिन उतर आइल, आ खिड़की के फाँक से धीरे से झाँक गइल, जइसे कुछ आँक गइल, भीतर से बन्द बा केंवाड़ी त बाहर के साँकल के पुरवाई झुन से बजा गइल, आँगन के हरसिंगार, दुउरा के महुआ जस, चू-चू के माटी पर अलपना सजा गइल, ललमुनियाँ चहक उठल, बंसी - [बसंत-फागुन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बसंत-फागुन/) - धुन से सुनगुन मिलल बा भँवरन के रंग सातों खिलल तितलियन के लौट आइल चहक, चिरइयन के! फिर बगइचन के मन, मोजरियाइल अउर फसलन के देह गदराइल बन हँसल नदिया के कछार हँसल दिन तनी, अउर तनी उजराइल कुनमुनाइल मिजाज मौसम के दिन फिरल खेत केम खरिहानन के! मन के गुदरा दे, ऊ नजर लउकल - [बड़हन बानर हिरोइनची](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बड़हन-बानर-हिरोइनची/) - ओह घरी पश्चिमी बिहार में हिरोइनचिअन के आंतक बहुत बेसी हो गइल रहुए, जदि भुला के बल्टी, तसला, रसरी, कुरसी, टेबुल भा सइकिल घर के बहरी भा बिना ओहारे अंगना में छूट जाए त दस पनरह रोपया खातिर मारल मारल फीरत हिरोइनचिअन के लाटरी लगले जइसन खुशी मिलत रहे। कसहूं चोरा के बेच खोच के - [पान थूक के](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पान-थूक-के/) - पढ़े लिखे में जी ना लागे बनि के घुमत हवा नमुन्ना पिता जी पूछलन पूत से अपने रगड़त खैनी संगे चुन्ना। तब बबुली झार अदा से अगबै पान थूक के बोलस मुन्ना सुना हे बाऊ नेता बनबै कइ देब दऊलत पल में दुन्ना। का घबड़ाला झूठमूठ क अँगुरी पर बस दिनवा गीन्ना लड़ब - [नून-तेल-लकड़ी मे फंसि गइल जनता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नून-तेल-लकड़ी-मे-फंसि-गइल-जन/) - नून-तेल-लकड़ी मे फंसि गइल जनता नाहीं त तखता पलटि देत जनता! ओके लगेला की होत बा सब अच्छा नइखे मालूम के बा झूठा के बाद सच्चा भेड़ियन के बीच में भइल नंगी जनता नाहीं त तखता पलटि देत जनता! धरम-करम मेें उ बा गइल अझुराई जात-पात ऊंच-नीच के रोग लगाई भरम मे भागल - [दू गो लघुकथा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/दू-गो-लघुकथा/) - १.बेटी के बियाह बेटी के बियाह खातिर चिन्तित महतारी अपना पतिदेव से कहली- एजी! रउरा बेटी के बियाह के कवनो चिन्ता बा की ना ? बेटी पढ़ि -लिख के पांच बरीस से नोकरीयो करऽ तिया, पैंतीस बरीस के उमीरो हो गईल। समय से शादी-बियाह कईल हमनीं के जिम्मेवारी बा बाकिर रउरा त कवनो फिकीरे नईखे। - [दुरजन पंथ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/दुरजन-पंथ/) - (1) अकरुणत्वमकारणविग्रहः,परधने परयोषिति च स्पृहा। सुजनबन्धुजनेष्वसहिष्णुता, प्रकृतिसिद्धमिदं हि दुरात्मनाम्।। - भर्तृहरि गसल निठुरता हद गहिरोर पोरे-पोर। पोंछ उठवले हरदम सगरी, सींघ लड़ावे के तत्पर। सकल उधामत चाहे करि लऽ जीति ना पइब कबो समर। अनकर माल-मवेसी, धनि पऽ निरलज आँखि उठावे, सुजन बंधु सन इरिखा पारे, दुरजन जान सुभावे। (2) दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङकृतोऽपि - [कहानी का सुनायीं](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कहानी-का-सुनायीं/) - गांव के परिवेश के कहानी का सुनायीं सभे बा मतलबी केकरा के समझायीं घर के पड़ोसिया लगावे दरहीं कूड़ा कहले पे हमके दिखावे लमहर हुरा धमकी त देत बा कईसे समझायीं गांव के परिवेश के......। संस्कार घर-घर के स्वाहा भईल जाला ईर्ष्या के आग में सबे जरते देखाला सुनि के अनसुनी करे माने नाहीं - [अन्हरिया में अंजोरिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अन्हरिया-में-अंजोरिया/) - केतना दिन जमाना के बाद आज ए पेड़ा से सुरसती के जाए के म‌उका मिलल बा।बग‌ईचा के झिहिर-झिहिर बेयार बड़ा सोहावन लागत रहे।बरियारी गडि़वान के रोकवाए के मन रहे।बाकिर अन्हार हो जाइत त बाटे ना बुझाईत।ल‌इकाई के सगरी बात मन परे लागल।अमवारी के झुलुआ..भ‌ईंस के सवारी..पतहर झोंक के मछरी पकावल..डडे़र पर के द‌उराई..गड़ही में गर‌ई - [आपन बात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-बात-2/) - साहित्य अपना में समाज का संगे सभे के हित समाहित राखेला आ हरमेसा बढ़न्ति का ओर गति बनवले राखे के उपक्रम विद्वान साहित्यकार लोग करत रहेलें। अइसने कुछ साहित्य जगत के मान्यतो ह। बाकि हर बेर ई सही ना होखे। कई बेर एकरा से उलट होत लउकेला। जान-बूझ के भा इरखा बस कवनो नीमन चीजु - [लागल लड़िका के बजार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लागल-लड़िका-के-बजार/) - लागल लड़िका के बजार एहि जुगवै में कीनैं लड़की के बाप एहि जुगवै में ! तीन-चार लाख रुपइया पुलिस-प्राइमरी के भैया साथे एगो मोटर कार एहि जुगवै में लागल लड़िका के बजार एहि जुगवै में! जवन जुनियर में पढ़ावै सात से आठ लाख फुरमावै कार दतवा चिआर एहि जुगवै में लागल लड़िका के - [अहम् के आन्हर सोवारथ में सउनाइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अहम्-के-आन्हर-सोवारथ-में-स-2/) - का जमाना आ गयो भाया, आन्हरन के जनसंख्या में बढ़न्ति त सुरसा लेखा हो रहल बा। लइकइयाँ में सुनले रहनी कि सावन के आन्हर होलें आ आन्हर होते ओहन के कुल्हि हरियरे हरियर लउके लागेला। मने वर्णांधता के सिकार हो जालें सन। बुझता कुछ-कुछ ओइसने अहम् के आन्हरनो के होला।सावन के आन्हर अउर अहम् के - [एक कप चाह](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एक-कप-चाह/) - (हमार मूल fb पोस्ट के भोजपुरी रूपांतरण) ------ 'चाह' जिनगी ह । 'चाह' एगो एहसास ह। 'चाह' विरह के तड़प ह । ' चाह' मिलन के मिठास ह । आरा -बलिया -छपरा ह 'चाह' । 'चाह' भजपुर- रोहतास ह। ऋतु में वसंत आ माह मधुमास ह। तबे त सभका के पेय ई ख़ास ह। - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-9/) - अपन लड़की सयान हो गइल , रात जागल बिहान हो गइल । आज माई बेमार का भइल , सून घर कऽ दलान हो गइल । हमरे सीना में लागल दरद, छुटकी लड़की हरान हो गइल । भाई -भाई में नाहीं पटल आध-आधा चुहान हो गइल । जब सहारा न कोई रहल, - [जुठार मोरा कजरा बोला का पउला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जुठार-मोरा-कजरा-बोला-का-पउ/) - बदरा के फेर पिया काहे मोहइला जुठार मोरा कजरा बोला का पउला। बिंदिया देखत रहे तोहरा नदानी झुमका गवाही देही बात मानी चनवो से बलमू ना जेरिको लजइला जुठार मोरा कजरा बोला का पउला। होठवा के लाली सुघर सकुचायल घायल पैजनिया हो सहमल बा पायल चुड़िया के खनखन से अईसन लोभइला जुठार मोरा - [भोरे मोरे अँगना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोरे-मोरे-अँगना/) - कि खनकेला जइसे, सुघर हाथे कँगना बिहँसे किरिनिया, किलक उठे ललना पसरि उठे रंग ना। भोरे मोरे अँगना॥ चंहके चिरइया, आई अँगनइया ललना के मइया लेलीं बलइया हुलसि उठे पग ना। भोरे मोरे अँगना॥ भोरहीं बबुआ,माँगे जोन्हइया दुअरा बहारी दुलारेलीं मइया बजाई घरे घुघुना। भोरे मोरे अँगना॥ जयशंकर प्रसाद द्विवेदी - [बरम बाबा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बरम-बाबा/) - तू त देखतअ हउअ सब दिन-रात बरम बाबा नाहीं बा अब पहिले जइसन बात बरम बाबा सुक्खू अपने अँगने में भी नल लगवा लेहलेन कुँआ पाट के रामधनि बइठका बना देहलेन बुधनी के दुआर पर खम्भा घर में लाइट बा बालकिशुन बिल देवे लगलेन जेबा टाइट बा घरे-घरे पैखाना बा ,लोटा क जुग बिसरल केहू नाही अब जंगल में - [वेलेंटाइन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/वेलेंटाइन/) - उठ ना अब ले सुतल बाड़ू। जाड़ा पाला में का तंग कइले बानी ।बेर बिहान होखे ना दीं। सुरसतिया के माई जल्दी उठ आज हमार वेलेंटाइन ना बनबूं। रउवो आपन उमीर ना देखीं ।एह उमर में कबो रेखा तो कबो हेमा मालिनी के शौख जाग जाता।ई वेलेंटाइन कवन भूतनी के नाम ह ? कवनो नया - [2020 के भिखारी ठाकुर भोजपुरी सम्मान 'आखर – आखर गीत' के दीहल जाई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/2020-के-भिखारी-ठाकुर-भोजपुरी-स/) - देश के प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था हिन्दुस्तानी एकेडेमी प्रयागराज शुक्रवार के अपने राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारन घोषणा कइलस। एह बेरी भोजपुरी खाति भिखारी ठाकुर भोजपुरी सम्मान आखर – आखर गीत बदे चंदौली जिला के बरहुआं गाँव के बेटा गाजियाबाद में रहि रहल जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के दीहल जाई। ए सम्मान के साथे उनुका के संस्था के - [नयनवा से लोर झरे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नयनवा-से-लोर-झरे/) - हिया बेंधेले संवरिया के बाति नयनवाँ से लोर झरे ॥ जागल जबसे बा पहिली पिरितिया रहि - रहि उभरेले सँवरी सुरतिया मोहें निदिया न आई भर राति नयनवाँ से लोर झरे ॥ रहिया निरेखी बीतल दुपहरिया मन मुरुझाई जाय लखते दुवरिया बुला आई जाँय रतिओ - बिराती नयनवाँ से लोर झरे ॥ - [चुनरिया ए बालम](http://www.bhojpurisahityasarita.com/चुनरिया-ए-बालम/) - तिकवेले भरि भरि नजरिया ए बालम रंगब रउरे रंग मे चुनरिया ए बालम ॥ तोपले तोपाई न, लक़दक़ सेहरा करबे निबाह जब लागल इ लहरा निकलब जब तोहरी डहरिया ए बालम ॥ रंगब रउरे रंग मे चुनरिया ए बालम ॥ करके करेज सभ उजरल महलिया सून कई गउवाँ के साँकर गलिया चलि अइली - [बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बिजुरिया-हाय-पड़ल-बदरा-का-प/) - विधना का लिखना पर जरि जरि बुताले। बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले.. बिचरत चरिवातन पर दूर दूर रोले आवत छावत अन्हार अकड़ि अकड़ि बोले लखि के कुलबोरन के लोरन नहाले बिजुरिया हाय पड़ल बदरा का पाले.. असमय अरियात रहनि समझ में न आवे उमरत बेढंग बान घेरी के चलावे घाव घोर मनवा - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-7/) - जानके केहू आहत कईल जान के तान के तनके तनके नयन बान के केस छितरावत घेरत गगन में घटा फूल अस कोमल अंगन के अजबे छटा फूल उपमण्डल चेहरा लगे चान के नाम ओठन पर आंखिन में सूरत बसल आस तूरत ना पूरत जरूरत असल ओही मूरत के देवी जपी मान के - [पहुना भइल जिनगी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पहुना-भइल-जिनगी/) - कब दरक गइल जियरा उधियाइल भिनुसहरा अब टोवत बेवाई सभे अहमक़ कहाई । साटल पेवना भइल जिनगी ॥ घाव बाटे जियतार टकटोरत बार बार उहाँ उजार खोरिया देखीं जवने ओरिया काँच खेलवना भइल जिनगी ॥ बड़की बिटिया सयान सभे उझिलत गियान दाना ला मोहताज कइसे चली राज काज ओद लगवना भइल जिनगी ॥ - [बिला रहल थाती के संवारत एगो यथार्थ परक कविता संग्रह "खरकत जमीन बजरत आसमान "](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बिला-रहल-थाती-के-संवारत-एग/) - मनईन के समाज आउर समय के चाल के संगे- संगे कवि मन के भाव , पीड़ा , अवसाद आउर क्रोध के जब शब्दन मे बान्हेला , त उहे कविता बन जाला । आजु के समय मे जहवाँ दूनों बेरा के खइका जोगाड़ल पहाड़ भइल बा , उहवें साहित्य के रचल , उहो भोजपुरी साहित्य के - [माथे कS सिङार बाबूजी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/माथे-कs-सिङार-बाबूजी/) - बाटें भरि भरि के आपन दुलार बाबूजी । तोहीं हमनी के माथे कS सिङार बाबूजी ॥ सभके नियमित जगावें नेह बचवन पर लुटावें करें नेहिया के बारिस हर बार बाबूजी ॥ तोहीं हमनी के..... दरदिया सिरहीं उठावें हँसि बिहँसि के दुलरावें कइने दिन रात आपन निसार बाबूजी ॥ तोहीं हमनी के..... बीपत - [कबले होइहं गवनवा हमार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कबले-होइहं-गवनवा-हमार/) - कबले होइहं गवनवा हमार भउजी। बाटे मौसम मे आइल खुमार भउजी। बसंती हवा चले देहीयां दुखाता। कोइलर के बोलियो माहुर बुझाता। नीक लागे ना पायल झंकार भउजी। कबले होइहं गवनवा हमार भउजी। सरसो के खेतवा मता के पिअराइल। आमन के बगिया बा खूबे मउराइल। सून्न लाग$ता सगरो जवार भउजी। कबले होइहं गवनवा हमार - [ऑक्सीजन से भरपूर ‘पीपर के पतई’](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ऑक्सीजन-से-भरपूर-पीपर-के/) - कहल जाला कि प्रकृति सबके कुछ-ना-कुछ गुण देले आ जब ऊहे गुण धरम बन जाला त लोग खातिर आदर्श गढ़े लागेला। बात साहित्य के कइल जाव त ई धरम के बात अउरी साफ हो जाला। ‘स्वांतः सुखाय’ के अंतर में जबले साहित्यकार के साहित्य में लोक-कल्याण के भाव ना भरल रही, तबले ऊ साहित्य खाली - [जेब कट गइल थाने में](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जेब-कट-गइल-थाने-में/) - एक दिन गइली रपट लिखावे , घबड़ाइल कुछ माने में । का बतलाईं ये भइया मोर जेब कट गइल थाने में । मुंशी अउर दीवान भी रहलन , थाना के परधान भी रहलन । दु एक लोग महान भी रहलन,कुछ मुजलिम मेहमान भी रहलन आँख मुदाइल भागल अइलीं , गइलीं चाय दुकाने में । का - [बबुआ बोलता ना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बबुआ-बोलता-ना/) - कहवाँ से आवैला कवन ठाँउ जइबा,बबुआ बोलता ना, के हो दिहलें तोहके बनवास, बबुआ बोलता ना! कवने करनवाँ बतावा अइला बनवाँ? कोने कोने घूमला भंवरवा जइसे मनवाँ कउनी हो नगरिया में अंजोरिया नाही भावै, बबुआ बोलता ना, कहवाँ रात भावै बरहो मास, बबुआ बोलता ना! रूठि गइलीं रिधि-सिधि चललीं रिसियाइ के कउनी हो - [पगलो आजी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पगलो-आजी/) - ओह दिने गाँव के प्राथमिक इस्कूल में कवनों बरात रुकल रहल।खूब चहल-पहल रहल।हमहन के घर के समनवे वाला खेत में तम्बू गड़ल रहल अउर बराती लोगन क खूब स्वागत -सत्कार होत रहल।लाउडस्पीकर पर 'हाँथे में मेहँदी , माँगे सेनुर , बरबाद कजरवा हो गइल हो...।' बजत रहल।ओहर समियाना में जेतने किसिम क गाना बजे एहर - [तीन चौथाई आन्हर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तीन-चौथाई-आन्हर/) - बाबू आन्हर माई आन्हर हमै छोड़ सब भाई आन्हर के-के, के-के दिया देखाई बिजुली अस भउजाई आन्हर॥ हमरे घर क हाल न पूछा भूत प्रेत बैताल न पूछा जब से नेंय दियाइल तब से निकल रहल कंकाल न पूँछा ओझा सोखा मुल्ला पीर केकर-केकर देईं नजीर जंतर-मन्तर टोना-टोटका पूजा पाठ दवाई आन्हर॥ - [कजरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कजरी/) - पवन झकझोरे बालम मोरे। नन्ही नन्ही पनिया के बुनिया पलकिया पर ढोय ढोय बदरी बदन प' गिरावेले कोंवर अंग टोय टोय हँसले रहउँ ना बरेला गुदरउँना सरब अंग बोरे बालम मोरे। नासा भँहु तानेला अकसवा में बोरो लागे जरत बुतात बा धुआँ धुआँ सोरहो सिंगारवा कि बूँन बूँन अँसुआ झुरात बा लोर झरे अँखिया बरवनी - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-6/) - हम गइलीं चउकठि के लवट अइलीं गांव । काली आ कमइछा बाबा बरम्ह के ठांव। हम------ केकरा से बोलतीं आ केके देख हँसतीं कवना बिधि जियरा के गम-दुख अंकतीं सकदम अरथ सबद फइलांव। हम---- धनि हो नहर तूं बांगर धनखरलू जहाँ उड़े धूर तहाँ कमल उगवलू बाकी खोजले न मिले बाग बड़की के छांव। हम--- - [लोक संस्कृति के अजब नजीर – जबरी पहुना भइल जिनगी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लोक-संस्कृति-के-अजब-नजीर/) - भोजपुरी भाषा आज देश दुनिया में आपन परचम लहरावे मे काफी आगे बा। एह करी में रोज नया-नया लेखक लोग के कविता आ कहानी के संकलन खूब बाजार में पाठक खातिर आवता। हाल फिलहाल में भोजपुरी के लेखक मंच पर एगो नया नाम उभरल ह जोकर नाम ह- जे.पी. दिवेदी। दिवेदी जी के ई खासियत - [भाषा के खातिर तमासा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भाषा-के-खातिर-तमासा/) - इ भाषा बदे ही तमाशा चलत हौ बिना बात के बेतहासा चलत हौ इहाँ गोलबंदी, उहाँ गोलबंदी बढ़न्ती कहाँ बा, इहाँ बाS मंदी । कटाता चिकोटी सहाता न बतिया बतावा भला बा इ उजियार रतिया कहाँ रीत बाचल हँसी आ ठिठोली इहो तीत बोली, उहो तीत बोली । मचल होड़ बाटे छुवे के - [पिनकू जोग धरिहन राज करीहन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पिनकू-जोग-धरिहन-राज-करीहन/) - बंगड़ गुरू अपने बंगड़ई खातिर मय टोला-मोहल्ला में बदनाम हउवन।किताब-ओताब क पढ़ाई से ओनकर साँप-छुछुनर वाला बैर ह।नान्हें से पढ़े में कम , बस्ता फेंक के कपार फोड़े में उनकर ढ़ेर मन लगे।बवाल बतियावे में केहू उनकर दांज ना मिला पावे।घर-परिवार अड़ोसी-पड़ोसी सब उनके समझा-बुझा,गरीयाय के थक गयल बाकिर ऊ बैल-बुद्दि क शुद्धि करे क - [बावला: एगो किसान कवि](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बावला-एगो-किसान-कवि/) - रामजियावन दास बावला भोजपुरी के एगो कवि, पुरनकी पीढ़ी के. इनका के जाने वाला जादेतर लोग भक्त-कवि मानेला, राम कथा से जुडल कवितन के चर्चा करेला. बात सहियो लागत बा. कतने कुल्हि प्रसंग बा इनका कविता में जवन कुछ त तुलसी-वाल्मीकि से मेल खाला आ कुछ एक दम इनकर आपन कल्पना के उपज ह. मेल - [आखर-आखर गीत’ के आवरण के ऑनलाइन लोकार्पण सम्पन्न भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आखर-आखर-गीत-के-आवरण-के-ऑनल/) - भोजपुरी के लोकप्रिय रचनाकार जयशंकर प्रसाद द्विवेदी के तीसरकी किताबि ‘आखर-आखर गीत’ के आवरण के ऑनलाइन लोकार्पण कई दिन पाछे ‘सर्व भाषा ट्रस्ट’ के आभासी मंच फेसबुक आउर यूट्यूब पर लाइव कइल गइल। कार्यक्रम के शुरूआत डा. रजनी रंजन के सरस्वती वंदना से भइल । कार्यक्रम के अध्यक्षता सर्वभाषा ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री अशोक लव - [हमार बिरना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हमार-बिरना/) - जेई पर भइलन शहीद हज़ार बिरना छोड़िहैं वनके ना तनिको हमार बिरना॥ आगे बढ़ी जब चीन पाकिस्तान बिरना मरिहें छीन लिहें सबके परान बिरना । छोड़िहैं वनके ना तनिको हमार बिरना॥ जम्मू से लेके हमार कन्या कुमारी सिन्ध से लेके बंग्ला हमरी दुआरी एक भारत एक धरती हमार बिरना। छोड़िहैं वनके ना तनिको - [गिरगिट](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गिरगिट/) - सोझ हराई में साजिश के बुनत रहल बिखबेली जे, काहे दुन कुछ दिन ले भइया, बाँट रहल गुर भेली से। ढलल बयस तबहूँ ना जानसि अंतर मुरई गाजर के, रँहचट में सोना के सपना आन्हर काढ़सि काजर के। जेकर बगली फाटल रहुवे हाथे रखल अधेली से। जे बघरी में फेंकत रहुवे सँझहीं से कंकर पत्थल, - [मम्मा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मम्मा/) - आपन रीति आपन नीति आपन करम भुला गइलन। देखs घरवाँ रार मचावे शकुनि मम्मा आ गइलन॥2॥ सोचलन उहवाँ होई का,का करत होइहें ओहनी फाँका। देखलें जरत घीव क दियरी चउकठ लँघते बउरा गइलन॥ देखs घरवाँ रार मचावे शकुनि मम्मा आ गइलन॥2॥ बाबू-माई कबों न बुझलन भाईन के भाई न समुझलन बहिनो घरवाँ फाँड़ - [लोरी गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लोरी-गीत/) - जाईं हम लोभाय हो, बबुअवा के मुसुकी पर। केई पुचकारे, केई अंगे लगावेले अंगे लगावेले, अंगे लगावेले 2 केकरा अँचरवा नीचे,2 जालें लुकाय हो बबुअवा के मुसुकी पर। जाईं हम लोभाय हो, बबुअवा के मुसुकी पर। माई पुचकारे, बाबू अंगे लगावेले अंगे लगावेले, अंगे लगावेले 2 दादी के अँचरवा नीचे,2 जालें लुकाय हो बबुअवा - [भोजपुरी गीत के भाव-भंगिमा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-गीत-के-भाव-भंगिमा/) - कविता के बारे में साहित्य शास्त्र के आचार्य लोगन के कहनाम बा कि कविता शब्द-अर्थ के आपुसी तनाव, संगति आ सुघराई से भरल अभिव्यक्ति हऽ। कवि अपना संवेदना आ अनुभव के अपना कल्पना-शक्ति से भाषा का जरिये कविता के रूप देला। कवनो भाषा आ ओकरा काव्य-रूपन के एगो परंपरा होला। भोजपुरी लोक में ‘गीत’ सर्वाधिक - [मुफ़लिसी में चमकल नगीना-हीरा प्रसाद ठाकुर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मुफ़लिसी-में-चमकल-नगीना-ही/) - साहित्य के अखाड़ा मे कुछ अइसनो कवि आ लेखक पहलवान पैदा भइलें,जे ‘स्वांतः सुखाय’ खातिर आपण कलाम दउरावत रहलें आ अपना कृतिअन के प्रकाशन आर्थिक लाभ के दृष्टि से ना बलुक सेवा भावना से करत रहि गइलें आ उ ग्लोबल हो गइलें।