आपन आछो-आछो आ दोसरा के छिया-छिया

का जमाना आ गयो भाया,बड़बोल बोलवन के भाव-ताव के कवनो ठेहा-ठेकाना के हेरल संभव नइखे। कवनो गली-मोहला, गाँव-शहर, नगर-डगर अइसन जगह नइखे जहवाँ एहनी के प्रजाति काबिज ना होखे। सगरों कुंडली मार के बइठल बाड़न सन। सभले बेसी सभे कुछ एहनिये के चाहत बा। ओकरा खातिर कुछो करे के तइयार बाड़न सन। छीछालेदर करे से लेके रइता फइलावे तक में एहनी के आपन करतब बुझाता। अपने सनमान खाति केहुओ के आगु खीस निपोरत बेरा छाती चाकरे राखल ओहनी के सोभाव में बा भा कहीं कि खुने में मेझराइल बा। नीमन बातिन के बाउर बतावे में जरिको देरी नइखे करत सन आ खुदही बाउर करे में जरिको लजातो नइखे सन। धरम-जाति से लेके प्रदेश आ क्षेत्र तक सब आपन बतावत नइखे थाकत सन। अपने जय-जय होखे के राग आलाप रहल बाड़न सन। ओहनी के विद्वता त अधजल गगरी लेखा छलक रहल बा। नीमन चिजुइयन का ओर ओहनी के दीठिए नइखे जात। ‘विष कुंभम पयो मुखम’ के असली भगत लोगन के तबो कबों-कबों मजबूरी के नाम जपे के पड़ जात बा। ओहुके गिनावे में न लजात बाड़न सन आ न पिछुआत बाड़न सन।

ठाकुर रमेसर सिंह के ई सहूर देखि-बूझ के त मनराखन पांड़े के सरम आवे लागल। उ बेचारु इहे बूझत रहने के उनुका से बड़ बकलोल एह जहान में दोसर केहु नइखे, बाकि उनुकर ई भरम ठाकुर रमेसर सिंह तूर दिहलें। दाँत निपोरे से लेके हाथ पसारे आ भीख माँगि के सनमान बिटोरे भा कुरसी हथियावे में सभेले अगहीं लउकत बाड़न। अपना के बड़का भाषा विद बूझे वाला ठाकुर रमेसर सिंह के ढेर लो ‘भासाई दरिदर’ के तमगा से नवाज चुकल बा। दोसर भाषा के साहित्य के अनुवाद क के अपना के मौलिक बोले में उनुकर जबाब नइखे। सुने में त इहो आवेला कि ठाकुर रमेसर सिंह कवनो इस्कूल में माहटर बाड़न। बाकि माहटरई के उनुका भीरी कतना लूर बा, अब उनुका नोकरी देवे वाली सरकारो सोच रहल बिया। गारी-गुन्नर से लेके चोरी चकारी तक में सगले गुन आगर माहटर साहेब अपना हिसाब से परिभासा गढ़े में सभेले आगहीं ठाढ़ भेंटालें।खीर भा सेवई में परल माछियो के चूस के खाये वाला ठाकुर रमेसर सिंह आजु से झूठे के गगरी भर भर के ढो रहल बाड़न। दू रूपिया के खैनियो कीन-खरीद के ना बलुक मागिए खालन। बाक़िर ठकुरई के बखाने में सभे ले आगु भेंटालें। गाहे-बगाहे कबों कवनो साह जी झूठ बोलिके खैनी मंगा लेलन त उनुका उधार पचावल ठाकुर साहेब के चतरा हाथ के खेल बा। अब त मनराखन पांड़े मारे चिंता के सुखा के काँट लेखा हो गइल बाड़न कि उनुका बिरासत केहु दोसर कब्जिया रहल बा।

मनराखने लेखा ठाकुर रमेसर सिंह के संगे कुछ लिहो-लिहो करे वाला लोग सटल बा। उ लो उनुका भरम के बरोबर खाद-पानी दे रहल बा। कई बेर त कुछ लो रमेसर सिंह के बेंजइयो अपना कपारे ओढ़ लेता। ओकरा खाति माफ़ियों माँगे में केजरियो के पाछे ढकेल देता। दोसरा के कन्ही पर मंगनी के बनूक राखि के ठाकुर साहेब बाहबाही लुटहूँ में जरिको ना पिछुआलें आ कान्ही वाला के लमचूस थमा के अपना गुरुरे मगन हो जालें। अब चाहे बनूक टूटे भा कान्ह, ठाकुर साहेब आपन बकलोलई के ढ़ोल बजा-बजा के आपन मुखौटा चमकावे में जीव-जाँगर का संगे लाग जालें। जइसे कान-कूबर के आँख आ देह वाला लो ना सोहालें ओइसहीं ठाकुरो साहेब के नीमन लोग ना सोहालें। उ त बस हर घरी आपन आछो-आछो आ दोसरा के छिया-छिया करे में अझुराइल आ सउनाइल रहेलन।

 

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

संपादक

भोजपुरी साहित्य सरिता

Related posts

Leave a Comment