भोजपुरी साहित्य क पारस : पं. धरीक्षण मिश्र

जब से सृष्टिकर्ता सृष्टि के रचलें तब से भाव अउरी विचार के अभिव्यक्त करे के मानवीय लालसा अलग अलग रूप में जनम लेहलस । मुंशी प्रेमचंद जब ई कहत बाड़े कि जवना साहित्य से हमरा में रुचि ना जागे, आध्यात्मिक अउरी मानसिक तृप्ति ना मिले, हमरा में गति अउरी शांति पैदा ना होखे, हमरा मे सौन्दर्य प्रेम ना जागृत होखे, जवन हमनी के सच्चा संकल्प अउरी कठिनाई पर विजय पावे के दृढ़ता उत्पन्न ना करे, ऊ हमारा ला बेकार बाटे अउरी ऊ साहित्य कहलावे के अधिकारी नइखे ।

बात अगर पंडित धरीक्षण मिश्र के होखे त ऊहाँ के साहित्य मे ऊ सब कुछ मौजूद बा जवन उत्कृष्ट साहित्य के मानक होला । पंडित धरीक्षण मिश्र पर आइल एगो स्मारिका मे कैलाशनाथ मिश्र जी एगो बड़ा बढ़िया प्रसंग लिखले बानी उहाँ के कहत बानी कि १९६० के दशक के बात हs ,नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया मे डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी आइल रहनी आ ऊहाँ कविवर पंडित धरीक्षण मिश्र जी भी आमंत्रित रहनी ।ऊहाँ के आपन‌ लोकप्रिय रचना “कौना दुखे डोली में रोवति जाति कनियाँ ” अउरी संस्कृत व्याकरण पर केंद्रित कुछ रचना के सुनाके डॉ. द्विवेदी के आश्चर्यचकित कर देहनी। “कौना दुखे डोली में रोवति जाति कनियाँ ” के अंतिम बंद रहे :-

चौदहे बरीस घर राम छोड़ि दिहले तऽ

पोथी के पोथी लोग लिखले बा कहनियाँ ।

जन्म भूमि छोड़ि देत बानी आजीवन हम

माथ पै चढ़ा के माई बाप के बचनियाँ ।

हमरी बेर बाकी तऽ दुकाहें दों सूखि गैल

बालमीकि व्यास कालिदास के कलमियाँ ।

हमरा ए त्याग पर लिखाइल ना ग्रंथ एको

एही दुखे डोली में रोवति जाति कनियाँ ॥

जइसे ही बंद खतम भइल, डॉ. द्विवेदी ,धरीक्षण मिश्र के अपना अकवारी मे भर लेहनी अउरी कहनी कि “आपने कमाल कर दिया है । इस पर तो आज तक न किसी का ध्यान गया है और न किसी ने कुछ लिखा ।”

अइसही एगो अउरी संस्मरण “अमृतध्वनि” जइसन कठिन छंद के बारे में आवे ला । धरीक्षण मिश्र जी के काम बाटे अमृतध्वनि पर उहाँ के लिखल हs :-

ठनगन समधि नाधि के, बके अंट के पंट ।

बेटिहा भेजले अंत में ,लट्ठद्धर कुछ लंठ ।।

लट्ठद्धर कुछ लंठज्जबर गरज्जद्धरधर  ।

धद्धग्गरदन  चच्चचटकन   थत्थत्थपर ।।

गातल्लउरि पीटातस्सब सुधियातत्तनमन ।

खातक्कवर सुहातठ्ठहर  भुलात्त ठनगन ।।

डकडर बिना न जात बाअइसन बा बरजाद ।

आइल तीर्थ प्रयाग सेकुम्भज्जबर परसाद ॥

कुम्भज्जवर परसादध्धर तन कम्पत्थरथर ।

आँखझ्झरझर नाकसरसर साँस्घ्घरघर ॥

बन्दघ्घर मन मन्दत्‍तर निस्पन्ददि‍दनभर ॥

तारच्छिकत कपारध्धिकत पधार डकडर ॥

 

जब एह छंदन के डॉ. पंडित विद्यानिवास मिश्र जी देखनी त कहनी की “मिश्र जी के कलम से तरि गइल भोजपुरी” ।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी लेखक मैनेजर पाण्डेय लिखले बानी एक जगह की “ पं. धरिक्षण मिश्र सचमुच एक किसान कवि है । उन्होंने कविता की खेती की है । उनकी कविताएं एक किसान कवि की लहलहाती फसलें है जो कवि को संतोष देती है और दुसरे को जीवन । उनका काव्य-संसार तुलसीदास के काव्य-संसार की तरह सधारण जन के लिए भी है और पंडितों के लिए भी ।”

पं. धरीक्षण मिश्र लोक भाषा के एगो महान साहित्यकार रहनी , जेकरा रचना में अलंकार, छंद साम‌र्थ्य के व्यापकता भोजपुरी ला एगो गौरव के बात रहे । इहे कारण रहे कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी एह कवि के भोजपुरी साहित्य जगत में ऊँच स्थान मिलल बाटे।

 

कवनों भी रचना के व्यावहारिकता समय आ काल से परे होला। एगो उहाँ के रचना देखल जाव

कथनी पर करनी फेरात नइखे,

दिमाग गरम रह ता कबो सेरात नइखे,

हर के दुगो बैल कइसे मान होइहें सन

जब एगो बुढ़ गाई घेरात नइखे ।

 