ओइसनें हिन्दी आ भोजपुरी के सुपरिचित गीतकार कविवर ‘हीरा प्रसाद ठाकुर’ जी रहनीं। उहाँ - [महापण्डित राहुल सांकृत्यायन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/महापण्डित-राहुल-सांकृत्य/) - ई दुनिया बड़ बे; बहुत बड़ औरी एतहत बड़हन दुनिया में जाने केतने लोग बाड़ें औरी जाने केतने लोग पहिलहूँ ए दुनिया में रहल बाड़ें लेकिन कुछ नाँव लोगन के मन में ए तरे घुस जाला कि ओकरा खाती समय के केवनो मतलब ना रह जाला। औरी ओह हाल में बकत आपन हाथ-गोड़ तुरि के - [निरमल गाँव](http://www.bhojpurisahityasarita.com/निरमल-गाँव/) - आज बुधना गाँव बड़ दिन लउटल बा। नयका कुरता पायजामा आ लाल गमछा ओढ के जइसहीं बस से उतरल, आपन भयाद लोग के देख के मुँह बिचकावत कहलस- ई का? हमनी के गँऊवा में सफाई अभियान ना चलऽता का? बोलते-बोलते आगे बढत रहे कि गोबरे पर गोर पर गईल ।हे भगवान! एहीसे त हम गँऊवा - [नदी आ बेटी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नदी-आ-बेटी/) - नदी आ बेटी के सिरजन भगवान धरती के सुनरी सरूप बदे बनवलन। धरती पर मनई के बसे आ जीये बदे ई दुनो जन के अपना जीवन नेछावर करेके भेजलन। बेटी धरती पर मनई बसईली त नदी ओही मनई के जीवन दान दिहली ।खेती आ पानी के जुगाड़ के जिम्मा ई लिहली। ऐसही धरती फलत-फूलत आज - [भउजी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भउजी/) - हमरा पूरा जवार में एके गो भउजी रहली । बिजे भउजी। गाँव में भउजी , चाची, दादी ई सबलोगन के उनकरा 'भतार' के नाम से ही बोलावल जाला। आ सब नाम के साथे 'वा' आ चाहे 'ईया' लगा के बोलला से अपना निअन जनावेलन लोग। भईया हमरा सब गोतिया के बड़ बेटा हउअन। गाँव में बड़ - [भोजपुरी में बाल साहित्य](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-में-बाल-साहित्य/) - प्राचीन काल में भोजपुरी बिहार प्रांत के भोजपुर, आरा ,बलिया, छपरा, सीवान, गोपालगंज आ यूपी के कुशीनगर, देवरिया गोरखपुर, महराज गंज ,सिद्धार्थ नगर, मऊ , आजमगढ़, गाजीपुर आ बनारस के भाषा रहे बाकिर अब्ब आपन भोजपुरी एगो अंतर्राष्ट्रीय भाषा हो गइल बाटे । भोजपुरी खाली भारत के बिहारे यूपी के भाषा ना रहिके नेपाल , - [लड़की बुटीफुल्ल कर गइल चुल्ल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लड़की-बुटीफुल्ल-कर-गइल-चुल/) - बंगड़ गुरु के पड़ोस में एक जाना क बियाह रहल। लाउडस्पीकर पुरजोर लाउड रहल। सबेरहीं से एक्के गनवा कई बेर बजावल जात रहल, ’लड़की ब्यूटीफूल कर गयी चुल्ल...।’ सुनत -सुनत कपार दुखा गईल त बंगड़ खुनुस से फफात- उधियात पड़ोसी के घर में धावा बोललन। ’केकर काल आ गयल ह कि हेतना जोर -जोर से - [वोट माँगे अइले हो](http://www.bhojpurisahityasarita.com/वोट-माँगे-अइले-हो/) - अयोध्या मे गोली चलववले जरिको न सरमइले हो एकरा के लाजो ना लागे वोट माँगे अइले हो। महजिद पर भोंपू लगववलें मंदिर के बंद करवलें हो एकरा के लाजो ना लागे वोट माँगे अइले हो। चाचा बाबू हिल मिल के खूबै लूट मचवलें हो एकरा के लाजो ना लागे वोट माँगे अइले हो। मंचो पर - [कुकर्मनासा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कुकर्मनासा/) - आपन गाँव आउर आपन माटी के सोन्ह महक सभके भाव- विभोर क देवेले | पीढ़ी दर पीढ़ी के संजोवल इयादन के मंजर अपना के ओहमे रससिक्त करे लागेलन | आउर अगर अपना गाँव के नीयरे कवनो नैसर्गिक बनस्थली होखे , त उ मनई के मन मोर लेखा नाचहूँ लागेला | टकटकी बान्ह के निहारल आउर - [करतब वाली मुनिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/करतब-वाली-मुनिया/) - "का बताई बाबुजी, हमरा खातिर त रउरे लोग भगवान बानी, जे हमर करतब देखी के कुछ पइसा दे देत बानी लो, हम नईखी जानत की अल्लाह के ह ss अउरी राम के हs, हमरा खातिर त ई दर्शक लोग ही राम अउरी अल्लाह हवे लोग", करतब वाली कहलिन। थोड़ा सास लइके उ फिर कहली,"जब हमरा - [तलफत भुभुरी सोंच के](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तलफत-भुभुरी-सोंच-के/) - सोंचे में सकुचातानी कहे में भीतरे डेराइला, रोज अंजुरी में धुंध सहोरले दिल के कठवत में नेहाइला।। बेवहार के बागि नोचाता फीकीर केहुके हइए नइखे, जब कहीं करम के पटवन कर त हम केकरो ना सोहाइला।। सभे बवण्डर बनिके चले रेगिस्तानी राग अलापता, कपट के करवन लोटकी से सभके के नेहवाइला।। कसमकस से कलपत काया - [हरिहरी काकी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हरिहरी-काकी/) - भोरे भोरे फोन घरघड़ाइल त हरिहरी चाची कसमसात पलंग से उठ के ओकरे तरफ झटक के बड़बड़ात चलली- कवना के भोरे भोरे आग लागल बा।आजकाल ई फोनवो आदमी के जान पर बनहुक नियन गोली दागता।आरे आवतानी रे।तनी थिर हो रे बाबा।तोरा नियन हमरा में जान थोड़े भरल बा, जे हमहु घनघना के पहुंच जाइब। उमिर - [सुहराई रवै रव](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सुहराई-रवै-रव/) - सुहराई रवै रव बकोट ता कोई खड़ा दूर से भी कचोट ता कोई। अजादी सबै क नकोट ता कोई गुदगुद्दी बराय धइ लूट ता कोई। हिया में बईठ के भकोट ता कोई निवाला उड़ाई सरबोट ता कोई। जगह पाई जरिका तरोट ता कोई लगाई के आसन सघोट ता कोई। छुआई के - [काम](http://www.bhojpurisahityasarita.com/काम/) - एकबेरा फिर से सोच ल रामसिंगार, काहेकि तू हउअ बाबू साहब ..तोहार बेटा बैंक में पार्ट टाइम काम कर ना सकी .. ग्राहक लोग के चाह- पानी पियावे के पड़ी । अउर भी छोट-मोट काम कुल करेके पड़ी साहब लोग से डाँट भी सुनेके पड़ी । बाबू बिनोदवा ई कुल काम करी ओकरा गांव से - [ऐतिहासिक किताबि ‘भोजपुरी साहित्य में महिला रचनाकारन के भूमिका’ के भव्य लोकार्पण भइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ऐतिहासिक-किताबि-भोजपुरी/) - महिला लोगन के योगदान हमेसा से समाज, संस्कृति आउर सभ्यतन के बनावे आ जोगावे में रहल बा। बात भाषा के होखे भा संस्कृति के, महिला लोग एकरा हमेसा से भरले-पूरले बानी। महिला लोगन के योगदान हर भाषा, सभ्यता आउर संस्कृति में रहल बा। महिला लोगन के एही योगदान का बटोरे वाली ऐतिहासिक किताबि ‘भोजपुरी साहित्य - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-5/) - दिन धोइ साफ करे नभ इसलेटिया तारा गीत लिखि चान करे दसखतिया। तारा के पढ़ी तरई हो करुन कहानियाँ लिपि अनजान मुँहे नाही बा जबनियाँ देखे के बा खाली ओरि अन्त हीन गीतिया ।तारा लोग कहे लोक यह आँख का सिवान में छोट बड़ निगिचा आ दूर आसमान में हम कहीं नाहीं ई करेजवा के - [महंगाई में भुलाईल रिस्ता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/महंगाई-में-भुलाईल-रिस्ता/) - ईयाद करी छठी माई के गीत “ पांचऽ पुतऽर आदित हमारा के दिहिना, धिअवा मंगिले जरुर” छठ माई के परब करेवाली आजुओ ई गाना गावेली. आ सुनहु में ई गाना के बड आनन्द आवेला. यानी कि जब ई गाना के प्रचलन शुरू भईल होई ओहघरी आबादी कम होई. आजू के लोग से दिल से पूछी - [रउरा कहां सेयान बानी?](http://www.bhojpurisahityasarita.com/रउरा-कहां-सेयान-बानी/) - रउरा ना बुझबि सियासत रउरा अबहीं इंसान बानी, नेता खाली लाल बुझक्कड़ रउरा कहां सेयान बानी।। जनता जाहिल भकचोन्हर नेता नीमन सभमे सुनर, नेता छोडि़ सभे बा द्रोही नेताजी ग्यान बिग्यान बानी, रउरा कहां सेयान बानी।। रउरा सुनी इन्हिकर बात नीमन सीखइहें जात पात, एकरा से बड़ त सास्तर नइखे हमनी के इन्हिकर लगान बानी, - [शराबबंदी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/शराबबंदी/) - प्रदेश में शराबबंदी बा, शराब खरीदल-बेचल आ पियल प्रतिबंधित बा। बाकिर, एहि बंदी के आड़ में नया रोजगार खूब फरत-फुलात बा। पड़ोसी प्रदेश से शराब के तस्करी शबाब पर बा, पूरा के पूरा एगो रैकेट लागल बा। काल्ह फजीरहीं एगो शराब से भरल ट्रक सीमावर्ती थाना में जब्त भईल रहे, दिनभर खूब गहमागहमी रहे। आज - [भोजपुरी साहित्य : प्रकाशन अउर विपणन एगो गंभीर समस्या](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्य-प्रकाशन/) - भोजपुरी साहित्य के माध्यम लोक भाषा ह,जे समाज के देन ह।राजाश्रय के आभाव मे भी अपना भाषायी संस्कृति अउर लोक जुड़ाव के आधार पर साहित्य के क्षेत्र मे दमदार उपस्थिति दर्ज कर रहल बा।आज के ऐह आर्थिक अउर डीजीटल युगो मे प्रकाशन अउर विपणन के अभाव मे भोजपुरी साहित्यकार घर के आटा गील कके आपन - [बड़ा बेआबरू भइनी ऐ गोरिया तोहरे खातिर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बड़ा-बेआबरू-भइनी-ऐ-गोरिया-त/) - छठ के चार दिन पहिले इंदरासना के विदा करा के उनकरा भैया ले अइले, मय लइकिन के हुजूम रामचनर काका के घर में भीड़वाड़ कइ देली सन, केहू उनकर हाल पूछत बा, केहू मीठा पानी ले आवता त छोटकी भउजी परात में पानी भर के उनकर गोड़ धोवे लगली त केहू ससुरा से आइल छोरा - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-4/) - लाले ओठवा ए नन्हकु सूरूज देव ,लाले तोहरे गालवा .. खेलत कूदत तुहो रहल बाबू सगरी अकासवा .. नील रंग आकासवा से झांके ल अजगुत बाड़े तोहर रुपवा .. कबहुँ झांकेल केरवा के पतवा ,कबहूँ झाकेल नरियरवा . कबहुँ खेलल बबुआ सरोवरवा कूदि -कूदि देखावेल रूपवा .. जब हम पकरिना तोहरा ए बचवा भागल हमरा - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-8/) - बात जब बेबात के तब बात का? कटल जड़ तऽ भला बांची पात का? ऊ मोटाइल बा रहस्ये ई अभी, का पता ऊ रहे छिपके खात का? छली कपटी जब होई दुश्मन होई, मीत ऊ कइसे होई? हित-नात का? कथ्थ आ करनी में जेकरा भेद बा, ठीक केवन वंश के भा जात - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-7/) - ई बीमारी बड़का भारी। सनमुख डंणवत, पीछे गारी।। काटे भीतर घात लगाके, राम राम ई कइसन यारी? कवन भरोसा केन्ने काटी? जेहके भइल सुभाव दुधारी। ढेला भर औकात न जेकर, ऊहो मुँह से लादे लारी। छेड़के ओके नीक न कइलऽ, बहुत पड़ी तोहरा के भारी। कबहूँ जे सोझा आ गइलऽ, - [करियवा कोट](http://www.bhojpurisahityasarita.com/करियवा-कोट/) - कचहरी में वोकील मिलेलन टरेन में टी टी चलेलन बरहों महीना कोट काहें