राम रावण के नवका लडाई

रवनवा राम जी के लगे आइल

उनका गोडे प गिर गइल

कहलस –

‘देखीं ! अब हमरा आ रउरा में कवनो टसल नइखे

रहि गइल

एगो सीता जी रहली

त ऊ धरती में समा गइली

अब उनकर कवनो मामला बचल नइखे

रहल सवाल राज काज के

त हम रउरे पालिसी के कायल हो गइल बानी

अब हमरो रउरे रसता प चलेके बा

जनता खातिर जियेके बा

जनता खातिर मरेके बा!

 

देखीं राउरो उमिर हो गइल!

एतना दिन ले लोग खातिर जीअनी ह

मुअनी ह

दिन के दिन ना बुझलीं

रात के रात ना बुझलीं

जंगल में ,झाडी में

कुस में,कांटा में

भटकनी हं

तनिको सुख ना मिलल

आराम ना मिलल !

 

रउरहूं के कुछु आराम चाहीं

अब चलीं,कुछु दिन सुस्ताईं

राज पाठ कुलि रउरिए ह

जब मन करी चलि आएब

हमहूं के सुधरला के मौका दीं

हम तन मन धन से राउर पालिसी लागू करब!

 

आ देखीं ! रउवा त हईं भगतन के माई बाप

भक्तन प क्रिपा करीलें

हमहूं के भक्त बना लीं

मुअले प त रउरे तारबे करीलें

हम के जीअते तारि दीं।’

 

कहि के

रवनवा राम जी के गोड ध के लगल रोवे

एतना रोवलस कि ओकरा आंसू से नदी बहि चलल

राम जी भींजि गइलन

लगलें सोचे कि

बाति त ठीके कहता

एक बेर एही के मौका दे दियाव

कहलें

‘चलS रावन भाई ठीक बा

तोहऊँ के मवका दे रहल बानी

बाकी जानि लीह

तनिको शिकायत के मवका न दीह!’

 

रवनवा कहलस-

 

‘राम जी राउर किरिया

जो हम कुछ गडबड करीं

हम रउरे रसता प चलब

राउरे बतावल नीति धरम निबाहब।’

 

राम जी रवनवा से खूब हरवले भखवलें

आ ओके मवका देबे के मन बना लिहलें

कहलें –

‘अच्छा रावन भाई तू राज पाठ सम्हारS

आ हमके बताव,हम का करीं’

रवनवा कहलस-

‘रउवा अब आराम करेके बा

रउवा खातिर बहिरा अलंग में

एगो रिसार्ट तइयार करा देले बानी

ओहिमे जाके रहीं

पूजा पाठ करीं

बइठल बइठल देखत रहीं

हम कवने तरे का कS रहल बानी

टाइम टाइम प हमरा के बतावत रहेके बा!’

 

राम जी कहलें कि

‘चलS ठीक बा

तू सब सम्हारS

अब हम चलत बानी।’

 

रवनवा कहलस

एगो अवर निहोरा बा

राम जी कहलें -ऊहो बताव!

रवनवा कहलस-

‘हमार दसासन रूप जनता के ना भावे

हम एके ढोवत ढोवत थकि गयल बानी

एके रउवा सम्हार लेतीं

आ आपन रूप हमके दे देतीं

त सब मामला ठीका जाइत’

राम जी कहलें -‘देख !भक्त हमार कमजोरी हवें

जब तू भक्त बनि गइल त इहो स्वीकार बा!

 

रवनवा आपन दसो मुंह राम जी के दे देलस

आ राम जी के चेहरा अपने उप्पर लगा लेलस

राम जी रावन के चेहरा लगा लेहलें

आ महल से निकलि परलें

जसहीं महल से निकललें

रवनवा के सिपाही उनका के ध के ले गइलें

जेहल

कहलें

इहे रिसार्ट हवे

अब रउवा एही में आराम करीं

जेहल में रामजी रावन के दस ठो कपार

सम्हारे लगलें

 

आ राम जी के चेहरा लगवले रावन

मगन होते राज करे लागल।

लोग के बुझाइल की रामराज

चलि रहल बा।

–/ —–

प्रो. सदानंद शाही

भोजपुरी अध्ययन केंद्र

(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

 

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