देखS चिरकुटई

  देखS चिरकुटई चरम पर ए बाबा।   कतहीं केकरो कुछुओ बोलस अपना मनही मगन हो डोलस लागल बा धसका मरम पर ए बाबा।   खीस निपोरि टेसुआ बहावे कुछहू बोलि सभही भरमावे सरमाते नइखे सरम पर ए बाबा ।   ओकर चरित्तर सभही जनलस ओकरा बड़का धुरुत मनलस छिछिआई रोवत करम पर ए बाबा। देखS चिरकुटई चरम पर ए बाबा।   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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मटिया क गांव

पीपर पकरिया के गछनार छाँव हो, ऊँच नीच खोरिया में मटिया क गांव हो। मुर्ग़ा के बोलिया पर जहवाँ बिहान बाय, मनवा रिझावै बदे बिरहा के तान बाय। दिन रात चलत थकत नाही पाँव हो, ऊँच नीच खोरिया में मटिया क गांव हो।। देहियाँ क जहवाँ सिंगार बाटै माटी, जोगवल जात बा पुरान परिपाटी। कगवा क बोलिया सगुन काँव काँव हो, ऊँच नीच खोरिया में मटिया क गांव हो।। कबहुँ सुखात ना पसीनवा क सोती, खेतवा कियरिया से काढ़ि लेत मोती। कबौं बिधि दहिने कबहुँ जात बाँव हो, ऊँच नीच…

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कजरी

डाढ़ि डाढ़ि जइसे पातरी बिजुलिया झूले खाइ के कलइया झूले ना। नैन अलोते छिपाई गोड़े गोड़े गुदराई धाइ बइसि के सहेली के कन्हइया झूले। खाइ के दूनो पल्ला बीने बाँधे गोरी बँहिया नेवाधे आधे ऊन में लपेटली सलइया झूले। खाइ   आनन्द संधिदूत

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कजरी

पवन झकझोरे बालम मोरे। नन्ही नन्ही पनिया के बुनिया पलकिया पर ढोय ढोय बदरी बदन प’ गिरावेले कोंवर अंग टोय टोय हँसले रहउँ ना बरेला गुदरउँना सरब अंग बोरे बालम मोरे। नासा भँहु तानेला अकसवा में बोरो लागे जरत बुतात बा धुआँ धुआँ सोरहो सिंगारवा कि बूँन बूँन अँसुआ झुरात बा लोर झरे अँखिया बरवनी के पँखिया हिलेले कोरे कोरे बालम मोरे। सभ्यता समर काटे चिउटी देखत तोर लाजहीन दुनिया कहीं उड़े पल्ला कहीं अँचरा बदरिया के नीक ना रहनिया चम चम बिजुरी कमलदल अँगुरी फोरेले पोरे पोरे बालम मोरे।…

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ए माई हम ससुरा ना जाइब

ए माई हम ससुरा ना जाइब ननदी नटिन देवरा दरिंदा भसुरा भेड़ुआ करेला खाली निंदा छछबेहर गोतिनिया के बात हम बताइब ए माई हम…………………….   ससुई सनकी ससुरा कमीना मुसकिल करेलेसं हमार जीना कहेलेसं दहेज़ लेके आउ ना त जहर देब चाहे जलाइब ए माई हम………………………   मरदा मुअना रहेला हमसे हट के हरदम मारे कुकुर जस झपटि के अचके फफेंली धके कहेला दबाईब ए माई हम………………………..   कबो ना हटिला दिन भर खटेला तबो ओहनी के काहे अटकिला भोजन के बतिया कइसे भुलाइब ए माई हम………………………..   माई रे…

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अब चरचा होई

तहरा के लागल काहें मरिचा अब चरचा होई। रयन से बाड़s फरीछा-फरीछा अब चरचा होई।   माकत रहला बथता कपरवा लागल बुझाता हर के फरवा तरहत्थी में लउकेला खरचा अब चरचा होई।   जतने अरजी ओतने फरजी चोरी कई  तू बनला दरजी बतिया थोपलकी लागे बरछा अब चरचा होई।   मेढकी कुदान अवते चुनउवा बोकरि आपन गिरवला भउवा लगता अब फाटी जाई परचा अब चरचा होई।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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गीत

गूहि-गूहि टांग दीं अंजोरिया के पुतरी लछिमी गनेस के असीस घरे उतरी। एगो दिया गंगा जी के एगो कुलदेव के एक गउरा पारबती भोला महादेव के एक दिया बार दिहअ तुलसी के चउरी। सासु के ननद के समुख बूढ़ बड़ के गोड़े गिर सरधा समेट भूंइ गड़ के खींच माथे अंचरा लपेट खूंट अंगुरी । लाई-लावा संझिया चढ़ाइ बांट बिहने अन्नकूट पूजि के गोधन गढ़ि अंगने गाइ-गाइ पिंड़िया लगाइ लीप गोबरी । धनि हो अहिन्सा हऊ पाप-ताप मोचनी घर के सफाई मुए मकरी – किरवनी लोग पूजे अंवरा खिआवे सेंकि…

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ना एने के ना ओने के

अपने ही देशवा में भइनी बिदेशिया रे जाके कहाँ जिनिगी बिताईं ए संघतिया I   खेत खरिहान छूटल, बाबा के दलान छूटल दिल के दरद का बताईं ए संघतिया I   तीज तेवहार गइल, जियल मोहाल भइल मनवाँ में घूलत बा खँटाई ए संघतिया I   दक्खिन में दूर दूर, उत्तर में मार मार कहाँ जाके हाड़वा ठेठाईं ए संघतिया I   गाँव घर मुँह फेरल, नाहीं केहु परल हरल रोकले रुकत ना रोवाई ए संघतिया I   एहिजे के भइनी ना ओहिजे के रहनी रे मन करे फँसरी लगाईं…

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गीत

कोइला में हीरा हेराइल कुफुत में जिनिगिया ओराइल बलमु तोहें कुछ ना बुझाइल !! असरा के ढेंढ़ी तनिक ना गोटाइल बनउर से सपनन क फूल बिधुनाइल करजा क सूद गढ़ुआइल बलमु तोहें कुछ ना बुझाइल !! अबहीं ले अँगरेजी भूत असवार बा कहे बदे हमनी के इहाँ सरकार बा नेति बा अनेत में हेराइल बलमु तोहें कुछ ना बुझाइल !! कउवन के मान जान, हंस लखेदाइल नीर-छीर पोखर क सोत बा सुखाइल बेमसरफ घास बढ़ियाइल बलमु तोहें कुछ ना बुझाइल !! अशोक द्विवेदी संपादक, पाती

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बरखा गीत

बदरी बदरी बा नयनवां जाने कब बरसे ओरियाव हो अंगनवां जाने कब बरिसे। ढांप दिह लय धुन ढांप दिह गीतिया ढंपिह पथार लेखा पसरी पिरितिया ढंपिह अच्छर गियनवां ओठे कहनी कथनवां हाथे दूनो दरपनवां जाने कब बरि से। बदरी0   जिन मेहराये सांसतोहरो उछहिया ओरा बोराओढ लीह जिनगी के रहिया झारदीह कुण्ठा कथनवां कइले मनगर मनवां रखिह अपनों धियनवां जाने कब बरिसे।बदरी0   ढहेजिन फूल पातसुघर सपनवां फेरि दीहहंसी खुशी अपनों भवनवां बइठअ एक खनकोनवां धइलअ सोचे के समनवां दूगो लकड़ी लवनवा जाने कब बरिसे। बदरी0     आनंद संधिदूत…

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