पहिरेलन ? अगर नइखी जानत राज त जान जाईं आज। कोट पहिरला से खलित्तन के संख्या हो जाले जियादा राउर सुरक्षा अउर संरक्षा के पक्का वादा। जे केहु थाकल-हारल, मजबूरी के मारल धाकड़ भा बेचारा इनका भीरी आ जाला मुँह मांगल रकम - [आन्हर गुरु, बहिर चेला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आन्हर-गुरु-बहिर-चेला/) - समय लोगन का संगे साँप-सीढ़ी के खेल हर काल-खंड में खेलले बा,अजुवो खेल रहल बा। चाल-चरित्र-चेहरा के बात करे वाला लो होखें भा सेकुलर भा खाली एक के हक-हूकूक मार के दोसरा के तोस देवे वाला लो होखे,समय के चकरी के दूनों पाट का बीचे फंसिये जाला। एहमें कुछो अलगा नइखे। कुरसी मनई के आँखि - [भोजपुरी क नागार्जुन पंडित धरीक्षण मिश्र](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-क-नागार्जुन-पंडि/) - भोजपुरी साहित्य के आचार्य कवि धरीक्षण मिश्र साधारण जन समुदाय क असाधारण कवि बाड़न । इनकर व्यक्तित्व जेतने साधारण लेखनी ओतने असाधारण अउर विलक्षण । मिश्र जी अपना समय क यथार्थ दृष्टि राखे वाला अइसन सजग रचनाकार हउवन , जे जनता के दुख दर्द आपन लेखनी क विषय बनवलन । इनकर रचना साहित्य पढ़ के - [एक ठे बनारस इहो ह गुरु](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एक-ठे-बनारस-इहो-ह-गुरु/) - ‘का गुरु आज ई कुल चमचम ,दमदम काँहे खातिर हो ,केहू आवत ह का ‘? प्रश्न पूछने वाला दतुअन करता लगभग चार फुट ऊँची चारदीवारी पर बैठा आने -जाने वालों से पूछ रहा था। ”काहें मोदी आवत हउअन ,तोहके पता ना ह ?” पता ना ह ‘ ऐसे गुर्राते हुए बोला गया कि यदि पूछने - [गउए हई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गउए-हई/) - गउए हई सास, छोड़स ना रास । सिधा देस जोख के सबसे पहिले खास । ससुरो अलबेला, करस ना झमेला । घरनी से पूछी, कदमवा उठेला । मरद भकलोल, बुझाय ना झोल। माई के देखते त् सिआ जाले लोल । कस के लंगोटा, धईनी झोंटा । बिग देली परेह, देहनी दू सोटा - [बड़की माई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बड़की-माई/) - ए बबुआ काल्ह जवन बाजारी से चीनी ले आइल रहस नु ओहमें हतना कम बा , बड़की माई तपेसर के हाथ में एगो झिटिका पकड़ा के कहली । बड़की माई त का सोचतारू हम चिनिया खा गइल बानी , अरे ना रे मटिलागाना बनिया नु डंडी मरले बा जाके ओकरा से देखइहे आगे से बरोबर - [फिर आया माई मोरे दुअरिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/फिर-आया-माई-मोरे-दुअरिया/) - मां, माई मे त पुरी दूनिया समाहित रहेले, माई से बड़ कुछ ना । जनम देवे वाली पालन पोषण करे वाली माइए होनी। शास्त्रन में माई के उत्पत्ति मैं तीन कारण बतावल गयल ह पहला इच्छा दूसरा शक्ति अउर तीसर ह क्रिया। माई से अलग कोई भी ए तीनों चीज शामिल ना कर सके ना। - [एहू साल नहके](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एहू-साल-नहके/) - चम्पा-चमेली फूल फूलि-फूलि महके गइल सखी सावन एहू साल नहके। गांव आ नगर घूमे मोरा पांखे बदरी कइसे उड़ाईं ना - उड़ेले मोर चुनरी एक ओर भींजे जाले एक ओर भरके।गइल0 गमकेले धूर जइसे घीव-गूर मीस के इमिर-झिमिर देव ओरिन बरीस के बूंद-बूंद तन प' हवन अस लहके।गइल0 आंख मोर सिकरी दुअरिया - [अट्ठारह ले बरिस जाई बदरा, मनवा हो तनी धीर धरा...](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अट्ठारह-ले-बरिस-जाई-बदरा-म/) - "ये गुरु !बड़ा न उमस ह हो।चुरकी क आग अब दिमाग ले चढ़ आइल ह ।जनात ह परान चल जाई ।" टप-टप चुयत पसेना पोछत चेला के मय गमछी भींज के बोथा हो गइल। " अट्ठारह ले कुल ठीक हो जाई।परेशान मत होखा हो लाल।" मुस्कियात -पान चबात गुरु चेला के निसफिकिर रहे क सलाह दिहलन। - [आपन बात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-बात/) - साहित्य के चउखट पर ठाढ़ ऊँट कवने करवट बइठ जाई , आज के जमाना मे बूझल तनि टेंढ ह । कब के टोनहिन नीयर भुनभुनाए लागी आ कब के टोटका मार के पराय जाई ,पते ना चले । आजु के जिनगी मे कवनों बात के ठीहा ठेकाना दमगर देखाई देही , भरोष से कहलों ना - [हँसि हँसि अँजुरी भरे !](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हँसि-हँसि-अँजुरी-भरे/) - रतिया झरेले जलबुनियाँ, फजीरे बनि झालर, झरे फेरू उतरेले भुइयाँ किरिनियाँ सरेहिया मे मोती चरे ! सिहरेला तन , मन बिहरे बेयरिया से पात हिले रात सितिया नहाइल कलियन क , रहि रहि ओठ खुले पंखुरिन अँटकल पनिया चुवत खानी दिप-दिप बरे ! चह-चह चहकत/ चिरइयन से सगरों जवार जगे- सुनि, अँगना से - [प्रगतिशीलता के नाँव पर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/प्रगतिशीलता-के-नाँव-पर/) - भाषा सब अइसन भोजपुरी साहित्य में बेसी कविते लिखल जा रहल बा. दोसर-दोसर विधा में लिखे वाला लोग में शायदे केहू अइसन होई, जे कविता ना लिखत होई. एही से कविता के जरिये भोजपुरी में साहित्य लेखन के दशा-दिशा, प्रवृति-प्रकृति के जानल-समझल जा सकत बा. साहित्य आ साहित्य के शक्ति के बारे में एगो श्लोक - [कउवा से कबेलवे चलाक](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कउवा-से-कबेलवे-चलाक/) - का जमाना आ गयो भाया , पहिले त अंडा चूजा के सीख देत रहे बाकि अब त बापे के सीख देवे लागल बिया । तकनीक के जमाना नु बा , केनियों आड़ा तिरछा देखि के धार फूटि रहल बिया । चाहे ओकरा से गाँव तबाह होखे भा देश । पानी के रेला त रेला ह - [मड़इया मोर झाँझर लागे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मड़इया-मोर-झाँझर-लागे/) - गरमी के तिखर किरिनिया मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ दँवकेले पातर छन्हिया, मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ खाँखर पतलो क खर ले , खरकि गइले सरल रसरिया क बान्हन सरकि गइले हरका से हिलि जाले थुन्हिया मड़इया मोर झाँझर लागे ॥ सावन – भदउवाँ क रतिया ओनइ परे सरवत छन्हिया के संगही नयन झरे - [बैनीआहपीनाला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बैनीआहपीनाला/) - प्यार के रंग कइसन होला का ख़ूब गाढ़ लाल ओढ़हुल के फूल नियर का ख़ूब गाढ़ पीयर सरसों के फूल नियर का ख़ूब गाढ़ नीला अलसी के फूल नियर का ख़ूब गाढ़ हरियर घास नियर का ख़ूब गाढ़ कत्थई पाकल सेब नियर का ख़ूब झक्क सफ़ेद चाँदनी नियर आख़िर - [किशोर के कवित](http://www.bhojpurisahityasarita.com/किशोर-के-कवित/) - १ नाक नाक के सवाल रहे आपन ना खानदान के, कान पर गइनीं आँख अछइत, सब करम हो गइल नाक ना बाँचल। २ जाल आदमी आपन हाथे आपन पाँखि काटी आपन बीनल जाल में आज अझुराइल फँसल छटपटात बा, जाल बिछवले रहल हा दाना डलले रहल हा अनकरा खातिर, - [सपना रोज सजाई ले](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सपना-रोज-सजाई-ले/) - भौतिकता में डूबल असलियत से उबल आधुनिकता में अझुराई ले आ अपना के खूब भरमाई ले सपना रोज सजाई ले। ज्ञानविहीन दिशाविहीन दुबिधा में अपने के समझ ना पाई ले सपना रोज सजाई ले। कामकाज भले ना होखे आमद-खर्च नफा-नुकसान अंगुरी पर निपटाई ले सपना रोज सजाई ले। लमहर-लमहर जम्हाई लेके विकास-ह्रास के खाका रोज - [जे देहलस उ पइलस का](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जे-देहलस-उ-पइलस-का/) - घास क रोटी कोइ बतावै फिर कउनो राजा खइलस का हम कुरबानी काहे देहीं जे देहलस उ पइलस का। महल बनउलस शिला तोड़ जे अपन नाम लिखइलस का कउनो कोने खोज बतावा उ अपनो कुटी बनइलस का। सार गला संसार रचयिता जाना इहा कमइलस का मजदूर बोल जग हँसी उड़ावै कोइ हाँथ कपारे - [त्याग](http://www.bhojpurisahityasarita.com/त्याग/) - फागुन के रात बा । आम के बउर के गमक लेके नवबसंत के मीठ-मीठ हवा बहsता। तालाब के किनारे एगो पुरान लीची के गाछ के घन पतsइयन के बीच से रात-रात भर जागे वाला कवनों बेचैन पपीहा के तान मुखर्जी के घर के एगो निद्राहीन शयन कक्ष में प्रवेश कर रहल बा । हेमंत तनी - [कुकुरिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कुकुरिया/) - भूँक कुकुरिया भूँक तोके राम भूँकावै भूँक नइहर खइली सासुर खइली खइली पास पड़ोस गिन-गिन देवता पित्तर खइली तवनों पर अफसोस आँख खोल के देख बउरही मचल हौ थूकम थूक। के के नाही कुंआ झंकउली के के ना तरियउली भलमनुसन क रस्ता छूटल अइसन दाँत गड़उली सोच सोच के कारस्तानी उठै करेजे हूक। - [भोजपुरी में मानकीकरण के जरूरत ... कतना व्यवहारिक ?](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-में-मानकीकरण-के-ज/) - साहित्य के साँच आ संवेदनसील मानके सिरजना के राहि डेग बढ़ावल सुखकर होला। मने एगो अइसन प्रेरक तत्व जवना के प्राण तत्व मान के सृजन के समाज खाति एगो आइना का रूप में परोसला के सुघर दीठि आ संकल्पना का संगे सोझा ले आवे खाति प्रतिबद्धता के एगो मानक मानल जाला। अइसन सृजन अपना भीतरि - [जमुऑंव के संत निराला बाबा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जमुऑंव-के-संत-निराला-बाबा/) - जमुऑंव गाँव (थाना- पीरो, जिला- भोजपुर) के लोग बहुते धारमिक सोभाव के ह। जब से हम होस सम्हरले बानी तबे से देखतानी कि एह गाँव में पूजा-पाठ, हरकीरतन आ जग उग के आयोजन लगातार होत आ रहल बा। एह गाँव में साधुजी लोगन के बड़ा बढ़िऑं जमावड़ा भी होखत रहेला। मंदिर आ देवस्थानन से त - [सुखेला नयनवाँ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सुखेला-नयनवाँ/) - कईसे के जिहं माई तोर ई ललनवाँ सूखि जाले धरती सगरौ सुखेला नयनवाँ कईसे के जिहं माई.......। सुबहा के घाम लागे जेठ के दुपहरी कउनो नखतवा देखालै नाहीं बदरी तपते त बीत गईल ई अषाढ़, सवनवाँ कईसे के जिहं माई........। झुरा अकाल साल सालै परि जाला चईति अगहनी के बीज जरि जाला छोड़ि गाँव चिरई,चुनमुन - [संतकवि कबीर के जनम आ मृत्यु के तिथि बिचार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/संतकवि-कबीर-के-जनम-आ-मृत्य/) - उत्तर भारत के मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के क्रांतिकारी संतकवि कबीर के जनम तिथि, जन्म