फागुन मे बाबा देवर लागे , फागुन मे……..

का  जमाना आ गयो भाया, जबले अनचहले ई बसंत कलेंडर से बहरियाइल बा ,तबले केहू केकरो बाट नइखे जोहत । कहे के मतलब ई बा कि सभे बारी बारी से फगुआसल बा । जइसे फागुन केकरो बाट ना जोहे, बेबोलवले अइए जाला आ सभे के अपने ढंग से नचाइयो जाला । हाँ – हाँ , ना – ना भलही करत होखे केहू , रंग – अबीर से कतनों भागत होखे केहू  बाकि फागुन रुखरे सिर चढ़ि जाला । लइकन से लेके सयानन तक आ बुढ़वन से लेके जवानन तक सभे…

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हाली-हाली उग ये अदितमल

भारत के धरती तीज आ त्योहारन  के धरती ह । इहवाँ हर मौसम मे कवनों ना कवनों त्योहार पड़बे करेला । देवारी के बीतते आउर भाई दूज के बाद सगरो छठ परब के तैयारी चले लगेला । छठ बरत भगवान सूर्य के समर्पित एगो अइसन बरत ह जवन शुद्धता , स्वछता आउर पवित्रता के संगे मनावल जाला । जइसे – जइसे छठ बरत के दिन नीयरे आवेला , जेहर देखीं, ओहरे छठ के तइयारी शुरू होत दिखाई देवे लगेला । छठ के बाति के साथे अपने सभ्यता-संस्कारन के झलक उभरे…

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