बंगड़ गुरु के मिललीं नानी

” का बंगड़ भइया,काहें सोकतायिल हउवा।एतरे त एतना चहकेला कि चिरई-चुरुंग फेल।आज काहें उदासल हउवा भाय ?” मिंकू बंगड़ गुरु के आगे -पीछे चलत परिकरमा करत रहलन बाकिर बंगड़ चुप।

” आजकल लगन क दिन ह भइया।एतना सादी-बियाह होत ह कि पापा नेवता-हँकारी करत हलकान- परेसान हो जात हउवन..त ऊ का ह कि जयिसहीं हम दस-बीस गो रुपैया मांगत हईं कि अगियाबैताल नियन सोंटा लेके मारे धउरा लेत हउवन।उधारी एतना चढ़ गईल ह कपारे प कि सोचते घुमटा आवे लगत ह।तनी चाह-पान क मन रहल ह…..।का बतायीं भइया नसा छूटत ना ह अउर नोकरी -चाकरी मिलत ना ह।” मिंकू क सुर में चाशनी भरपूर रहल बाकिर बंगड़ विरक्त।मिंकू के पान-तमाखू क एतना तलब होत रहल कि बंगड़ क चुप्पी उनके बरदास्त के बाहर रहल।

” हऊ नीलुवा कुछो कह देलस हे का भइया ?” मिंकू बंगड़ के मन क थाह लिहल चहलन बाकिर बंगड़ मौन-मूक होके चलल चल जात रहलन।

” अच्छा त हमके पहिलहीं अंज़ाद हो गईल रहल ह कि ऊ तोहरे लायक ना हे।जाए दा भइया अइसन कुल आवल -जायल करीहन, मन थोर नत करा।चला तनी चौरसिया के दूकान ओरी…जंहवा मुंह में बीड़ा घुलल कि तहवाँ पीड़ा भुलल..।” मिंटू चौरसिया के दूकान ओरी दू डेग बढ़वलहीं रहलन कि बंगड़ उनकर कालर पकड़ के चार डेग पीछे खींच लियइलन।

” का बे ! हम चुप का हैं कि तुमको सुतार हो गया है। तब ले बकर-बकर किये पड़े हो…आंय ।” मिंटू जान गयिलन कि बंगड़ क्रोध में हउवन काहें कि जब बंगड़ क्रोध में रहेलन त खड़ी बोले लगेलन।

” अच्छा जाएदा बंगड़ भइया अब ना बोलब… हमके कुछ काम इयाद आ गईल ह।” मिंटू कालर में कसायिल जात कंठ से मिनमिनात रहलन।

” आछा! तो अब तुमको काम इयाद आ गया…आंय।जब मुफ़ुत में पान कचरने के फिराक में थे तो काम नहीं आया.. जाओ ससुर हम जानते हैं कि हमहीं केहू के काम आ जाँय त आ जायँ अउरी केहू हमरे काम नहीं आने वाला।देख लिए सबका सेवा-टहल करके… ससुर दू कौड़ी की इज्जत नहीं है घरे -बहरे ।” बंगड़ मिंटू क कालर छोड़ के एगो पेड़ के नीचे भुँइयां आलथी-पालथी मार के आसन जमा लिहलन।अब मिंटू फिरो पान-गुटखा के तलब से परेसान बंगड़ के फिकिर में बूड़त -उतरात कहलन-

” का भईल भइया.. केहू कुछ कह दिहलस ह का ?” मिंटू बंगड़ के कान्ही प हाथ ध के दुलार देखावत कहलन।बाकिर बंगड़ चुप आसमान निहारत रहलन।

” भइया हम का कहत हईं कि हमहन के ई इंटर – बीए क पढ़ाई से त नोकरी -चाकरी मिली ना।चला कवनो काम -धंधा खोजल जाय।

” कवन काम करबे बे …।झाड़ू -बुहारू करबे कि तरकारी क ठेला ठेलबे..आंय..।” ओतना देरी में पहिली बेर बंगड़ ठठा के हसलन अउर मिंकू मगन होके स्वास-स्वास में पान-गुटखा क आस धरे लगलन।

” भइया हम का कहत हईं कि चला चलल जाय चौरसिया भइया के दूकान ओरी।चाह -वाह पी के अराम से उंहवे कुछ पलानिंग करेके।” बंगड़ मिंकू क तलब जानत रहलन एहि से ऊ जेतना बार चौरसिया क नाम ले ई टाल जायँ-