स्थान, परिवार, भासा, मरन तिथि आदि के लेके बिद्वान लोग के एकमत नइखे। आ जदि कबीर अपने चाहे उनका समकालीन उनकर केहू भक्त नइखे लिखले त जनम तिथि, जनम स्थान, परिवार आ मरन तिथि के लेके ठोस सबूत जुटावल कठिन बा। - [साइबर अपराध की आतंकी हमला ?](http://www.bhojpurisahityasarita.com/साइबर-अपराध-की-आतंकी-हमला/) - आजु काल्ह समाचार पत्र उठा के देखी त लगभग हर दिन साइबर ठगी से संबंधित मामला देखे अउर पढ़े के मिल जाई । जवना के आतंकी हमला भी मानल जा सकत बा । आज के अत्याधुनिक तकनीकी युग में लोग आपन जीवन के सरल बनावे खातिर कईगो उपकरण के प्रयोग करत बा लोग । दुनिया भर में - [साहित्यिक चोरी : समस्या आ समाधान](http://www.bhojpurisahityasarita.com/साहित्यिक-चोरी-समस्या-आ-स/) - हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफार्म प एगो ममिला बहुत चरचा में रहे, जहंवा भोजपुरी के एगो साहित्यकार आ गीतकार प चंचरीक जी के लिखल प्रसिद्द गीत ‘चरखवा चालू रहे’ कॉपी कर के बहुत मामूली हेर-फेर के संगे एगो पत्रिका आ इन्टरनेट प आपन नांव से छपवावे के आरोप लागल. आरोप-प्रत्यारोप के लमहर दौर चलल, - [साहित्य अकादमी भाषा सम्मान-2021](http://www.bhojpurisahityasarita.com/साहित्य-अकादमी-भाषा-सम्म/) - साहित्य अकादमी भाषा सम्मान एगो भारतीय साहित्यिक पुरस्कार हवे,जवना के शुरुवात साहित्य अकादमी सन 1954 से कइलस। साहित्य अकादेमी एगो स्वसत्ताशासी संस्था हवे जवना पर सरकार के हस्तक्षेप नइखे। ई संस्था साहित्यकारन द्वारा साहित्य के बढ़न्ति खातिर बनावल गइल बा। साहित्य अकादमी मान्यता-प्राप्त 22 + 2 गो भाषा में हर बरीस पुरस्कार देवेले। उहवें भोजपुरी - [गुलरी क फूल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गुलरी-क-फूल/) - ढेर चहकत रहने कि रामराज आई , हर ओरी खुसिए लहराई । आपन राज होखी , धरम करम के बढ़न्ती होई , सभे चैन से कमाई-खाई । केहू कहीं ना जहर खाई भा फंसरी लगाके मुई । केहू कबों भूखले पेट सुतत ना भेंटाई । कुल्हि हाथन के काम मिली , सड़की के किनारे फुटपाथो - [मति मारीं हमके](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मति-मारीं-हमके/) - ओई दिन माई घर की पिछुवाड़े बइठि के मउसी से बार झरवावत रहे। तवलेकहिं बाबूजी आ गइने अउर माई से पूछने की का हो अबहिन तइयार ना भइलू का? केतना टाइम लगावतारू? माई कहलसि, “बस हो गइल, रउआँ चलिं हम आवतानी।” खैर हम समझि ना पवनी की कहाँ जाए के बाति होता। हम लगनी सोंचे - [अवघड़ आउर एगो रात](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अवघड़-आउर-एगो-रात/) - रहल होई १९८६-१९८७ के साल , जब हमारा के एगो अइसन घटना से दु –चार होखे के परल , जवना के बारे बतावल चाहे सुनवला भर से कूल्हि रोयाँ भर भरा उठेला । मन आउर दिमाग दुनों अचकचा जाला । आँखी के समने सलीमा के रील मातिन कुल्हि चीजु घुम जाला । इहों बुझे मे - [गयल गाँव जहाँ गोंड़ महाजन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गयल-गाँव-जहाँ-गोंड़-महाजन/) - का कहीं महाराज , समय के चकरी अइसन घूमरी लीहले बा कि बड़ बड़ जाने मे मुड़ी पिरा रहल बा । जेहर देखी ओहरे लोग आपन आपन मुड़ी झारत कुछहु उलटी क रहल बा । उल्टी करत बेरा न त ओकरे जगह के धियान रहत बा , न समय के धियान रहत बा । एतना - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-3/) - हमरा पर बाबू जी रहम रउरा करीं गइया बछरुआ नीयर दान जन करीं काहे करतानी बाबा सभे लोग के नकल मत करीं हमके नइहरवा से बेदखल अँखिया में बेटिया के लोर जन भरी गइया बछरुआ........................... धक धक करेला हमरो करेजवा का जाने कइसन मिली ससुरवा सोंचत अँखियाँ से लोर मोरे झरी गइया बछरुआ....................... - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-6/) - पहिले रSहे सरल आ सहज आदमी आज नफरत से बाटे भराल आदमी ॥ गीत जिनगी के गावत - सुनावत रहे अब तs जिनगी के पीछे पर्ल आदमी ॥ आदमी जे रहित तs करित कुछ सही आदमी के जगह बा मरल आदमी ॥ अपना वइभव के तिल भर खुसी ना भइल देख अनकर - [मशीनीकरण बेरोजगारी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मशीनीकरण-बेरोजगारी/) - मंगला के मेहरी दुआरा पर बैठकर के गोबर के गोईठा बनावत रहे, तब ले गाँव के रिस्ता मे बुआ लगीहन उ ओकरा दुआरा पहुँचली। आउर मंगला के मेहरी के उदास चेहरा देख के बोलली। "रे पतोहीया काहे मुहँ लटका के बईठल बारिश रे। ई अवाज गाँव के एगो बुआ के रहे"। पहीले त पतोहीया उल्टा - [बउरहिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बउरहिया/) - " ए अम्मा जी उर्दी छुआए जात ह गांई जा लोग।" लइका क माई अम्मा लोगन के होस धरवलीं कि उ लोग काहें खातिर बोलावल गईल हईं जा।अम्मा लोग कढ़वलीं - ' जौं मैं जनतीं गनेस बाबा अइहन, लीपि डरतीं अंगना दुआर चनन छिड़कतीं ओही देव घरवा चनन क सुन्नर सुबास जौं मैं जनतीं सीतला - [नीति](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नीति/) - तिन्हकर घर सुख चैन रहे जहँ धी सुधिया, तिअई सुमुखी। भृत्य भरोसी, इच्छित वित्त, धनी अपनी सबरंग सखी। अतिथि सेव, देव पूजन नित, मधुर अन्न-रस की जिवनारी, बितत नित्य साध के संगति जीवन धन्य उहे घरुआरी। जवनि हाथ दान नहिं जाने स्रवन सहे नहिं सुक्ति उदेसा। दरस साध आँखि अनजानल, पैर भ्रमे ना तीरिथ देसा। - [बुढ़िया माई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बुढ़िया-माई/) - १९७९ - १९८० के साल रहल होई , जब बुढ़िया माई आपन भरल पुरल परिवार छोड़ के सरग सिधार गइनी । एगो लमहर इयादन के फेहरिस्त अपने पीछे छोड़ गइनी , जवना के अगर केहु कबों पलटे लागी त ओही मे भुला जाई । साचों मे बुढ़िया माई सनेह, तियाग आउर सतीत्व के अइसन मूरत - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-5/) - बचपन के हमरा याद के दरपन कहाँ गइल माई रे, अपना घर के ऊ आँगन कहाँ गइल खुशबू भरल सनेह के उपवन कहाँ गइल भउजी हो, तहरा गाँव के मधुवन कहाँ गइल खुलके मिले-जुले के लकम अब त ना रहल विश्वास, नेह, प्रेम-भरल मन कहाँ गइल हर बात पर जे रोज कहे दोस्त हम हईं - [एगो त्रिवेणी ईहवों बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/एगो-त्रिवेणी-ईहवों-बा/) - मन में घुमे के उछाह, सुन्दरता के आकर्षण आ दू देशन के राजनैतिक सीमा के बतरस के त्रिवेणी में बहत ही हम त्रिवेणी जात रहनी। हमनी के छह संघतिया रहनी जा आ एगो जीप के ड्राईवर। हमरा के छोड़ के सभे एह प्रान्त से परिचित रहे। हमरा बेचैनी के एगो इहो कारन रहे की आजू - [भोर के गद](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोर-के-गद/) - मूठरी घाम गुलेट खोंस गइल ह जंगला के फाँक में अखबारी टेल्हा सूरुज कुछ अगिते। एगो चिड़ा ओरी त झूलत नसेनी प पसार रहल बा प्रेम। अनमुन्हे के फींचल गँड़तर हरकऽता। पाँख छितनार मूरुख चिड़ी खोज रहली ह गूलर के फूल। फिजूल। सकल कपट अघखानि सकल पँड़या सरबजनिक नल प बलटियन पानी छछरावत गावऽता बेहया - [भोजपुरी रचनात्मक आन्दोलन के माने-मतलब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-रचनात्मक-आन्दोलन/) - केहू दिवंगत हो जाला त आमतौर पर कहल जाला कि भगवान उनुका आत्मा के शांति देसु। हमार एगो कवि-मित्र कहेले कि बाकी लोग के त पता ना, बाकिर कवनो रचनाकार खातिर अइसन बात ना कहे के चाहीं। शान्त आत्मा से कवनो रचना त हो ना पाई आ ना हो पाई त बेचारा दुबारा मर जाई। - [सात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सात-पुहुत-के-उखड़-गइल-खूँटा/) - सात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा बेंचा गइलें स बैल दुआर कुछ दिन रहल उदास बाकिर सन्तोषो ई कम ना रहल कि अतना जोतइला के बादो निकल गइल दाम गहँकी अइलें स तय भइल दाम धरा देल गइल पगहा पगहा धरावत दाम धरत माथ पर गमछा धइल ना परल भोर रिटायर होत समय चाचा सोचलें - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-4/) - सहते सहते सहार हो जाई दुखवा बढ़ि के पार हो जाई तनी साजल करीं तरीका से ई जवानी उलार हो जाई छोड़s रहे दs बतिया जाय दs ना तs दुनिया जितार हो जाई छोड़s नफरत के ,प्यार का राहे सभे केहू तोहार हो जाई तनी माटी नरम तू होखे द s - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-3/) - मुहब्बत खेल ह अइसन कि हारो जीत लागेला भुला जाला सभे कुछ आदमी , जब प्रीत लागेला अगर जो प्यार मे मिल जा त माँड़ो-भात खा लीले मगर जो भाव ना होखे , मिठाई तीत लागेला । पड़े जब डांट बाबू के , छिपीं माई के कोरा मे अजी ई बात बचपन के - [भिनसहरा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भिनसहरा/) - ''फूटल , किरिनिया ,त, मन, मुसूकाइल बिहंसल, भोर- भिनसार , लक-दक फुलवा, के, भरल बगइचा से , धरती के सोरहो सिंगार i उचरत- कगवा ,लेअइलस , सनेसवा , बहुरल ,दिनवा ,हमार , पुरुबी -बयरिया ,उड़वलस अंचरवा ... ... चुनरी भरल, कचनार i मुंहवा के ,पनिया, सजनिया ,निहारे ख़ुशी -ख़ुशी ,ओसरा , दुवार - [मजदूर के प्रेमकथा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मजदूर-के-प्रेमकथा/) - मनोज एगो डेहारी मजदूर रहें। अभी-अभी नया साल में ही ओकर शादी भाईल रहें। मनोज के सब साथी आपन मेहरारु के साथे घुमे जात बारे वेलेंटाईन डे पर। मनोज भी सोचलस की हमू काहे ना आपन औरत के कही घुमावे ले जाई। मनोज एगो खुशीदिल इंसान रहें। ठेकेदार से पाईसा लेके मनोज प्लान बनाईलस कि - [बोरसी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बोरसी/) - घर में नाया सामान के अइला पर पुरनका के पूछ घट जाला कबो कबो त खतमें हो जाला , कमो बेस घर परिवार आ हितइयो के ईहे हाल होला जइसे जीजा के अइला पर फूफा के पूछ कम हो जाला, बेटी के होते बहिन के पूछ घट जाला ,नात नतकुर के होते आजा आजी पर - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत-2/) - सपना मे सुध–बुध के खेती अंगे-अंग कचनार । सखी रे, अइसन होला प्यार । लैला-मजनू हीर के देख प्रेम मे पसरल