हाली – हाली उग ये अदितमल

भारत के धरती तीज आ त्योहारन  के धरती ह । इहवाँ हर मौसम मे कवनों ना कवनों त्योहार पड़बे करेला । देवारी के बीतते आउर भाई दूज के बाद सगरो छठ परब के तैयारी चले लगेला । छठ बरत भगवान सूर्य के समर्पित एगो अइसन बरत ह जवन शुद्धता , स्वछता आउर पवित्रता के संगे मनावल जाला । जइसे–जइसे छठ बरत के दिन नीयरे आवेला , जेहर देखीं, ओहरे छठ के तइयारी शुरू होत दिखाई देवे लगेला । छठ के बाति के साथे अपने सभ्यता-संस्कारन के झलक उभरे लागेले , सभे कुछ अपनत्व से भरल पूरल देखाए लगेला । भोजपुरिया संस्कृति में देवी-देवता के संगे प्रकृति पूजा-उपासना के ढेर महातिम दियाला। ओही में सूर्योपासना खातिर छठ के परब मनावल जाला। छठ व्रत षष्ठी तिथि के होला एही से एकर नाम छठ पड़ गइल। कातिक अँजोर के छठी पर मनावे जाए वाला छठ के ढेर महातिम ह। एकर बरनन भविष्य पुराण मे मिलेला। ई बरत आदिकाल से घर – परिवार के सुख-समृद्धि के खातिर मनावल जाला । एह परब के मरद-मेहरारू सभे संगही मनावे ला लो।

 

एगो पौराणिक कथा ह कि लंका विजय के बाद भगवान राम आउर माता सीता एह बरत के विधि विधान से कइले । छठ बरत के संबंध मे एगो इहो कहनी ह कि पांडव लोग जब जुवा मे आपन राज पाठ हार गइने , त द्रौपती छठ के बरत कइनी आउर उनुकर मनोकामना पूरन भइल । एगो लोक कथा इहो हवे कि राजा प्रियब्रत आ रानी मालिनी संतान हीन रहले । पुत्र खाति कश्यप ऋषि से जग करवने , बाकि मुवल लइका के जनम भइल । ई सुनके राजा बहुत दुखी भइलें आ आत्महत्या करे क मन बना लीहलें । जइसे उ आत्महत्या करे चललें , त छठी माई परगट होके कहलीं , “ हम देवी छठी हईं आ सभके पुत्र के सौभाग्य देहीलें” । राजा आउर रानी कातिक अँजोर के छठी माई के बरत कइने आउर उनके घरे लइका के जनम भइल ।

 

वइसे त वैदिक परंपरा के कूल्हे बरत त्योहार के वैज्ञानिक कारण ह , त छठों के बा । ओह घरी सुरूज़ भगवान के जवन पराबैगनी किरन धरती पर पड़ेले उ धरती के सभे जीव जंत आ मनई खाति ढेर लाभकारी होले  । कार्तिक शुक्ल के छठी के दिने मनावल जाये वाला छठ पवित्र परब हऽ। पहिले ई व्रत के मेहरारू लोग करत रहे , बाकि अब त अदमी लोग संगे करे लागल बाड़न । एकरा के बेटा ला करे जाये वाला परब कहल जाला । समय के संगे लइका आ लइकी मे अंतर ना रह गइल बा आ आजु के समय मे तनाव से जूझत मनई खाति ओकरे तनाव से मुक्ति के बरत कहल जाव त अतिशयोक्ति ना होई ।

 

छठ पूजा के शुरुवात कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के  ‘नहाय-खाय’ से, जब व्रती घर के सफाई कइला के बाद कद्दू, रहिला क दाल आउर भात खाय के जमीन पर सुतेलन । इहवें  से व्रत के शुरुआत होला । अगले दिन ‘लोहंडा’ आउर ‘खरना’ पर सांझी के बेरा में गुड़ के संगे  साठी के चाउर के खीर बनाके  केरा  के पत्ता में ओकर भोग लगावल जाला । षष्ठी के सबेरहीं से डूबत सूरूज़ के  अरघ देवे के तइयारी शुरू हो जाला । अरघ में मौसमी तरकारी  आउर फल के बांस के सूप भा मिट्टी के ढक्कन में सजावल जाला । व्रती एही सजल सुपली के लेके पश्चिम दिशा में पानी में खड़े होके सूर्य के  नमन करेलन । ई एगो अइसन परब ह , जवने मे अस्त हो रहल सूरूज़ के पूजा कइल जाला । सूर्य के अस्त होखला के बादे व्रतधारी घरे लौटेलन ।

 

लोक जीवन सहजता के जीवन होला । एह सहजता में अपनत्व आ  प्रेम के लमहर धार दिखाई देवेला । व्रत-त्योहारन के बेरा जवन गीत गवाला ओहू में लोक-जीवन के आषीश, प्रेम, अपनत्व, सहयोग, समरसता दिखाई पड़ेला । एही बदे छठ के सामाजिक समरसता के बरत कहल जाला । साँचो मे छठ के कारने बैर भाव मरि जाला आ  नेह उपजि जाला। एह परब पर ई लोकगीत जरूर गावल जाले –

 

काँच ही बाँस के बहँगिया

बहँगी लचकत जाय ।

बाट जे पूछेला बटोहि सर

ई बहँगी केकरा घरे जाय ?

