फगुआ: बसंत के मदनोत्सव में पुरखन के बैदई

बसंत के मौसम में पहिला रंग अबीर बसंत पंचमी जवन माघ शुक्ल पंचमी के होला। एहिजे से बसंतोत्सव भा फगुआ के शुरुआत होला। बसंत ऋतुराज कहाले। एह बसंत के महिमा एतना कि श्रीमद् भगवद्गीता के दसवां अध्याय में श्रीकृष्ण कहत बाड़ें –

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः। ।

हम सामों (गवाये वाला मन्त्र) में बृहत्साम आ छन्दन में गायत्री छन्द हईं। हमहीं सब महिनन में श्रेष्ठ अगहन (मार्गशीर्ष) महिना आउर ऋतु में बसन्त ऋतु हईं।

जब श्री कृष्ण अपना के बसन्त कहत बाड़ें त एकर बहुत गहिर मतलब बा। द्वापर में उनका दू बेर आपन विश्वरूप रूप में आ के कहे पड़ल-

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें। (तृतीय सर्ग, रश्मिरथी)

कृष्ण अपना के बदलाव के रूप में देखा रहल बाड़ें। आरंभो उहे … अंतो उहे… आ जब बदलाव होला त मय संसार एह बितल के बिदाई आ आवेवाला के स्वागत में लाग जाला। बसन्त ऋतु फागुन आ चईत के महिना के मानल जाला। बितत साल  के अंतिम महिना से नया साल के नया महिना के संधिकाल। कामदेव के कला आ बसन्त के सृंगार के गठजोड़ एही समय भइल रहे। महादेव के तपस्या से जगावे खातिर जब कामदेव असमर्थ भइले त ब्रह्मा के तरफ से बसन्त के रूप में सहायक मिलल। कामदेव के धनुहा से जब बसन्त के सजावल फूल के बान छुटल त महादेव के आँख  खुलल। तप भंग भइल, बाकि ओकर ताप जब महादेव के तिसरका आँख से बरसल त कामदेव भस्म  हो गइलें। उनकर पत्नी रति के रोअल महादेव के क्रोध बहा देलस आ कामदेव के अनंग रूप मिलल। अनंग उहे जवना के आस्तित्व त होखे बाकि बेअंग होखे। अनंग रति आ बसन्त के संगति तब से आज तक चलत बा। इंसान के भाव में रति के प्रवाह बसंत में चरम पे रहेला। फागुन बसंत के लड़कपन ह त चईत बुढ़ापा। एह अनंग-रति-बसन्त के जोर एह संसार पर सबसे जादे एही फागुन में रहेला। फागुन आवते प्रकृति के हरेक कोना मतवाला हो जाला। लइका-सेयान, बुढ़-जवान, मरद- मेहरारू, दुपाया-चौपाया, जड़ -चेतन सभे पे फागुन सवार हो जाला। आम में मंजर का लागल, आम बौराइल। पलास-सेमर के फूल के ललई जंगल में आग लगावे लागल। खेत में लागल सरसों के पियर- पियर फूल से धरती के आँचर लहलहाये लागल। मैथिली  के कवि विद्यापति कहले बानी –

आइल ऋतुपति राज वसंत

धावल अलि कुल माधवी पंत

खेत में दिखे पियर फुल सरसो

मन में उमंग दिखे, जैसे खुशी मिलल बरसों।

आनंद उमंग के एह परब के मनवला के पाछे ढेर कहानी बा आ हरेक कहानी के पाछे कुछ वैज्ञानिक बात छुपल रहेला।

बाल्मीकि रामयणों में बसंतोत्सव के चर्चा आइल बा। भविष्य पुराणों में एक तरह के उत्सव के लिखल गइल बा जवना में  कामदेव आउर रति के स्थापन आ पूजा कइल जात रहे। संस्कृत साहित्य में एह तरह के उत्सव के बारे में खूब लिखाइल बा। संस्कृत नाटक ‘चारुदत्त’  आ ‘मृच्छकटिकम्’ में कामदेव के जुलुस निकाले के चर्चा बा। एगो आउरी किताब ‘वर्ष-क्रिया कौमुदी’ त एह जुलूस के जवन रंग रूप बतवले बा ओहमे ढोल -नगाड़ा के साथे  गाना-बजाना आ फेर एक दूसरा पे कीचड़ फेंकल आ अश्लील हास परिहासो के चर्चा बा। सांझ के नया कपड़ा पहिर लोगन के मेलो जोल के भी चर्चा बा। कालिदास के ऋतुसंहार में त बसंत के जवन वर्णन बा अगर एहिजा लिखल जाय त एह लेख पे सेंसरबोर्ड बइठ जाई। बस ई समझ लीं कि एह बसंतोत्सव भा मदनोत्सव में राग रंग आ अश्लीलता के खुला खेल होत रहल  ह। हर्षचरित होखो, दशकुमार चरित्र भा कुट्टनीमतम् सब जगहा मदनोत्सव के चर्चा बा। अश्लील हास-परिहास के चर्चा बा। पं. हजारी प्रसाद द्विवेदीयो आपन किताब  ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ में मदन पूजा बतवले बानी।

