कविता आ कुदार हाथ में दुओ लिआइल

धन्य रहे धरीक्षण मिश्र जस लोग , जे भोजपुरी के अपना अभिव्यक्ति के माध्यम बनावल । ओह लोग
का अपना महतारी भाषा खातिर कवनो हीन भावना ना रहे ,आ ऊ लोग भोजपुरी के भाषिक शक्ति से खूबे परिचित रहे । मिश्र जी के काल हिन्दी आन्दोलन के काल रहे । भोजपुरी क्षेत्र के लोग भोजपुरी के अनदेखी करत,दरकिनार करत हिन्दी सेवा में लागल रहे । आजो
बहुत लोग हीन भावना से ग्रसित बा आ चाहत बा कि भोजपुरी लोकेसाहित्य तक सीमित रहे ।  मूर्खतापूर्ण तर्क से ई लोग भोजपुरी के हिन्दी के बोली साबित करे में आपन श्रम जाया कर रहल बा ,जबकि भोजपुरी के सैकड़न साहित्यकार धरीक्षण बाबा से सीख लेत भोजपुरी साहित्य सेवा में जुटल बाड़ें । भोजपुरी के अभिव्यक्ति क्षमता के पता मिश्रजी आ ओह समय के भोजपुरी साहित्यकार लोग के रहे  । भोजपुरी में कइसे
लिखे के चाहीं मिश्र जी से सीखल जा सकत बा ।
शुरुआती पढ़ाई तमकुही में , मिडिल के पढ़ाई पडरौना में आ हाई स्कूल के पढ़ाई लंदन मिशनरी हाईस्कूल ,बनारस से कइला के बाद मिश्र जी चहले रहितीं त नौकरी कइले रहितीं । नौकरी ना करके कविता आ खेती बागवानी के पारम्परिक पेशा के अपनवलीं । ई , अधछेछरा पढ़ाई करके नौकरी के लाइन में लागेवालन आ खेती से मुँह फेरेवालन खातिर आँख खोलेवाली बात बा । गाँधी जी के सादगी आ मित्तव्ययिता अउर अपना अंग्रेजी अध्यापक हिल साहेब के मेहनत ,लगन आ स्वध्याय के सीख के गंठरी पाड़त मिश्र जी जीवन में आगे बढ़ चललीं ।
सुबह सबेरे नित्य क्रिया से निवृत हो के बिना कवनो बाहरी आडंबर ईश वंदना आ ध्यान करके कोदार खुरपी लेके खेती बागवानी कइल , आस पड़ोस के गंदगी के सफाई कइल उहाँ के रोजनामचा रहे । सुस्ताए घरी साथ के कॉपी पर पेन्सिल से कविता रचल , घर – परिवार , गाँव ,समाज , राज ,देश सब पर  नजर राखत ओकरा विसंगतियन के उकेरल उहाँ के दैनिक जीवन में सामिल रहल ।  उहाँ का सबसे बेसी राजनीति , राजनीतिक दल आ नेतन के बखिया उधेरले बानी । सामाजिक समस्यन के लेके उहाँ के  नजर  कम तीख नइखे  । अइसहीं वैवाहिको समस्या पर उहाँ के पैनी नजर बा । मिश्र जी के कविता के कैनवास बड़का बा आ विविध विषयन के ओह में समावेश बा ।
मिश्रजी भोजपुरी व्यंग्य परम्परा के लमहर कवि के रूप में स्थापित भइनी ।  भोजपुरी भाषा के विशेषता ई बा कि ऊ गाभी परधान भाषा ह । एह गाभी के  पूरा उपयोग भोजपुरी के आदि कवि कबीर दास में देखल जा सकत बा ,जब ऊ धर्म के बाहरी आडंबर पर कड़ा चोट कइलें । ई व्यंग्य के परिपाटी के हीरा डोम भगवाने पर आक्षेप लगा के आगे बढ़वलन ,जवना में भगवान पर छुआछूत से डेरइला के बात करत बाड़न ।
धरीक्षण मिश्र में ई व्यंग्य विनोद के साथ अभिव्यक्त होखत बा ।  अपना ‘गणेश बन्दना’ में विनोद के साथ गणेश जी के सक्षमता पर सवाल उठा देले बाड़न — हम सिमिट माँगब ना तोहसे
घर फूस के बाटे घेरावल टाटे
बर नेता बने बदे माँगबि का
पनियाँ जब ना पियनी कई घाटे
