पिनकू जोग धरिहन राज करीहन

बंगड़ गुरू अपने बंगड़ई खातिर मय टोला-मोहल्ला में बदनाम हउवन।किताब-ओताब क पढ़ाई से ओनकर साँप-छुछुनर वाला बैर ह।नान्हें से पढ़े में कम , बस्ता फेंक के कपार फोड़े में उनकर ढ़ेर मन लगे।बवाल बतियावे में केहू उनकर दांज ना मिला पावे।घर-परिवार अड़ोसी-पड़ोसी सब उनके समझा-बुझा,गरीयाय के थक गयल बाकिर ऊ बैल-बुद्दि क शुद्धि करे क कवनों उपाय ना कइलन।केहुतरे खींचतान के दसवीं ले पढ़लन बाकिर टोला- मुहल्ला के लइकन के अइसन ग्यान बाँटें कि लइका कुल ग्यान के ,दिमाग के चोरबक्सा में लुकवाय के धय आवें अउर तब्बे बहरे निकालें…

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घरवा में बाटे न हरदिया, दरदिया……!!

का जमाना आ गयो भाया, मारे बरियरा रोवै न देस।  ई त लमहर आफत आइल बाटे भाई, पहिले लोग कड़ी निंदा से काम चला लेत रहलें,बाकि अचके में सुभाव काहें बदल लीहलें? शाकाहारी होखला का बादो हतना तेज झपट्टा, अचके में  बिसवास नइखे होत। अजबे हालत कर दीहलें यार, न कहते बनता आ न  सुनते | एह बेरी त बेसी थू – थू करा दीहल लोग सगरी दुनिया में। अब त रोवहूँ नइखे देत सन, अबले जेकरा आगु रो-गा के भीख मिल जात रहल ह, उ चीन्हलो से मना कर…

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मानवाधिकार मने रक्षा कवच बाक़िर केकर ….?

का जमाना आ गयो भाया, जेहर देखा ओहरे नटई फ़ारत कुछ लोग देखाइये जा तारन। माने भा मतलब कुछों होखे उनुका चिचिअइले से फुरसत नइखे लेवे के। सभे के आपन-आपन हित बाटे, केकरो अपना दोकनियों के चिंता करे के बा, त केकरो अपना जेब के चिंता बाटे। तनि हई न देखा, सभेले बेसी उहे नरियात देखात ह जेकर ई कुल्हि कइल-धइल बाटे।उनही के आंटा, उनही के घीव, कमरी ओढ़ि के झींक के पियतो बाड़ें आ दोष तवन दोसरा के लगावत बाड़े। आ क़हत का बाड़े कि इनका वोजह से हमरा…

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चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

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कुक्रांद

चौंकि गइनी़ नू ई नाम सुनिके? देश में बनेवाला हजारन दलन में ई एगो दल के नाम ह, जवन अबे नये बनल ह। ओइसे त ई दल बने  आ बनावे के विचार कई साल से चलत रहल ह, लेकिन कई अड़चनन का बावजूद ई रजिस्टर्ड पाटी होइए गइल बा। भइल ई कि कुछदिन पहिले फुलेसर आ भुवर के कुक्कूर आपस में लड़ि गइले सन। समय बीतल, ओ कुक्कूरन में इयारी हो गइल, लेकिन फुलेसर आ भुवर में लाठी- लउर निकलि गइल आ आजु ले बोलोचाल बन बा। उहे कुक्कूरा रोज…

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शेष भगवान जाने ——-!!

का जमाना आ गयो भाया, टँगरी खींचे के फेरा में ढेर लोग अझुराइल बाड़ें। उहो काहें बदे, एकर पता नइखे, बस खींचे के बा, सरेखल बा लोग आ आँख मून के खींच रहल बा। आगु चलिके एकर का फायदा भा नोकसान होखी, एकरा ला सोच नइखे पावत। आला कमान के कहनाम बा, सेकुलर दादा कहले बाड़ें, एही सब के चलते हो रहल बा। अब भलही टँगरी खींचे के फेरा मे खुदे गड़हा गिर के कनई मे लसराए के परत होखे। ओहमे कवन सुख मिल रहल बा भा आगु मिली,पता नइखे।…

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सगरों झोले झाल बा का जी?

                      का जमाना आ गयो भाया , जेने देखी ओने लाइने लाइन लउकत बा। सभे केहू लाइन मे ठाढ़ ह, चुप्पी सधले आ भीतरे भीतर अदहनियाइल। कतना बेबस लउकत बा मनई, तबों दम बन्हले, हुलास आउर जजबा से भरल-पूरल। आगु आवे वाला दिन नीमन दिन होखी एकर बाट जोह रहल बा। कथनी आउर करनी मे उपरियात थोर बहुत नीमन पल के हेरे के भागीरथ परयास करत आम आदमी, तभियो जय जय क रहल बा। वाह रे , जमाना  ! ई…

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टोंटी आउर धोबियापाट के जतरा

का जमाना आ गयो भाया, सभे भाई लोग कुछ ना कुछ उखाड़े-पछाड़े मे लाग गइल बाटे। अखाड़े के रसूख खाति “धोबियापाट” कबों ना कबों लगवहीं के पड़ेला। जब सभे दाँव फेल हो जाले सन, त “धोबियापाट” के सहारा बचेला। फेर मौका आ दस्तूर देखि के “धोबियापाट” दे मारेलन पहलवान लोग। अखाड़ा मे लड़े से पहिले पहलवान लोगन के दिमाग मे एकर जोजना बनि जाले। आखिर अखाड़ा के इज्जत के सवाल उठि जाला। आ इजत खाति त इहवाँ मडर हो जाला। एह घरी सभे एक मुस्त एक्के जोजना पर काम क…

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परिभाषा माने जवन हम गढ़ी………!

का जमाना आ गयो भाया, अब मनई लोग के बजार लाग रहल बा। दोकान सजा – सजा के लोग बइठल बा, खरीदे वालन के इंतजार हो रहल बा। जेकरा नइखे बेचे के, ओकर मालिक लोग पहाड़े हाँक देले बा अपने मवेसियन के। राशि एकही बा मवेसी आ मनई के। अपने हिसाब से बूझ लीहल जाव। हम बड़का, हम बड़का के हो – हल्ला चारु ओरी मचल बा। केकरो चैन नइखे, जे चैन मे बा, ओकरो चैन मलिकार लो छीने मे लाग गइल बा। कुछ के त छीनियो लेले बा। जेकरा…

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अंतरात्मा के आवाज

का जमाना आ गयो भाया, कुरसी के लड़ाई मे साँच के बलि दिया गइल। सत्यमेव जयते लिखलका पत्थरवा लागत बा कवनो बाढ़ मे दहा गइल। तबे नु एकर परिभाषा घरी घरी बदल रहल बा। पहिले दिन कुछ आउर आ दोसरा दिन कुछ आउर। अपना देश मे एकर बरियार सुविधा बा जवन कबों केकरो आवाज के अंतरात्मा के आवाज मे पलट देवेले। बाकि एह आवाज के निकाले खाति ढेर पापड़ बेले के पड़ेला। पापड़ बेल देले भर से कबों काम ना चले, त ओह पर कुछ छिड़के के पड़ेला,घाम देखावे के…

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