तनि दूरे रह मर्दे…….?

का जमाना आ गयो भाया, सोसल डिस्टेन्सिंग के मतलब बता-बता के सभे पगला गइल बाकि केहू माने आ बुझे के तइयारे नइखे। के-के नाही लागल समुझावे में, बड़का भइया से लेके छोटका भइया तक, बबवा से लेके मोटा भाई तक, भुंअरी काकी से लेके मनराखन पांडे तक बाकि ई ससुर के नाती लो समझते नइखे। एह लोगन के एगो बेमारी धइले बा जवना के नाँव सबूत ह। जब ले दू -चार जने एन्ने-ओन्ने ना होखिहें, मनबे ना करी लो। दोसरकी लहर में कई लाख लो मर-बिला गइलें बाकि लोगन के अभिओ समुझ में नइखे आइल। कुछ लोग त ई बूझ के रखले बा कि समुंदर के मथला से जवन अमरितिया निकसल रहे, बिसनु जी इनही लोगन के पिया के भेजले बाड़ें। घुसुक-घुसुक के कपारे चढ़े खातिर तइयार बइठल बा। पता ना एहनी के भीरी लाजो-हया बा कि ना। जुरमाना लगो भा डंडा बाजो, अदबद उहे कमवा करी जवना के बरिजे के कहल जा रहल बा। एहनिन के ई हाल देखि-देखि के हमरो खोपड़िया के चकर घिन्नी बन गइल बा। जतने नवहा लोग बा,समुझवला पर पकठा पुरनिया लेखा गियान के गंगा उझिले लागता। मने जे समुझा रहल बा, तेही दोषी बा। ई लोग करियो के पाक-साफ बनत फिरत बा। बाकि जवने दिना मुँहझउसा कोरोनवा अपना लपेटा में लेता, ओह दिन छठी के दूध मन परा देता। घर-पलिवार, हित-नात, दोस्त-मित्र सभे के मुँह पर फेफरी पड़ जाता। कतने आल्हर-आल्हर  बच्चा-बुतरु कुल्हि अनाथ हो गइलें बाकि कुछ लोग त अबो मानत नइखे।

मलिकार लोग आँकड़ा के बाजीगरी देखा-देखा के सभे भरमावे में लागल बा। ई मति कहीं कि हम बाउर बोलत बानी। अब रउवे बताईं कि जवना दिन हरनंदी से सटल सहर के मरे वाला लो के गिनती 2 गो बतावल आ भोंपू पर सुनवावल गइल, ओह दिन 2 घंटा में एंबुलेंस हिंडन घाट के 15 चक्कर मरलस आ उहाँ चहुंपल मुरदन के भसावे खाति टोकन बाँटल गइल रहे आ नम्मर 6-7 घंटा बाद आइल। एकरा पाछे मलिकार लोग के का मंसा बा, एकरा फेरा में पड़ला के जरूरत नइखे। जरूरत बा अपना आ अपना पलिवार के संगही समाज आ देश के एह कोविड से बचावे के। उ बाँची कइसे, सोसल डिस्टेन्सिंग, मास्क आ इंजेक्सन मने वैक्सीन से। जतना कड़ाई हो सके, ओतना कड़ाई से एह तीनों के कइला के काम बा। काहें से कि अबरी जमराजों आपन बही-खाता खोल के बइठल बाड़ें, जरिको ओनइस-बीस होते परचा फार देत बाड़ें। उनुका भीरी कवनो सोरस-पैरब्बी नइखे चल पावत। उ कवनो मंतरी-संतरी के चिट्ठी-पतरी भा फोन-सोन नइखे देखत-सुनत। मने ई दोसरका कोरोना काल सभे के मन के घवाहिल कर देले बा। सभे के संसियों सतावल देखाता आ सभहरे से साँय-साँय मउवत के रोंवा कंपावे वाली अवजियो आ रहल बा।

मलिकार के करिन्दा लोगन के लूटला-खइला से फुरसते नइखे मिलत। ई लोग त गिद्धनो से गइल-गुजरल हो गइल बा। रउरा सभे जानते होखब कि गिद्ध मुअल जानवर भा मुरदा के खालें, बाकि ई लोग त जियते के खात बा। आदमिनो के बीचे क दया-करुना आ सहजोग के भाव मर गइल बुझाता। अइसन आफत-बीपतों के लोग लूटे-खसोटे के मोका बना देहलस। आक्सीजन आ दवाई के हाल देखि के सिर धुने के मन करे लागता। एहनी के सरीर से मलिकार आ दरोगा-पुलिस के डरे खतम हो गइल बा। कतों-कतो त इहों देखाइल कि इहो लोग एहमें नटई ले सउनाइल बा। अतना होखला के बाद अब लोगन के सबूत त नहिए चाही। अबो केकरो चाहत होखे त कवनो समसान घूम आओ, देखि के बकार निकसल बन्न हो जाई।

ई समय सभे के नीमन से समुझा चुकल बा कि का करे के चाही आ का न करे के चाही । मीन-मेख निकारे खाति हरे जुग में कुछ लोग जामेले, एहु घरी बाड़ें। अस्पताल, दवा,नियम-संजम इहे आगु आवे वाला समय के हरबा-हथियार ह , एही सभे के पोढ़ कइल समय के जरूरत बा। भविस खातिर गाँव-गाँव के हर सुविधा से जोडल बहुते जरूरी बा। ढेर स्वास्थ्य केंद्रन में गोइठा पाथे से लेके सुअर पाले तक के हाल चल रहल बा, ओहनी पर मलिकार लोग के नजर जासु आ उहाँ डागदर लोग मय दवा-बीरो के संगे भेंटाय तबे जवन तीसरकी लहर के सुनगुन चलत बा, ओहसे देश आ समाज के बचावल संभव हो पाई। अबो ना चेतल त चानी अस चानी के बार उधियाये में देर ना लागी।  हम त मन के बाति कह देनी,राउर मरजी मानी भा मति मानी।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

संपादक

भोजपुरी साहित्य सरिता

 

 

 

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