फगुआ फगुआ नइखे रह गइल

फगुआ निअराते मन अगराये लागत रहे। भौजी सब से अझुराये के मोका मिल जाई -ई सोच के मन गुदगुदात देरी ना लागे। बड़की भौजी के फगुआ आवते बेमारी जोर मार देत रहे। बड़की माई उनकर पैरवीकार बन जास। ‘तू ना मनबऽ, दुलहिनियाँ के तीन दिन से बोखारे नइखे छोड़त, आ तू दिन में दू- बेर आके नहवा देत बाड़ऽ।’ मन खिनखिना जात रहे। हमरा रंग डलला से बोखार चढ़ जात बा आ साँझ होते झार के तइयार हो जात बाड़ी। भइया के बाजार निकले के बेरा फरमाइशे नइखे ओरात। डाबर के ऑवड़ा के तेल, लक्स के मीठऊआ साबुन, माला सेन्ट आ पांड्स पाउडर- लमकी लिस्ट देख के भइया तरना जास। बड़की माई उनकरो के समुझावस -‘फगुआ नू आवत बा बबुआ, दुलहिनिया ठीके नू कइले बिया -धीरे-धीरे एक-एक करके सब सामान आ जाई। एकेदिने कुछ इयाद रही, कुछ भोर पड़ जाई, तऽ का होई? फगुआ के दिने बाजारे जाए में माटी में गोथा जाये के डरे कवनो मरद घर से थोरिके निकलेला लोग। बुढ़ऊ लोग के तऽ लइका छोड़बे ना करेलन सं, तू कइसे निकलबऽ?’

बड़की माई के ई बतकही सुनके मने-मन खीस एतना बरे कि का कहल जाव! पतोह के बचावे खातिर कबो बोखार के बहाना, कबो कपरबत्थी के।

फगुओ के दिने भोरही नहवा-धोआ के जब पुड़ी-पुआ बनावे खातिर भौजिये के बइठा देस आ कहस कि तू चूल्हा तर से उठबे मत करिहऽ, अपने आई लोग आ मुँह बनाके लवट जाई लोग। अँगना में कल पर से लोटा में चौका खातिर पानी लेबे भौजी कब उठिहें -ओतने खातिर घुरिआइल रहे के पड़त रहे।

बाद में जब बड़का भैया के बिआह हो गईल आ नवकी भौजी आ गइली तऽ हमनीं के उलटा-पुलटा टानही ना लगली बलुक सब अगराइलो छोड़ा दिहली। बड़का भैया सतपाल जी महराज के चेला हो गइल रहलें आ बिआह ना करेके मन बना लेले रहलें। बाद में उनकरो मन डोल गइल आ छोटका भैया के बाद ऊहो बिआह खातिर राजी हो गइले। बड़ा मुसकिल हो गइल रहे जब छोटी जानी का बड़ी जानी बन जाये के पड़ल रहे, आ बाद में उतरल बड़ी जानी का नवकी भाभी भइला के चलते हमनीं के उधम सम्हारे के पड़त रहे। ‘नवकी भौजी’ हमनी कही सं बड़की भौजी के; काहे कि ऊ बाद में उतरल रहली। बड़ा मानस नवकी भौजी, चूँके उनकरा के हमनी ‘नवकी भौजी’ कहीं। हमहूँ खूब घुरिआईं उनकरे लगे चूँके एक तऽ ऊ बेराम कम पड़स आ दोसर कि देहो-दसा से बरिआर रहली। बरिआर रहली एहसे डर बराबर बनल रहे। मोरी के पाँकी में धसोरके पाईंट-ताईंट सब खोल-खाल देस। बाकिर उनकरा हाथे रगराये के एगो अलगे मजा रहे। गरमी के दिन में जब स्कूल सबेरहीं जाये के पड़े आ बारह बजे ले घरे लवट आवत रहीं हमनीं, पूरा दुपहरिया बड़किये भौजी के लगे कटे। खूब अमरूद खियावस आ भैया का लगे चिट्ठी लिखवावस। एलीफैन्ट आ बैशाली कॉपी के पन्ना फारि-फारि खूब मजा आवे भौजी का ओरि से भैया के चिट्ठी लिखे में। कहस कि तनीं शायरी डाल दीं बबुआ तब नू भैया का अच्छा लागी। हम खाली ‘बलम परदेसिया’ फिलिम के गाना सुनाईं तऽ कहस कि ई ना चली, रूकीं हम बतावत बानीं। फेरू लिखवावस-‘‘लिखत बानीं खत खून से सियाही मत समझेब/पाती हऽ गरीब के खेयाल खूब करेब।।’’