” उँहा कवन पलानिंग करबे बे ,इंहवे कर।आज हमार मन ना ह ओह ओरी जाये क।सबेरे-सबेरे अइसन काण्ड हो गईल ह कि दीमाग अबहीं ले ख़राब ह।” बंगड़ माथ प हाथ फेरत कहलन।

” का भयल भइया ?” मिंकू केहू तरे भइया के पटा के पान खायल चाहत रहलन।एहि से उनके झेले खातिर तैयार बइठल रहलन।

” अइसन आज एगो बुढ़िया उल्लू बनवलस हे कि नत पूछ।”

” बुढ़िया …आंय केकर मजाल ह कि तोहके उल्लू बना दिही।उहो बूढ़ -ठूढ़।”

” अरे का बतायीं रे..।” बंगड़ अफ़सोस करत कहलन

” बतावा न ?” मिंकू क जिग्यासा अब गगन छुवे लगल रहल।

” सबेरे-सबेरे टहरत चौकाघटवा ओरी गईल रहलीं।हऊ जवन ठेकवा ह न सरबवा क ओकरे लग्गे चहुँपलीं त का देखत हईं कि एगो सराबी नसा में धुत्त दुकनिया के समने लोटल रहल।”

“त का ऊ बुढ़िया के तंग करत रहल ?”

“नाही।”

“तब ?”

” हम कुल नौटंकी उंहवे निमिया क पेड़वा तरे ठाढ़ होके देखत रहलीं।”

“त का भयल ?

” चौरहवा किहाँ जवने टेम्पू रुके ओही में बइठल लइकियन के उ सरबिया हाथ में बोतल लहरावत इसारा करे कि आवा पी ला।”

“तब ?”

” तब का हमार मन करत रहल कि जायीं दू डंटा मारी ससुर के कुल्ह नसा हिरन हो जाय।”

” त मरला का ?…कहीं ओही बुढ़िया क बेटवा त ना रहल ऊ ?”

” ना ”

“काहें ,अइसन कुल नसेड़िन के त लोटा-लोटा के कूटे के चाही।” मिंकू हाथ घुमा-घुमा के मारे के मुद्रा आ गईल रहलन।

“अरे हम कुछ करीं-कहीं कि ऊ बुढ़िया अटुववा में से निकल के बहरे आईल अउर सरबिया ओरी जाए लगल।हमके लगल कि सरबिया के मारे जात हमहूँ पाछे -पाछे धउर अयिलीं।”

” फिर?”

“फिर का,ऊ काण्ड भईल कि अबहीं ले हमार रोवां खड़ा हो जात ह।”

” अइसन का भईल ?” मिंटू मुँह फड़ले बंगड़ ओरी से कवनो धमाका क इंतज़ार करत रहलन।

” अरे का बतायीं।जब बुढ़िया सरबिया के लग्गे चहुँपल त सरबियो चिहा के ओके ताके लगल।हमहूँ क्रोध में रहलीं।बुढ़िया कुछ बोले ऐसे पहिले हमही सरबिया के गारी-फक्कड़ देवे लगलीं।”

” ठीके त कइला।बुढ़िया खुस हो गईल होई ? ”

“ना यार।कुल उलटा हो गयल?”

” अइसन का भयल भइया ?”

” अरे जयिसहीं हम सरबिया के मारे खातिर थपरा तनलीं कि बुढ़िया तड़ से मारत त बा एहि गाल प।” बंगड़ आपन दायाँ गाल आगे बढ़ा के मिंटू के देखवलन।

” ओह ..बाकिर मरलस काहें ? ”

” थपरा मार के कहलस कि जब दू घोंट पिए के फीरी (फ्री) में मिलत रहल ह त तू काहें लंगड़ी मरले ह मुंहफुकना।”

“आंय.. का बात भइया गज़ब… अरे कास कि हमहूँ रहल रहतीं उँहा।मज़ा आ जात गुरु ,एक बंगड़ के संगे दोसर बंगड़ क बंगड़ई देखे के मिलत।हम का कहत हईं भइया कि जरूर ऊ कवनो जमाने में तोहार नानी रहल होइहन।एके कविता में अइसे कहल जा सकता ह , बंगड़ गुरु के मिललीं नानी ,कुल बंगड़ई हरलीं नानी।’ मिंटू ठठा के हँसत रहलन।एह आनंद के आगे ऊ पान-तमाखू क तलब भुलाय गयल रहलन।

  • डॉ  सुमन सिंह

वाराणसी

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