गजल

बहुते के कलम घिस गइल,ढेरे के ना धार अबहीं बाकी बा बहुते के इलाज कइल गइल, ढेरे के उपचार अबहीं बाकी बा   केतनन के पेट भरल बाटे, केतनन के भूख ज्वाला बा लेसले बहुते के लोर बा पोछल गइल, ढेरे के रोजगार अबहीं बा   केतना ना माई जर मर गइली, डोली ना उठल बेटी ना पढ़ली बहुते के हाथे मेंहदी बा लागल, ढेरे के उधार अबहीं बाकी बा   एह देस के हाल गजब बउए, जहँवा के लोग अजब बा कुछ बहुते के दिल हिल मिल जाला, ढेरे…

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ग़ज़ल

रात अन्हरिया, दिया जराईं, डगर डगर उजियार करीं बहुत सरहनीं महल के रउआ, अब मडई से प्यार करीं   सागर के पानी ह खारा, एह में डुबकी लिहले का ताल तलइया वाला पानी, गंगा जी के धार करीं   देखीं दुःख के दानव छउकी, छउकी रार मचवले बा भूख का मारे के पहिले, ओकरा छाती पर वार करीं   सांच हवे जब देहिया, माटी के ह माटी मिल जाई तब देरी का, माटी मिल के भी उनकार उपकार करीं   साहस के लहरइले, परबत के हियरा भी दरकेला बखत पड़े…

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गजल

लैला के मजनू, हीर के, राँझा के लाग-बाझ | बाजत मजीर ढोल बा, कान्हा के लाग-बाझ ||   सोहनी के प्रीत-रीत, महीवाल के अबूझ | एक-एक चिराग नेह के, नाता के लाग-बाझ ||   जिनगी के नेह-छोह के, फरहाद यार के | अपना सबूरी, साधना, श्रध्दा के लाग-बाझ ||   जुलियट के, रोमियो के, आ खुसरो निज़ाम के | दमयन्ति, आम्रपाली के, अरजा के लाग-बाझ ||   जौहर गजल का गाँव में, चिंतन श्रृंगार के | तुलसी, कबीर, जायसी, मीरा के लाग-बाझ|   -डॉ.  जौहर शफियाबादी

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गजल

लोहा उपजा के लकाहार दिहलऽ जिनगी अँसुआ के धार के बेकार दिहलऽ जिनगी   पिरितिया के खेतवा में बएर भाव बो के हँसुआ के धार के बेकार दिहलऽ जिनगी   नेहिया के थान में दिआला जहँवा सरधा सुसुम तूँ पानी के बेकार दिहलऽ जिनगी   सुधिया के तला से, निहारेला ना ललसा हलचल के जिनगी बेकार दिहलऽ जिनगी   साँझ के बसेरवा में बंसिया के ना टेरवा लोरवा के धार के बेकार दिहलऽ जिनगी   विद्या के गँउआ में नेहिया के का कहानी छछनत इजहार के बेकार दिहलऽ जिनगी।  …

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गजल

चमत्कार बा , हाला नइखे तनिकों गड़बड़झाला नइखे ई विकास के राज सड़क ह कहवाँ ऊँचा – खाला नइखे कवानों अइसन जगह बताईं जहवाँ हवस – हवाला नइखे छोपनी नइखे केकरा आंखे किनका मुँह पर ताला नइखे चान सुरूज़ उनके घर कैदी एने कहूँ उजाला नइखे कवन गली, कवने चौराहे जमकल बजकत नाला नइखे जेने कोड़ी , तेने पाईं कहवाँ घूस घोटाला नइखे ॥   गंगा प्रसाद ‘अरुण’

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गजल

चंचल आ शालीन हवा यादन मे तल्लीन हवा हिरनी अइसन मांके – भागे जल मे जइसे मीन हवा परी लोक के किस्सा कहनी के लागे कालीन हवा सन्नाटा से ई बतिआवे बाजे जइसे बीन हवा जबे उड़ासे पंछी उतरे झपटे बन शाहीन हवा फुफुकारत तन मन से जइसे हो जाये आलीन हवा दवा दुआ अस राहत बाँटे कह जाले आमीन हवा ॥ गंगा प्रसाद ‘अरुण’

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गजल

पहिले रSहे सरल आ सहज आदमी आज नफरत से बाटे भराल आदमी ॥   गीत जिनगी के गावत – सुनावत रहे अब तs जिनगी के पीछे पर्ल आदमी ॥   आदमी जे रहित तs करित कुछ सही आदमी के जगह बा मरल आदमी  ॥   अपना वइभव के तिल भर खुसी ना भइल देख अनकर खुसी के जरल आदमी ॥   राण – बेवा भइल अब त इंसानियत माँग मे पाप कोइला दरल आदमी ॥   कब ले ढोइत वजन नीति के ज्ञान के फायदा जेने देखलस ढरल आदमी ॥…

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गजल

मुंह कहे के त का का कह गइल पर मन क बात मने में रह गइल । न नौ मन भइल न राधा नचली जवन जोगवले रहीं उहो बह गइल । दिल के भड़ास निकल ना पवलस भितर के टीस भितरे सह गइल । सांच के गठरी ढो के का कइलीं झूठ बोले वाला के सब लह गइल । जवना खातिर अब ले धधाइल रहीं महल सपना के आज ढह गइल । आग फइले में देरी ना होला कबो देख चिंगारी कवना जगह गइल । लागे अरमान कबो ना पुरा…

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