-आखिर में लिखवावस- ‘चल जो रे चिट्ठी उड़ते-उड़ते। पिया जी के बोलिहे नमस्ते-नमस्ते।’ चिट्ठी पूरा पढ़िके सुनावे में हमरा भुनभुनाहट से बगले में दोगही में सुतल इया के नींन टूट जाव आ कि ऊ महटिअवले हमनीं देवर-भौजाई के बतरस सुनत अचानके भड़क जास- ‘रे दुलहिनिया! तें छँवड़ा के बिगाड़ के छोड़बे। आ ई घरघुसना तऽ मऊगा होइये गइल बा। बाबा के लगे दलान में ई ना सूती, तोहरे लगे जँतसार पारे में एकरो मन लागेला। आज इनकरा के धोलवावत बानीं बबुआ से। इया चरचरात-चिल्लात रह जात रहली बाकिर झट से चिट्टी लिफाफा में भरा जात रहे आ भौजी से जिलेबी खाये के पइसा लेके पटकवरा ठोकले दउड़ जात रहनीं हम, डाखाना ठेकावे चिट्ठी के। ई नेह-नाता रहे देवर-भौजाई के ओह बेरा।

नवकी भौजी हमार बिआह में खूब छउक-छउक मल-मल हमरा के नहववले रहली आ परीछे के बेरा लोढ़ा घुमावत पूछले रहली- ‘हमरा के भूल ना नू जइबऽ राजा?

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‘फगुआ’ बादो के साल में कई बेर आइल। नोकरी-चाकरी से छुट्टी निकालके घरे पहुँचला के बादो ऊ नवकी भौजी ना भेंटास। भइया लेके उनके परदेस बस गइल रहलें। जवन भौजी लोग भेंटास ओह लोग पर अबीरे से काम चला लेबे के पड़त रहे। पेट खराब ना होखो एहसे दहीबाड़ा खाइये के भौजी लोग से माफी लिआ जाव। पुआ-पूड़ी बने बाकिर छूअे के केहू नाम ना लेव।

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हमनीं के गाँवे एगो झखड़ काका रहलें। झखड़ काका फगुआ के महीना भर पहिलहीं से गोथाए लागत रहलें। एक महीना पहिलहीं से नहाइल छोड़ देस ऊ। कहस -अब फगुअे के दिन नहाइब पोखरा में। इयाद बा- एक बेर अहिरटोली से दही के नदिया लेके चललें तऽ थोरिके दूर चलला के बाद लइका डंटा मारके फोड़ दिहले सं -माथा पर से नीचे ले नहा गइले गोबर से। माई-बहिनी के गरिआवे में उनकर जोड़ ना रहे। नया-नया काटल-काटल गारी देबे में एक नम्बर रहलें पूरा गाँव में। बाकिर केहू बुरा ना माने। झखड़ काका के गारी परसादी रहे।

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एक साल फगुआ में तऽ गजबे भइल। बगौरा गढ़ पर के पगलाइल सियारिन एक रात चार आदिमी के काट लिहलस, भोरे-भोरे डोल-डाल करे गइल रहे लोग। ई घटना के चरचा ओह साल खूब भइल आ मारकेट में फगुओ उठा दिहल लोग- ‘‘फागू राय के कटलस/अचारी जी के कटलस/ मामा जी के कटलस/जोगड़वे रे पगलिन सियरिनिया।।’’

-अब ना गाँव में फागू राय जी बाड़न जवन फगुआ कढ़ावत रहलें, ना अचारी जी बानीं जवन दरबार के पुजेड़ी रहनीं आ ना महारानी दुलहिन जी के भैयेजी बानीं, जेके गाँव भर के बुढ़-जवान सभे ‘मामा जी’ कहे।

अब फगुआ फगुआ नइखे रह गइल, ना अउसन भौजी लोग बा, ना कवनो झखड़ काका बाड़ें ना फागू राय, ना अचारी जी, ना मामा जी! आज तऽ किनहूँ नाँव जोड़के अगर गीत बना देस तऽ गोलिये चल जाई। फगुआ आजो आवत बा बाकिर कुर्त्ता बस अबीर खाके रह जात बा आ मनई छोटकी कटोरी में थोरिकी भर छोला आ टिकड़ी के साइज के पुअे से ढेकारे लागत बा। साँच पूछल जाव तऽ अपना-अपना दुआरी से गाँवों में अब केहू हिले के नइखे चाहत। फगुआ आज अचिको नइखे फगुआत, फगुआ के नाम भर रहि गइल बा।


  • डॉ॰ सुनील कुमार पाठक

पत्राचारीय पता-जी-3, ऑफिसर्स फ्लैट, भारतीय स्टेट बैंक के समीप, न्यू पुनाई चक, पटना-800023,
ई-मेल-skpathakpro@gmail.com मो॰-9431283596

 

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