सामा चकवा लोक कथा

सामा चकवा ई लोक कथा भारतीय लोक मानस मे रचल बसल बा।एक भाई अपने बहिन बदे अपने बाप क बिरोध करेला अऊर ओके निर्दोष साबित कर के समाज के लोगन के एक नेक सन्देस देला।आज जहाँ समाज मे रिस्ते नाते बेमानी होत जात ह।ऊहा ई त्योहार क आजू के समय मे महत्व बढ. जाला।ई कहानी बा राजा कृष्न क बेटी साम्बवती रहनी।एक चुगुलखोर जाके राजा से कहेला कि सामवती क एगो ऋषि के साथे गलत समबन्ध बन व ले ह ई।राजा ओकरे बाती पर बिसवास क ई लेनै।एक बार भी सत्य क पता ना लग ऊनै।न अपने बेटी से एक बार जानै क कोशिस क ईनै।उ अपने बेटी अउर ऋषि के शाप दे देहनै दूनो मैना बन ग ईनै।लेकिन साम्वती के पति के अपनी पत्नी पर पुरा भरोसा रहल ।उहो मैना क रूप ध ईले।अब तीनो जन पछी के रूप मे ।ई देख के साम्यवती क भाई बहुत चिंतित हो जाला।अपने बाबूजी के बहुत भरोसा देला कि हमार बहिन सही ह एकरे बदे उ तपस्या भी करेला।अन्त मे राजा के अपने गलती पर पछतावा होला तीनो के शाप से मुक्त क ई देनै।ईहै सामा चकवा लोक पर्व क कथा बा। आज जहा रिस्ता भी बजारहो गयल ह अईसने मे लोकमानस मे बसल ई कथा मे भाई अउर पति क भरोसा साथे साथ बहिन के दोस मुक्त करे बदे भाई क त्याग क सन्देस बा।

बहिन कुल भाई के त्याग मे ई त्योहार मनावैली।माटी क चिर ई बना के ओके रोज खेते मे चरावै ले जानी गीत गावत जानी।कातिक के पूनवासी के बिसर्जन कयल जाला।बहिन कुल चुगुलखोर के दाढी मे आग लगा देनी माटी क चिर ई तोड के सामा ऋषि अउर सामा क पति सब मानव रूप मे आ सके।

 

  • डॉ ऋचा सिंह

Related posts

Leave a Comment