पीर के देख राधा के पायल के धुन पर मुरली के तस्वीर के देख श्रवण के कांधे के बहँगी जगत भइल उजियार । सखी रे, अइसन होला प्यार । लक्ष्मण,राम,भरत सम भाई - [देंह फागुन महीना हमार भइल बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/देंह-फागुन-महीना-हमार-भइल/) - जहिए से नैना दु से चार भइल बा, इंतजार में मजा बेसुमार भइल बा I पह फाटल हिया में अंजोर हो गइल, पाँख में जोस के भरमार भइल बा I जाल बंधन के तहस नहस हो गइल, संउसे धरती आ अम्बर भइल बा I पूस के दिन बीतल बसंत आ गइल, देंह - [डिजिटल जमाना अउर रामधनी बब्बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/डिजिटल-जमाना-अउर-रामधनी-ब/) - खुद से त अब नाही उनकर कइल बा लड़िकन के बुद्धि पे पत्थर धइल बा मोदी क अभियान का चल गइल बा रामधनी बब्बा क फजीहत भइल बा जब से खुलल हउए जनधन क खाता खाता में रुपिया न आवत न जाता कुछ गड़बड़ी बा रुकल बाटे पेंशन बब्बा से ज्यादा हौ आजी के - [कवन गीत हम गाईं बसन्ती](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कवन-गीत-हम-गाईं-बसन्ती/) - कठुआइल उछाह लोगन के, मेहराइल कन -कन कवन गीत हम गाईं बसन्ती पियरी रँगे न मन !! हर मजहब के रंग निराला राजनीति के गरम मसाला खण्ड खण्ड पाखण्ड बसन्ती चटकल मन – दरपन !! गठबन्धन के होय समागम तिहुआरी टोटरम के मौसम धुआँ -धूरि कोहराम मचावे धरती अउर गगन !! गलत - [भोर हो गइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोर-हो-गइल/) - खोल द दुआर, भोर हो गइल। किरिन उतर आइल, आ खिड़की के फाँक से धीरे से झाँक गइल, जइसे कुछ आँक गइल, भीतर से बन्द बा केंवाड़ी त बाहर के साँकल के पुरवाई झुन से बजा गइल, आँगन के हरसिंगार, दुउरा के महुआ जस, चू-चू के माटी पर अलपना सजा गइल, ललमुनियाँ चहक उठल, बंसी - [सात गो गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सात-गो-गीत/) - सरस्वती वंदना शारदा भवानी दीप ज्ञान के जराई दऽ मन के दूआर से अन्हरिया भगाई दऽ गने गने मने मने बुद्धि आ विवेक दऽ धरम अनेक भले भाव सब के एक दऽ दूध पानी जस देशवासी रहें मिलि के एकता के पाठ लोगे लोग के पढ़ाई दऽ घावे घाव कइले बाते दुखवा दुधारी बितली उमिरिया - [कठकरेजी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कठकरेजी/) - राजबनी कुछ कसल-कसल। डोले झिर-झिर पुरवइया रे। भोरघुमंतू बूढ़ा-बूढ़ी सितिआइल सुकवार दूब पऽ दँवरी पारे। बगले में मनबढ़ मुस्टंडा एक सहस्सर डंड पेल के पाँखुर झारे। एक ओरि धुंधरात आँखि के फिकिर बाटे। गठिया से टभकत ठेहुना के जिकिर बाटे। डम्हकल आम टपकबे करिहें, केहू कही। कतिनो रँउदऽ दूब बूढ़ंगी होनी त होइए के रही। - [राजनीति बिख बोली](http://www.bhojpurisahityasarita.com/राजनीति-बिख-बोली/) - एकहुँ अवसर छोड़त नइखे कँउचावे के , बोल रहल बा बोली ; राजनीति बिख घोली । जइसे खेल भइल लइकन के , काट रहल बा चिउँटी । पुलु - लुलु अँउठा देखलावे अउरी झोंटा-झोंटी । जब - जब आपन मुँहवा खोली टुभुकत बोल कुबोली । राजनीति बिख घोली ।। पाथर जोड़ी बनल महल में रहत - [बरसे बदरिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बरसे-बदरिया/) - नन्‍हीं–सी गुड़िया के गोदिया उठवलैं लोरिया सुनाय नैन निदिया बलवलैं अँगले में झरैला दुलार हो बाबा मोर आवैं बखरिया॥ नेहिया की छँहियाँ में गुनवाँ सिख्‍वलैं बचपन से बड़पन उमिर ले पढ़वलैं नेहिया कै भरल भंडार हो बाबा मोर आवैं बखरिया॥ दुखवा उठाइ धरे सुखवा बिछउलैं हँसि हँसि के सबही के नेहिया लुटउलैं मोहिया भरल बा - [हम भोजपुरिया साहित्यकार बानी आ तू ......?](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हम-भोजपुरिया-साहित्यकार/) - का जमाना आ गयो भाया , जेहर देखा ओहरे मचमच हो रहल बा । सभके त भोजपुरिया साहित्यकार कहाये के निसा कपारे चढ़ के तांडव क रहल बा । 56 इंची वाला एह लोगन देखते डेरा गइल बा , एही से दिल्ली छोड़ के गुजरात भागल बा । मने हेतना बड़का , जे केकरो सुनबे - [साठ बरिस के भइया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/साठ-बरिस-के-भइया/) - भउजी सोरह के बाड़ी आ साठ बरिस के भइया बाज के चोंच में देखीं अंटकल बिया एक गौरइया भिखमंगा जी बेंच के बेटी, दारू पीके कहलें बाबू बड़ा ना भइया साला सबसे बड़ा रूपइया “पराम्ब्यूलेटर” में घूमत बाड़े अब डैडी के सन ऊ का जनिहें का होला ई “पिठइयां अउर कन्हइया” पूजा - [भोजपुरी हमरे मन-प्रान में बसल हे](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-हमरे-मन-प्रान-में/) - ऊ भारत के आपन मातृभूमि माने लीं अउर मॉरीशस के कर्मभूमि। अपने पुरखन के देस भारत से उनके एतना लगाव ह कि इँहा से वापिस मॉरीशस लवतट के बेरी अइसे आँख भरि-भरि हिरोहेलीं जइसे नइहर छोड़ के ससुरे जात होखं। मॉरीशस क सरनाम भोजपुरी गायिका हईं अउर अभिनय के क्षेत्र में भी उनके महारत हासिल - [लोकमन आ लोकरंग के चतुर चितेरा भिखारी ठाकुर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/लोकमन-आ-लोकरंग-के-चतुर-चित/) - लोकमन आ लोकरंग के चतुर चितेरा भिखारी ठाकुर आजुओ भोजपुरी के सबसे चर्चित व्यक्ति बाड़न. केहू उनके समय-संदर्भ के सर्वाधिक चर्चित नाटककार का रूप में, भोजपुरी के ‘शेक्सपियर’ मानल त केहू भोजपुरी भाषा-साहित्य के प्रचार-प्रसार खातिर ‘भारतेन्दु’ का नाँव से नवाजल. पुरबी राग के जनक महेन्दर मिसिर का बाद, बलुक उनहूँ ले ढेर भिखारी ठाकुर - [मार देहला रजऊ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मार-देहला-रजऊ/) - हिन्दी के कइला बेड़ा पार हो, भोजपुरिया के मार देहला रजऊ || मार देहला रजऊ हो मार देहला रजऊ, भोजपुरिया के मार देहला रजऊ || दिन दिन बढे अनुसूचिया से दुरिया ओही से घरवा में तलफे भोजपुरिया इज्जत भइल मोर उघार हो भोजपुरिया के मार देहला रजऊ।| अटकन चटकन बहुत देखवला वादा के - [घेरी घेरी बरसे बदरिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/घेरी-घेरी-बरसे-बदरिया/) - घेरी घेरी बरसे बदरिया बलम नौउकरिया से आई जा हो। बदरा अंगे अंग करेला ठिठोली मारे ला मुस्की बोलेला कुबोली घड़कन जगावे बुजुरिया बलम नौउकरिया से आई जा हो। चुअ ता ओरवन बह ताटे खोरी छुअत हवईया मोहै चोरी चोरी झाँकत घटा अँगनईया बलम नौउकरिया से आई जा हो। देवरा सतावे ला कजरा निहारी ननदी - [नेता काका](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नेता-काका/) - नेता काका के असली नाव हमरो पता नइखे पर गाँव-जवार,हित-नात सब केहू उनके नेते-नेते कइले रही....हँ कुछ लोग उनके दरबरियो कहेला। दरअसल एक बेर के बाति ह की चुनाव में नेता काका राजमंगल पाणे के परचार करत रहने। ओ ही बीचे उ एक बेर कवनो अउर नेता के परचार में देखि लेहल गइने। अब ए में - [तनी बरिस$ ना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/तनी-बरिस-ना/) - तनी बरिस$ ना बदरा कचरि के. गरमी डललसि बेमार, हो के बहुते लाचार, करीं तहसे गोहार हम लचरि के. तनी बरिस$ ना बदरा कचरि के. अउसत बा, रात - दिन छूटे पसेना सूखे ना, केतनो हँउकला से बेना धरती भइली अंगार, जरे अंगना दुआर, जान मारत हमार बा जकड़ि के. तनी बरिस$ ना बदरा कचरि - [बुधिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बुधिया/) - गाड़ी टेसन से अबही छूटल ना रहेल सवारी अपने मे अरूझायल हउए । केहू सूटकेस मे चेन लगावत ह,त केहू आपन बेग के सही करत ह,त केहू आपन सीट न. खोजत बा।तबही धच - घचक करत गाड़ी आगे बढै़ लगल । तब ले वहीं मे से केहू क अवाज सुनाईल ,इंजन लग गयील अब गाड़ी - [पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइले](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पहिले-पहिल-जब-वोट-मांगे-अइ/) - पहिले-पहिल जब वोट मांगे अइले तोहके खेतवा दिअइबो ओमें फसली उगइबो । बजडा के रोटिया देई-देई नुनवा सोचलीं कि अब त बदली कनुनवा । अब जमीनदरवा के पनही न सहबो, अब ना अकारथ बहे पाई खूनवा । दुसरे चुनउवा में जब उपरैलें त बोले लगले ना तोहके कुँइयाँ खोनइबो सब पियसिया मेटैबो ईहवा से - [समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/समाजवाद-बबुआ-धीरे-धीरे-आई/) - समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई हाथी से आई, घोड़ा से आई अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद... नोटवा से आई, बोटवा से आई बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद... गाँधी से आई, आँधी से आई टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद... काँगरेस से आई, जनता से आई झंडा से बदली हो आई, - [ई आठवीं अनुसूची नहिंए रहे त का हरज !](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ई-आठवीं-अनुसूची-नहिंए-रहे/) - ( अपने अद्भुत-सरस काव्य-पाठ से दर्शकन के लोभे -मोहे में प्रकाश उदय जी जेतना निपुण हउवन, ओतने गुणी, ओतने समृद्ध अपने लेखनी से भी हउवन।आशा ह कि,अजब ओज,अलहदा वाचन-लेखन शैली, बेहद विनम्र बाकिर तनिक संकोची-लजाधुर सुभाव वाले, भोजपुरी साहित्य क सर्वप्रिय -प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रकाश उदय जी से 'भोजपुरी साहित्य-सरिता' क सह-संपादिका सुमन सिंह क ई - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल-2/) - कम में गुजर-बसर रखिहऽ! घर के अपना, घर रखिहऽ! मुश्किल-दिन जब भी आवे दिल पर तूँ पाथर रखिहऽ. जब नफरत उफने सोझा तूँ ढाई आखर रखिहऽ. आपन बनि के जे आवे सब पर खास नजर रखिहऽ. दर्द न छलके ओठन पर हियरा के भीतर रखिहऽ. एह करिखाइल नगरी में दामन तूँ ऊजर रखिहऽ. डॉ अशोक - [रोज-रोज काका टहल ओरियइहें](http://www.bhojpurisahityasarita.com/रोज-रोज-काका-टहल-ओरियइहें/) - भीरि पड़ी केतनो, न कबों सिहरइहें.. रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! भोरहीं से संझा ले, हाड़ गली बहरी जरसी छेदहिया लड़ेले सितलहरी लागे जमराजो से, तनिक ना डेरइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! गोरखुल गोड़वा क,रोज-रोज टभकी दुख से दुखाइ सुख, एने-ओने भटकी निनियों में अकर-बकर, रात भर बरइहें! रोज-रोज काका, टहल ओरियइहे! फूल-फर देख के, उतान - [मांगलिक गीतन में प्रकृति-वर्णन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मांगलिक-गीतन-में-प्रकृति/) - लोक-जीवन में आदमी के सगरो क्रिया-कलाप धार्मिकता से जुड़ल मिलेला। आदमी एह के कारन कुछू बुझेऽ। चाहे अपना पुरखा-पुरनिया के अशिक्षा आ चाहे आदमी के साथे प्रकृति के चमत्कारपूर्ण व्यवहार। भारतीय दर्शन के मानल जाव तऽ आदमी के जीवन में सोलह संस्कारन के बादो अनगिनत व्रत-त्योहार रोजो मनावल जाला। लोक-जीवन के ईऽ सगरो अनुष्ठान, संस्कार, - [हर रंग में रंगाइल : ‘फगुआ के पहरा’](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हर-रंग-में-रंगाइल-फगुआ-के/) - एगो किताब के भूमिका में रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ऊर्फ जुगानी भाई लिखले बाड़े कि ‘भाषा आ भोजन के सवाल एक-दोसरा से हमेशा जुड़ल रहेला। जवने जगही क भाषा गरीब हो जाले, अपनहीं लोग के आँखि में हीन हो जाले, ओह क लोग हीन आ गरीब हो जालंऽ।’ ओही के झरोखा से देखत आज बड़ा सीना चकराऽ के कहल जा सकत - [हम गाँव क हईं गँवार सखी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हम-गाँव-क-हईं-गँवार-सखी/) - हम गाँव क हईं गँवार सखी! हम ना सहरी हुँसियार सखी! बस खटल करीला सातो दिन, आवे न कबो अतवार सखी! हम गाँव क हईं गँवार सखी! लीची,अनार,अमरूद,आम, सांझो बिहान खेती क काम, घेंवडा़,लउकी,धनिया जानी, ना जानीं हरसिंगार सखी!हम गाँव क हईं गँवार सखी! इहवाँ जमीन बा बहुत ढेर, असहीं उपजे जामुन आ बेर, इ - [बसमतिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बसमतिया/) - बसमतिया के उपर बडा कठिन समय बा हस्पताले चहुपे के ।सॉय सॉय करत अन्हरीया बा । कोरा मे बोखार से तपत ओकर साल भर क् बेटवा। फटहीा लुगरी मे लपेटले अपने दुधमुहा दुलरूवॉ के करेजा से चिपटवले बसमतिया अपने भतारे के पीछे पीछे भागत चलत जात बदहवासल एक गो मतारी "का जाने भगवान हमसे काहे - [बदरो मरसिया बांचत ह](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बदरो-मरसिया-बांचत-ह/) - संवत २०७३ अषाढ़ अन्हरिया पख के रात क समय बा सगरो आसमान में बदरी घेरले ह तनिकों देखात नइखे , हवा सिहरा देत बा । हल्की झींसी पडै़ लगल ह , हवा चहूँ ओर सांय सांय करत बा । पुरा गोपालपुर गॉव नींद मे सुतल ह ,लेकिन हमरे आंखी मे नींद कहॉ ? अब पहिले - [भोजपुरी गीतन में होली वर्णन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-गीतन-में-होली-वर्/) - भोजपुरिया धरती उत्सवधर्मी धरती ह। भोजपुरिया लोकजीवन मुख्य रूप से खेती-किसानी पर आधारित बाटे ना, त मेहनत मजदूरी पर। भोजपुरिया लोकजीवन के हर एक परब त्योहार कृषि से जुड़ल बाटे। एह त्योहारन में होली-फगुआ के त कहहीं के का बा?घर के कोठिला में घान-चाउर भरल रहेला, बघार में गेहूँ गदरात रहेला,आम-महुआ मोजरात रहेला आ सरसो - [गाँव-गिरांव के मड़ई से आध्यात्म के शिखर का अनूठा कवि- अनिरुद्ध](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गाँव-गिरांव-के-मड़ई-से-आध्य/) - पुरूबी बेयार से रसगर भइल गँवई सुघरई के सँवारत, ओकरे छटा के उज्जर अंजोरिया में छींटत-बिदहत कविवर अनिरुद्ध के गीत आ कवितई अपना तेज धार में सभे पाठक आ श्रोता लोगन के बहा ले जाये के कूबत राखेले। अनिरुद्ध जी के गीत आ कवितई अपना स्पर्श मात्र से पथरो पर दूब उगावे लागेले। फेर कतनों - [पंछी उड़त गगन छिछिआए](http://www.bhojpurisahityasarita.com/पंछी-उड़त-गगन-छिछिआए/) - पंछी उड़त गगन छिछिआये। अइसन उठल बवण्डर-अंधर जाना कहाँ,कहाँ चलि जाय। पंछी उड़त गगन छिछिआये॥ तनिक हवा के दया न आइल टूट-टूट खोंता उधिआइल टूटल डाढ़ बसेरा उजड़ल ना निशान कुछ जगह चिन्हाए पंछी उड़त गगन छिछिआये॥ नीड़ गिरल कुछ नदी नीर में ताल-तलइया नहर-झील में भुंइ भूखे कुछ मरे डूब जल - [अनन्त](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अनन्त/) - *युगम- युगम अमर अनन्त रहे* *उ परेम रस भाखा भोजपुरी होखे* ई सोच, ई फिकीर हमरा अंदर काहे । कवना फायेदा खातिर। कवन लालच घेरले बा, समझ मे नइखे आवत।ई हमरा समझ से परे काहे बा।खुलल आसमान होखे। बदरी भा टटहात घाम होखे। दिन होखे चाहे रात होखे। हमेसा मन में चलत एकही बात बा। - [हारब त हारब बाकिर तोहरा के जीते ना देब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हारब-त-हारब-बाकिर-तोहरा-के/) - हिन्दुवन के कमजोरी ह कि ऊ जीव हत्या पसन्द ना करसु. इहां ले कि जे मांसभक्षी होला उहो अपना सोझा काटल पसन्द ना करे. जे काटेला ऊ झटका में काटेला कि कटाएवाला के कम से कम कष्ट होखे. दुनिया के सगरी नीति नैतिकता पोसे पकावे वाला हिन्दू के इहो याद ना रहे कि जब-जब ऊ - [होली मिलन/वसंतोत्सव के आयोजन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/होली-मिलन-वसंतोत्सव-के-आय/) - गाजियाबाद । पूर्वांचल भोजपुरी महासभा गाजियाबाद का तत्वावधान में अग्रसेन भवन,लोहिया नगर में भोजपुरी सम्मेलन आ होली मिलन/वसंतोत्सव के आयोजन कइल गइल।एह आयोजन में मुख्य अतिथि का रूप में श्रीमती आशा शर्मा (महापौर), गाजियाबाद सिरकत कइली। कार्यक्रम का आरंभ अतिथियन द्वारा दीप प्रज्वलन आ सरस्वती वंदना के संगे भइल। सरस्वती वंदना रोमी माथुर जी के - [भोजपुरी साहित्य के आधी आबादी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-साहित्य-के-आधी-आब/) - हाल के कुछ बड़ घटना में एक बात इहो बा कि लेखन के दुनिया में औरतन के हिस्सेदारी पर बातचीत कइल जाता। शहर-शहरात से लेके गांव-जवार के दूर-दराज़ इलाका में जइसे-जइसे सामाज आ राजनीति में महिला लोगन के भागीदारी बढ़ल जाता, ओह पर चर्चा भी खूब होता। बाकिर आपन जिनगी के मूल समस्या के लेके - [ब्रजभूषण मिश्र आ उनकर रचना संसार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ब्रजभूषण-मिश्र-आ-उनकर-रचन/) - ब्रजभूषण मिश्र कवि, निबंधकार, संपादक, समीक्षक आ संगठनकर्ता होखे का पहिले साफ मन-मिजाज आ दिल-दिमाग के सोगहग मनई हउवें। साफ मन-मिजाज के मनई मतलब सभकरा हित आ चित के खेयाल राखेवाला। घरियो छन जे इनका से बोल बतिआ लेलस ओकरो के पीठ पीछे कहत सुनले बानी - ए जी, एह जुग-जबाना में मिसिर जिउवा अइसन - [जनगीत आ भोजपुरी जनगीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/जनगीत-आ-भोजपुरी-जनगीत/) - जनगीत में जन आ गीत एक साथे बा।एह में जन पहिले बा आ गीत बाद में।एह पहिले आ बाद के जवन मतलब ह तवन ई ह कि जन के कंठ में गीत बसेला,ओकर हिया से गीत फूटेला।जन आ गीत के जुगलबन्दी में पूरा जीवन धड़केला।राग-रंग के साथे विरह-बिछोह,दुख-तकलीफ आ जीवन-संघर्ष।सज्जी समाज मय नाता-रिश्ता के साथे।जनगीत - [आखिर के ठगाता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आखिर-के-ठगाता/) - शेखर के गांजा के इ पहिलका दम रहे। अवरू सब साथी गांजा के दम पचावे आ जोम से मुँह आ नाक से धुँआ निकाले में माहिर हो चुकल रहन। पहिलके दम शेखर तनि जोर से खींच लेले रहले। उनका से बर्दाश्त ना भइल। उनकर माथा चकराए लागल। बाकि उ अपना साथी लोग से कुछ ना - [कुछ दिन बचके रहअ गुरु](http://www.bhojpurisahityasarita.com/कुछ-दिन-बचके-रहअ-गुरु/) - कुछ दिन बचके रहअ गुरु घर में घुस के रहअ गुरु केहू से मत तनिक सटअ सबसे कट के रहअ गुरु फइलल बाटै खूब कोरोना ख़ूब मचल हौ रोना-धोना कउनो दवा न असर करत बा नाहीं कउनो मंतर टोना चीन से फइलल दुनिया भर में गाँव-गाँव में,शहर-शहर में एक लोग से अउर लोग में एक - [भोजपुरी समीक्षा के बढ़त डेग](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-समीक्षा-के-बढ़त-डे/) - 2021 के जून महीना भोजपुरी समीक्षा खातिर बढ़िया रहल।दूगो महत्वपूर्ण किताब सर्वभाषा ट्रस्ट, दिल्ली से छपल।प्रो.बलभद्र के एगो किताब -"भोजपुरी साहित्य :हाल फिलहाल"आ डा.ब्रज भूषण मिश्र के किताब -"भोजपुरी साहित्य :प्रगति आ परख"सामने आइल।एह दूनू किताबन से भोजपुरी के सृजनशीलता के पता चली।एकनीं में संकलित आलेखन में कवनो -न -कवनो एगो खास भोजपुरी रचना भा - [सावन भादो फेल भइल ह](http://www.bhojpurisahityasarita.com/सावन-भादो-फेल-भइल-ह/) - जेठ में अइसन खेल भइल ह सावन भादो फेल भइल ह । नदी नहर फूफकरले बाटे ताल पोखर भी भरले बाटे धान क बिआ सांस ना लिहलस अइसन इहां झमेल भइल ह सावन भादो फेल भइल ह । केकर लगल ह उल्टा बानी लूह के बदले बरसे पानी ललका पानी भरल सिवनवां पूरा रेलम रेल - [साहित्यकार के माने-मतलब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/साहित्यकार-के-माने-मतलब/) - साहित्य एगो अइसन शब्द ह जवना के लिखित आ मौखिक रूप में बोले जाये वाली बतियन के देस आ समाज के हित खाति उपयोग कइल जाला। ई कल्पना आ सोच-विचार के रचनात्मक भाव-भूमि देवेला। साहित्य सिरजे वाले लोगन के साहित्यकार कहल जाला आ समाज आ देस अइसन लोगन के बड़ सम्मान के दीठि से देखबो - [संत कबीर के सगुनोपासना](http://www.bhojpurisahityasarita.com/संत-कबीर-के-सगुनोपासना/) - संत कबीरदास के बारे ई आम राय बा कि ऊ उत्तर भारत में निरगुन भक्ति धारा के पहिल संतकवि हवें। बाकिर हमरा समझ से कबीरदास खाली निरगुनिए भक्ति धारा के संत नइखन। ऊ सुगुन भक्ति धारा के भक्तो बाड़न। बाकिर ओह तरह से ना जइसे सगुन भक्ति धारा के संतकवि तुलसीदास बाड़न। तबो जे अपना - [बतकूचन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बतकूचन/) - का कबो सुनले बा केहू जे कवनो जियतार देह, माने कवनो देही, आपन मन में सहेजल अनुभव के अनेरिये जियान होखे देले ? ना ! काहें जे, अइसना अनुभवे के बल आ बिस्तार प कवनो मनई आपन तर्क गढ़ेला। आपन बात के मर्म जता सकेला। आपन अर्जित अनुभवे के सान प केहू के विवेक प - [मई में माई चल गइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मई-में-माई-चल-गइल/) - "डभकेला मन के सपन, माई पसवे लोर । आस सेराइल जा रहल दुख के ओर न छोर।।"