कविता के कला मँगले हँसब s
हम बानी देहाती गवाँर जपाटे
कहि दs निज वाहन से एतने
कबे कापी किताब हमार न काटे
अपना अमरस प्रेम के विनोदी ढंग से उहाँ का आत्म परिचय वाला खंड में परगट कइले बानी — चिउरा का साथ आम का रस का मिश्रण के                जे  ग्रास हवे
बस उहे सजीवन बूटी ह s आ ऊहे
च्यवनपरास हवे
ए मृत्यु लोक के अमृत उहे हs
उहे. सुरा शैम्पेन हवे
आ मानुस खातिर ईश्वर के ऊ
सबसे उत्तम देन हवे ।
कवना धरीछना से मिलल आजादी , सुराज में जनसेवा के नाम पर मंत्री बनि के लोग स्वराज करे लागल ,त भला धरीक्षण मिश्र के कवि चूके वाला कहाँ रहे —-
सरपंच का दुआर ब्लॉक से मिलल उधार पर ।
काँगरेस का हड़वार पर गान्धी जी का जयकार पर ।
सुराज सैर करत बा मिनिस्टरन की कार पर ।।
मिश्र जी के निशाना पर नेता बेसी बाड़ें । ओहू में सत्ताधारी दल । कवि के कहनाम बा कि सत्ता में बइठल नेता लोग दोषी अपराधियन के बचावे के काम कर रहल बा । पुलिस पर ई लोग दवाब बना के , अपराधी के छोड़वा रहल बा । नेता के पहचान ओकरा पहनावा ओढ़ावा से कइल आसान बाटे —
उजर खदर के टोप धरत जे अपना शिर पर ।
तब ऊ नेता बनत जे लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर  ।।
इनका मारे पुलिस चोर के पकड़ न पावत ।
अगर कहीं पकड़ात त जा के रिहा करावत ।।
गाँधी जी के तीन बानरन के जरिये गाँधी जी के अनुयायी लोग के जवन चित्र मिश्र जी खिंचल़े बानी  ,ओकर गाभी भीतर ले मार करेवाली बिया । मिश्र जी एह कविता में गाँधीवाद के भुलवा देले बा काँग्रेसी लोग ई बतवले बानी ——
गाँधी जी के पक्का चेला रहले तीन गो बानर ।
बउक एक गो बहिर एक गो और एक गो आन्हर ।
गाँधी जी का बाद एक परिवर्तन  उनमें  आइल ।
तीनूँ बानर नेता भइले गान्धी बाद भुलाइल।
मिश्र जी आपातकाल के खूबी आ खामी दुनो के बरनन अपना कवितन में कइलें  । कइसे मीसा के दुरुपयोग भइल । लोग के परेशान करे के हथियार बनल रहे मीसा । सरकार बदलला पर जनता पार्टी के शासनो कवि के तीख नजर से ना बाँचल । एह शासन के विसंगतियन पर उहॉ के कलम चलल । इन्दिरा सरकार आ जनता सरकार के तुलना देखलीं —–
जेतना काम इन्दिरा जी ओह घरी
एगारह बरिस में कइली ।
ओतना काम जनता सरकार
अढाई बरिस में कर दिहलसि।
ऊ प्रजा के पानी में उसिनत रहली
त ई तावा में सुखले तता दिहलसि ।
सामाजिको व्यंग्य मे मिश्र जी  विविध विषयन पर कटाक्ष  कइले   बानी ।    पटवारी  ,विकास ,ब्लाक ,अस्पताल ,सोसायटी (गन्ना ),दहेज , अध्यापक ,पंचाइत ,ग्राम प्रधान ,सर्वोदय, विद्यार्थी आ नकल जइसन विषय एह में सामिल बा ।  पटवारी पुराण लमहर नाटिका रूप में बा । पटवारी के चरित्र के स्वगत कथन उजियार करत बा —
त अब दू दू असामिन के हम चिरुकी धइ के जोरीले
लड़ा के सब के आपुस में हम धन सुध करि के छोड़ीले
दवा दारी फरारी में हम केतने घर उजारी ले ।
आ सर्किल रेट में गरदन हम सबके रेति डारीले ।
‘ब्लाक’ कविता में सरकारी अधिकारियन पर उहाँ के कलम नीब चुभावत लिखलस —