अब सोचेवाला बात ई बा कि समाज में एह तरह के उत्सव आ आयोजन के जरुरत काहे पड़ल ? का कारण रहे कि समाज में मदनोत्सव आ होली के नाम पर श्लील आ अश्लील के भेव मिटा के आनंद उमंग के एह उत्सव के मनावल गइल! त एकरा के समझे खातिर हमनी के पुरखा पुरनिया के बनावल नियमन के पाछे छुपल गूढ़ विज्ञान के समझे पड़ी।

ऊर्जा कइसनों होखो ओकर प्रवाह नियंत्रित कइलो जरूरी होला। ऊर्जा के बेलगाम भइला पे शारीरिक, व्यवहारिक आ सामाजिक नुकसान ज्यादे होला। एही से पुरखा लोग आपन शारीरिक ऊर्जा के बचावे के बात कहत रहे लोग। ब्रह्मचर्य के बाँध लगा के काम ऊर्जा के रोकल जात रहे। जाड़ा के मौसम में शरीर मे गरमी आ ऊर्जा बरकरार राखे  खातिर पहिले के लोग तरह तरह के खान-पान करे। बैदई के नुस्खा जाड़ा मे बरियार चले। लोग एह नुस्खा मे सोना-चाँदी सहित ना जाने केतना गरमी लेत रहे लोग। ऊर्जा के संभारे के एह उतजोग में ऊर्जा के नुकसानों खूब होत रहे। वैज्ञानिक लोग के कहल सांच बात कि ऊर्जा के केहू बाँध ना सके आ एकर रूप परिवर्तन होत रहेला। नदी के बाँध देला से प्रवाह रुकी आ ओह प्रवाह के बिजली बनायीं त ऊर्जा के उपयोग भइल। ना त जहिया बाँध टूटी, जान माल के नोकसान करी। इहे हाल शरीरो के ऊर्जा के होला। ऊर्जा के संचय (एकट्ठा) कइला के साथ रेचनों (निकालल) कइल जरुरी होला। आ इहे आधार बनल एह मदनोत्सव, होली आ फगुआ जइसन उत्सव मनावे के। ई एगो उत्जोग बनावल गइल समाज के एह उत्सव आ आयोजन के माध्यम से काम ऊर्जा के मनोविकार आ मनोरोगी होखे से बचावे के। अश्लील हास परिहास के  छूट देके मन के मानसिक विकार निकाले के। कहल जाय त ई पुरखा लोग के एह उत्जोग में ढेर अइसन चीज अलोत रहे जेकरा के साधारण लोग के समझ से बाहर रहे। अब मदनोत्सव बा त राग रंग रहबे करी। गायन वादन होखबे करी। राग-रंग, हास-परिहास, गायन-वादन एह उत्सव के कुन्जी बनल जवना से समाज के लोगन के मनोविकार के दूर करे के उपाय कइल गइल। गायन वादन में दू गो शैली बनल- फगुआ आ चईता। फगुआ आ चईता दूनों के पुरुष राग मानल जाला। एही फगुआ के भेव में जोगिरा आवेला जवन सोझ सोझ जोगी आ चेला के बीच शास्त्रार्थ के रूप होला। अश्लील हास परिहास तुकांत बेतुकांत पद आ अंतिम में जोगिरा सारा रा रा… के घोष में जनमानस आपन मन के सब विचार विकार कह देला। फगुआ के अंतिम चरण में चईता गवाला आ एह में शरीर आ मन के अंतिम रूप से बांधे के उपाय कइल जाला। चईता शब्द के उत्पाती भइल बा चैत्य से जवना के बौद्ध धर्म में देवता के मंदिर कहल जाला। एह चैत्य में रंग, ध्वनी आ प्रकाश  के माध्यम से साधना कइल जाला। ओहू में ध्वनि भा आवाज के अधिका उपयोगिता बा। त होरी,फाग, बारहमासा भा चईत के गावे के शैली प्रधान होला, खास तरह के आवाज निकाललो जरुरी बा। गायन  करेवाला लोग गोलाकार घेरा में बइठेला आ एकरा के मंडल कहल जाला। बीच में ढोलक भा नाल  बजावेवाला लोग बइठेला। आ एह घेरा के परिधि पे गायक लोग झाल, करताल के साथे संगत करेला। बीच में एतना दुरी रहेला के एक-दू लोग मेहरारू के भेस ध के नाच सके। ई लोग जोगिन कहाला। परिधि पे बइठल केहू गायन के सञ्चालन कर सकेला। एहिजा सभे कोई एक बराबर होला आ केहू एह समूह के प्रधानी ना करे। त एह मंडल के चैत्य रूप में लेके गायन कइल जाला। फाग के शैली में जहां माधुर्य के साथे अल्हड़पन होला (जोगीरा, धमाल इत्यादि) ओहिजे चईत के गायन में कड़ापन होला। गायक आलाप के साथे आरोह के ओर बढ़ेले। एहिजा अवरोह ना होखे… बस चढ़ाव रही दोगुन ,तिगुन, चौगुन तक पूरा समूह एके भावे एके रागे ऊपर बढ़त जाई।