(सुकुपा) 'मातृदिवस' के छव दिन पहिलहीं एह साल 3 मई के माई विदा ले लिहलस।जब से एह दिवस विशेष के प्रचलन भारतो में खूब बढ़ गइल , माई के फोटो हम फेसबुक पर डालल शुरु कर दिहनीं ।एह - [वासकसज्जा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/वासकसज्जा/) - हुलस अंगना नूतन नेह, पसरल गेह खनक कंगना। गदगद गात सुहावन सिहरन उमगल चाल अपार पुलक मन आपन आन, एक समान हरख नयना। चान लुटावत जोती निरमल निरखत नखत गगन से अविकल मुखड़ा गोर, नित चितचोर रटत रटना। दीप जरा चितवे अपलक पथ मिलन आस पिय के सुधि में रत आहट जानि, - [बरहुआँ के श्री ब्रह्मेश्वरनाथ मंदिर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बरहुआँ-के-श्री-ब्रह्मेश्/) - संसार मे अइसन कमे लोग होले, जेकरा हाथे नीमन काम होला, जवना से कीर्ति बढ़ेले। ईनार ,पोखरा, मंदिर, ईस्कूलन के बनवावल सभे के कल्यान खातिर होला।भगवान जेकरा हाथे ई सब करावल चाहेलन, उहे अइसन कुल्हि काम करे खाति अगराला। ओकरा जिनगी में ख्याति त मिलबे करेले, ओकर लोक आउर परलोको संवर जाला। धन- दउलत त - [भोजपुरी भासा का मानकीकरन के बेवहारिक आधार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/भोजपुरी-भासा-का-मानकीकरन/) - संसार का हर ग्यात भासा के दू खाना में राखल गइल। पहिला - एक केन्द्रीय भासा आ दोसर - बहु केन्द्रीय भासा। एक केन्द्रीय भासा के माने एक मानक रूप के भासा ; जइसे - रूसी, इतालवी, जापानी वगैरह। एह एक मानक रूप वाला भासा के अंगरेजी में मोनोसेंट्रिक लैंग्वेज ( Monocentric Language ) कहल - [नदिया भेदवा खोलत बिया](http://www.bhojpurisahityasarita.com/नदिया-भेदवा-खोलत-बिया/) - करिआ चितउरि बोलत बिया। कर्फू लागल बहरा बा सांसन ऊपर पहरा बा खाली खतरे खतरा बा नइया डगमग डोलत बिया। घरवो के भीतरा डर बा गांवन से बुरा खबर बा बांचल ना कौनो दर बा नदिया भेदवा खोलत बिया। - डाॅ. हरेश्वर, सतना - [मजबूरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/मजबूरी/) - कल्लूआ के उमर जब तीन साल के रहे तबे ओकरा बाबूजी के देहांत हो गईल। कल्लू के पूरा जिम्मेवारी अब ओकरा माई पर आ गईल। ओकर माई मेहनत-मजूरी क के पाले लगली, समय बीते लागल। कल्लूआ के एके गो काम रहे, खाईल-पीअल आ कसरत कईल। वक्त के साथे कल्लू एगो गबरू जवान के रूप में - [गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गीत/) - आफत बनके आइल कोरोना, अजी हम सुकवार नइहर की। आटा सानत मोरी मुरूके कलाई, मुरूके कलाई अजी जीउ जर जाई, ओह पे ताना मारे सास! कहें काम इ तिहारी, अजी हम सुकवार नइहर की। आफत बनके आइल कोरोना ... बरतन माजत मोरी हाथ करिआई, हाथ करिआई सगरी देह मरूआई, ओह पे लेबे - [बरगद गाछ](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बरगद-गाछ/) - बरगद गाछ के तरे बइठल शिवशंकर के आपन बाबूजी इयाद पड़ गइनी। बाबूजियो तऽ बरगदवे अइसन रहनी।केतना लोग के ऊपर आपन हाथ रखनीं। सगरी गाँव उनहीं जमीन पर राज करत बा। बाकिर हमरा पता ना रहे कि उ खोख बरगद रहन। जेकरा में दीमक नियन भीतरे भीतरे गोतिया दायाद आ बेटवन लोग बाँटत काटत छाँटत - [गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/गजल/) - जलल बा हिया में अगन धीरे धीरे मिलल जब नयन से नयन धीरे धीरे जुड़ल प्रीत के डोर जबसे ह उनसे सजावे लगल मन सपन धीरे धीरे नशा प्रीत के लग गइल बाटे अइसन रहत मन ह खुद में मगन धीरे धीरे बहक जाला तन मन न धीरज धराला बुलावेलु चुपके सजन - [केकरे ख़ातिर](http://www.bhojpurisahityasarita.com/केकरे-ख़ातिर/) - दिनवा दिनवा भागत हउवअ केकरे खातिर रतिया रतिया जागत हउवअ केकरे खातिर बीवी-बच्चा ख़ातिर भी ना समय बचत बा ऑफिस में ही सारा-सारा समय कटत बा पइसा त आवत बा लेकिन जीवन बा फीका पइसा खर्च करअ क टाइम कहाँ मिळत बा बहरअ रहअ चाहत हउवअ केकरे खातिर झूठअ मन बहलावत हउवअ केकरे खातिर करअ नौकरी के रोकत बा खूब करअ खिंचअ रुपिया - [का मरदे का हाल बा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/का-मरदे-का-हाल-बा/) - पहिला बार जोगेश्वर भाई के केहूँ मुम्बई बोलाइले रहे ई कह के आवऽ बहुत बढ़िया कम्पनी बा, फ्रेशर्स लइकन खातिर सिखे के बहुत बढिया जगह बाटे। जोगेश्वर भाई किशोरावस्था से आगे निकल चुकल रहलन अब उनका आपन जिम्मेदारी के आभार हो चुकल रहें जेंगन हम के भी आभार हो चुकल रहे आउर आखिर जिम्मेदारी के - [बगल में छुरी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/बगल-में-छुरी/) - आन्हर बहिर गरहो से गहिर पोतले चन्नन उजरे पहिर। ओढ़ले कमरी लिहले गगरी बिष से भरल चललें डहरी। कुछहू बोलत सगरों डोलत सरम छोड़िके गठरी खोलत। कुछ के बटलें सभके कहलें मुँह पर ढकनी बन्हले रहलें। कउड़ा तपलें उलटा जपलें बाउर माहुर सोझहीं नपलें। करमें भगलें धउरे लगलें हाथ जोरिके - [हमार टोला](http://www.bhojpurisahityasarita.com/हमार-टोला/) - घरे-घर पालेलें सपोला, हमार टोला। सभही बनेला रामबोला, हमार टोला॥ चर-चेरउरी से बतिया बनावेला आगु-पाछा घूमि उनुका पटावेला कतहूँ उठवले फिरे झोला, हमार टोला ॥ जोरत गाँठत सुतार जोगावेला चन्नन छिरकी जगहियो गमकावेला ओहमें मिलवले बिसगोला,हमार टोला॥ बीने-बरावे में बखत खपावेला आपन अपने के कुल्हि चमकावेला निकसेला बइठी के डोला,हमार टोला॥ - [वारि जाऊँ ए सखी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/वारि-जाऊँ-ए-सखी/) - वारि जाऊँ ए सखी,2 हो बबुअवा निरखि वारि जाऊँ ए सखी॥ सुघर-सुघर हाथ-गोड़, सुघर नयनवाँ सुनि लागै बोलिया, बोलत मयनवाँ अचके मुसुकी परखि, वारि जाऊँ ए सखी। हो बबुअवा निरखि, वारि जाऊँ ए सखी॥ बिहँसेला बाबू, झलके दंतुलिया बेर-बेर मुँहवा, डारत अंगुलिया कबों धऊरे लपकि, वारि जाऊँ ए सखी। हो बबुअवा निरखि, वारि - [आईं, गुलरी के फूल देखीं नु....?](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आईं-गुलरी-के-फूल-देखीं-नु/) - ढेर चहकत रहने ह कि रामराज आई , हर ओरी खुसिए लहराई । आपन राज होखी , धरम करम के बढ़न्ती होई , सभे चैन से कमाई-खाई । केहू कहीं ना जहर खाई भा फंसरी लगाके मुई । केहू कबों भूखले पेट सुतत ना भेंटाई । कुल्हि हाथन के काम मिली , सड़की के किनारे - [ए बाबू ! सपना सपने रहि जाई](http://www.bhojpurisahityasarita.com/ए-बाबू-सपना-सपने-रहि-जाई/) - का जमाना आ गयो भाया, अब त उहो परहेज करत देखाये लागल जे रिरियात घूमत रहल। आजु के समय में जब हिंदिये के ओकत दोयम दरजा के हो चुकल बाटे, त अइसन लोगन के का ओकत मानल जाव। हिंदियों वाला लो अपना बेटा-बेटी के अंगरेजी ईस्कूल में पढ़ावल आपन शान बुझता काहें से कि ओहू - [आपन ढेंढर भूलि दोसरा के फुल्ली निहारे के फैसन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/आपन-ढेंढर-भूलि-दोसरा-के-फु/) - का जमाना आ गयो भाया, एगो नया फैसन बजार में पँवरत लउकत बा, ढेर लो ओह फैसन ला पगलाइल बा। उचक के ओह फैसन के लपके खाति कुछ लोगन के कुटकी काट रहल बा। एह फैसन के फेरा में हर जमात के कुछ न कुछ लोग लपके ला लाइन लगवले देखात बा। कुछ लो लपकियो - [अहम् के आन्हर सोवारथ में सउनाइल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अहम्-के-आन्हर-सोवारथ-में-स/) - का जमाना आ गयो भाया, आन्हरन के जनसंख्या में बढ़न्ति त सुरसा लेखा हो रहल बा। लइकइयाँ में सुनले रहनी कि सावन के आन्हर होलें आ आन्हर होते ओहन के कुल्हि हरियरे हरियर लउके लागेला। मने वर्णांधता के सिकार हो जालें सन। बुझता कुछ-कुछ ओइसने अहम् के आन्हरनो के होला।सावन के आन्हर अउर अहम् के - [अनुवाद के बाद के माने-मतलब](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अनुवाद-के-बाद-के-माने-मतलब/) - का जमाना आ गयो भाया। कुछ दिन से में/से के चकरी घूमे शुरू भइल बा। बाक़िर ई चकरिया के घूमलो में कुछ खासे बा। जवन आजु ले मनराखनो पांड़े के ना लउकल। ढेर लोग कहेलन कि अइसन कुल्हि काम पर मनराखन पांड़े के दिठी हमेशा जमले रहेले। अब मनराखनो बेचारे करें त का करें। उनका - [अँधेर पुर नगरी....!](http://www.bhojpurisahityasarita.com/अँधेर-पुर-नगरी/) - का जमाना आ गयो भाया,सगरी चिजुइया एक्के भाव बेचाये लगनी स। लागता कुल धन साढ़े बाइसे पसेरी बा का। कादो मतिये मराइल बाटे भा आँखिन पर गुलाबी कागज के परदा टंगा गइल बा,जवना का चलते नीमन भा बाउर कुल्हि एकही लेखा सूझत बाटे। मने रेशम में पैबंद उहो गुदरी के। मने कुछो आ कहीं। मलिकार - [Blog Post Title](http://www.bhojpurisahityasarita.com/blog-post-title/) - What goes into a blog post? 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रजिस्टर्ड ऑफिस: भोजपुरी साहित्य सरिता 15 A, मानसरोवर ,बम्हैटा लालकुआँ, गाजियाबाद(उ. प्र.)-201002 फोन- 9999614657: ईमेल-editor@bhojpurisahityasarita.com bhojpurissarita@gmail.com कार्य स्थल : भोजपुरी साहित्य सरिता GF-38, कम्पुटर मार्केट निकट पुराना बस अड्डा गाजियाबाद-201001 (उ0 प्र0) फोन-9999614657 ## Categories - [आलेख/निबंध](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/आलेख-निबंध/) - [भोजपुरी कविता](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/भोजपुरी-कविता/) - [भोजपुरी गीत](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/भोजपुरी-गीत/) - [भोजपुरी गजल](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/भोजपुरी-गजल/) - [कहानी](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/कहानी/) - [लघुकथा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/लघुकथा/) - [समीक्षा](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/समीक्षा/) - [संस्मरण](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/संस्मरण/) - [टटका समाचार](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/टटका-समाचार/) - [बतकूचन](http://www.bhojpurisahityasarita.com/category/बतकूचन/) - 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