गोधन बाबा चलले अहेरिया

अभीन कतहूँ से दिवाली के उमंग कम नइखे भइल कि गोधन बाबा के कुटाए के दिन आ जाला। अभी ठीक से दिवाली के दिअरीओ नइखे बिनाइल। बैन के बादो चारूओर पटाखा के बारूद के गंध फइलल बा। फाटल-जरल कागज अभी ठीक से बहराइलो नइखे। मोमबत्ती के जारन अभीन छोड़ावलो नइखे गइल। घर-दुआर, खान-पान सबमें अभीन तेल के बास बा। नवका कपड़ा के आकर्षण अभी कम नइखे भइल। अभीन घर में मीठाई भरले बा कि बिहाने उठते दीदी खातिर भजकटेया जोहाये लागल। गोधन-पूजा अपना भोजपुरिया समाज में एगो दोसरे रूप में…

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लोकपर्व, आस्था आउर मन बानी…….

भारत लोक त्योहारन क धरती ह। एहां लोक त्योहार में रचल बसल संस्कृति एके विशेष बनावेले। रसोई से दुआरि ले लोक से गमकत सभ्यता आजु भी बाचलि त बा लेकिन ओकर ऊ रूप जवन मन के जोड़ले रहे ,आधुनिकता के चक्कर में बिलायेके स्थिति में आ रहल बा। लोक पे कहल लिखल त समुंदर में गोड़ गड़ले जस बात हवे बाकि तब्बो मन में जवन नेह लाग बा ऊ अव्यक्त रहि के भी अपना आस पास के ओह टोह पर जवन करेजा टो ले ,अभिव्यक्त हो ही जाला। एह समय…

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फागुन मे बाबा देवर लागे , फागुन मे……..

का  जमाना आ गयो भाया, जबले अनचहले ई बसंत कलेंडर से बहरियाइल बा ,तबले केहू केकरो बाट नइखे जोहत । कहे के मतलब ई बा कि सभे बारी बारी से फगुआसल बा । जइसे फागुन केकरो बाट ना जोहे, बेबोलवले अइए जाला आ सभे के अपने ढंग से नचाइयो जाला । हाँ – हाँ , ना – ना भलही करत होखे केहू , रंग – अबीर से कतनों भागत होखे केहू  बाकि फागुन रुखरे सिर चढ़ि जाला । लइकन से लेके सयानन तक आ बुढ़वन से लेके जवानन तक सभे…

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हाली-हाली उग ये अदितमल

भारत के धरती तीज आ त्योहारन  के धरती ह । इहवाँ हर मौसम मे कवनों ना कवनों त्योहार पड़बे करेला । देवारी के बीतते आउर भाई दूज के बाद सगरो छठ परब के तैयारी चले लगेला । छठ बरत भगवान सूर्य के समर्पित एगो अइसन बरत ह जवन शुद्धता , स्वछता आउर पवित्रता के संगे मनावल जाला । जइसे – जइसे छठ बरत के दिन नीयरे आवेला , जेहर देखीं, ओहरे छठ के तइयारी शुरू होत दिखाई देवे लगेला । छठ के बाति के साथे अपने सभ्यता-संस्कारन के झलक उभरे…

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