हमार माई

हमरो  येगो माई रहली।

हमरे खातीर सब कुछ सहली।

 

कब्बो बबुआ कब्बो दुलरुआ

कब्बो जिगर के टुकड़ा कहली।

 

जब गिर जाईं दौड़ के आ के

हमके उठा सोहरावत रहली।

 

खूब हमन के मालिश कईली

चांत-चांत मजबूत बनवली।

 

अपने अंचरा ढांप-ढूप के

हमके दूध पिआवत रहली।

 

हम जो हंसीं त हंसत रहली

हम रोईं त रोअत रहली।

 

रोज सुनावत रहली लोरी।

हमके सुता के सूतत रहली।

 

नजर कहीं न हमके लग जा

करीआ टीका लगावत रहली।

 

उनके खातिर सभे दुलरुआ

सतवां रहल या रहल पहली।

 

“खेतान”के ना सेवा लेहली

इहवां से ऊ चटपट गईली।।

जगदीश खेतान

कप्तानगंज ( कुशीनगर)

Related posts

Leave a Comment