नारी

मुकद्दर के मारल

भगावल हई

कहि के अबला धरा पे

सतावल हई,

घर के देहरी मोरे खातिर

जेहल भई

हाँथ कंगन पिन्हाँ के

छिपावल हई।

 

सभ्य दुनिया कहाँ बा

बतावे कोई

साँच नेहिया पिरितिया

देखावे कोई,

इन्तहाँ भुत में बाटे

हमरे भईल

आज भी मोके माहुर

पियावे कोई।

 

चौसर पे रख के

संघारल हई

त कभों चीर खिंच के

उघारल हई,

कभों बन के शक्ति

पुजाई ला हम त

कभों दिल से हमहीं

बिसारल हई।

 

दर्द बाटे हिया में

धसल काँट जस

वक्त से पहिले हमहीं

त मारल हई,

मड़वा में आगी के

फेरा लगाई के

दईजा बदे “योगी”

जारल हई।

 

कहि के अबला धरा पे

सतावल हई।।

 

योगेन्द्र शर्मा “योगी”

ग्राम व पोष्ट-भीषमपुर,

चकिया,चन्दौली (उ.प्र.)

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