“हो! रामा एही ठइयां… आज चईत हम गायिब ए रामा ! एही ठइयां”

ओ समय गावे बजावे वाला के मन के लगाम कसा जाला, देह दशा के होश ना रहे आ जब आरोह के ऊँचाई पर तान पहुँचल कि  अचानक ‘हा’ के आवाज के साथे अचानक तान तूड़ दियाला। ध्वनि एतना लयबद्ध आ तालबद्ध  होला कि मन बीच में भटकबे ना करे। एही समय पे मन के चंचलता रुक जाला। हा आ हू आवाजो के महत्व बा जवन साधना के अंग ह। ई शरीर के मणिपुर चक्र भा नाभि के आंदोलित करेला। चंक्रमण ध्यान के रूप ह आ ई भगवान बुद्ध के खोज आ बौद्ध साधना के प्रारंभिक प्रशिक्षण के विषय ह। चईत गायन के मंडल में जोगिन घेरा के चारों ओर नाचेले आ गायक बौद्ध उपासक के रूप होला। बीच में बइठल ढोलकिया ध्वनि के केंद्र भा ध्यान के केंद्र होला। ध्यान के बदलत आवृति से मन ओही आवाज में डूब जाला। आउर अन्दर के वासना, आक्रोश, गुस्सा अपने आप संस्कृत, लयबद्ध आउर तालबद्ध होके ढोलक, मंजीरा के थाप में संगीत के अंग बन जालें। ( संदर्भ:  मगध की रह्स्यावृत साधना संस्कृति, डा० रवीन्द्र कुमार पाठक)

शील-अश्लील, तुकांत-अतुकांत पद के साथे मन के विकार निकले एह प्रयोग के पुरखा बड़ी जतन से सम्भरलें। बाकी आज के होली आ चईत गायन में साधना पक्ष आ व्यवहार पक्ष गायब हो गइल बा। पुरखन के बनावल नियम कानून आ चिकित्सा पक्ष के आज जाना आ बुझल जरूरी बा। आज होली गीतन में अश्लीलता के प्रवाह ज्यादा बा। अब ना उ मंडल रहल ना गायन। फाग –चईत के प्रारंभिक आ जरुरी वाद्य के जगह पे अंग्रेजी बाजा आ जोगिन के जगह पे अश्लील नृत्य करत मेहरारुन के प्रवेश से फाग आ चईता गायन के महत्त्व कम हो गइल। लोग सिनेमा संगीत पे अबीर उड़वला के, अश्लील गीतन पे मरद मेहरारू के नाचल आ नशाखोरी के ही आज होली के नाम दे देले बा। होली फगुआ आ चईत त अब नइखे… होली बेराग आ रंगहीन  हो चुकल बा। शहरीपन के भीड़ मे प्रेमभावो व्यवहारिक आ व्यापारिक बन गइल बा। शहर मे अब ई साधना संभव नइखे, एह से एकर व्यवहारिक पक्ष रंग गुलाल आ पिचकारीये तक ठीक बा। समाज बदल गइल आ साथे समाजिकता भी। एह से जेतना सधे ओतने साधल ठीक बा।

  • शशि रंजन मिश्र, दिल्ली

Related posts

Leave a Comment