आँख तोर फूटो रे बटोहिया

ई बहँगी कवन बाबू के घरे जाय।।

 

भगवान सूर्य के बरत भा छठी माई के बरत भा सूर्य षष्ठी के बरत के नाँव से परसिद्ध ई परब  लोक उत्सव बेसी ह । एह बरत के विधि –विधान आउर ओकरे संगे गावे जाये वाला लोकगीतन के रंगत आ उमंग अलगे रहेला । सुरूज़ भगवान से अपने दशा के बतावत मेहरारू लोग जब ई गावेलीं सुने वालन के आँखि से लोर रुकबे ना करेला —

 

काल्ह के भुखले तिरियवा

अरघ लिहले ठाढ़ऽ।

हाली-हाली उग ये अदितमल,

अरघा जल्दी दियावऽ।।

 

 

छठ के गीतन में लइका के बात कवनों न कवनों रूप मे आइये जाला । देखीं गंगा माई से जुडल एगो गीत –

 

गंगा माई के झिलमिल पनिया

नइया खेवेला मल्लाह,

ताही नइया आवेले कवन पूत

एहो कवना देई के साथ।

गोदिया में आवेलें कवन ललना

एहो छठी मइया के घाट।।

 

छठ पुजा मे परसाद खाति केरा, नेबुवा , दही, सेब ,सिंघाड़ा, उंख, हरदी, आदी, चिउरा, सूरन, कोंहड़ा के परयोग होला जवन प्रकृति के अँचरा से मिलेला, एही से एह परब के प्रकृति पूजा के परब कहल जाला । ई बरत सामूहिक समरसता के बरत ह, जवने मे हित नात से लेके अड़ोसी – पड़ोसी तक ब्यवस्था बनवावे मे बराबर शरीक होलें । एकर मतलब त इहे ह सभे केहु चाहे उ बरत करत होखे भा न करत होखे । कहीं कहीं कुछ लोग अइसनो भेंटाला जे बरत कवनों कारन से ना क पावेला बाकि कवनों बरती के बरत मे सहजोग जरूर देवेला –

 

कवन देई के अइले जुड़वा पाहुन,

केरा-नारियर अरघर लिहले।

 

भोजपुरिया लोक जीवन मे छल कपट कमे मिलेला । जइसे इहवाँ के लोग मन से निश्छल होलें ओइसही इहाँ के धरती से किसिम किसिम के फल–फूल उपजावेले । कवनो गाँव में चलऽ जाईं, हर जगह लौकी, कोंहड़ा, नेनुवा , सरपुतिया भा नेबूआ, केरा, हरदी, सूरन लउकबे करी । तबे न ई ढेर गावलों जाला–

 

केरवा जे फरेला घवद से,

ओहपर सुगा मेरड़ाय,

सुगवा के मरबो धनुष से,

सुगा गिरे मुरछाय।

 

धरम जाति के भेद भुलाके हित-मीत, गाँव-घर-समाज छठ पूजा मे समान रूप से सामिल होखेला । बरती सभे दोसरों के बरत करे खाति एकर महातिम बताके उसकावेला। देखीं न –

 

महादेव के लगावल फूलवरिया

गउरा देई फूल लोढ़े जाँय,

लोढ़त-लोढ़त गउरा धूपि गइली

सुति गइली अँचरा बिछाय।

 

ई कहलों गइल बा कि मेहरारू लो के भरल-पूरल स्वरूप माई बनले मे होला । मेहरारू लोग भोजपुरिया समाज मे कर्मठता आउर त्याग के मूर्ति ह लो । ओह लोगिन के परान उनके संतति मे बसेला । ओकरा के पावे खाति कुछों करे खाति हरमेसा तइयार रहेला लो । पूत खाति त लालायित रहेला लो बाकि बेटी दमाद के बातों ना भुलाला । देखीं तनि-

 

रूनुकी झुनुकी बेटी मांगीला , पढ़ल पंडितवा दमाद

हे छठी मइया ——

 

छठ मे भोजपुरिया संस्कृति आ संस्कार क असली रूप उभर के आवेला । सोरह सृंगार, सोलहो कला भा पूर्णता के प्रतीक सोरह आना के झलक सांचो मे देखे आ समझे के होखे त अपना के एक बेरी एकरा मे समाहित होके समझीं । फेर रउवों ई क़हत न अघाब कि – छठ सांस्कृतिक संपन्नता, पावनता आ वैभव के व्रत हऽ।

 

 

  • तनुजा द्विवेदी

 

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