चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

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पड़लन राम कुकुर के पाले

“ए साह जी हो, तनी एगो कड़क चाय पियवता भाय।आज दिमाग बड़ा गरम ह।”हाँफत-हुँफत हलकान हाल नन्हकू अड़ी पर अवते साह जी से फरमाइस कइलन। ” काहें मूड ख़राब ह नन्हकू भइया।बतावा भला साह जी! जे काम के न काज के,दिन भर लखेरा नियन घुम्मत रहेला ओहू क मूड कब्बो खराब हो सकेला ?।” एक जाना नन्हकू के दिमाग क  तापमान बढ़ावत हंसी कइलन। ” ए साह जी!कह देत हईं कवनो दिने तोहरे दोकान पर खून-खराबा हो जायी त हमके दोस मत दीहा।ई ससुर जवने के सोझ डहरी ना चले…

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खेलवना

भोजपुरी संस्कार गीतन में #खेलवना के बहुत महत्व बा। बालक भइला की खुसी में गावे जाएवाला #सोहर का बाद #खेलवना सबसे जिआदे गावल जाला। सोहर के जहाँ एगो निस्चित छन्द आ लय बा, उहें खेलवना गीतन में ई बन्हान नइखे। कवनो छन्द आ लय में पुरहर मस्ती से #खेलवना गावल जाला। #खेलवना अजबे आनन्ददायक मांगलिक गीत ह, जवना में बालक के रूप- रङग, उठल- बइठल, खेलल- कूदल, हँसल- रोवल, चाल- ढाल आ बाबा- इआ, माई- बाबूजी, भाई- भउजाई, चाचा- चाची के छलकत नेह- दुलार के बरनन होला। ए हिसाब से #तलसीदास जी के ठुमुकि चलत…

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स्मृति शेष (विशेष)

परम पूज्य महामना मदन मोहन मालवीय जी एक युग महापुरुष रहनै। 25 दिसंबर 1861 ई0 में पंडित ब्रजनाथ आउर श्रीमती मुन्ना देवी के बेटा के रूप में जन्म लेहनै । ब्रजनाथ व्यास जी के पवित्र आउर  सात्विक गुड़न क भरपूर प्रभाव मदन मोहन मालवीय जी में बचपने  से दिखाए लगल । घर में प्रारंभिक शिक्षा के बाद उनके पंडित हरदेव जी के धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला मे भेजल गयल। पंडित जी अपने शिष्यन के अपने बचवा जैसे मानै। दूध पियावै अउर कसरत करावै । कुश्ती भी लड़वावै । उनकर इहे ध्येय…

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भोजपुरी कहावतें

बिच्छी के मंतर ना आवे , साँप के बियरी हाथ बढ़ावे चोर चोरी से जाय , हेरा फेरी से ना ओरी तर के भूत जाने सात पुहुत हारे त हूरे जीते त थूरे गांठ के हलुक बात के धनी भर घर देवर भतार से ठाँठा बुझेली चिलम चढ़े ला अंगारी बिन घरनी घर भूत के डेरा ,घरनी अइली त भूतवे डेरा फटक चंद गिरधारी , लोटा ना थारी भइल बियाह मोर करबे का आनकर आटा आनकर घी , चाँप चाँप बाबाजी पिया भए कोतवाल अब डर काहे का ससुरा से…

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