लोकतंत्र के बारे में उहाँ के जब कहत बानी कि :-

लोकतंत्र के मानी ई बा,

लोकिलोकि के खाईं

जिन गिरला के आशा करिहें,

हाथ मलत पछताई ए भाई,

अइसन राज ना आई ।

लागत बा की एह सब बातन के समय के परिधि में नइखे समेटल जा सकत । पं. धरीक्षण मिश्र जी के बारे में कहल जाला की उहाँ के सबसे बड़ विशेषता रहे की संस्कृत के कठिन से कठिन छन्द के प्रयोग उहाँ के भोजपुरी में कइनी । विधुन्माला , शिखरिणी ,वंशस्थ , शविवदना ,शूर,मालिनी ,सार ,भुजंगप्रयात ,इंद्रव्रजा ,निधि ,अमृतध्वनी आदि छंद के प्रयोग उहाँ के भोजपुरी में मिलेला ।

 

पं. धरीक्षण मिश्र जी राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन अपना आखिन से देखले रहनी । एह परिवर्तन के  उहाँ के संवेदनशील मन पर गहरा असर पड़ल रहे । एगो उहाँ के रचना बड़ी प्रसिद्धि पवले रहे “सुराज सैर करत बा मिनिस्टरन की कार पर” एकर एगो बानगी देखल जाव :

आइल सुराज बा सही सुनात बात कान में ।
न आँखि से देखात बा न आवेत बा ध्यान में ।।
सुराज ना देखात बा जवार में पथार में ।
न ढाब ढाठ भाठ में न बाँगरे कछार में ।।
न खेत में न पेट में न बेर्हि में बखार में ।
न नोट में न कोट में न शौक में सिंगार में ।।
न बोर्ड में बाजार में न मिल में रोडवेज में ।
न श्राद्ध में बिहाय में न दान में दहेज में ।।
अकाल अन्न वस्त्र के सवार बा कपार पर ।
सुराज सैर करत बा मिनिस्टरन की कार पर ।।

पं. धरीक्षण मिश्र जी के रचना में समाजिकता बाटे इहाँ के लिखल एगो कविता बाटे कि “बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल” एकरा माध्यम से जब इहाँ के कहत बानी कि

कइसन घर बर मिली कहाँ से धन दहेज के आयी ।

कइसन मिलिहें सासु ननद जहवाँ बेटी बियहायी ।

भारी चिन्ता एगो माथापर सवार हो गइल ।

बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल ।।

कई बार सरकारो एके तूरे के सरियाइल ।

तब मेन गेट तजि बैक डोर से चुपके से चलि आइल ।

हार मानि अब चुपचाप बा सरकार हो गइल ।

बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल ।।

 

दहेजवा जादू के बा भारी एगो खेल हो गइल ।

एकरा आगे सबके अक्किल बाटे फेल हो गइल ।

कवनों लउकत ना उपाय बा अन्हार हो गइल ।

बाटे बेटी के बियहवा भारी भार हो गइल ।।

 

ई कविता बड़ बाटे बाकिर एहमे एकर चारित्रिक चित्रण बड़ी जबरदस्त बाटे।  पं. धरीक्षण मिश्र जी के पहिला किताब “शिव जी के खेती” रहे जवन १९७७ में आइल रहे । गृहस्थी के पूरा साँच समेटले शिव , पारबती आ नारद मुनि के केंद्र में राख के , व्यंग आ रस से सउनाइल शिव जी के खेती सब केहू के पढ़े लायक बनल बाटे।

पं. धरीक्षण मिश्र जी के वास्तविक काव्य-भूमि व्यंग्य रहे , अगर हम उहाँ के भोजपुरी काव्य के परसाई आ श्री लाल शुक्ल कही त एहमे कवनो सानी नइखे। मिश्र जी के साहित्य पर कुछ काम  भइल बाटे आ अभी बहुत कुछ बाकी बाटे । एगो कहावत कहल जाला की करनी के फलआज ना त कल । आजो कबो कबो जब गोरखपुर आकाशवाणी से धरीक्षण मिश्र जी के कविता के पुनः प्रसारण होखेला त तन मन आनन्द से भर जाला । सुनी के “कौना दुखे डोली में रोवति जाति कनियाँ ” बहुत जाना के रोवां खाड़ा हो जाला ।

पं. धरीक्षण मिश्र भोजपुरी साहित्य के समृद्धता के दस्तावेज बानी । उहाँ के रचना संसार भोजपुरी साहित्य के निर्माता के श्रेणी में बाटे । साहित्य अकादमी उहाँ पर भारतीय साहित्य के निर्माता शृंखला में विनिबंध निकलले रहे । कहल जाला कि साहित्य में मुख्य रूप से ऊहे रचना स्वीकार होला चाहे जीवन पावेला जवन बहुधा कंठ से अनेक रूप में बन बिगड़के एगो सर्वमान्य रूप धारण कर लेवेला । पं. धरीक्षण मिश्र भोजपुरी साहित्य के ऊ पारस बानी जवना के एको कोना अभी ठीक से पकड़ाइल नइखे । उहाँ के रचल साहित्य अभी बाट जोहत बा ओह जौहरी लोगन से जे आवे देखे, परखे आ दुनिया के देखावे , की हई देखs , हई देखs… भोजपुरी एगो भाषा के तौर पर केतना समृध्द बाटे आ ओकर लगे अपना साहित्यकारन के रूप में कइसन कइसन अनगढ़ पारस बाटे ।

  • जलज कुमार मिश्र

 

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