बाबा रे बाबा

आपन – आपन धरम माने के स्वतन्त्रता संविधान मे का दिया गइल , लोगन के लुच्चा ब्रांड के दोकान खोले के परमीसन खलित्ता मे आ गइल । देश भर के सोझबक मनई जेकर आस्था अपने धरम मे रहेले , ओकरे ओही आस्था के दोहन करे ला कब कवन नवका धरम / संप्रदाय / पंथ  बन जाई, पते ना चलेला । जब उहवाँ लोग शिकार होखे लगेलें, तबे जरि मनी केकरो कान पर जुवाँ रेगेनी सन । अइसनका दोकानी वाला बाबा, तांत्रिक, फकीर, मौलवी, फादर, भिक्षु लो अपने चारो ओरी ढेर दमगर भौकाल बना के रखेला । चमक दमक आउर चमत्कार के बीनल जाल मे बड़ बड़ जाने घुमरी घूमत मिलेलन । आम मनई से लेके बड़ बड़ नेता लो उनुके इहवाँ दरबार लगावत देखा जाने । काहें कि वोट बैंक वाली राजनीति के सूत्र इहवों से मिलेला । कब कवन बाबा , मौलाना केकरे इजत मे पलीता लगा देही , उ लगला के बादे बुझाला । ओकरा पहिले तक त बाबा लो भगवान से अवतारे नु होला , आउर केहु उनुकर चेला लो उनुका बारे मे कुछहु सुनलों ना चाहेला ।

एगो हिन्दी फिलिम आइल रहे “हरे राम हरे कृष्ण” ओही के एगो गीत अचके मन पर गइल ह । राउरो देखी न –

“ देखो ओ दीवानों ऐसा काम न करो , राम का नाम बदनाम न करो ।“

इहवाँ त आशाराम , रामपाल , रामबृक्ष, राम रहीम —– जइसन लमहर फेहरिस्त बा । अब लोग बाग अइसने नाम वालन से डेराए / घबराये लागल बाड़न । कवनों माई – बाबू अपने बचवन के नाँव मे “राम” जोड़े से पहिले हजारो बेरी सोचिहें । ए घरी त अइसने कूल्हि धरमगुरु गोट बाड़न सन आउर धरम के आड़ लेके पेड़ा चापत बाड़न सन । सरकार आउर सगरी राजनीतिक दल के लो ओहनी के इहाँ हाजिरी लगावत बाड़न । कवनों कुकरम से अछूता नइखे सन ई कूल्हि बाबा । अब त बुझात बा कि जेलो मे एगो आश्रम बनावे के परी । “ तू चल मै आता हूँ ” के तरज पर गवें – गवें रसता बनि रहल बा । ए कूल्हि बाबा लोगिन के खाति कवनों सम्बंध के मतलब कुछों नइखे । एह लोगिन के त अपने ऐयासी से खाली मतलब बा । समाज के सोझा कई गो उदाहरन आ गइल तबो समाज के अभी ले नइखे बुझाइल । भक्ति ठीक बात ह बाकि अंधभक्ति के त ठीक ना काहल जा सकेला । आपन अलग दुनिया बसावे के ख्वाब राखे वाला अइसन बाबा लो पापाजी ,बापू आ पता ना का का कहवावेला अपना के आउर ओकरे उलट काम करेला । ई कूल्हि बाबा समाज के दीमक लेखा चाट रहल बाड़े आ खोखड़ बना रहल बाड़े । न्यायपालिका के जागल एह देश खाति ढेर जरूरी बाटे काहें कि राजनीतिक दल त खाली वोट के राजनीति करेला लो, उ लो उचित ला त कबों नीमन परयास ना करे ।

एह देश मे एह देश के लोगन के जगाइब ,संभव नईखे , नामुमकिन बा । इहवाँ त लोग जान बूझ के जहर पिएला आउर बाद मे दोसरा के एकर दोष लगावेला । अइसन न रहत त चारा पचाओ, माटी खपाओ, परिवार बचाओ रैली ना होखत । इहवाँ के सामाजिक संरचना के ढेर अनगढ़ बा, ओकरा परिभाषित करल आसान नइखे । इहाँ के समाज कब कवने रौ मे बह जाई, कहल ना जा सकेला । ई कूल्हि देखला , सुनला , समझला के बाद त बस इहे कहल जा सकेला – “गइल भइसिया पानी मे” ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

 

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