खर्च मनमाना करे के मिल गइल अधिकार बा ।
आज कल के इहे सब राजा तथा जिमिदार बा ।।
उहाँ के ई साबित करत बानी कि एह देश से राजतंत्र आ जमींदारी नइखे गइल ,रूप बदल के बरकरार बा ।
पूरबी यू. पी. में गन्ना किसान के नकदी फसल रहल बा ,बाकिर सबदिन गन्ना के साथ ,ओहके उपजावे वाला किसानो पेड़ात रहल बा  । एह काम में जे सोसायटी बनल बाड़ी स ऊ मजा मार रहल बाड़ी जबकि किसान बेहाल बा —-
उपजावत ऊँखि किसान स्वयं
मिलवा तक ओके हवे पहुँचावत ।
मिल मालिक ओके मसीन से पेरि के
और पकाइ के चीनी बनावत ।
बिचवा में सोसाइटी आई के
चीनी का दाम से बैठल मौज उड़ावत ।
घुन खाके अनाज के गुदा मनो
खोइया बा किसान के खाली खियावत ।
तत्कालीन समस्यन पर कुछ दोहा देखीं जवना में बदलत युग के ऊपर चोट करत उहाँ का विसंगतियन के उजागर कइलीं —-
चीनी गुड़ के रस गइल चाय भइल अब पेय ।
ज्ञान हीन शिक्षा भइल सनद भइल अब ध्येय ।
घड़ी हाथ गहना भइल लुँगी भइल पोशाक ।
मूर्ख लोग वक्ता भइल पण्डित लोग अवाक ।
समाज में विवाह के समस्या रहल बा । दान दहेज , स्वागत सत्कार के लेके बेटहा – बेटिहा के बीचे तकरार , रूसल मुँहफुलौअल आम बात बा ।मिश्रजी के कलम से इहो सब.विषय अछूता नइखे । बाकिर , विदा होके जायेवाली कनियन के  रोआई के जरिये विनोदी भाव से औरत जाति के समस्यन के जवना तरह उकेरले बानी ,साँच पूछीं त ऊ व्यंग्य में रूदन पैदा करत बा । स्त्री विमर्श के नायाब नमूना बा —
लेवे के साँस ना बतास ताजा पाइबि हम
ओढ़े के परिहें कई पर्त के ओढ़नियाँ ।
कहियो त गोड़ बड़ा जोर झिन्झिनाये लगी
कहियो दुखाये अगियाये लगी चनियाँ ।
डाक्टर कही कि कम भैल बा विटामिन बी
नैहर के भूत कही ओझा और गुनियाँ ।
केकर जवाब कौन कइसे दे पाइबि हम
एही दुखे डोली में रोवत जाति कनियाँ ।
मिश्र जे के नजर से कोर्ट कचहरी आ न्यायिक प्रक्रियो ना बाँचल ।उहाँ का एह क्षेत्र में जवन अनाचार बा ,ओहू पर लिखले बानी —
हवे बजार बजार ना , कोर्ट हवे बाजार ।
जहाँ न्याय सौदा बिके ,गाँहक जुटे हजार ।
गाँहक जुटे हजार , दाम जे अधिक चुकावे ।
उहे न्याय उहँवा अपना मन माफिक पावे ।
मिश्र जी के कवितन के जाने समझे आ ओकरा विस्तार के परिचय पावे खातिर बड़हन विश्लेषण आ मूल्यांकन के जरूरी बा । उहाँ का खेत में अनाज फल फलहरी भर नइखीं उपजवले ,बलुक कागज पर कलम से कवितो उजवले बानी , जवना के सवाद चटखार बा । बेलाग बोले लिखे आ बिना डेरइले
पाठ करे में उहाँ के बराबरी संभव ना बा । ई निडरता उहॉ का कबीर से मिलल बा ,विद्वता तुलसी आ केशव से ।  हर स्तर के पाठक आ श्रोता के मनसायन होत बा ।  उहाँ के मान्यता बा कि बिना खेती आ बिना शिक्षा एह देस आ देस के जनता के कल्याण ना होई । उहाँ का एही से कुदारो उठवनी आ कलमो चलवनी । उहाँ का कहनी – ‘कविता आ कुदार हाथ में दुओ लिआइल’ ।

  • डॉ० ब्रज भूषण मिश्र
    .****  मुजफ्फरपुर , बिहार ।
    मो. 9905030520

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